इंडिया स्पीक डेली लीगल ब्यूरो। नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) के नाम पर सामने आए हैरान करने वाले आंकड़ों और मनमानी प्रशासनिक कार्यशैली पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। दिल्ली में एक झटके में एक-तिहाई के करीब (32.8%) मतदाताओं को ड्राफ्ट सूची से बाहर किए जाने और नियमों के विपरीत फॉर्म में बदलाव किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग (ECI) को कड़े कानूनी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
शीर्ष अदालत ने दो टूक व्यवस्था दी है कि निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत तय फॉर्म 6, 7 और 8 में अपनी मर्जी से कोई फेरबदल करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास कतई नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने आयोग से सीधा सवाल दागा है कि जो लाखों नागरिक पहले से ही मतदाता सूची में विधिवत दर्ज थे, उन्हें दोबारा नाम जुड़वाने के लिए नए मतदाता वाला ‘फॉर्म-6’ भरने को क्यों मजबूर किया जा रहा है?
दिल्ली SIR का भयावह सच: 1.45 करोड़ में से 47.57 लाख वोटर ड्राफ्ट से बाहर
दैनिक भास्कर द्वारा संकलित आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में चलाए गए इस तथाकथित गहन पुनरीक्षण (SIR) ने राजधानी के चुनावी भूगोल को हिलाकर रख दिया है:
* कुल मतदाताओं में 32.8% की ऐतिहासिक गिरावट: SIR प्रक्रिया शुरू होने से पहले दिल्ली में कुल मतदाताओं की संख्या 1.45 करोड़ थी। SIR के बाद जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में यह आंकड़ा घटकर मात्र 97.54 लाख रह गया है। यानी राजधानी के 47.57 लाख मतदाताओं के नाम सीधे ड्राफ्ट सूची से बाहर फेंक दिए गए हैं।

* 43.33 लाख जीवित नागरिकों पर ‘शिफ्टेड या लापता’ का ठप्पा: ड्राफ्ट सूची से बाहर किए गए 47.57 लाख नामों का जब वर्गीकरण देखा गया, तो चौंकाने वाली हकीकत सामने आई:
* अनुपस्थित / शिफ्टेड / अन्य: 43.33 लाख
* मृत मतदाता: मात्र 2.82 लाख
* एक से अधिक जगह दर्ज (डुप्लीकेट): मात्र 1.42 लाख यानी बाहर किए गए लोगों में 90 प्रतिशत से अधिक वे जीवित नागरिक हैं, जिन्हें बिना पुख्ता सत्यापन के सिर्फ ‘अनुपस्थित या शिफ्टेड’ का ठप्पा लगाकर सूची से बेदखल कर दिया गया।
* ड्राफ्ट लिस्ट का वर्तमान स्वरूप: वर्तमान ड्राफ्ट सूची में 49.89 लाख पुरुष, 47.64 लाख महिला और 447 थर्ड जेंडर मतदाता शेष बचे हैं। इस पूरी कवायद में 33.14 लाख नोटिस जारी किए गए थे, जिनमें से 31.27 लाख नोटिसों के निपटारे का दावा किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट का सीधा सवाल: “पहले से पंजीकृत वोटर दोबारा फॉर्म-6 क्यों भरें?”
सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने सुनवाई के दौरान आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर कानूनी सवाल उठाए:
1 . फॉर्म-6 का मूल स्वरूप: अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्वाचक नियमों के तहत ‘फॉर्म-6’ का उपयोग केवल और केवल पहली बार मतदाता बनने वाले नए नागरिकों के पंजीकरण के लिए विहित है।
2 . झूठी घोषणा का दबाव: जब ये 43.33 लाख नागरिक पहले से ही देश के वैध और पंजीकृत मतदाता थे, तो उन्हें दोबारा नए सिरे से अपनी नागरिकता और पात्रता साबित करने के लिए फॉर्म-6 की कतार में क्यों खड़ा किया जा रहा है? पहले से पंजीकृत नागरिक से नए वोटर का फॉर्म भरवाना उनसे एक तरह से ‘झूठी घोषणा’ (False Declaration) करवाने जैसा गैर-कानूनी कदम है।
3 . सुधार के लिए फॉर्म-8 का प्रावधान: यदि कोई मतदाता किसी कारणवश स्थानांतरित (Shifted) हुआ है या उसके पते व विवरण में बदलाव आया है, तो कानूनन उसके लिए ‘फॉर्म-8’ का प्रावधान है। चुनाव आयोग उन्हें फॉर्म-8 भरने की अनुमति देने के बजाय सीधे फॉर्म-6 थोपकर उनके मूल मताधिकार को ही शून्य मान रहा है।
नियमों का आईना: फॉर्म 6, 7 और 8 का वैधानिक उपयोग
सांविधिक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियमों के तहत तीनों फॉर्मों के कार्यक्षेत्र पूरी तरह स्पष्ट और कानून द्वारा सीमित हैं:
| फॉर्म | कानूनन निर्धारित उपयोग | चुनाव आयोग द्वारा किया गया कथित दुरुपयोग |
| Form-6 | वोटर लिस्ट में पहली बार नया नाम शामिल कराने (New Registration) के लिए। | पहले से पंजीकृत लाखों पुराने वोटरों पर जबरन थोपा गया और नए युवाओं के सामने अवैध शर्तें जोड़ी गईं। |
| Form-7 | किसी नाम पर वैध आपत्ति दर्ज कराने या नाम हटाने के आवेदन के लिए। | बिना ठोस आधार के थोक में नाम काटने के लिए दुरुपयोग किया गया, जिस पर बाद में आयोग को कैपिंग लगानी पड़ी। |
| Form-8 | पहले से दर्ज जानकारी में सुधार, पता बदलने या अन्य संशोधनों के लिए। | शिफ्टेड वोटरों को इसका सामान्य इस्तेमाल करने देने के बजाय फॉर्म-6 की जटिलताओं में धकेला गया। |
फॉर्म-6 में अवैध बदलाव और आयोग के 26 सितंबर के दावे की खुली पोल
* फॉर्म-6 का यह विवाद तब फूटा था जब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट में यह उजागर हुआ कि चुनाव आयोग के दोनों चुनाव आयुक्तों ने फाइलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराते हुए फॉर्म-6 में किए जा रहे बदलावों को ‘अनाधिकृत और अवैध’ कहा था।

* युवाओं के सामने खड़ी की गई दीवार: विपक्ष और याचिकाकर्ताओं का मुख्य आरोप है कि चुनाव आयोग ने नए मतदाताओं के फॉर्म-6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणाएं और अव्यावहारिक शर्तें नत्थी कर दीं, जिससे पहली बार मतदाता बनने वाले युवा वर्ग के लिए अपने मताधिकार का उपयोग करना बेहद कठिन हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया आयोग का दावा: चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को आधिकारिक प्रेस नोट जारी कर यह नैरेटिव बनाने की कोशिश की थी कि फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को ‘सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी’ मिल चुकी है। लेकिन शीर्ष अदालत ने सुनवाई में साफ कर दिया कि अदालत ने ऐसे किसी संशोधित फॉर्म-6 को कभी कोई मंजूरी नहीं दी है।
निष्कर्ष: लोकतांत्रिक शुचिता पर लगा गहरा बट्टा
दिल्ली के इस आधिकारिक आंकड़े ने साबित कर दिया है कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के नाम पर जो प्रक्रिया चलाई गई, उसने सुधार के बजाय देश के लाखों आम और कामकाजी नागरिकों के मताधिकार को ही संकट में डाल दिया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा फॉर्म 6, 7 और 8 में किसी भी छेड़छाड़ पर लगाई गई रोक और पुराने वोटरों से फॉर्म-6 भरवाने पर उठाए गए तीखे सवालों ने यह साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और नियमों से ऊपर नहीं हो सकता। जब देश की राजधानी में 43 लाख से अधिक जीवित नागरिकों को तकनीकी और प्रशासनिक बाजीगरी से ‘लापता’ बताकर सूची से बेदखल कर दिया जाए, तो यह केवल एक विसंगति नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक तंत्र पर गहरा संस्थागत आघात है। अब देखना यह है कि शीर्ष अदालत के इस कड़े हस्तक्षेप के बाद आयोग इन 43 लाख नागरिकों के मताधिकार को बिना किसी उत्पीड़न के किस तरह बहाल करता है।
