इंडिया स्पीक डेली सिनेमा डेस्क। प्रीमियर 27 OCTOBER 2026 को हुआ था।लॉस एंजिल्स के ‘एकेडमी म्यूजियम ऑफ मोशन पिक्चर्स’ (डेविड गेफेन थिएटर) में जब नितेश तिवारी निर्देशित ‘रामायण: राइज ऑफ अ लेजेंड’ का पहला वैश्विक प्रीमियर संपन्न हुआ, तो हॉलीवुड और अंतरराष्ट्रीय सिने-समीक्षकों की जो प्रतिक्रियाएं अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दर्ज हुईं, वे केवल सामान्य प्रशंसा नहीं बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक विस्मय की गवाही दे रही हैं।

गौरतलब है कि आधुनिक वैश्विक सिनेमाई बाजार में गैर-अंग्रेजी पौराणिक गाथाओं को अक्सर पश्चिमी दर्शक दूरी बनाकर देखते रहे हैं, किंतु इस प्रीमियर में लगभग तीन घंटे से अधिक की मूल हिंदी अवधि (बिना किसी कटौती के सबटाइटल्स के साथ) देखने का विदेशी दर्शकों का चुनाव अपने आप में भारतीय सिनेमा के प्रति बदलते नजरिए को रेखांकित करता है। अमेरिका के लॉस एंजिल्स में सीमित स्क्रीनों पर हुए ‘रामायण’ के पहले वैश्विक प्रीमियर ने पश्चिमी सिने-संसार में जिस तीव्र कौतूहल और विस्मय को जन्म दिया है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि जब तकनीक अपनी मर्यादा में रहकर मानवीय करुणा और मर्यादा का संवाहक बनती है, तो महाकाव्य हर भौगोलिक और भाषाई सीमा को लांघ जाते हैं।
दुनिया के सबसे विशाल आईमैक्स थिएटर्स में विदेशी दर्शकों ने अंग्रेजी डबिंग के 30 मिनट छोटे संस्करण को नकारकर मूल 3 घंटे से अधिक की अवधि वाले हिंदी शो को सबटाइटल्स के साथ प्राथमिकता दी। यह रुझान बताता है कि आधुनिक वैश्विक दर्शक अनुवादित कृत्रिमता के बजाय मूल भाषा की ध्वन्यात्मक गंभीरता और उसके आंतरिक ‘भाव’ को आत्मसात करने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा है।
गल्फ न्यूज के अनुसार, स्क्रीनिंग से निकले एक समीक्षक का स्पष्ट कहना था: “मेरी अंग्रेजी डब संस्करण देखने में कोई रुचि नहीं थी। मैं उस मूल भाषा और भाव की प्रामाणिकता को देखना चाहता था जिसके बारे में लोग कहते हैं कि यह भारत की आत्मा है।“
दृश्य भव्यता: ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ और ‘गॉड्स ऑफ इजिप्ट’ के बीच का संतुलन
सिनेमैटिक पैमानों पर फिल्म हॉलीवुड के उस महाकाव्यात्मक संसार से सीधे आंखें मिलाती है, जिसे वैश्विक दर्शकों ने पीटर जैक्सन की कालजयी त्रयी लॉर्ड ऑफ द रिंग्स (Lord of the Rings) और स्वर्णिम पौराणिक फैंटेसी गॉड्स ऑफ इजिप्ट (Gods of Egypt) में देखा था। किंतु जहां हॉलीवुड की कई पौराणिक फिल्में अंधाधुंध वीएफएक्स और तड़क-भड़क के बोझ तले अपनी मानवीय आत्मा गंवा बैठती हैं, वहां यह प्रस्तुति तकनीक के बीच कथा के मूल मर्म को बचाए रखने का गंभीर यत्न करती है।

प्रीमियर देखकर निकले एक विदेशी दर्शक का सीधा बयान इस दृश्य प्रभाव को पुष्ट करता है:
“साल 2001 में जब ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ आई थी, उसके बाद से आज तक मैंने सिनेमाई पर्दे पर ऐसा कुछ महसूस नहीं किया। यह फिल्म अद्भुत, भव्य और महाकाव्यात्मक है। इसके सबसे करीब अगर कुछ रखा जा सकता है तो वह ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ ही है, लेकिन यह उससे भी आगे निकलती दिखती है। ऐसा लगा जैसे मैं किसी अलौकिक दुनिया से बाहर निकल रहा हूँ।”
अभिनय की संवेदनशीलता: राम की मानवीय करुणा और आँखों की नमी
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत राघव के चरित्र में उतरे ‘नेचुरल स्टार’ रणवीर कपूर का सहज अभिनय है। राम को किसी अनछुई, अलौकिक या चीखने-चिल्लाने वाली आक्रामक दैवीय प्रतिमा बनाने के बजाय उनके भीतर के दुख, आत्मसंयम, विछोह और मर्यादा को जिस मौन गरिमा के साथ उभारा गया है, उसने दर्शकों के मर्म को सीधे छू लिया। कर्तव्य-बोध और त्याग के उन विरल क्षणों में थियेटर के भीतर एक गहरा सन्नाटा पसर जाता है।

प्रीमियर देखकर निकली अंतरराष्ट्रीय समीक्षक थेरेसा सिमोनी (Theresa Simoni) ने राम के चरित्र पर भावुक होते हुए दर्ज किया:
“राजकुमार राम की भूमिका निभाने वाले अभिनेता के पास गजब की असाधारण प्रतिभा है। उनके अभिनय ने मेरी आँखें नम कर दीं, मैं रो पड़ी (Moved to tears)। यह एक अविस्मरणीय अनुभव था।”
पश्चिमी समीक्षकों को जहां रणबीर के राम में एक संयमित और शांत ‘दैवीय गरिमा’ दिखी, वहीं रावण की भूमिका में यश के प्रवेश और उनकी उपस्थिति को अंतरराष्ट्रीय प्रेक्षकों ने ‘मैग्नेटिक’ (चुंबकीय) और भयावह रूप से प्रभावशाली करार दिया।

तीन घंटे से अधिक का यह विस्तार कब समाप्त हो जाता है, इसका भान दर्शक को बिल्कुल नहीं होता। गति और मानवीय संवेदना का यह तादात्म्य किसी भी लंबे सिनेमाई शिल्प की सबसे बड़ी कसौटी माना जाता है।
रहमान का संगीत: वैश्विक वाहवाही के बीच वही पुराना दोहराव और सूफियाना भटकाव
वैश्विक फलक पर ‘रामायण’ का बैकग्राउंड स्कोर और संगीत एक दिलचस्प, किंतु तीखे विरोधाभास को जन्म देता है। जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉलीवुड के दिग्गज हंस ज़िमर (Hans Zimmer) के साथ मिलकर तैयार किए गए इस संगीत को पाश्चात्य समीक्षकों ने बड़े पर्दे के अनुकूल ‘विशालकाय’ (Colossal), गगनभेदी और महाकाव्यात्मक करार दिया है,

वहीं भारतीय संगीत-चेतना और शास्त्रीय परंपरा के धरातल पर ए.आर. रहमान का यह काम गंभीर निराशा और पुराने खांचों के दोहराव का शिकार नजर आता है।

हॉलीवुड और अंतरराष्ट्रीय प्रेस की शुरुआती रिपोर्टों में इस बात पर खासा जोर दिया गया है कि रहमान और ज़िमर की जुगलबंदी ने पश्चिम के सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा को जिस तरह भारतीय लोक और तंत्री वाद्यों के साथ पिरोया है, उसने गैर-भारतीय दर्शकों को एक अलौकिक फैंटेसी की दुनिया में धकेल दिया। कई विदेशी समीक्षकों ने लिखा कि दृश्यों के पीछे गूंजती भारी ब्रास (Brass) और स्ट्रिंग्स की धुनें किसी ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ या ‘ड्यून’ जैसा भव्य और रोंगटे खड़े कर देने वाला वातावरण रचती हैं, जिसने भाषा को जाने बिना भी विदेशी मन को बांध लिया।
किंतु जैसे ही इस संगीत को भारतीय सांस्कृतिक और पौराणिक संदर्भ में परखा जाता है, रहमान का शिल्प बुरी तरह उघड़ जाता है। भारतीय श्रोता और आलोचक जिस मौलिक, वैदिक और सनातनी नाद की अपेक्षा कर रहे थे, वहां रहमान अपनी ही पुरानी धुनों की जुगाली करते पकड़े जाते हैं। फिल्म के कई भावुक और द्वंद्व वाले दृश्यों में रहमान का बैकग्राउंड स्कोर अनायास उनकी अपनी ही फिल्म ‘रॉकस्टार’ (Rockstar) और ‘जोधा अकबर’ के संगीत की याद दिला देता है। वही आलाप, वही परिचित कॉर्ड प्रोग्रेशन और वही पुराना वाद्य-संयोजन—सब कुछ ऐसा लगता है जैसे रॉकस्टार के अनरिलीज्ड ट्रैक्स या बैकग्राउंड नोट्स को उठाकर रामकथा के ऊपर चस्पां कर दिया गया हो।

इससे भी बड़ा वैचारिक संकट रहमान की वह चिर-परिचित शैली है, जो हर पौराणिक आख्यान को अपनी सुविधा के अनुसार सूफी, कव्वाली और दरबारी संगीत के सांचे में ढालने की कोशिश करती है। भारतीय आलोचना पक्ष का यह आरोप बेहद प्रासंगिक और सटीक बैठता है कि रामकथा की अपनी एक अंतर्निहित शास्त्रीयता, वेद-ध्वनि, ओंकार का गांभीर्य और शंख-घंटियों का शुद्ध आध्यात्मिक स्पंदन होता है।
रहमान के संगीत में उस सनातनी प्राण-प्रतिष्ठा का नितांत अभाव खलता है। गीतों में भक्ति के सजल लोक-प्रवाह या वीर रस के वैदिक उद्घोष के बजाय एक कृत्रिम सूफियाना उदासी और मेलोड्रामा तैरता रहता है। राम-सीता विवाह का उत्साह और लोकसंगीत जहां उनकी धुनों से गायब है, वहीं राम के वनगमन या सीता के विछोह जैसे प्रसंगों में भी संगीत भारतीय करुणा की उस पराकाष्ठा को नहीं छू पाता जो तुलसी या वाल्मीकि के पदों में स्वतः बहती है; उल्टे वह एक बॉलीवुडिया और पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा के शोर में तब्दील हो जाता है।
वैश्विक कानों के लिए भले ही यह एक नया और भव्य ‘सिनेमैटिक साउंड’ हो, लेकिन भारतीय परंपरा की गहरी समझ रखने वाले श्रोता के लिए रहमान का यह संगीत सृजनशीलता के दिवालिएपन, आत्म-मुग्ध दोहराव और एक हिंदू महाकाव्य पर गैर-सांस्कृतिक मुहावरे थोपने की विफलता से अधिक कुछ नहीं दिखता।
सबसे कमजोर सिरा कुमार विश्वास: संवाद और गीतों में मंचीय तुकबंदी
नितेश तिवारी की इस भव्य संरचना में यदि कोई सिरा सबसे कमजोर, निराश करने वाला और वैचारिक रूप से खोखला दिखता है, तो वह संवाद और गीत लेखन के स्तर पर कुमार विश्वास का काम है। जब यह घोषणा हुई थी कि ‘आदिपुरुष’ के भाषाई पतन और छिछले संवादों के बाद ‘रामायण’ की भाषा तय करने का जिम्मा कुमार विश्वास को सौंपा गया है, तो अपेक्षा यह थी कि वे महर्षि वाल्मीकि के संस्कृत वांग्मय के दार्शनिक गांभीर्य और गोस्वामी तुलसीदास की लोक-संवेदना को सिनेमाई धरातल पर जीवंत करेंगे। किंतु पर्दे पर उनका काम एक गंभीर महाकाव्यात्मक रूपांतरण के बजाय, मंचों पर सुनाए जाने वाले मुशायराई तुकबंदियों और कामचलाऊ मुहावरों का संकलन बनकर रह गया है।

महाकाव्य की अपनी एक अंतर्निहित गरिमा, शास्त्र सम्मत भार और आध्यात्मिक नीरवता होती है। राम का संवाद केवल सूचना देने या तुक मिलाने का जरिया नहीं है; वह मर्यादा, मौन और आंतरिक द्वंद्व की अभिव्यक्ति है। कुमार विश्वास यहीं पूरी तरह गच्चा खा गए हैं। वे अपने कवि सम्मेलनों के ‘तालियों के अभ्यस्त’ मंचीय स्वभाव से बाहर ही नहीं निकल पाए। उनके लिखे कई संवाद दृश्य-भव्यता और चरित्रों के नैतिक वजन को उठाने के बजाय, सतही मुहावरों और नाटकीय लाउडनेस में बदल जाते हैं, जिससे दृश्य का प्रभाव अचानक नीचे गिरता है।

गीतों के धरातल पर भी यही संकट साफ झलकता है। ए.आर. रहमान के पाश्चात्य सिम्फनी और भारतीय वाद्यों के जटिल ऑर्केस्ट्रेशन के सामने कुमार विश्वास के शब्द न तो भक्ति की उस पराकाष्ठा को छू पाते हैं जो रामकथा की आत्मा है, और न ही उनमें वह काव्यात्मक गहराई है जो कालजयी बन सके। वे शब्द बस धुन के पीछे दौड़ते हुए प्रतीत होते हैं, जिनमें न तो वैदिक ऋचाओं का नाद है और न ही अवधी की वह सजल मिठास जो हृदय को बेध दे।
संवाद और गीत दोनों ही स्तरों पर उनका यह सतहीपन एक चेतावनी की तरह है कि किसी सांस्कृतिक महाकाव्य को लिखने के लिए केवल तुकबंदी का मंचीय हुनर और लोकप्रियता काफी नहीं होती; उसके लिए जिस सभ्यतागत अध्ययन, भाषा-तपस्या और वैचारिक विनम्रता की आवश्यकता होती है, कुमार विश्वास वहां बुरी तरह चूकते और निराश करते नजर आते हैं।
महाकाव्य की अपनी एक अंतर्निहित गंभीरता और आध्यात्मिक भार होता है; जब संवाद उस भार को छोड़कर मंचीय नाटकीयता, हल्की लोकप्रियता या सरलीकृत मुहावरों की ओर मुड़ते हैं, तो दृश्य का वजन एकाएक नीचे गिरता है। यह वह पहलू है जो एक अमर कृति को कई बार सामान्य लोकप्रिय सिनेमा के धरातल पर ला पटकता है। कुमार विश्वास ने अपने लेखन से दर्शकों को भी बेहद निराश किया है।
क्लिफहैंगर की छटपटाहट और अधूरा युद्ध
फिल्म जिस तीखे और अचानक मोड़ पर छूटती है, वह दर्शकों के भीतर एक तीव्र कथात्मक छटपटाहट पैदा करता है। स्क्रीन के अचानक ब्लैकआउट (काली) होते ही हॉल में मौजूद एक विदेशी दर्शक के मुंह से अनायास चीख निकली—“नहीं! (I shouted out loud, ‘No!’)”, क्योंकि दर्शक कथा के उस चरम बिंदु पर आकर रुकने के लिए कतई तैयार नहीं था। फिल्म के अंत में छूटे तीखे मोड़ (Cliffhanger) पर उसी विदेशी दर्शक ने अपनी तात्कालिक प्रतिक्रिया साझा करते हुए बताया: “जब फिल्म अचानक उस क्लिफहैंगर पर खत्म हुई और स्क्रीन पूरी तरह काली (Blackout) हो गई, तो मेरे मुंह से अनायास चीख निकली—’नहीं!’ (I shouted out loud, ‘No!’). मैं स्तब्ध रह गया क्योंकि मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह पहले हिस्से का अंत था और अब हमें दूसरे भाग के लिए रुकना पड़ेगा

यह क्लिफहैंगर यह स्पष्ट संदेश छोड़ जाता है कि युद्ध अभी केवल पर्दों पर नहीं, बल्कि भीतर की सांस्कृतिक समझ और वैश्विक सिनेमाई पैमानों पर भी लड़ा जाना बाकी है। संवादों की कमजोरी और संगीत के आंतरिक अंतर्विरोधों के बावजूद, यह प्रीमियर यह आश्वस्त करता है कि जब तक केंद्र में रामकथा की मानवीय करुणा, विछोह और मर्यादा का रुदन जीवित है, तब तक यह गाथा हर भौगोलिक परिधि को तोड़कर दुनिया को झकझोरती रहेगी।
लॉस एंजिल्स के इस प्रीमियर ने पश्चिमी दर्शकों के मन में यह स्पष्ट कर दिया है कि यह मात्र एक क्षेत्रीय धार्मिक कथा नहीं, बल्कि मानवीय मर्यादा, त्याग और अंधकार पर प्रकाश के वैश्विक संघर्ष की वह गाथा है जो हॉलीवुड के बड़े-बड़े फैंटेसी महाकाव्यों को तकनीकी और भावनात्मक दोनों स्तरों पर चुनौती दे रही है।
नोट: यूट्यूब और सोशल मीडिया की बंदिशों के बाद अब यह तय है कि सच बोलने के लिए अपना आजाद प्लेटफार्म चाहिए। India Speak Daily केवल मेरा नहीं, आपकी निडर आवाज़ का मंच है। आइए, मिलकर इस पर अपनी स्वतंत्र Live Streaming और Video Platform को सनातनियों का वैचारिक अधिष्ठान बनाएं। नीचे ‘ISDian बनें’ बटन पर क्लिक कर आज ही इसके सदस्य बनें👇

रहमान क संगीत बालीवुड की कठमुल्लाकरण की नीति की तरफ ले जाता है।जब कव्वाली की धुन थियेटर में गूंजेगी तब पब्लिक बोर होगी सोने पे सुहागा कुमार विश्वास की अप्रासंगिक तुकबंदी। आज फिल्म इंडस्ट्री लगता है पाकिस्तान से चलरही है। सोनी टीवी पर इंडियन आईडल में भी कोई सड़क छाप को लाकर सारे गाने कव्वाली बनाने वाले को हर हाल में वाह वाह कर प्रमोट किया जाता है।
कुमार विश्वास, शायद ब्राह्मण है, पर सारे भगवान का अपनी नौटंकी बाली महफ़िल में बहुत अपमान करते हैं, जैसे शिवजी को -अरे नंगे बदन बर्फ पर बैठे हैं, हनुमान जी को -देखो वे उड़े चले जा रहे हैं!इसी बकवास पर लोग तालियां पीटते हैं।
Weill Cornell Medical College,New York में मेरी बेटी ने किसी फंक्शन में “सरस्वती वंदना ‘स्टेज पर गाई थी तो पूरा हाल साथ में गुनगुना रहा था (यद्यपि कोई समझ नहीं पा रहा था फिर भी) बाद में हाल तालियों की आवाज से भर गया था। विदेशियों को भारतीय संस्कृति पसंद आती है!
Jay Jagannath
Good analysis