इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि जब सत्ता की चमक सबसे तेज होती है, तब समाज का बौद्धिक और प्रबुद्ध वर्ग खामोशी से अपना फैसला सुनाकर उसे जमीन का अहसास करा देता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में विधान परिषद (शिक्षक एवं स्नातक क्षेत्र) के चुनाव नतीजों ने देश के राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। इस जनादेश का केंद्र बना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी, जहां भाजपा को न केवल हार का मुंह देखना पड़ा, बल्कि उसके अभेद्य किले दरकते नजर आए। लेकिन यह कहानी सिर्फ काशी तक सीमित नहीं है; यह पटना के तीन दशक पुराने गढ़ के ढहने, नागपुर में संघ मुख्यालय के आंगन में शिकस्त और देश के शिक्षित मतदाताओं के उस सामूहिक आक्रोश की दास्तान है, जिसे अब नजरअंदाज करना नामुमकिन है।
1. काशी का महासंग्राम: अपना संसदीय क्षेत्र भी नहीं बचा सके प्रधानमंत्री
वाराणसी में शिक्षक और स्नातक दोनों ही बौद्धिक वर्गों के चुनाव में सत्ता के भारी-भरकम प्रचार तंत्र की कलई खुल गई:
* वाराणसी खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र:
* विजेता:लाल बिहारी यादव (समाजवादी पार्टी)
* पराजित:डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा (भारतीय जनता पार्टी)
* सपा के लाल बिहारी यादव ने लगभग 4,898 मतों के निर्णायक अंतर से भाजपा प्रत्याशी को शिकस्त देकर अपनी सीट बरकरार रखी।

* वाराणसी खंड स्नातक सीट का सच:
* शिक्षक सीट से पहले स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी भाजपा के तीन बार के एमएलसी केदारनाथ सिंह को समाजवादी पार्टी के आशुतोष सिन्हा ने शिकस्त दी थी।
* स्थानीय प्राधिकारी कोटे में जमानत जब्त:
* इसी काशी में स्थानीय निकाय कोटे के एमएलसी चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी अन्नपूर्णा सिंह विजयी रहीं, जबकि भाजपा प्रत्याशी सुदामा पटेल तीसरे स्थान पर खिसक गए और अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए।
देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में स्थानीय निकाय, शिक्षक और स्नातक—तीनों ही स्तरों पर बुद्धिजीवियों और स्थानीयप्रतिनिधियों ने भाजपा के अधिकृत प्रत्याशियों को सीधे खारिज कर दिया। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के दावों के बीच जब शिक्षक और स्नातक मतदान केंद्र पहुंचे, तो उन्होंने विकास के विज्ञापनों के बजाय अपनी सेवा सुरक्षा, वेतन विसंगति और पुरानी पेंशन (OPS) के संकट को प्राथमिकता दी।
काशी का आक्रोश: जीत का घटता फासला, प्रशासनिक खेल के आरोप और जमीनी बगावत
काशी में भाजपा की यह पराजय अचानक नहीं हुई है, बल्कि इसकी पटकथा 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही लिखी जा चुकी थी। 2019 में करीब पौने पांच लाख वोटों से जीतने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2024 में कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन के प्रत्याशी अजय राय के सामने मुश्किल से करीब 1.52 लाख वोटों से ही जीत दर्ज कर सके। मतगणना के शुरुआती राउंड्स में जब अजय राय आगे चल रहे थे और प्रधानमंत्री खुद 6,000 से अधिक वोटों से पीछे हो गए थे, तो सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसर गया था।
अजय राय का आरोप: मतगणना के बाद यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने सार्वजनिक तौर पर मतगणना प्रक्रिया में हेरफेर का गंभीर आरोप लगाया था। अजय राय का कहना था: “शुरुआती राउंड्स में हम लगातार लीड कर रहे थे और पूरे देश ने देखा कि प्रधानमंत्री पीछे चल रहे थे। इसके बाद अचानक मतगणना की रफ्तार बेहद धीमी कर दी गई। प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग कर जानबूझकर काउंटिंग रोकी गई, लाइट गुल होने की बातें सामने आईं और पूरे सिस्टम ने मिलकर अंतिम राउंड्स में दबाव बनाकर मोदी जी को विजेता घोषित कराया। यदि चुनाव पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष होता, तो परिणाम कुछ और ही होता।”

जीत दर्ज करने के बाद जब प्रधानमंत्री पहली बार अपने संसदीय क्षेत्र काशी के दौरे पर पहुंचे, तो उनके काफिले पर एक चप्पल/जूता उछाले जाने की अप्रत्याशित घटना घटी, जिसने सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ यह साबित कर दिया कि जमीन पर लोगों के भीतर किस कदर गुस्सा सुलग रहा है।
यही हाल हालिया एयर शो के दौरान भी देखने को मिला। वायुसेना के भव्य शौर्य प्रदर्शन को देखने के लिए उमड़ी काशीवासियों की विशाल भीड़ को भुनाने के लिए जब सत्ता प्रतिष्ठान और सोशल मीडिया तंत्र ने इसे ‘मोदी-मोदी’ के व्यक्तिगत समर्थन के रूप में प्रचारित करना शुरू किया, तो स्थानीय जनता ने कड़ा ऐतराज जताया। काशीवासियों ने साफ संदेश दिया कि गंगा के घाटों पर उमड़ा जनसैलाब देश के जांबाज वायुसैनिकों और तिरंगे के सम्मान में था, न कि किसी राजनीतिक दल की चुनावी ब्रांडिंग के लिए।
प्राचीन आत्मा पर चोट और कारपोरेट कब्जा: क्यों उबल रही है काशी?
काशी के मतदाताओं, खासकर बुद्धिजीवियों, व्यापारियों और शिक्षकों के इस भारी गुस्से के पीछे कई गहरे और अनसुलझे जख्म हैं:
* प्राचीन विग्रहों और धरोहरों का विध्वंस: काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के नाम पर बनारस की संकरी पौराणिक गलियों, सदियों पुराने मठ-मंदिरों, दुर्लभ शिवलिंगों और पारंपरिक विग्रहों को बुलडोजर से तोड़े जाने का मलाल आज भी काशी के सनातन समाज और साधु-संतों के दिलों में सुलग रहा है। परंपरावादी काशीवासियों का मानना है कि आस्था के केंद्र को एक ‘टूरिस्ट प्लाजा’ और कंक्रीट के मॉल में तब्दील कर दिया गया।
* बुनकरों की बर्बादी और ‘फ्लैट रेट बिजली’ का संकट: बनारस की रीढ़ यहां का हथकरघा और पावरलूम बुनकर समाज (हिंदू और मुस्लिम दोनों) है। योगी सरकार द्वारा बुनकरों को मिलने वाली सब्सिडी/फ्लैट रेट बिजली योजना को खत्म कर मीटर प्रणाली लागू करने से हजारों बुनकर भुखमरी की कगार पर पहुंच गए और कई कारखाने बंद हो गए। बुनकरों ने बनारस में कई बार हड़ताल और सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया था।
* मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट का कंक्रीटीकरण व संवेदनहीनता: काशी की पहचान उसके प्राचीन घाटों के आध्यात्मिक और अक्खड़ स्वरूप से है। मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र महाश्मशान पर ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर प्राचीन पत्थरों और भवनों को तोड़कर कंक्रीट और स्टील के स्ट्रक्चर खड़े किए जा रहे हैं। स्थानीय डोम राजा परिवार, पंडे-पुरोहित और अंतिम संस्कार कराने वाले लोग इसे काशी की मोक्षदायिनी परंपरा और अंत्येष्टि के विधि-विधान पर हमला मानकर भीषण विरोध कर रहे हैं।

* स्मार्ट सिटी’ का जलभराव और सीवर संकट: हजारों करोड़ रुपये खर्च करने और ‘क्योटो’ बनाने के दावों के बावजूद बनारस की जमीनी हकीकत यह है कि हल्की बारिश में भी गोदौलिया, लंका, सिगरा और चौक की गलियां सीवर के गंदे पानी से लबालब हो जाती हैं। जलकल और सीवर के काम के नाम पर पूरे शहर की सड़कों को महीनों खोदकर छोड़ दिया गया, जिससे स्थानीय निवासियों और व्यापारियों का व्यापार ठप हुआ और जनजीवन नारकीय बन गया।
* किसानों की जमीन का जबरन अधिग्रहण (ट्रांसपोर्ट नगर व रिंग रोड परियोजना): वाराणसी के ग्रामीण और बाहरी इलाकों (जैसे मोहन सराय और बैरवन) में ‘ट्रांसपोर्ट नगर योजना’ और रिंग रोड फेज-2 के लिए किसानों की उपजाऊ जमीन औने-पौने दामों पर जबरन अधिग्रहित की गई। इसके विरोध में बनारस के किसानों ने महीनों तक धरना दिया, पुलिस की लाठियां खाईं और कई किसानों को जेल तक भेजा गया। यह ग्रामीण काशी का सीधा मोदी सरकार के खिलाफ खुला विद्रोह था।
* गंगा का दोहन और प्रदूषण: मोक्षदायिनी गंगा में लग्जरी और डीजल संचालित बड़े क्रूज उतारकर पर्यावरण और स्थानीय मल्लाहों की रोजी-रोटी पर सीधा प्रहार किया गया। क्रूज से निकलने वाले अपशिष्ट और सीवेज को सीधे पतित-पावनी गंगा में गिराए जाने के वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन को जुर्माना तक लगाना पड़ा, वहीं एनजीटी (NGT) ने गंगा के बहाव क्षेत्र में बनी ‘टेंट सिटी’ को अवैध मानते हुए भारी जुर्माना ठोका था।
* स्थानीय रोजगार पर बाहरी कब्जा: बनारस की स्थानीय अर्थव्यवस्था—चाहे वह विश्वप्रसिद्ध बनारसी साड़ी उद्योग हो, पान-मसाला, खिलौना उद्योग हो या कॉरिडोर और घाटों के आसपास की दुकानें—स्थानीय पीढ़ियों से काम कर रहे दुकानदारों को उजाड़कर बड़े पूंजीपतियों और बाहरी (विशेषकर गुजरात से आई) कंपनियों व ठेकेदारों को सौंपने का आरोप स्थानीय व्यापारी वर्ग खुलकर लगा रहा है।
* IIT-BHU की गरिमा पर कलंक: महामना मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की पवित्रता और सुरक्षा उस समय तार-तार हो गई, जब कैंपस के भीतर IIT की एक छात्रा के साथ गनपॉइंट पर सामूहिक बलात्कार की वीभत्स वारदात सामने आई। इस मामले में जब पुलिस ने आरोपियों (कुणाल पांडेय, सक्षम पटेल और आनंद चौहान) को गिरफ्तार किया, तो उनका सीधा संबंध भाजपा आईटी सेल के शीर्ष पदाधिकारियों के तौर पर उजागर हुआ। घटना के बाद आरोपियों का राजनीतिक रसूख और उन्हें बचाने की कोशिशों ने बनारस के छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और अभिभावकों के भीतर सत्ता के प्रति भारी नफरत भर दी।
यही वजह है कि जब शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में बैलेट पेपर के जरिए मत डालने का मौका मिला, तो काशी के प्रबुद्ध समाज ने कॉरिडोर के विज्ञापनों को दरकिनार करते हुए सत्ता के अहंकार पर अपने आक्रोश की अंतिम मुहर लगा दी।
2. ‘काशी से नागपुर’ का राष्ट्रीय कोण: RSS मुख्यालय भी नहीं बचा
यह आक्रोश केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार पश्चिम भारत के उस केंद्र तक है जिसे भाजपा और संघ की वैचारिक नर्सरी कहा जाता है:
* नागपुर स्नातक सीट (गडकरी-फडणवीस का गढ़): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुख्यालय और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी व देवेंद्र फडणवीस के गृह क्षेत्र नागपुर में भाजपा का कई दशकों पुराना एकाधिकार खत्म हुआ। वहां महाविकास अघाड़ी (कांग्रेस) के अभिजीत वंजारी ने भाजपा प्रत्याशी को भारी मतों से पराजित किया।
* नागपुर शिक्षक सीट: स्नातक के बाद नागपुर शिक्षक सीट पर भी भाजपा समर्थित नागो गाणार को पराजय का सामना करना पड़ा और निर्दलीय सुधाकर अडबाले ने ऐतिहासिक अंतर से जीत दर्ज की।
काशी से लेकर नागपुर तक का यह पैटर्न साबित करता है कि जब-जब देश का शिक्षक, प्रोफेसर और स्नातक मतदाता मतदान केंद्र तक पहुंचा, उसने सत्ताधारी दल के वैचारिक गढ़ों में जाकर सीधी चोट की।
3. उत्तर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों का मिजाज
वाराणसी के अलावा उत्तर प्रदेश के अन्य शिक्षक एवं स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में भी सत्ता और जनता के बीच गहरा टकराव सामने आया:
* गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक सीट: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र से जुड़े इस निर्वाचन क्षेत्र में मतगणना के दौरान भीषण तनाव देखने को मिला। समाजवादी पार्टी ने खुले तौर पर प्रशासनिक हस्तक्षेप और धांधली के आरोप लगाते हुए मतगणना का बहिष्कार तक किया। यहां भाजपा समर्थित प्रत्याशी ध्रुव कुमार त्रिपाठी और सपा के डॉ. संजयन त्रिपाठी के बीच वरीयता मतों को लेकर अंतिम क्षणों तक तीखा संघर्ष चला।
* योगी की प्रतिष्ठा वाली गोरखपुर-फैजाबाद सीट: “42 हजार वोटों तक हम आगे थे, आखिरी 1600 में हुआ खेल!”
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र और प्रतिष्ठा से सीधे जुड़ी गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक सीट पर मतगणना के दौरान हुई कथित धांधली को लेकर निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव का एक सनसनीखेज वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में राजीव यादव ने प्रशासनिक मशीनरी पर सत्ता के इशारे पर चुनाव को ‘हाईजैक’ करने का सीधा आरोप लगाते हुए कहा—“42 हजार वोटों की गिनती तक हम लगातार आगे चल रहे थे, लेकिन आखिरी के महज 1600 वोटों में खुला खेल करके बीजेपी प्रत्याशी को जबरन जिता दिया गया। हमारे प्रथम वरीयता के वोटों में कलम चलाकर ‘1’ की जगह ‘4’ बना दिया गया ताकि वे अवैध हो जाएं और बीजेपी उम्मीदवार को इसका फायदा मिले।”
तीसरे राउंड की गिनती तक 376 मतों से आगे चल रहे निर्दलीय प्रत्याशी का आरोप है कि मतगणना स्थल पर तैनात अधिकारियों का रवैया पूरी तरह पक्षपाती था और उन्हें ऊपर से पहले से ही निर्देश मिले हुए थे कि सीएम की साख बचाने के लिए क्या करना है। कांटे के इस मुकाबले में फंसी सीट पर बेईमानी की सारी हदें पार करते हुए प्रशासन ने कुंदरकी जैसी ‘प्रायोजित जीत’ दोहराई और मुख्यमंत्री की ‘कथित प्रतिष्ठा’ बचाने के नाम पर जनादेश की सरेआम बलि चढ़ा दी।
* मेरठ, बरेली और लखनऊ: पश्चिमी यूपी के मेरठ स्नातक एवं शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के दिनेश कुमार गोयल और श्रीचंद शर्मा ने सीट बचाई, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट पर डॉ. हरि सिंह ढिल्लों जीते, जबकि बीजेपी रक्षा मंत्री की सीट लखनऊ में हारी
* आगरा में तीखी झड़पें: आगरा स्नातक सीट पर भाजपा के डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह और सपा के शशांक यादव के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा, जहां दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच सड़क से लेकर मतगणना केंद्र तक तीखी नोकझोंक हुई।
4. बिहार में बड़ा उलटफेर: 30 साल पुराना किला ढहा, चारों सिटिंग MLC हारे
बिहार में 8 विधान परिषद सीटों (4 शिक्षक और 4 स्नातक) पर आए नतीजों ने सत्ताधारी एनडीए (भाजपा-जदयू) को गहरा झटका दिया। सबसे बड़ा संदेश यह रहा कि बिहार की चारों शिक्षक सीटों पर मौजूदा एमएलसी चुनाव हार गए:
* पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र (भाजपा का सबसे बड़ा नुकसान):
* विजेता:डॉ. संजीव कुमार सिंह (राजद) — 4,487 वोट
* पराजित:नवल किशोर यादव (भाजपा) — 3,430 वोट
* भाजपा के कद्दावर नेता और लगातार पांच बार से एमएलसी रहे नवल किशोर यादव को 1,057 वोटों से हार का मुंह देखना पड़ा। पटना में तीन दशक से चला आ रहा भाजपा का एकाधिकार राजद ने ध्वस्त कर दिया।
* सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र (अपनों की बगावत):
* भाजपा से निष्कासित बागी डॉ. राहुल राज (4,965 वोट) ने निर्दलीय ताल ठोकते हुए एनडीए के अधिकृत प्रत्याशी आनंद पुष्कर (जदयू – 3,150 वोट) को करारी शिकस्त दी।
* दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र (जन सुराज की एंट्री):
* कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा अपनी सीट नहीं बचा सके; यहां डॉ. सुरेश प्रसाद राय (जन सुराज) ने जीत हासिल कर चुनावी राजनीति में प्रशांत किशोर की पार्टी का पहला खाता खोला।
* तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र:
* वामदल (CPI) के सिटिंग एमएलसी संजय कुमार सिंह पराजित हुए, और भाजपा के नरेंद्र प्रसाद सिंह ने निर्दलीय भूषण झा को लगभग 594 मतों के मामूली अंतर से हराकर भाजपा के खाते में यह सीट डाली।
* पटना व दरभंगा स्नातक सीटें:
* पटना स्नातक: जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने राजद के दिलीप कुमार को पछाड़ते हुए सीट अपने नाम की।
* दरभंगा स्नातक: भाजपा के सर्वेश कुमार ने राजद समर्थित उम्मीदवार को मात्र 237 वोटों के बेहद मामूली अंतर से हराया।
5. बैलेट पेपर बनाम ईवीएम: विपक्ष के दावों को मिला मनोवैज्ञानिक संबल
इस पूरे चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक और तकनीकी पहलू यह था कि मतदान ईवीएम (EVM) के बजाय मतपत्रों (बैलेट पेपर) और वरीयता मतों (Single Transferable Vote) के जरिए संपन्न हुआ।
वर्तमान में पूरे देश में चुनाव आयोग की निष्पक्षता, पेपर लीक, महंगाई और बेरोजगारी को लेकर जगह-जगह छात्र और युवा सड़कों पर हैं। ऐसे माहौल में जब बैलेट पेपर से हुए चुनाव में:
* देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र (वाराणसी) में भाजपा शिक्षक और स्नातक दोनों स्तरों पर हार जाती है,
* राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय (नागपुर) में भाजपा के स्नातक और शिक्षक दोनों उम्मीदवार धूल चाटते हैं,
* और बिहार की राजधानी में 30 वर्षों से जीत रहे भाजपा के कद्दावर नेता को मात मिलती है—
तो विपक्ष और नागरिक समाज के इस तर्क को भारी बल मिलता है कि देश की जनता का वास्तविक मिजाज गोदी मीडिया के नैरेटिव और सरकारी प्रचार से बिल्कुल अलग है।
दिलचस्प बात यह भी रही कि शिक्षक और स्नातक जैसे शत-प्रतिशत साक्षर चुनावों में भी भाजपा का कैडर जिसे ‘पन्ना प्रमुख’ और अभेद्य चुनावी मशीनरी कहा जाता है, वह बैलेट पेपर की पहली वरीयता (1st Preference) के मतों में ही पिछड़ गया। प्रबुद्ध मतदाताओं ने किसी संशय के बिना सत्ता के खिलाफ अपनी पहली पसंद दर्ज कराई।
सत्ता के लिए अंतिम चेतावनी
वाराणसी से लेकर नागपुर और पटना तक के परिणाम केवल कुछ सीटों का चुनावी गणित नहीं हैं। यह देश के शिक्षक, प्राध्यापक, अधिवक्ता और स्नातक युवाओं के भीतर उबल रहे नीतिगत असंतोष का सीधा विस्फोट हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लगातार होते पेपर लीक, पुरानी पेंशन बहाली को लेकर सरकार की बेरुखी, संविदा और मानदेय पर काम कर रहे शिक्षकों का शोषण और शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी ने उस वर्ग को सत्ता के विरोध में लाकर खड़ा कर दिया है, जो किसी भी समाज की रीढ़ होता है। जब समाज को दिशा देने वाला शिक्षक और भविष्य गढ़ने वाला युवा ही बैलेट के जरिए सत्ता के खिलाफ वोट डालने लगे, तो यह स्पष्ट संकेत है कि बदलाव की बयार चल पड़ी है। यदि सत्ता प्रतिष्ठान ने काशी और नागपुर से मिले इन संकेतों की अनदेखी की, तो यह चिंगारी आने वाले आम चुनावों में एक व्यापक जनांदोलन का रूप धारण कर सकती है।
नोट: यूट्यूब और सोशल मीडिया की बंदिशों के बाद अब यह तय है कि सच बोलने के लिए अपना आजाद प्लेटफार्म चाहिए। India Speak Daily केवल मेरा नहीं, आपकी निडर आवाज़ का मंच है। आइए, मिलकर इस पर अपनी स्वतंत्र Live Streaming और Video Platform को सनातनियों का वैचारिक अधिष्ठान बनाएं। नीचे ‘ISDian बनें’ बटन पर क्लिक कर आज ही इसके सदस्य बनें👇

बाबा ने धमकी दी है,रिजीम चेंज करने की कोशिश करने बालों को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी।