संदीप देव आधुनिक सूचना-तंत्र में एक भ्रम बड़ी चतुराई से गढ़ा गया है—‘निष्पक्षता’ का भ्रम। हकीकत यह है कि निष्पक्षता जैसी कोई चिड़िया पत्रकारिता के आकाश में कभी उड़ती ही नहीं; जो मौजूद है, जो अनिवार्य है और जिसकी मांग लोकतांत्रिक समाज को करनी चाहिए, वह केवल और केवल ‘वस्तुनिष्ठता’ (Objectivity) है।
फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने जिस अवधारणा को ‘सामाजिक तथ्य’ (Social Facts) कहा था, वह समाजशास्त्र के एक विद्यार्थी के नाते मेरे अध्ययन और चिंतन का मूल आधार रहा है। सामाजिक तथ्य किसी व्यक्तिपरक राय, सत्ता के प्रचार या भीड़ की पसंद पर निर्भर नहीं होते; वे अपने आप में ठोस, स्वतंत्र और जांच योग्य यथार्थ होते हैं। पत्रकारिता यदि इन तथ्यों को उसी रूप में सामने रखने का साहस नहीं रखती, तो वह सूचना नहीं, केवल प्रचार तंत्र का हिस्सा बनकर रह जाती है।
सत्ता का स्वरूप बदला, असहजता का पैमाना नहीं
व्यवस्था का चरित्र कभी नहीं बदलता। जब मैं मुख्यधारा के प्रिंट मीडिया (अखबार) में था, तब की सत्ता और तंत्र मेरी खोजी रपटों से असहज होते थे। आज जब हम अपना स्वतंत्र मीडिया हाउस चला रहे हैं, तो आज की सत्ता और व्यवस्था भी उसी तरह असहज है।
कांग्रेस के शासनकाल में भी मुझ पर मुकदमे दर्ज कराए गए और आज भाजपा के दौर में भी उसी तरह मुकदमों और दबाव का सामना करना पड़ रहा है। दोनों पक्षों के लिए यह स्थिति असहज हो सकती है, लेकिन एक स्वतंत्र पत्रकार के लिए यही उसकी वस्तुनिष्ठता का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र है। यदि सत्ता—चाहे उसका वैचारिक चोला कुछ भी हो—आपकी पत्रकारिता से सहज महसूस करने लगे, तो मान लीजिए कि आपने तथ्यों के साथ कहीं न कहीं समझौता कर लिया है।
‘डिजिटल जमींदारी’ और अल्गोरिदम की गुलामी
आज मुख्यधारा के कॉर्पोरेट मीडिया से निराश होकर लोगों ने डिजिटल मीडिया का रुख किया, लेकिन क्या वहां वास्तविक स्वतंत्रता है?
सच्चाई यह है कि यूट्यूब और फेसबुक जैसे मंचों पर जिसे ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ कहा जा रहा है, वह असल में विदेशी टेक-कंपनियों के अल्गोरिदम और व्यूअरशिप की नई गुलामी है। डिजिटल स्पेस को ‘लेफ्ट’ और ‘राइट’ के दो तय खांचों में बांट दिया गया है। दोनों के अपने बंधे हुए दर्शक हैं, जो सूचना नहीं, बल्कि अपनी पूर्वग्रह-युक्त मान्यताओं की पुष्टि चाहते हैं। यदि कोई पत्रकार अपने तय खांचे की लकीर से जरा भी हटकर सच कहने का प्रयास करता है, तो उसके अपने ही दर्शक उसे ट्रोल करने लगते हैं, उसका व्यूअरशिप ग्राफ गिरने लगता है। परिणाम यह होता है कि वह डरकर फिर से अपनी तयशुदा लाइन पर लौट आता है और खुद को तटस्थ दिखाने के लिए बीच-बीच में ‘ऑड-ईवन’ पत्रकारिता का स्वांग रचता है।
यह पत्रकारिता नहीं, व्यूअरशिप का व्यापार है। इसी डिजिटल पराधीनता को तोड़ने के लिए हमने एक संकल्प लिया था—सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के रहमोकरम से पूरी तरह मुक्त होकर अपना स्वतंत्र न्यूज पोर्टल और चैनल स्थापित करने का।
आज वह संकल्प साकार हो चुका है। अब यूट्यूब और मेटा हमारे लिए पत्रकारिता के मंच नहीं, केवल खबरों के प्रसार का एक सीमित जरिया भर हैं।
साइबर हमलों और सेंसरशिप के बीच खड़ा विकल्प
स्वायत्तता की यह राह कभी सुगम नहीं रही। जब विचार सत्ता और डिजिटल तंत्र दोनों को असहज करते हैं, तो हमले हर दिशा से होते हैं:
* मुख्य यूट्यूब चैनल को हैक करने के बार-बार प्रयास किए गए, कई बार प्रतिबंध लगाए गए। चैनल वापस मिलने के बाद भी यह तकनीकी संघर्ष लगातार जारी है।
* फेसबुक ने बाकायदा यह दर्ज किया कि अत्यधिक ‘रिपोर्टिंग’ के चलते हमारे प्रोफाइल को रिकमंडेशन सूची से बाहर किया जा रहा है।
* हमारे अपने स्वतंत्र सर्वर पर एक-एक घंटे में 3,000 से लेकर 55,000 तक डीडीओएस (DDoS) और ब्रूट-फोर्स साइबर अटैक झेले गए।
सीमित संसाधनों के बावजूद यदि हमारी टीम इन अवरोधों के आगे नहीं झुकी, तो इसका कारण कोई भौतिक शक्ति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और आंतरिक संकल्प है। अध्यात्म का मूल बल यही है कि वह विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी हताश नहीं होने देता। वह सिखाता है कि व्यवस्था द्वारा उछाले गए हर पत्थर को चुनकर एक नया स्वायत्त संस्थान कैसे खड़ा किया जाता है।
‘जिसका खाएगा, उसका गाएगा’: आत्मनिर्भरता का आर्थिक दर्शन
पत्रकारिता की स्वतंत्रता कभी हवाई नारों से सुरक्षित नहीं रह सकती; उसके लिए वित्तीय स्वायत्तता अनिवार्य शर्त है। पुरानी लोक-कहावत बहुत स्पष्ट है—“जिसका खाएगा, उसका गाएगा।”
यदि आप सरकार से विज्ञापन लेंगे या कॉरपोरेट घरानों के सीएसआर फंड पर पलेंगे, तो आपकी कलम कभी उनके खिलाफ नहीं चल सकती। सरकारी विज्ञापनों के फॉर्म और कॉरपोरेट घरानों के प्रस्ताव हमारे पास भी आए, लेकिन हमने हाथ जोड़कर नम्रता से उन्हें अस्वीकार कर दिया। पत्रकारिता की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ ही यही है कि वह व्यवस्था, सत्ता और कॉरपोरेट—तीनों के वित्तीय हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त हो।
इसीलिए हमने मेंबरशिप मॉडल (पाठक-केंद्रित सदस्यता) को अपनाया। हमारे अन्य प्रकल्प—कपोत प्रकाशन (पुस्तकें), ई-कॉमर्स और गुरुकुलम् आधारित शिक्षण पहल—इस स्वतंत्र पत्रकारिता की रीढ़ हैं। जब पाठक अपनी चेतना से पत्रकारिता को फंड करता है, तब पत्रकारिता किसी अल्गोरिदम, व्यूअरशिप या सत्ताधीश के तुष्टीकरण के दबाव से मुक्त होकर शुद्ध सामाजिक तथ्यों पर काम करती है।
वैचारिक स्पष्टता: No Left, No Right, Only Sanatani Voice
indiaspeakdaily.in को यह स्वाधीनता किसी सत्ता या तकनीकी मंच ने नहीं, बल्कि “No Left-No Right, Only Sanatani Voice” के विचार से जुड़े जागरूक पाठकों और दर्शकों ने दी है।
हमारा सरोकार इससे नहीं है कि कौन सा राजनीतिक दल हमारी रिपोर्ट से प्रसन्न होता है और कौन सा नाराज। हमारा एकमात्र पैमाना यह है: क्या जो लिखा गया है, वह तथ्यात्मक और वस्तुनिष्ठ है?
आलोचकों और ट्रोल करने वालों से मेरा सीधा और विनम्र संवाद है—यदि आपके पास मेरे उठाए गए तर्कों और तथ्यों का कोई प्रत्युत्तर है, तो उसे प्रमाण सहित सामने रखिए। आप मेरे तथ्य काटिए; मैं न केवल प्रसन्नता से अपनी भूल स्वीकार करूंगा, बल्कि आपके तर्कों को अपने मंच पर प्रमुखता से स्थान भी दूंगा।
लेकिन यदि आप तथ्यों को काटने में असमर्थ होकर सिर्फ पार्टी विशेष के तयशुदा टूलकिट के आधार पर चरित्र हनन करेंगे, झूठे लेबल लगाएंगे और अनर्गल प्रलाप करेंगे, तो यह केवल आपकी मानसिक पराधीनता और ‘ब्रेनडेड’ होने का प्रमाण है।
भारतीय चिंतन परंपरा में परमात्मा को ‘सच्चिदानंद’ कहा गया है—सत् (सत्य), चित् (चेतना), और आनंद। हर मनुष्य के भीतर इसी सत्य और चेतना का वास है। राजनीतिक कबीलों की मानसिक दासता से बाहर निकलिए, अपनी स्वतंत्र चेतना को पहचानिए और एक चैतन्य, चिंतनशील नागरिक बनकर अपने जीवन को सार्थक कीजिए।
सत्य ही आधार है, तथ्य ही कसौटी है।
जय श्रीहरि विष्णु।
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