इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। लोकतंत्र में जब सत्ता अपने बनाए कानूनों से असहमति के स्वरों को पूरी तरह खामोश न कर पाए, तब वह तकनीकी और विधिक बारीकियों का ऐसा जाल बुनती है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खुद-ब-खुद दम तोड़ दे। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की ताजा रिपोर्ट इसी भयावह यथार्थ को सामने लाती है। केंद्र सरकार के नए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) कानून के खिलाफ देश के 21 सबसे बड़े मीडिया घरानों के शीर्ष संगठन ‘डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन’ (DNPA) ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। 698 पन्नों की इस विस्तृत याचिका में मीडिया समूहों ने स्पष्ट कहा है कि यह कानून स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता पर ‘प्री-सेंसरशिप’ (प्रकाशन-पूर्व सेंसरशिप) थोपने का औजार बन चुका है, जो किसी भी जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अक्षम्य आघात है।

यह पूरा विवाद सरकार के उस नए प्राइवेसी कानून से उपजा है, जिसमें पत्रकारिता और जनहित की स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए कोई स्पष्ट और ठोस छूट (Journalistic Exemption) नहीं दी गई है। कानून के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत डेटा—चाहे वह उसका वित्तीय लेन-देन हो, अनैतिक संपत्तियां हों या संदिग्ध गतिविधियां—उपयोग करने से पहले उसकी पूर्व-सहमति (Prior Consent) लेना अनिवार्य किया जा रहा है। इतना ही नहीं, संबंधित व्यक्ति को भविष्य में कभी भी अपनी सहमति वापस लेने (Withdrawal of Consent) का अधिकार होगा, जिसके बाद मीडिया संस्थानों को वह खोजी खबर अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म से मिटानी पड़ सकती है।
इसके साथ ही, कानून के तहत गठित होने वाला नियामक बोर्ड जनहित के अस्पष्ट और व्यापक आधार पर किसी भी सामग्री को ब्लॉक करवा सकता है तथा जांच के नाम पर मीडिया संस्थानों को उनके गोपनीय सूत्रों (Sources) का खुलासा करने पर मजबूर कर सकता है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस याचिका को दायर करने वाले DNPA में केवल स्वतंत्र या आलोचक माने जाने वाले संस्थान ही नहीं, बल्कि अडानी समूह का एनडीटीवी और मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह का नेटवर्क18 जैसे बड़े कॉरपोरेट घराने भी शामिल हैं।

यह घटनाक्रम महज एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि सत्ता और प्रेस के बुनियादी संबंधों पर गहरा प्रहार है। सवाल उठता है कि यदि एक खोजी पत्रकार को किसी भ्रष्ट राजनेता, नौकरशाह या बड़े कॉरपोरेट घोटालेबाज के खिलाफ खबर करने से पहले उसी व्यक्ति की ‘सहमति’ लेनी पड़े, तो क्या देश में बोफोर्स, 2G या व्यापमं जैसे खुलासे कभी संभव हो पाते?
यह प्रावधान व्यवहारिक रूप से किसी भी अपराधी या जालसाज को खबर छपने से पहले ही आगाह करने और सबूत नष्ट करने का कानूनी कवच थमा देता है। पत्रकारिता का मूल स्वभाव ही सत्ता की परतों को उधेड़ना और अंधेरे में छिपाई गई सच्चाइयों को रोशनी में लाना है। जब कानून ही यह तय कर दे कि सच लिखने के लिए संदिग्ध की अनुमति चाहिए, तो पत्रकारिता केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों और जनसंपर्क बयानों को छापने वाली मशीन बनकर रह जाएगी, जैसा कि याचिका में भी कहा गया है कि यह कानून खोजी पत्रकारिता को महज एक ‘नपुंसक और लाचार दर्शक’ बनाकर छोड़ देगा।
निजता एक बुनियादी नागरिक अधिकार है, लेकिन जब निजता की आड़ में सत्ताधीशों और नीति-निर्माताओं की जवाबदेही को खत्म किया जाने लगे, तो वह तानाशाही की ढाल बन जाती है। विकसित लोकतांत्रिक देशों—यहाँ तक कि यूरोपीय यूनियन के कड़े जीडीपीआर (GDPR) कानूनों में भी—सार्वजनिक हित में की जाने वाली खोजी पत्रकारिता को निजता और सहमति की बाध्यताओं से स्पष्ट छूट दी गई है।
इसके उलट, भारतीय डीपीडीपी कानून में ऐसी पत्रकारिता छूट का अभाव यह दिखाता है कि राज्य का उद्देश्य आम नागरिक के डेटा की रक्षा करना कम, और व्यवस्था के भ्रष्टाचार को उजागर करने वाली कलमों पर लगाम कसना अधिक है। गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर करने की विवशता किसी भी स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए मौत का फरमान है; क्योंकि यदि सूत्र ही सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो संस्थागत भ्रष्टाचार की जानकारी बाहर कौन लाएगा?
अंबानी–अडानी की कंपनियों ने भी मोदी सरकार को SC में घसीट लिया!
पत्रकारिता और पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए अंबानी-अडानी की मीडिया कंपनी भी खुलकर सरकार के विरोध में आ गई है। लल्लनटॉप की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी की कंपनियों समेत 21 न्यूज पब्लिशर्स ने मोदी सरकार के प्राइवेसी कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने कहा है कि इस कानून से मीडिया की आजादी पर असर पड़ेगा। केंद्र सरकार पत्रकारों के सूत्रों की जानकारी मांग सकती है, जिससे सूचना पहुंचाने वालों की पहचान उजागर होने का रिस्क होगा. इससे खोजी पत्रकारिता खत्म हो जाएगी। कानून में किसी भी डेटा के लिए इजाजत लेने के प्रावधान पर आपत्ति जताते हुए न्यूज पब्लिशर्स ने कहा कि ऐसा करने से जिसके खिलाफ जांच की जाएगी वो सतर्क होकर सबूत मिटा सकता है।

इस पूरे मामले में यह सबसे विचारणीय पहलू है, जहाँ अंबानी-अडानी के स्वामित्व वाले वो बड़े कॉरपोरेट मीडिया घराने भी अदालत की चौखट पर खड़े हैं जिन पर अक्सर सत्ता-समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं। जब अडानी और अंबानी के स्वामित्व वाले डिजिटल मीडिया समूह भी इस कानून के खिलाफ गुहार लगाने को विवश हो जाएं, तो यह समझ लेना चाहिए कि संकट कितना व्यापक और गहरा है। सत्ता जब नियंत्रण के कानून गढ़ती है, तो वह किसी की वफादारी नहीं देखती; उसका उद्देश्य व्यवस्था के प्रत्येक तंत्र को अपने नियंत्रण में लेना होता है।
न्यूज पब्लिशर्स की एसोसिएशन DNPA की ओर से 6 अक्टूबर को ये याचिका दाखिल की गई थी, जिस पर मंगलवार 27 अक्टूबर को सुनवाई होनी है. रॉयटर्स में छपी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, ये जानकारी पहली बार सामने आई है। न्यूज पब्लिशर्स की याचिका मोदी सरकार के प्राइवेसी कानून के रास्ते की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. क्योंकि अभी तक सिर्फ छोटे पब्लिशर्स और छोटे न्यूज संस्थानों के लोग इस कानून को चुनौती दे रहे थे। अब इस लिस्ट में अंबानी और अडानी जैसे बड़े नामों की कंपनियां भी जुड़ गई हैं।
सरकार ने दिया धोखा
न्यूज पब्लिशर्स का कहना है कि जब कानून बन रहा था, तब एक मीटिंग में सरकार ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वो इस कानून से प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेगी। लेकिन कानून में मीडिया को छूट नहीं दी गई है. यह मीडिया की आजादी में दखल देने जैसा है।
मोदी सरकार ने 2025 में लोगों के डिजिटल प्राइवेट डेटा की सेफ्टी के लिए प्राइवेसी कानून लागू करने का ऐलान किया था। बताया गया कि यह भारत का पहला डेटा प्रोटेक्शन कानून है. किसी भी कंपनी या संगठन को अगर आपका डेटा चाहिए तो इसके लिए आपकी सहमति लेनी होगी. ये भी साफ-साफ बताना होगा कि डेटा क्यों चाहिए।

भारत की ‘डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन’ (DNPA) का कहना है कि पत्रकारों को इस कानून से अलग रखने के लिए कोई प्रावधान नहीं है, जो चिंता की बात है। एसोसिएशन का कहना है कि अगर कोई पत्रकार किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच करता है तो इस कानून के तहत उसे पहले संबंधित व्यक्ति की इजाजत लेनी पड़ेगी। इससे वो सतर्क हो सकता है, जांच और गवाहों को प्रभावित कर सकता है, सबूत मिटा सकता है। इसके अलावा इस कानून की वजह से कई बार पत्रकारों को अपनी छपी खबरें हटाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
न्यूज पब्लिशर्स की एक चिंता ये भी है कि कानून में सरकार को जानकारी मांगने की जो शक्तियां मिली हैं, उससे पत्रकारों के सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती है।
यूरोप में पत्रकारों को इस कानून से रखा गया है बाहर
DNPA का कहना है कि यूरोपीय यूनियन, सिंगापुर, ब्रिटेन में भी इस तरह के कानून लागू हैं, लेकिन वहां पर इससे पत्रकारों को कानून से बाहर रखा गया है। बता दें कि DNPA न्यूज पब्लिशर्स का एसोसिएशन है, जिसमें मुकेश अंबानी का मीडिया समूह नेटवर्क-18 भी शामिल है। इसके अलावा गौतम अडानी का NDTV भी इसका सदस्य है। इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट जैसे संस्थान भी इस एसोसिएशन का हिस्सा हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के लिए परीक्षा की घड़ी।
सुप्रीम कोर्ट में इन सब आपत्तियों को लेकर 698 पन्नों की याचिका डाली गई है। कहा गया है कि ये कानून इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म को कमजोर कर देगा। पत्रकारों का काम सिर्फ घटनाओं को दर्ज करने तक रह जाएगा। इस कानूनों के प्रावधानों की वजह से खबरों को छपने से पहले ही रोकने का काम कर सकते हैं, जो लोकतंत्र के लिए मंजूर नहीं होना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने अब यह परीक्षा है कि वह तकनीक और डेटा की आड़ में रची जा रही इस विधिक तानाशाही से संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा कैसे करता है। यदि यह कानून बिना किसी ठोस पत्रकारिता छूट के लागू हो गया, तो देश में खोजी पत्रकारिता का औपचारिक अंतिम संस्कार तय है।
संपादकीय टिप्पणी:
यह महज संयोग नहीं है कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून, जिसे अगस्त 2023 में संसद से पारित कराया गया और जिसके सबसे विवादित प्रावधान मई 2027 से पूरी तरह अमल में आने हैं, उसी समय अदालत की दहलीज पर है जब देश में स्वतंत्र खोजी पत्रकारिता ने सत्ता के सबसे संवेदनशील तंत्रों को बेपर्द किया है। संसद से लेकर सड़कों तक मुख्यधारा का अधिकांश टेलीविजन मीडिया पहले ही सत्ता की चारदीवारी का भोंपू बनकर ‘गोदी मीडिया’ के रूप में तब्दील हो चुका है, जहाँ सत्ता की विफलताएं, घपले और संस्थागत क्षरण ‘प्राइम टाइम’ की बहसों से पूरी तरह गायब कर दिए जाते हैं। मगर सत्ता की बेचैनी तब बेकाबू हो गई जब मुट्ठी भर बेबाक खोजी रिपोर्टों ने सरकार के बुने गए आख्यान की धज्जियां उड़ा दीं।
टाइमलाइन गवाह है कि जब-जब सत्ता ने संस्थाओं पर अपनी पकड़ पूरी तरह मजबूत समझी, तब-तब खोजी रिपोर्टों ने अंदरूनी सड़न को जनता के सामने ला पटका:
* चुनाव आयोग के भीतर असहमति का खुलासा: सितंबर 2026 में ही द इंडियन एक्सप्रेस की सनसनीखेज खोजी पड़ताल ने देश को चौंका दिया, जिसमें उजागर हुआ कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के कामकाज और विवादित ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया पर चुनाव आयोग के अन्य दोनों आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने 10 महीनों में 14 गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इस रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की कथित ‘एकजुट निष्पक्षता’ के सरकारी दावे को तार-तार कर दिया।

* सुप्रीम कोर्ट को साधने की इनसाइड स्टोरी: अक्टूबर 2026 के आखिरी हफ्ते में द इंडियन एक्सप्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल के अप्रकाशित संस्मरण (Without Fear or Favour) के हवाले से ऐतिहासिक खुलासा किया। रिपोर्ट ने दस्तावेज किया कि कैसे कॉलेजियम की नियुक्तियों में सरकार सीधे हस्तक्षेप कर रही थी, जजों की जाति तक खंगाली जा रही थी और पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ सरकार के दबाव के आगे जरूरत से ज्यादा नतमस्तक थे।

* अरुणाचल और एलएसी पर चीनी घुसपैठ का पर्दाफाश:द हिंदू ने उपग्रह चित्रों और खुफिया सूचनाओं के आधार पर लगातार यह उजागर किया कि कैसे चीन ने अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले और लद्दाख की सीमा पर भारतीय दावे वाले क्षेत्रों में पूरे-के-पूरे गांव और सैन्य बुनियादी ढांचा खड़ा कर लिया है, जबकि सरकार ‘न कोई घुसा है, न कोई घुसा हुआ है’ की जुमलेबाजी में व्यस्त थी।
* इलेक्टोरल बॉन्ड और पेगासस का सच: इससे पहले स्वतंत्र डिजिटल पोर्टल्स और अखबारों ने ही उजागर किया था कि किस तरह चुनावी चंदे के नाम पर कॉरपोरेट ब्लैकमेलिंग का खेल चला और कैसे विदेशी स्पाईवेयर से विपक्षी नेताओं, जजों और पत्रकारों की जासूसी की गई।
यही वह बेबाक पत्रकारिता है जिससे सत्ता की नींद उड़ी हुई है। जब ‘प्रेस्टीट्यूट मीडिया’ के जरिए सत्ता की कालिख पर लीपापोती करने के तमाम पैंतरे इन कुछ मुट्ठी भर खोजी पत्रकारों की वजह से नाकाम होने लगे, तब सरकार ने निजता की आड़ में एक विधिक हथियार तैयार किया।
मई 2027 की समयसीमा तय करके डीपीडीपी कानून के जरिए ऐसा फंदा बुना गया है कि पत्रकार किसी भ्रष्ट नेता, दागी नौकरशाह या सांठगांठ वाले कॉरपोरेट की जांच करने से पहले उसी की ‘लिखित सहमति’ मांगने को मजबूर हों। यदि कोई खबर छप भी जाए, तो आरोपी अपनी सहमति वापस लेकर उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटवा दे और जरूरत पड़ने पर सरकारी बोर्ड पत्रकारों से उनके गोपनीय सूत्रों के नाम उगलवा ले।
यह निजता का संरक्षण नहीं, बल्कि संवैधानिक पारदर्शिता की नृशंस हत्या की विधिवत तैयारी है। जो सत्ता टेलीविजन के स्टूडियो में आलोचना का गला घोंट चुकी है, वह अब कानून की धाराओं के जरिए उस आखिरी कलम को भी तोड़ देना चाहती है जो फाइलों में दबे काले कारनामों को जनता की अदालत में लाती है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने इस काले विधिक प्रावधान पर रोक नहीं लगाई, तो देश में लोकतंत्र केवल एक खाली खोल रह जाएगा—जहाँ सत्ता के अपराध सुरक्षित होंगे और सच बोलना अपराध बन जाएगा।
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मोदी सरकार बहुत बुरी तरह बौखलाईं हूई है और हर क्षेत्र में तानाशाही चाहतीं हैं।
जय सियाराम हर हर महादेव संदिपजी बहुत बढिया खबर दिया