संदीप देव । अहंकार, अज्ञान और राजनीतिक चाटुकारिता जब किसी व्यक्ति के सिर चढ़कर बोलती है, तो वह व्यासपीठ की गरिमा को धूल-धूसरित करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं करता। मंच पर बैठकर पर्चा निकालने और भीड़ जुटाने वाले धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की बदजुबानी अब उस स्तर तक जा गिरी है जहाँ वह परब्रह्म के पावन नामों और उनके स्वरूप का उपहास उड़ाने लगा है।
क्या महर्षि वेदव्यास की पवित्र पीठ अब केवल सस्ती लतीफेबाजी, राजनीतिक भांडगीरी और भगवान के स्वरूपों का उपहास उड़ाने का अखाड़ा बनकर रह गई है? क्या सनातन धर्म के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था इतनी लाचार हो चुकी है कि मंचों पर पर्चे बांटने वाले मदारी स्वयं परब्रह्म के अवतारों की खिल्ली उड़ाएं और सत्ता के गलियारे में बैठे उनके आका तालियां पीटते रहें?
हाल ही में मध्य प्रदेश के शिवपुरी (करैरा) में बागेश्वर धाम के बहुप्रचारित कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने जो कुछ कहा, वह केवल अज्ञान नहीं, बल्कि वैष्णव धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध बोला गया घोर अपराध है। भगवान श्रीकृष्ण, पावन वृंदावन धाम और भारतीय नारी की तपस्या पर की गई भद्दी टिप्पणियों के बाद जब चौतरफा आक्रोश भड़का, तो कैमरे के सामने आकर ‘हमसे तो चूक हो ही जाती है’ का घड़ियाली रोना रो दिया गया।
किंतु सवाल यह है कि यह ‘चूक’ बार-बार क्यों होती है? उत्तर स्पष्ट है: “जस गुरु तस चेला।“ जिसके गुरु रामभद्राचार्य संघ-भाजपा के राजनीतिक संरक्षण में खुद शास्त्रों के मनमाने अर्थ गढ़कर राजनीतिक एजेंडा साधते रहे हों, उस शाखा का चेला व्यासपीठ को विदूषक का मंच न बनाए तो क्या बनाए?
1 परब्रह्म के अवतारों का उपहास: धीरेंद्र शास्त्री का कुतर्क
शिवपुरी के मंच से धीरेंद्र शास्त्री ने भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम की तुलना करते हुए जो विषवमन किया, उसे शब्दशः सुनना किसी भी सनातनी के लिए असहनीय है:
“तुम अपने वाले ठाकुर जी की एक भी फोटो देख लो, कहीं बैठे हैं तो टेढ़े… वो खड़े भी होते हैं तो तीन जगह से टेढ़े—
पांव के ऊपर पांव, कमर कहीं लचकाएं, बंसी बजाएं तो टेढ़े… हमाए वाले खड़े भी होते तो सीधे। हमाए वाले का नाम भी सीधा, चलना भी सीधा, दिखते भी सीधे… तुम्हारे वाले का नाम भी टेढ़ा, चलते भी टेढ़े, खड़े भी टेढ़े होते… हमारे वाले का धाम भी सीधा—अयोध्या, तुम्हारे वाले का वृंदावन… बंसी का बजाना तो खेल भी है, धनुष का चलाना खेल नहीं… बंसी तो हमारे यहां जे (ये) भी बजाता है, बजा भाई बजा… गायों को चराना तो खेल है, बंदरों को नचाना खेल नहीं।“
यह शब्द किसी विधर्मी या विदेशी आक्रांता के नहीं, बल्कि 24 घंटे हिंदू राष्ट्र का ढोल पीटने वाले उस स्वयंभू शास्त्री के हैं, जिसे संघ और भाजपा के तंत्र ने दिन-रात ‘दरबारी मीडिया’ के जरिए संत कथावाचक बनाकर पेश किया है।
1. शास्त्रों के कटघरे में धीरेंद्र शास्त्री
A. त्रिभंग स्वरूप का उपहास (मूर्खता की पराकाष्ठा): भगवान श्रीकृष्ण के ‘त्रिभंग ललित’ विग्रह को “कमर लचकाना” और “टेढ़ा” कहना वैष्णव रस-शास्त्र की घोर अनभिज्ञता है। भक्ति-रसामृत-सिंधु और चैतन्य चरितामृत के अनुसार, त्रिभंग मुद्रा कामदेव के मद को चूर करने वाले परब्रह्म के माधुर्य रस का सर्वोच्च शिखर है। त्रिभंग विग्रह जीवात्मा के तीनों तापों—आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—का हरण करता है।
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं। (१.३.२८) जिस स्वरूप को स्वयं परात्पर भगवान कहा गया हो, उनके ‘त्रिभंग ललित’ विग्रह (तीन जगह से मुड़ी मुद्रा) का यह कहकर उपहास उड़ाना कि “वे तीन जगह से टेढ़े हैं”, दर्शन और भाव-साधना के प्रति घोर अनभिज्ञता का प्रमाण है। त्रिभंग मुद्रा भगवान के अलौकिक प्रेम, माधुर्य और रसराज स्वरूप का प्रतीक है, न कि शारीरिक विकृति का। जो अज्ञानी रसराज श्रीकृष्ण के नयनाभिराम विग्रह को शारीरिक लचक बताकर ठहाके लगवा रहा है, उसे व्यासपीठ पर बैठने की पात्रता किसने दी?
B. अवतार–भेद का महापाप: सनातन धर्म का आधारभूत सिद्धांत है कि राम और कृष्ण एक ही सच्चिदानंद घन परब्रह्म श्री हरि विष्णु के दो नित्य लीला-विग्रह हैं। पद्म पुराण (स्वर्गखंड) में नामापराधों का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा गया है:शिवस्य श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादि सकलं।धिया भिन्नं पश्येत्स खलु हरिनामाहितकरः॥ जब शिव और विष्णु में भेददृष्टि रखना
नरक का द्वार और नामापराध माना गया है, तो साक्षात पूर्णब्रह्म राम और कृष्ण के बीच तुलना कर एक को छोटा और एक को बड़ा दिखाना सनातन धर्म की मूल आत्मा पर आघात है।
जिस रामभक्ति की आड़ लेकर मूर्ख धीरेन्द्र शास्त्री ने यह तुलना की है, उसी रामभक्ति के आधार ग्रंथ रामचरितमानस में संत तुलसीदास जी ने भगवान राम और भगवान कृष्ण की एकात्मता को प्रतिपादित किया गया है। उत्तरकांड में कागभुशुण्डि जी भगवान के समस्त रूपों को एक ही अखण्ड ब्रह्म का विलास बताते हैं।
C. वेणुनाद और गोचारण का तिरस्कार: श्रीमद्भागवत के वेणुगीत में जिस मुरली की तान पर जड़ पाषाण पिघल गए और यमुना उल्टी बहने लगी, उस दिव्य वेणुनाद को यह मूढ़ व्यक्ति “खेल” और अपने मंच के साधारण वादक के समकक्ष बताता है!
व्यासपीठ से यह वक्तव्य देना कि “बंसी बजाना तो खेल है, धनुष चलाना नहीं” अथवा “गायों को चराना खेल है, बंदरों को नचाना खेल नहीं”, भक्ति रस के गूढ़ सिद्धांतों की घोर अवहेलना है।
मुरली वादन कोई साधारण क्रिया नहीं, बल्कि ब्रह्म की उस अनाहत ध्वनि (वेणुनाद) का प्रतीक है जो समस्त जीवों को माया से मुक्त कर परमात्मा की ओर आकर्षित करती है।।
वीर रस (धनुर्धर राम) और माधुर्य रस (मुरलीधर कृष्ण) की ऐसी तुलना करना यह सिद्ध करता है कि धीरेन्द्र शास्त्री को न तो भक्ति-रसामृत का बोध है और न ही रस-शास्त्र का।
श्रीकृष्ण का ‘गोपाल’ रूप गौ-सेवा, करुणा और प्रकृति-साहचर्य का सर्वोच्च आदर्श है। जिस गो-सेवा के लिए साक्षात नारायण नंगे पांव ब्रज की वीथियों में घूमे, उसे “गायों को चराना तो खेल है” कहकर खारिज करना वेदों की गो-महिमा का खुला अपमान है।
2. ‘श्रीकृष्ण‘ नाम की बनावट पर मूढ़ शास्त्री का प्रलाप
मंच से भगवान श्रीकृष्ण के पावन नाम पर फूहड़ व्यंग्य कसते हुए धीरेंद्र शास्त्री ने कहा:
“हमाए वाले का नाम भी सीधा, चलना भी सीधा, दिखते भी सीधे… तुम्हारे वाले का नाम भी टेढ़ा, चलते भी टेढ़े, खड़े भी टेढ़े होते… वो ‘क‘ में जो ‘ऋ‘ की मात्रा नीचे लगी है न, वो भी ऐसे टेढ़ी मुड़ी है… हमाए वाले राम सीधे खड़े हैं, सीधे लिखे जाते हैं।“
एक पावन नाम—जिसके स्मरण मात्र से जीव भवसागर से पार उतर जाता है—उस नाम के वर्ण विन्यास, ‘ऋ’कार की मात्रा और उसके स्वरूप को लतीफेबाजी का विषय बनाकर ठहाके लगवाना बौद्धिक दिवालियापन और घोर नामापराध है।

A. गीता की स्पष्ट घोषणा है: श्रीकृष्ण ही श्रीराम हैं।
इस तथाकथित कथावाचक शास्त्री को शायद किसी ने श्रीमद्भगवद्गीता का दसवां अध्याय (विभूति योग) पढ़ने की सलाह नहीं दी। यदि इसने गीता का एक श्लोक भी निष्ठा से पढ़ा होता, तो इसे समझ आता कि जिस राम का नाम लेकर यह भगवान श्रीकृष्ण का उपहास उड़ा रहा है, वे स्वयं परब्रह्म का ही स्वरूप हैं।
गीता के दसवें अध्याय के ३१वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने दिव्य ऐश्वर्य और विभूतियों को प्रकट करते हुए अर्जुन से कहते हैं:
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥
(श्रीमद्भगवद्गीता १०.३१)
अर्थात:
“पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ और शस्त्रधारियों में मैं ही श्रीराम हूँ। जल–जंतुओं में मैं मगरमच्छ हूँ और नदियों में मैं श्रीगंगा जी हूँ।“
स्वयं जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण उद्घोष कर रहे हैं कि शस्त्र चलाने वालों में, मर्यादा और शौर्य के शिखर पर विराजमान ‘राम‘ कोई अन्य नहीं, बल्कि मैं ही हूँ!
जब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण श्रीराम को अपना ही स्वरूप बता रहे हैं, तब यह अनपढ़ कथावाचक किस धृष्टता से राम को “हमाए वाले” और कृष्ण को “तुम्हारे वाले” में बांटकर धर्म का बंटाधार कर रहा है? क्या गीता से बड़ा कोई शास्त्र है? क्या योगेश्वर के इस वचन के सामने इस मदारी के छिछोरे तर्कों की कोई औकात है?
B. ‘ऋ‘कार की दिव्यता: व्याकरण और मंत्र–शास्त्र का अज्ञान
व्याकरण और उपनिषदों में भगवान श्रीकृष्ण के नाम की निष्पत्ति को अत्यंत पावन माना गया है:
* गोपालतापनी उपनिषद और महाभारत में आता है: ‘कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः। तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते॥’ अर्थात ‘कृष्’ सत्ता (आनंद/अस्तित्व) का वाचक है और ‘ण’ परमानंद (मोक्ष) का वाचक है। इन दोनों के मिलन से जो सच्चिदानंद घन परब्रह्म प्रकट होता है, उसे ‘कृष्ण’ कहते हैं।
* ‘क’ के नीचे लगी ‘ऋ’कार की मात्रा कोई ‘टेढ़ापन’ नहीं, बल्कि देववाणी संस्कृत का वह स्वर है जो पूर्णता और माधुर्य को जन्म देता है।
जिस व्यक्ति को यह भी नहीं पता कि ‘ऋ’ देवनागरी का दिव्य स्वर है, वह मंच पर बैठकर मूर्खों की तरह लचक-लचक कर नाम की बनावट का मजाक उड़ाता है। यह वही कर सकता है जिसने कभी किसी प्रामाणिक गुरुकुल की देहरी न लांघी हो और जिसे केवल सत्ता की बैसाखियों पर उछलना सिखाया गया हो।
3. अयोध्या बनाम वृंदावन: पावन धामों में दुर्भावनापूर्ण भेद
धीरेंद्र शास्त्री ने केवल प्रभु के विग्रह का ही नहीं, बल्कि वृंदावन का भी उपहास उड़ाते हुए उसे ‘टेढ़ा’ सिद्ध करने की धृष्टता की।
* अयोध्या की मर्यादा: अयोध्या मानव सभ्यता की प्रथम राजधानी और सूर्यवंश के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पावन जन्मस्थली है, जो विधि, मर्यादा और धर्म का अधिष्ठान है।
* वृंदावन की दिव्यता: श्रीमद्भागवत महात्म्य में सनकादिक ऋषि स्पष्ट कहते हैं कि कलिकाल में जब ज्ञान, वैराग्य और भक्ति क्षीण हो चुके थे, तब वृंदावन की पावन रज का स्पर्श पाते ही भक्ति देवी ‘नवयौवना’ स्वरूप को प्राप्त हुईं:धन्या सा मथुरा यत्र संजातो भगवान् हरिः।वृन्दावनं परं धन्यं यत्र लीलामयी तनुः॥ वृंदावन निष्काम माधुर्य और शरणागति की पराकाष्ठा है। अयोध्या और वृंदावन सनातन की दो दिव्य आंखें हैं। एक को सीधा और दूसरे को टेढ़ा कहकर भक्तों के मन में भेद के बीज बोना धाम-अपराध की पराकाष्ठा है।
4. करवा चौथ और नारी–तपस्या पर छिछोरा प्रहार
करैरा की उसी कथा में धीरेंद्र शास्त्री की सामंती और स्तरहीन मानसिकता एक बार फिर उजागर हुई, जब उन्होंने भारतीय नारी के पावन पर्व करवा चौथ को ‘खसम पूजन दिवस’ और ‘एक दिन व्रत, 364 दिन ताने’ कहकर उपहास उड़ाया।

जिस भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी के संबंध को आध्यात्मिक साधना और यज्ञ माना गया है, उसे गली-मोहल्ले के घटिया लतीफों में बदलकर रख दिया गया। व्यासपीठ का उपयोग स्त्रियों की साधना को कलंकित करने और सजे-धजे टेंटों में बैठे भक्तों से सस्ती तालियां बटोरने के लिए किया गया।
5. “जस गुरु तस चेला“: रामभद्राचार्य का ट्रैक रिकॉर्ड
धीरेंद्र शास्त्री का यह आचरण कोई अचानक उपजी विकृति नहीं है। इसके पीछे उनके गुरु रामभद्राचार्य की वह पाठशाला है, जहां शास्त्रों के मनमाने और विवादित अर्थ गढ़ना आम बात रही है।
रामभद्राचार्य ने वर्षों तक अपने आपको रामानंदाचार्य सिद्ध करने की होड़ में आदि शंकराचार्य से लेकर अन्य संप्रदायों पर
अनर्गल प्रलाप किया है। रामचरितमानस की चौपाइयों और हनुमान चालीसा में मनमाने बदलाव करने का दुस्साहस हो या शंकराचार्यों की सर्वोच्च पीठों के विरुद्ध अनर्गल बयानबाजी, रामभद्राचार्य ने हमेशा शास्त्रसम्मत परंपराओं को धता बताकर राजनीतिक संरक्षण की छांव तलाशी है। अहंकारी रामभद्राचार्य को जब संतों ने रामानंदाचार्य नहीं माना तो मनमानी करते हुए इन्होंने संत तुलसीदास जी के नाम से ‘तुलसी पीठ’ का निर्माण कर लिया!
जब गुरु ही अहंकार और राजनीतिक चाटुकारिता में लीन होकर परंपराओं को तोड़ेगा, तो चेला उससे दो कदम आगे निकलकर भगवान श्रीकृष्ण को ‘लचकने वाला’ और वृंदावन को ‘टेढ़ा’ ही बताएगा। यह विशुद्ध रूप से ‘जस गुरु तस चेला’ का जीवंत उदाहरण है। “जस गुरु तस चेला“ की कहावत इन पर अक्षरशः चरितार्थ होती है।
6. धीरेन्द्र शास्त्री की पुरानी आदत: संतों और महापुरुषों के अपमान का लंबा इतिहास
धीरेंद्र शास्त्री की यह बयानबाज़ी पहली बार नहीं हुई है। इनका इतिहास प्रमाण है कि यह विवादों के जरिए चर्चा में रहने का एक सोची-समझी तकनीक का हिस्सा है:
* संत तुकाराम का अपमान: महाराष्ट्र के परम पूज्य वारकरी संत तुकाराम जी महाराज के बारे में मनगढ़ंत कहानी गढ़ी कि उनकी पत्नी उन्हें रोज डंडे और गन्ने से मारती थीं। जब वारकरी संप्रदाय ने सड़क पर उतरने की चेतावनी दी, तो गिड़गिड़ाते हुए माफी मांगी।
* सहस्रबाहु अर्जुन का अपमान: कलचुरी और हैहयवंशी क्षत्रिय समाज के आराध्य राजराजेश्वर सहस्रबाहु अर्जुन को मंच से मदांध और अत्याचारी कहा। एफआईआर और सामाजिक विरोध के बाद फिर ‘खेद’ व्यक्त किया।
* शंकराचार्यों से टकराव: जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने इनके जादुई पर्चों, अंधविश्वास और राजनीतिक मोहरा बनने पर सवाल खड़े किए, तो इनके पास कोई शास्त्रार्थ का उत्तर नहीं था। शंकराचार्यों ने बार-बार चेताया है कि सनातन धर्म चमत्कारों, मदारियों और राजनीतिक दलालों से नहीं, बल्कि शास्त्र-सम्मत मर्यादा और तपस्या से चलता है।
7. राजनीतिक–कॉर्पोरेट गठजोड़ और सनातन को गिरवी रखने का षड्यंत्र
धीरेंद्र शास्त्री अचानक शून्य से उठकर इतने बड़े ‘स्टार’ कैसे बन गए? क्या यह उनकी आध्यात्मिक साधना का फल है? कतई नहीं।
यह संघ-भाजपा के उस राजनीतिक इकोसिस्टम की सुनियोजित उपज है, जिसे अपनी उग्र, सतही और चुनावी हिंदुत्व की राजनीति के लिए ऐसे ही अनपढ़ और लाउड लाउडस्पीकरों की आवश्यकता थी। पारंपरिक शंकराचार्य और वेदाचार्य कभी किसी राजनीतिक दल की जी-हुजूरी नहीं करते, वे सत्ता से आंख मिलाकर सवाल पूछते हैं। इसलिए, एक समानांतर ‘कथावाचक सिंडिकेट’ खड़ा किया गया।
करोड़ों के पंडाल, चार्टर्ड प्लेन, सत्ताधारी मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों की हाजिरी और 24 घंटे बिके हुए टीवी चैनलों पर इनका लाइव प्रसारण—यह सब कुछ धर्म की सेवा नहीं, बल्कि सनातन समाज की चेतना को कुंद करने का षड्यंत्र है। इस तंत्र का उद्देश्य जनता को वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक विमर्श से भटकाकर अंधविश्वास, पर्चा-संस्कृति और राजनीतिक ध्रुवीकरण की अफीम चटाना है।
संघ और भाजपा के जिस राजनीतिक तंत्र ने सनातन धर्म को ‘जय श्रीराम’ के नारों की चुनावी राजनीति तक सीमित करने का ठेका ले रखा है, उसने ऐसे छिछले मंच-कलाकारों को पूरे देश में सिर पर चढ़ा रखा है। शंकराचार्यों के शास्त्रसम्मत वचनों को दरकिनार कर इन मदारियों के जरिए जनता को यह सिखाया जा रहा है कि राम और कृष्ण अलग हैं, अयोध्या और वृंदावन में बैर है, और सनातन धर्म केवल पर्चा निकालने का अंधविश्वास है।
8. व्यासपीठ का व्यावसायीकरण और राजनीतिक मंचन
व्यासपीठ को सनातन परंपरा में परम पवित्र, निष्पक्ष और आत्मज्ञान का केंद्र माना गया है। महर्षि व्यास का आसन केवल मनोरंजन, जनसमूह को हंसाने या तात्कालिक तालियां बटोरने का साधन नहीं है।
* मनोरंजन और सस्ती लोकप्रियता: आज के दौर में अनेक तथाकथित कथावाचकों ने कथाओं को शास्त्र-विवेचन के स्थान पर प्रहसन (कॉमेडी), सनसनीखेज दावों और मंच-नाट्य में बदल दिया है। तालियां बटोरने के लिए शास्त्रों के चरित्रों को विकृत करना बौद्धिक दिवालियापन है।
* राजनीतिक हित और ध्रुवीकरण: वर्तमान समय में धार्मिक मंचों का उपयोग सत्ता-समर्थक माहौल बनाने, राजनीतिक विचारधाराओं को परोसने और जनता का ध्यान मूल आध्यात्मिक व नैतिक प्रश्नों से भटकाने के लिए किया जा रहा है। जब धर्म का उद्देश्य लोक-कल्याण के बजाय सत्ता और धन-संचय बन जाता है, तब वाणी से ऐसा ही शास्त्र-विरुद्ध प्रदूषण निकलता है।
धीरेंद्र शास्त्री को मेरी सीधी चेतावनी!
धीरेंद्र शास्त्री! व्यासपीठ की पवित्रता को अपनी सस्ती लतीफेबाजी और अज्ञान की जागीर मत समझिए । हाथ जोड़कर कैमरे पर ‘हमसे तो चूक हो ही जाती है’ का ढोंग रचना बंद करो।
यदि लेशमात्र भी लज्जा और सनातन के प्रति निष्ठा शेष है, तो अपनी इस अनियंत्रित जुबान को लगाम दो। पहले किसी विद्वान के चरणों में बैठकर श्रीमद्भगवद्गीता, वेद और उपनिषदों का अध्ययन करो, ‘ऋ’कार और रस-शास्त्र का भेद समझो, और उसके बाद व्यासपीठ की सीढ़ियां चढ़ने का दुस्साहस करो। भगवान श्रीकृष्ण और उनके पावन नाम का उपहास उड़ाने का जो अक्षम्य पाप तुमने किया है, उसके लिए पूरा सनातनी समाज तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेगा।
व्यासपीठ से भगवान श्रीकृष्ण का उपहास उड़ाना, पवित्र तीर्थों की खिल्ली उड़ाना, नारी-शक्ति को लांछित करना और बाद में ‘चूक हो गई’ कहकर पल्ला झाड़ लेना अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
माफी मांगने से पाप नहीं धुलते। जो व्यक्ति भगवान के स्वरूपों में भेद करता है, वह कथावाचक नहीं, धर्म का व्यापारी है। अब समय आ गया है कि सनातन समाज सत्ता समर्थित इस मदारी-संस्कृति को पहचाने। धर्म की रक्षा राजनीतिक प्रायोजनों में नाचने वाले इन जोकरों से नहीं, बल्कि शास्त्रों के गहन अध्ययन, मर्यादा और आत्म-साधना से ही संभव है। व्यासपीठ को इन राजनीतिक दलालों से मुक्त कराना ही आज का सबसे बड़ा धर्म-युद्ध है।
नोट: यूट्यूब और सोशल मीडिया की बंदिशों के बाद अब यह तय है कि सच बोलने के लिए अपना आजाद प्लेटफार्म चाहिए। India Speak Daily केवल मेरा नहीं, आपकी निडर आवाज़ का मंच है। आइए, मिलकर इस पर अपनी स्वतंत्र Live Streaming और Video Platform को सनातनियों का वैचारिक अधिष्ठान बनाएं। नीचे ‘ISDian बनें’ बटन पर क्लिक कर आज ही इसके सदस्य बनें 👇
