इंडिया स्पीक डेली ब्यूरो। भारतीय चुनावी तंत्र में चल रही वैधानिक धांधली और करोड़ों नागरिकों के मताधिकार पर चल रहे बुलडोजर पर अब देश की सर्वोच्च न्यायिक चेतना ने सबसे बड़ा और अचूक हथौड़ा चलाया है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओक (Justice Abhay Oka) ने ‘बीबीसी मराठी’ को दिए एक विस्तृत और बेबाक साक्षात्कार में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग की पूरी कार्यप्रणाली को कानूनी रूप से ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ करार दिया है। जस्टिस ओक ने दो टूक शब्दों में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को मई 2026 के अपने उस आदेश पर तुरंत पुनर्विचार (Revisit) करना चाहिए जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को हरी झंडी दी गई थी।
जस्टिस ओक के 5 अकाट्य कानूनी प्रहार—जिन्होंने चुनाव आयोग की चूलें हिला दीं
जस्टिस ओक ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1950 और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 की कानूनी संहिताओं को सामने रखते हुए चुनाव आयोग के हर प्रशासनिक हथकंडे को बेनकाब किया है:
1. एक साथ पूरे राज्य या देश में SIR चलाना गैर–कानूनी
जस्टिस ओक ने बताया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) संसद द्वारा बनाई गई एक विशेष व्यवस्था है। इसके तहत किसी विशेष परिस्थिति में किसी एक निर्वाचन क्षेत्र या उसके सीमित हिस्से में ही विशेष पुनरीक्षण किया जा सकता है। आयोग संसद द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को लांघकर पूरे देश या राज्य की सभी सीटों पर एक साथ SIR नहीं थोप सकता। आयोग को मनमाना अधिकार नहीं है कि वह जब चाहे, जैसे चाहे कानून के दायरे से बाहर जाकर पूरी व्यवस्था को पलट दे।
2. ECI का फॉर्म न भरने पर नाम काटना पूरी तरह ‘अवैध‘
चुनाव आयोग ने फरमान सुनाया था कि जो नागरिक आयोग का प्री-फिल्ड ‘इन्यूमरेशन फॉर्म’ जमा नहीं करेगा, उसका नाम ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर कर दिया जाएगा। इस पर जस्टिस ओक ने सख्त लहजे में कहा कि “न तो 1950 के कानून में और न ही 1960 के नियमों में ऐसा कोई प्रावधान है जो किसी नागरिक का नाम सिर्फ इसलिए काटने की अनुमति देता हो कि उसने आयोग का नया फॉर्म नहीं भरा।“ फॉर्म न भरना नाम काटने का कानूनी आधार बन ही नहीं सकता।
3. बिना नोटिस और बिना सुनवाई के वोट की हत्या
कानून का स्पष्ट नियम है कि यदि किसी मतदाता की पात्रता पर कोई संशय या आपत्ति है, तो पहले उसे ‘कारण बताओ नोटिस‘ (Show Cause Notice) भेजा जाएगा, जवाब देने का समय मिलेगा और बाकायदा ‘व्यक्तिगत सुनवाई‘ (Hearing) होगी। लेकिन आयोग ने क्या किया? न कोई नोटिस दिया, न कोई सुनवाई की; एक मनगढ़ंत फॉर्म के न मिलने का बहाना बनाकर करोड़ों नागरिकों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से सीधे साफ कर दिए।
4. फॉर्म-6 और फॉर्म-8 बदलने का अधिकार संसद का है, ज्ञानेश कुमार का नहीं
चुनाव आयोग ने 18 वर्ष के युवाओं के लिए फॉर्म-6 में 2003 की मतदाता सूची का विवरण मांगने वाला जो नया घोषणापत्र (Declaration) जबरन नत्थी किया था, उस पर प्रहार करते हुए जस्टिस ओक ने कहा कि फॉर्म-6 और फॉर्म-8 में किसी भी प्रकार का बदलाव करने की शक्ति केवल नियम बनाने वाले प्राधिकारी यानी केंद्र सरकार और संसद के पास है। चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से वैधानिक फॉर्मों को अपनी मर्जी से नहीं बदल सकता।
5. चुनाव आयोग देश के नागरिकों की ‘नागरिकता‘ तय करने वाली अदालत नहीं है
चुनाव आयोग का काम निष्पक्ष चुनाव कराना और पात्र नागरिकों को सूची में दर्ज करना है। चुनाव आयोग कोई फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल या नागरिकता तय करने वाली एजेंसी नहीं है जो गरीबों और युवाओं से उनके पुरखों की नागरिकता के कागजात मांगकर उन्हें मताधिकार से बेदखल करने लगे।
आसान मिसाल: आपकी सोसाइटी आपका पानी काट दे और नियम भी न दिखाए!
सोशल मीडिया पर आम नागरिकों ने जस्टिस ओक के इस कानूनी खुलासे को जिस सरलता से समझाया है, वह इस तानाशाही को पूरी तरह नंगा करता है:
“ज़रा सोचिए, आपकी हाउसिंग सोसाइटी अचानक आपका पानी का कनेक्शन काट दे। न कोई नोटिस, न कोई सुनवाई। कारण पूछने पर सोसाइटी कहे: ‘आपने हमारा वह नया फॉर्म नहीं भरा, जिसका सोसाइटी के किसी बायलॉज में जिक्र तक नहीं है!’ जब आप पूछें कि यह नियम कहाँ लिखा है, तो कमेटी कहे: ‘हम तय करेंगे कि इस बिल्डिंग का निवासी कौन है!’ ठीक यही अपराध चुनाव आयोग ने देश के करोड़ों मतदाताओं के वोट के साथ किया है!“
सुप्रीम कोर्ट के नाम पर झूठा प्रेस नोट और अब न्यायिक बगावत
याद कीजिए, 26 सितंबर को चुनाव आयोग ने आधिकारिक प्रेस नोट जारी कर दावा किया था कि फॉर्म-6 में जोड़े गए इस विवादित घोषणापत्र को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दे दी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत खंडन करते हुए कहा था कि “हमने किसी संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी।“
अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओक का यह बयान सीधे तौर पर साबित करता है कि:
*मई 2026 में जब सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने SIR को अनुमति दी थी, तब फॉर्म-6 में अवैध बदलाव और नियमों के उल्लंघन के ये जमीनी तथ्य अदालत के सामने पूरी तरह रखे ही नहीं गए थे।
*पूर्व गृह सचिव आर. के. सिंह ने 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने और RPA की धारा 21-22 के उल्लंघन का जो आरोप लगाया था, उस पर अब सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ पूर्व न्यायाधीश ने कानूनी मुहर लगा दी है।
‘इंडिया स्पीक डेली‘ का सीधा सवाल:
जब देश की शीर्ष अदालत के एक सम्मानित पूर्व जज सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि चुनाव आयोग ने कानून का उल्लंघन किया है, बिना नोटिस नाम काटे हैं और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर संसद की शक्तियों को हथियाया है—तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार किस नैतिक अधिकार से उस कुर्सी पर चिपके हुए हैं?
*क्या मोदी सरकार का चुनाव आयोग अब संसद के ऊपर होकर अपने खुद के कानून लिखेगा?
*क्या देश की संप्रभु जनता का वोट अब किसी अमेरिकी वेंचर कैपिटलिस्ट समर्थित बैकएंड सॉफ्टवेयर (NxtGen/विनोद खोसला) और चुनाव आयोग के अवैध फॉर्मों की दया पर निर्भर रहेगा?
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका पर चुनाव आयुक्तों की ‘आजीवन कानूनी सुरक्षा’ (Lifelong Immunity) को लेकर केंद्र और ECI को नोटिस जारी कर रखा है। अब जस्टिस अभय ओक के इस खुलासे के बाद देश के सामने सब कुछ शीशे की तरह साफ है—वोट भारत की जनता का संवैधानिक अधिकार है, चुनाव आयोग के बाबूओं की जागीर नहीं। सुप्रीम कोर्ट को बिना एक पल गंवाए इस पूरे गैर-कानूनी SIR को रद्द कर देश के लोकतंत्र को इस संस्थागत अपहरण से मुक्त कराना चाहिए!
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