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Home » Blog » SDeo blog » त्रेतायुग में सूफियाना कव्वाली? ‘आदिपुरुष’ के गुनहगार मुंतशिर ने विश्वास-रहमान को मारा थप्पड़!
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त्रेतायुग में सूफियाना कव्वाली? ‘आदिपुरुष’ के गुनहगार मुंतशिर ने विश्वास-रहमान को मारा थप्पड़!

Ssandeep Deo
By Ssandeep Deo 14 Min Read
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14 Min Read
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संदीप देव / इंडिया स्पीक्स डेली विशेष। क्या त्रेतायुग के मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और माता जानकी के विवाह में कव्वालियां गाई जाती थीं? क्या अयोध्या और मिथिला की उस पावन वैदिक भूमि पर, जहाँ सामवेद की ऋचाओं और अवध के सोहर-मंगल गीतों का नाद गूंजता था, वहाँ ‘कुन फाया कुन’ और ‘रॉकस्टार’ के सूफियाना आलाप गूंज रहे थे?

यह सवाल आज इसलिए उठ खड़ा हुआ है क्योंकि जिस बॉलीवुडिया इकोसिस्टम ने हिंदू आस्था के सबसे बड़े महाकाव्यों को अपनी व्यावसायिक प्रयोगशाला बना लिया है, उसका एक और विकृत चेहरा अब बेनकाब हो चुका है। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए—जिस ‘आदिपुरुष’ के सड़कछाप, छिछोरे और लंपट संवादों के कारण समूचे देश ने मनोज मुंतशिर को धिक्कारा था, आज वही मनोज मुंतशिर नितेश तिवारी की ‘रामायण’ के गीतकार-संवाद लेखक कुमार विश्वास और संगीतकार ए.आर. रहमान को सार्वजनिक रूप से आईना दिखा रहे हैं।

मनोज मुंतशिर ने एक मुख्यधारा के न्यूज़ चैनल के उस दावे पर तीखा प्रहार किया जिसमें कहा गया था कि ‘रामायण’ के गीतों में “आदिपुरुष वाला कारनामा दोहराया जा रहा है।” मुंतशिर ने तंज कसते हुए दो-टूक लिखा:

“बड़ी जाहिलों जैसी बात की है… काश ‘रामायण‘ के गीतों में मेरा वाला कारनामा दोहराया जाता! ‘आदिपुरुष‘ बहुत खराब फिल्म थी, संवाद और भी खराब थे, लेकिन गीत तो देश का बच्चा–बच्चा गाता है। कभी जाइए अयोध्या, गली–गली में ‘आदिपुरुष‘ के ही गीत बजते हैं… गीतों को चैलेंज मत करिए। उनमें श्रद्धा, समर्पण और कवित्व की कोई कमी नहीं थी। ना मैंने राम के लिए नर्सरी राइम्स लिखीं, ना कव्वालियां! आगे लोग समझदार हैं, जानते हैं कि कौन कितने पानी में है!”

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पत्रकारिता निष्पक्षता की नहीं, वस्तुनिष्ठता की मांग करती है!

मनोज मुंतशिर वाला कारनामा?
बड़ी जाहिलों जैसी बात की है देश के स्वघोषित सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ चैनल ने.

मेरे भाई काश रामायण के गीतों में मेरा वाला कारनामा दोहराया जाता.

आदिपुरुष बहुत ख़राब फ़िल्म थी, संवाद और भी ख़राब थे, लेकिन गीत तो देश का बच्चा-बच्चा गाता है.
कभी जाइए श्री… https://t.co/cmUhNmYEqa

— Manoj Muntashir Shukla (@manojmuntashir) October 28, 2026

मुंतशिर का यह सीधा वार किसी और पर नहीं, बल्कि ‘अपने-अपने राम’ के मंचीय कथावाचक कुमार विश्वास और सूफियाना खांचों से बाहर न निकल पाने वाले ए.आर. रहमान की जोड़ी पर है। और कड़वा सच यह है कि इस वार में तर्क का एक ठोस और अकाट्य आधार मौजूद है।

आदिपुरुष बनाम रामायण: संवाद का पतन बनाम संगीत की आत्मा

यहाँ तटस्थ और निर्मम पड़ताल जरूरी है।

मनोज मुंतशिर ने ‘आदिपुरुष’ में “तेल तेरे बाप का, कपड़ा तेरे बाप का…” जैसे जो टपोरी और सड़कछाप संवाद लिखे थे, वह सनातन वांग्मय और रामभक्त हनुमान की गरिमा के विरुद्ध  किया गया एक अक्षम्य अपराध था। उसके लिए उन्हें देश ने कभी पूरी तरह माफ नहीं किया। लेकिन उस घनघोर अंधकार के बीच भी उस फिल्म का एक सिरा ऐसा था जिसने हर सनातनी के हृदय के तार झंकृत कर दिए थे—और वह था उसका संगीत और उसके बोल।

अजय-अतुल का संगीत और मुंतशिर के लिखे गीत:

* ‘जय श्री राम’ (राजा राम का ये पावन धाम): इस गीत के बजते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उसमें वैदिक शंखनाद का भार था, उसमें भक्ति की वह गगनभेदी गर्जना थी जो किसी महाकाव्य के अनुकूल होनी चाहिए।

* ‘राम सिया राम’ (जानकी जाने ना दूंगा तुम्हें): उस गीत में जो सजल कारुण्य, समर्पण और अवधी-संस्कृत निष्ठ भाव था, वह सीधे आत्मा को स्पर्श करता था। यही कारण है कि आज भी देश के मंदिरों, रामनवमी के जुलूसों और अयोध्या के घाटों पर वही धुनें गूंजती हैं। मुंतशिर ने भले ही संवादों में लंपटई दिखाई हो, लेकिन गीतों में उन्होंने सनातन भक्ति परंपरा के मूल प्राण-तत्व को नहीं छोड़ा था।

त्रेतायुग पर थोपा गया सूफियाना सांचा: रहमान की बासी खिचड़ी

अब आइए नितेश तिवारी, कुमार विश्वास और ए.आर. रहमान की इस बहुचर्चित ‘रामायण’ के गीत-संगीत पर दृष्टि डालें। हाल ही में प्रभु श्री राम और माता जानकी के पावन विवाह प्रसंग पर आधारित गीत ‘मंगल रंग‘ (मंगल गान) जारी किया गया। अयोध्या और मिथिला के विवाह का प्रसंग वाल्मीकि से लेकर तुलसीदास तक शुद्ध भारतीय लोक-संवेदना, वैदिक मंत्रोच्चार, शंख-घड़ियाल, सुहाग-गीतों और शास्त्रीय रागों का संगम रहा है।

लेकिन रहमान और कुमार विश्वास ने क्या परोसा?

जैसे ही यह गीत शुरू होता है, कोई भी संवेदनशील श्रोता स्तब्ध रह जाता है। यह गीत किसी सनातन विवाह का मंगल गान नहीं लगता, बल्कि ए.आर. रहमान की अपनी पुरानी फिल्म ‘रॉकस्टार’ (Rockstar) की मशहूर दरगाही कव्वाली ‘कुन फाया कुन’ का री-पैकेज्ड, बासी और दूसरा संस्करण जान पड़ता है!

वही सूफियाना टोन, वही उर्दू-फारसी के प्रभाव वाला मेलोड्रैमेटिक आलाप, वही परिचित कॉर्ड प्रोग्रेशन और वही कव्वाली की तर्ज पर बजने वाली तालें। क्या त्रेतायुग में कव्वाली की परंपरा थी मिस्टर रहमान? क्या अमीर खुसरो या निजामुद्दीन औलिया के दौर की सूफी गायकी को भगवान राम के विवाह पर चस्पां करना ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अक्षम्य अज्ञानता और धृष्टता नहीं है?

रहमान का संकट यह है कि वे चाहे ‘जोधा अकबर’ बनाएं, ‘रॉकस्टार’ बनाएं या ‘रामायण’—वे अपने उस चिर-परिचित सूफियाना और कव्वालीनुमा दायरे से बाहर ही नहीं निकल पाते। जब किसी हिंदू महाकाव्य को आकार दिया जाता है, तो वहाँ ‘मदरसा और दरगाह संगीत’ की नकल नहीं चलती; वहाँ ओंकार की ध्वनि, वेदों की ऋचाएं, सामगान का अनुशासन और भारतीय शास्त्रीय वाद्य (वीणा, मृदंग, मंजीरा, शहनाई) चाहिए होते हैं। रहमान ने वैश्विक सिंफोनी के नाम पर रामकथा के संगीत को एक हॉलीवुडिया ऑर्केस्ट्रा और दरगाही कव्वाली की खिचड़ी बनाकर रख दिया।

कुमार विश्वास की मंचीय तुकबंदी: ‘नर्सरी राइम्स‘ में सिमटा महाकाव्य

इस सांस्कृतिक विचलन की दूसरी सबसे कमजोर कड़ी साबित हुए हैं कुमार विश्वास। कुमार विश्वास स्वयं को रामकथा के सबसे बड़े आधुनिक व्याख्याता के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। देश को उम्मीद थी कि जब वे ‘रामायण’ की कलम थामेंगे, तो तुलसीदास की चौपाइयों की मिठास और वाल्मीकि के दार्शनिक गांभीर्य को आधुनिक सिनेमाई भाषा देंगे। लेकिन मुंतशिर ने जो तंज कसा है—“ना मैंने राम के लिए नर्सरी राइम्स लिखीं ना कव्वालियां“—वह सीधे विश्वास के मंचीय खोखलेपन को नंगा करता है।

नितेश तिवारी और नमित मल्होत्रा ने कुमार विश्वास को रामायण के शोध में जोड़ा था कि कहीं ‘आदिपुरुष’ जैसा कोई चूक न हो जाए! लेकिन कुमार विश्वास तो स्वयं इस टीम की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुए हैं।

विश्वास के लिखे बोलों में न तो भक्ति की वह सघन पराकाष्ठा है और न ही काव्य की वह अमर गहराई। वे अपने कवि सम्मेलनों के ‘वाह-वाह’ और सतही तुकबंदी वाले मिजाज से बाहर नहीं आ सके। गीत के शब्द रहमान की धुन के पीछे बेबस हांफते हुए नजर आते हैं। वे केवल कामचलाऊ मुहावरे और मंचीय तुक मिलाकर एक औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। जिस प्रसंग पर तुलसीदास ने ‘राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग में परिछाहीं’ जैसी अमर काव्य-रचना की थी, उस प्रसंग को कुमार विश्वास ने नर्सरी की कविताओं जैसी हल्की और सतही तुकबंदी में तब्दील कर दिया। संघ द्वारा सजाई गई महफिलों, स्टेडियमों और मंचों पर रामकथा बांचते-बांचते कुमार विश्वास भी संघी नास्तिकता के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं! जहाँ संघ ने सत्ता के लिए धर्म को धंधा बनाया, वहीं कुमार विश्वास ने पैसा और प्रसिद्धि पाने के लिए रामकथा को धंधा बना रखा है! उनके लिखे गीत-संवाद को सुनकर तो नहीं लगता कि रामकथा ने उनकी आत्मा के किसी कोने को छुआ है!

सिक्के का दूसरा पहलू: वैश्विक मंच पर गूंजती अभिनय और विहंगम दृश्यों की जय–जयकार

संगीत और संवादों के इस गंभीर भटकाव का अर्थ यह कतई नहीं है कि पूरी फिल्म को एक सिरे से खारिज कर दिया जाए। यदि हम निष्पक्ष और संपूर्ण समीक्षा के दायित्व का निर्वहन करें, तो यह स्वीकारना ही होगा कि सिनेमाई कैनवास, दृश्य-भव्यता और अभिनय के धरातल पर इस फिल्म ने विश्व मंच पर भारत का मस्तक बहुत ऊंचा किया है।

27 OCTOBER को अमेरिका के लॉस एंजिल्स में हुए प्रीमियर ने अंतरराष्ट्रीय सिने-संसार को हिला कर रख दिया है। हॉलीवुड के जो आलोचक भारतीय सिनेमा को अक्सर नजरअंदाज करते थे, वे इस बार स्तब्ध खड़े नजर आए:

* ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ के बाद का सबसे बड़ा दृश्य-चमत्कार: एक प्रमुख विदेशी समीक्षक ने स्क्रीनिंग से बाहर निकलते ही दर्ज किया:“साल 2001 में जब ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ आई थी, उसके बाद से आज तक मैंने सिनेमाई पर्दे पर ऐसा कुछ महसूस नहीं किया था। यह फिल्म अद्भुत, भव्य और महाकाव्यात्मक है। इसके सबसे करीब अगर कुछ रखा जा सकता है तो वह ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ ही है, लेकिन यह उससे भी आगे निकलती दिखती है। मुझे लगा जैसे मैं किसी अलौकिक परिकथा की दुनिया से बाहर निकल रहा हूँ।”

* राम के रूप में नेचुरल स्टार और आँखों की नमी: तकनीकी चकाचौंध के बीच फिल्म की असली जीत उसके मुख्य कलाकारों की संवेदनशीलता में है। राम के चरित्र में रणबीर कपूर ने किसी आक्रामक या लाउड दैवीय प्रतिमा को गढ़ने के बजाय, मर्यादा, मौन, आंतरिक दुख और त्याग की जो सजल मानवीय गरिमा पर्दे पर उतारी है, उसने विदेशी दर्शकों तक को रुला दिया। अंतरराष्ट्रीय समीक्षक थेरेसा सिमोनी (Theresa Simoni) ने भावुक होकर लिखा:“राजकुमार राम की भूमिका निभाने वाले अभिनेता के पास गजब की असाधारण प्रतिभा है। उनके अभिनय ने मेरी आँखें नम कर दीं, मैं रो पड़ी (Moved to tears)। यह एक अविस्मरणीय अनुभव था।” याद रखिए थेरेसा रणवीर कपूर से परिचित भी नहीं हैं, तभी वह कह रही हैं कि राजकुमार राम का चरित्र निभाने वाले अभिनेता ने उन्हें अपने अभिनय से रुला दिया। साथ ही, रावण के रूप में यश की चुंबकीय और भयावह उपस्थिति ने उस महाकाव्यात्मक टकराव को वह नैतिक और दृश्य भार दिया है, जिसकी अपेक्षा हर गंभीर सिने-प्रेमी करता है।

नमित मल्होत्रा (DNEG) और नितेश तिवारी का वैश्विक विजन: एक साधुवाद तो बनता है

गीत-संगीत और संवादों की कमजोर कड़ियों की निर्मम आलोचना के बावजूद, निर्देशक नितेश तिवारी और विश्व-विख्यात विजुअल इफेक्ट्स कंपनी DNEG के सर्वेसर्वा नमित मल्होत्रा की इस भगीरथ पहल को धन्यवाद देना हमारा नैतिक कर्तव्य है।

गौरतलब है कि हॉलीवुड और पश्चिमी दुनिया ने सदियों से ग्रीक, रोमन और नॉर्डिक माइथोलॉजी को अपनी फिल्मों के जरिए दुनिया के कोने-कोने में स्थापित किया है। भारत की सनातन संस्कृति और रामकथा जैसी कालजयी धरोहर उस स्तर के तकनीकी संसाधनों और वैश्विक वितरण के अभाव में अक्सर अपने ही भूगोल तक सीमित रह जाती थी।

नमित मल्होत्रा—जिन्होंने हॉलीवुड में ड्यून (Dune), ओपेनहाइमर और इंटरस्टेलर जैसी ऑस्कर विजेता फिल्मों के दृश्य प्रभावों (VFX) का नेतृत्व किया है—उन्होंने अपनी उस अंतरराष्ट्रीय शक्ति और पूंजी को अपनी सभ्यतागत कथा को दुनिया के सामने रखने में झोंक दिया। अमेरिका के सबसे विशालकाय आईमैक्स थिएटर्स में आज जो विदेशी दर्शक अंग्रेजी डबिंग छोड़कर मूल हिंदी में, सबटाइटल्स के साथ रामकथा को अनुभव कर रहे हैं, यह नमित मल्होत्रा और नितेश तिवारी की उसी अदम्य वैश्विक ललक का सुपरिणाम है।

हमारी शिकायत केवल इतनी है कि जब कैनवास इतना विशाल था, विजन इतना साहसिक था और दुनिया को अपनी ओर खींचने की मंशा इतनी पवित्र थी—तब काश, उसकी भाषा और उसके सुरों को भी वैदिक गरिमा और शुद्ध सनातनी भक्ति के अनुकूल रखा गया होता! तकनीक और अभिनय में जीती यह रामकथा यदि संगीत और संवादों में भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती, तो यह केवल एक भव्य सिनेमाई प्रयास नहीं, बल्कि आने वाले युगों के लिए एक अमर सभ्यतागत कीर्तिमान बन जाती!

नोट: यूट्यूब और सोशल मीडिया की बंदिशों के बाद अब यह तय है कि सच बोलने के लिए अपना आजाद प्लेटफार्म चाहिए। India Speak Daily केवल मेरा नहीं, आपकी निडर आवाज़ का मंच है। आइए, मिलकर इस पर अपनी स्वतंत्र Live Streaming और Video Platform को सनातनियों का वैचारिक अधिष्ठान बनाएं। ​नीचे ‘ISDian बनें’ बटन पर क्लिक कर आज ही इसके सदस्य बनें👇

Ssandeep Deo October 30, 2026
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Ssandeep Deo
Posted by Ssandeep Deo
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Journalist from 2.5 decades | Bestseller Author by Nielsen Jagran | Awarded the Sahitya Akademi Award for his book writing | He also received the Pandit Madan Mohan Malaviya Award and the Shivaji Ratna Award for journalism | Founder Editor of https://www.indiaspeakdaily.in
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