इंडिया स्पीक डेली सिनेमा डेस्क। समकालीन सिनेमाई बाज़ार जब भारी-भरकम पीआर, कृत्रिम प्रचार और अत्यधिक हिंसा व संवेदनहीनता पर आधारित कथ्य को बॉक्स ऑफिस की सफलता की गारंटी मानने लगा था, ठीक उसी दौर में ‘हनुमान अंश’ का उभार केवल एक व्यावसायिक उलटफेर नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक और वैचारिक संकेत है। यह उस दौर की घटना है जब दर्शक सतही तमाशे से ऊबकर आत्मा को स्पर्श करने वाले तत्व की तलाश में था।
फिल्म की पृष्ठभूमि: पहले दिन की विफलता से अभूतपूर्व उलटफेर तक
‘हनुमान अंश’ मूलतः बीसवीं सदी के दिव्य संत बाबा नीब करौरी के आध्यात्मिक प्रभाव, उनके अनन्य भक्त-शिष्य के आंतरिक रूपांतरण और लोक-कल्याण के उस दर्शन को रेखांकित करती है, जिसे भारतीय मानस में ‘हनुमान भाव’ कहा गया है। यह कोई पारंपरिक लाउड माइथोलॉजिकल ड्रामा नहीं, बल्कि आंतरिक द्वंद्व, मौन सेवा और परा-चेतना का एक मानवीय आख्यान है।
बॉक्स ऑफिस का संघर्ष और कायापलट रिलीज़ के पहले दिन फिल्म को बाज़ार के क्रूर यथार्थ का सामना करना पड़ा। बड़े बजट की प्रचारित फिल्मों—‘बंटवारा’, ‘आवारापन’ (सीक्वल/री-रिलीज़ प्रारूप) और भारी हिंसा व आधुनिक अवसाद को भुनाने वाली ‘टॉक्सिक’—के विशाल स्क्रीन काउंट और आक्रामक विज्ञापनों के आगे इसे सीमित थियेटर और बेहद ख़राब मॉर्निंग शो मिले। पहले दिन का कलेक्शन निराशाजनक रहा और फिल्म समीक्षकों के एक वर्ग ने इसे समय से पहले ‘फ्लॉप’ घोषित कर दिया।
किंतु कुछ दिन बाद जो हुआ, वह सिनेमाई समाजशास्त्र के विश्लेषकों के लिए एक शोध का विषय बन गया। फिल्म के किसी भी दृश्य में कृत्रिम उपदेश नहीं था, बल्कि वह सादगी थी जो सीधे दर्शक के मर्म को छूती थी। दर्शकों के सहज ‘माउथ पब्लिसिटी’ (Word of Mouth) ने ऐसा रूप लिया कि तीसरे दिन तक सिनेमाघरों के बाहर अप्रत्याशित कतारें दिखने लगीं। जहाँ ‘टॉक्सिक’ और अन्य फ़िल्में अपने आंतरिक खोखलेपन के कारण दूसरे सप्ताह में तेज़ी से ढहने लगीं, वहीं ‘हनुमान अंश’ ने एक शांत सुनामी की तरह बॉक्स ऑफिस पर कब्ज़ा जमा लिया।
नेपथ्य के शिल्पी: संघर्ष, साधना और परिचय
इस फिल्म की यात्रा इसके निर्माण से जुड़े हर व्यक्ति की व्यक्तिगत साधना और लंबे संघर्ष से जुड़ी है:
- निर्माता (प्रोड्यूसर): मुख्यधारा के बड़े कॉर्पोरेट घरानों ने इस विषय को “व्यावसायिक रूप से जोखिम भरा” कहकर ठुकरा दिया था। ऐसे में स्वतंत्र निर्माताओं ने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति और बचत को दांव पर लगाकर इसे बिना किसी समझौते के पूरा करने का संकल्प लिया। इस फिल्म के निर्माता अनुप्रिया नागर, डॉ. विशाल चतुर्वेदी, रागिनी एस (रागिनी सोना) और नम्रता जी सिंह। अनुप्रिया नागर मात्र 21 वर्ष की जेनजी बच्ची है, जो विदेश में पढ़ती थी और नीब करौरी बाबा के बारे में पश्चिमी में छपे विमर्श को पढ़ कर उनके जीवन को समझने और कुछ करने के लिए भारत लौटी।
| पैमाना | विवरण |
| अनुमानित बजट | ₹1.5 से ₹2 करोड़ (सीमित एवं अनुशासित निर्माण लागत) |
| घरेलू व वैश्विक कमाई | ₹100 छू सकती है। |
| सफलता का कारक | जैविक लोक-स्वीकार्यता, परिवार केंद्रित दर्शक और आध्यात्मिक तृप्ति |
- निर्देशक (डायरेक्टर): इस फिल्म के लेखक और निर्देशक डॉ विशाल चतुर्वेदी हैं। समानांतर सिनेमा और वृत्तचित्रों में वर्षों तक हाशिए पर संघर्ष करने वाले निर्देशक ने इस कथा को किसी व्यावसायिक तमाशे में बदलने के बजाय यथार्थपरक, संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण से परदे पर उतारा।
- मुख्य कलाकार: बाबा की भूमिका में शोभिनव सत्य हैं, जो इस फिल्म के सहायक निदेशक थे, परंतु मुख्य कलाकार के बीमार पड़ने पर उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई और उन्होंने कमाल कर दिया। किसी चमक-दमक वाले सुपरस्टार के बजाय शोभिनव को चुना गया। शोभिनव ने चरित्र की आत्मिक पवित्रता को जीने के लिए महीनों तक सात्विक और मौन दिनचर्या का पालन किया।
- संगीतकार एवं गायक: फिल्म के सबसे चर्चित गानों को साधु एस. तिवारी (Sadhu S. Tiwari) ने तैयार किया है। वह एक बेहतरीन संगीतकार और गायक हैं। फिल्म ‘हनुमान अंश’ के एल्बम में उन्होंने न सिर्फ संगीत (Music Component) दिया है, बल्कि कई प्रसिद्ध गानों के बोल (Lyrics) भी लिखे हैं और उन्हें अपनी आवाज से सजाया भी है। फिल्म का एक बेहद लोकप्रिय भजन सुनील लोधी (Suneel Lodhi) ने गाया है। सुनील लोधी मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड (सागर जिला) के रहने वाले एक 25 वर्षीय लोक गायक हैं। जन्म से दृष्टिबाधित होने और संगीत की कोई औपचारिक ट्रेनिंग न होने के बावजूद, वह गांवों में तंबूरा बजाकर भजन गाते थे। सोशल मीडिया पर उनका एक पारंपरिक भजन “मोरे संकट के कटैया” वायरल हुआ, जिसके बाद संगीत निर्माता पंकज वीआरके और फिल्म के निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की नजर उन पर पड़ी और उन्हें बॉलीवुड में ब्रेक मिला। हनुमान अंश के दो भजन बेहद प्रसिद्ध हो रहे हैं। पहला है भजन है- ‘पार्वती’। इस गाने के गायक, संगीतकार और गीतकार साधु एस. तिवारी हैं।यह गाना भगवान शिव और माता पार्वती के प्रसंग पर आधारित है। इसके बोल “जब ज़िद पे आ गई पार्वती…” और “घर गृहस्ती का जाने वे… काहे ज़िद कर रही का हे तप कर रही“ दर्शकों को बेहद भावुक और मंत्रमुग्ध कर रहे हैं। यह गाना अपनी गहरी भक्ति और मधुर संगीत के कारण सोशल मीडिया रील्स पर खूब ट्रेंड कर रहा है। दूसरा भजन है- ‘मैंने तेरे ही भरोसे‘! इसे अद्भुत सुनील लोधी ने गाया है और पारंपरिक धुनों के साथ इसे संगीतबद्ध किया है। इस भजन के बोल हैं—“ओ मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डारे दई…”। यह पूरी तरह से भगवान हनुमान के प्रति आत्मसमर्पण और अटूट विश्वास को दर्शाता है। सुनील लोधी की सादगी भरी और रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज ने इस गाने को एक जादुई मोड़ दिया है, जिसे सुनकर लोग सिनेमाघरों की तरफ खिंचे चले आ रहे हैं।
सेट पर घटी विस्मयकारी अनुभूतियाँ
फिल्म निर्माण के दौरान यूनिट के सदस्यों ने कई ऐसे अनुभवों को साझा किया, जिन्हें तर्क की सीमा में बांधना कठिन है:
- प्रतिकूल मौसम में अप्रत्याशित शांति: उत्तराखंड की उच्च घाटियों में जब भारी तूफ़ान और भूस्खलन की चेतावनी के कारण पूरी शूटिंग रद्द होने की कगार पर थी, तभी सेट के ऊपर का आकाश अचानक बिल्कुल शांत और साफ़ हो गया, जबकि कुछ ही किलोमीटर दूर मूसलाधार बारिश जारी थी।
- संसाधनों की स्वतः आपूर्ति: एक सुदूर पहाड़ी गाँव में शूटिंग के दौरान जब लाइट और जनरेटर का मुख्य उपकरण अचानक ख़राब हो गया और काम रुकने की स्थिति बनी, तब बिना किसी पूर्व योजना के एक स्थानीय व्यक्ति ठीक वही तकनीकी सहायता लेकर उपस्थित हो गया, जिसकी उस समय नितांत आवश्यकता थी।
- अदृश्य उपस्थिति का भान: आश्रम के दृश्यों के फिल्मांकन के दौरान कई वरिष्ठ तकनीशियनों और कलाकारों ने स्वीकार किया कि सेट पर एक विशिष्ट सौम्य सुगंध और भारी शांति का निरंतर अनुभव होता था, जिससे अत्यधिक तनावपूर्ण शेड्यूल में भी किसी में चिड़चिड़ापन या थकान नहीं देखी गई।
नाम का शुद्ध विमर्श: ‘नीब करौरी’ अथवा ‘नीम करौली’?
भाषाई और ऐतिहासिक दृष्टि से सही नाम नीब करौरी (Neeb Karori) है।
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद में एक छोटा सा रेलवे स्टेशन और गाँव है जिसका ऐतिहासिक नाम नीब करौरी है। महाराज जी ने अपने प्रारंभिक साधना काल में इसी गाँव के पास अपनी तपोभूमि बनाई थी और यहीं उनके जीवन की ऐतिहासिक ‘ट्रेन वाली घटना’ घटी थी। लोक-प्रचलन और अवधी/खड़ी बोली के उच्चारण भेद के कारण कालांतर में लोग इसे ‘नीम करौली’ या ‘नीम करोली’ कहने लगे। नैनीताल ज़िले के कैंची धाम और पश्चिमी देशों में ‘नीम करोली बाबा’ नाम अधिक प्रचलित हो गया, परंतु मूल और ऐतिहासिक रूप से शुद्ध संबोधन नीब करौरी बाबा (मूल नाम: लक्ष्मीनारायण शर्मा) ही है।
नीब करौरी बाबा: दिव्य जीवन और अलौकिक घटनाएं
बाबा नीब करौरी का पूरा जीवन किसी चमत्कार के प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि मानव-मात्र के प्रति अहैतुकी कृपा और ‘सबको भोजन कराओ, सबका कल्याण करो’ के संकल्प का प्रतीक था।
- ट्रेन का रुक जाना (नीब करौरी स्टेशन की घटना): महाराज जी एक बार बिना टिकट प्रथम श्रेणी के डिब्बे में चढ़ गए। टिकट परीक्षक ने अगले स्टेशन ‘नीब करौरी’ पर उन्हें अपमानित कर ट्रेन से उतार दिया। बाबा शांत भाव से अपने चिमटे को ज़मीन में गाड़कर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। इसके बाद ट्रेन का चालक कितनी भी कोशिश कर ले, ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। दूसरा इंजन मंगाया गया, तकनीकी जांच हुई, सब कुछ सही था परंतु ट्रेन टस-से-मस न हुई। अंततः एक स्थानीय यात्री ने अधिकारियों को बताया कि आपने एक सिद्ध संत का अपमान किया है। अधिकारियों ने क्षमा याचना की। बाबा ने दो शर्तों पर ट्रेन में पुनः प्रवेश किया—पहली, उस गाँव में एक पक्का स्टेशन बने और दूसरी, संन्यासियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो। बाबा के बैठते ही ट्रेन स्वतः चल पड़ी।
- गंगाजल में रूपांतरित हुआ घी (भंडारे का प्रसंग): कैंची धाम के आरंभिक दिनों में एक विशाल भंडारे के दौरान अचानक घी समाप्त हो गया। बाबा के निर्देश पर आश्रम के सेवक पास बहती शिप्रा नदी से दो कनस्तर पानी भरकर लाए। जब उस जल को कड़ाह में डाला गया, तो वह शुद्ध देसी घी की तरह काम करने लगा। अगले दिन जब बाज़ार से नया घी आया, तो बाबा ने ठीक दो कनस्तर घी वापस नदी में विसर्जित करवा कर प्रकृति का ऋण चुका दिया।
- अथाह भोजन का चमत्कार: महाराज जी के किसी भी आश्रम में आने वाले किसी भी व्यक्ति को कभी भूखे पेट नहीं जाने दिया गया। कई बार मुट्ठी भर अन्न से सैकड़ों लोगों के लिए विशाल भोजन तैयार हो जाना वहाँ एक नित्य यथार्थ बन गया था।
पश्चिम का जागरण: प्रोफ़ेसर रिचर्ड अल्पर्ट और ‘बाबा रामदास’
1960 के दशक में जब पश्चिमी समाज भौतिक समृद्धि के चरम पर पहुंचकर आंतरिक अवसाद, मानसिक भटकाव और साइकेडेलिक ड्रग्स (LSD) के भंवर में फंसा हुआ था, तब हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विख्यात प्रोफ़ेसर रिचर्ड अल्पर्ट (Richard Alpert) सत्य की खोज में भारत आए।
नैनीताल की पहाड़ियों में जब अल्पर्ट की भेंट बाबा नीब करौरी से हुई, तो बाबा ने उनके जीवन के सबसे गोपनीय विचारों और एक रात पहले घटी उनकी गुप्त घटनाओं को हूबहू प्रकट कर दिया। संदेह से भरे प्रोफ़ेसर ने बाबा को LSD की अत्यधिक घातक मात्रा (जो किसी सामान्य मनुष्य की जान ले सकती थी) परीक्षण के तौर पर दी। बाबा ने उस पूरी खुराक को बिना किसी हिचक के एक ही बार में खा लिया। घंटों तक उनके शरीर और चेतना पर उस विषैले रसायन का रत्ती भर भी प्रभाव नहीं पड़ा; वे मुस्कुराते हुए केवल यही बोले—“यह औषधि मनको कुछ देर भटका तो सकती है, पर ईश्वर तक नहीं ले जासकती।केवल प्रेम और सत्य ही वहाँ पहुंचा सकते हैं।”
इस घटना ने अल्पर्ट के अहंकार और पश्चिमी बुद्धिवाद को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। वे बाबा के शिष्य बने और उन्हें नया नाम मिला—रामदास (Ram Dass)।
अमेरिका लौटकर रामदास ने ‘बी हियर नाउ’ (Be Here Now) नामक युगांतरकारी पुस्तक लिखी। इस पुस्तक ने पश्चिमी जगत के लाखों युवाओं, बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों की चेतना को झकझोर दिया। रामदास के माध्यम से ही पश्चिम को पहली बार समझ आया कि भारतीय संन्यास भागने का मार्ग नहीं, बल्कि वर्तमान क्षण में पूर्णता से जीने की पराकाष्ठा है।
सिलिकॉन वैली का कैंची धाम कनेक्शन: स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग
पश्चिम के भौतिकतावादी और तकनीकी शिखर को जब भी दिशा की आवश्यकता पड़ी, उसकी सुई भारत के इस शांत हिमालयी आश्रम की ओर घूमी।
- स्टीव जॉब्स (Apple Founder): 1974 में एक 19 वर्षीय युवक के रूप में स्टीव जॉब्स अपने मित्र डैन कोटके के साथ आध्यात्मिक सत्य और जीवन के उद्देश्य की खोज में भारत आए। वे नीब करौरी बाबा से मिलने कैंची धाम पहुंचे, किंतु कुछ महीने पहले ही (सितंबर 1973) बाबा महासमाधि ले चुके थे। जॉब्स कई दिनों तक वहाँ रुके, ध्यान लगाया और भारतीय दर्शन के उस ‘मिनिमलिज्म’ (सादगी और सार-तत्व) को आत्मसात किया। इसी आंतरिक स्पष्टता ने आगे चलकर एप्पल (Apple) के उस डिज़ाइन दर्शन को जन्म दिया, जिसने तकनीक को मानवीय संवेदना से जोड़ दिया।
- मार्क जुकरबर्ग (Facebook Founder): वर्ष 2008 के आसपास, जब फेसबुक अपने अस्तित्व के गंभीर संकट से जूझ रहा था और कंपनी को बेचने के भारी दबाव थे, तब स्टीव जॉब्स ने मार्क जुकरबर्ग को एक सलाह दी—“भारत जाओ और उस मंदिर (कैंचीधाम) में कुछ दिन बिताओ जहाँ मैं गया था, तुम्हें तुम्हारी कंपनी का वास्तविक मिशन समझ आजाएगा।” जुकरबर्ग ने भारत आकर कैंची धाम में समय बिताया। उन्होंने स्वयं एक सार्वजनिक संवाद में स्वीकार किया कि वहाँ बिताए गए समय ने उन्हें यह स्पष्ट दृष्टि दी कि फेसबुक केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि दुनिया भर के इंसानों को आपस में जोड़ने का एक सेतु होना चाहिए।
सिनेमाई समीक्षा और सांस्कृतिक संदेश
‘हनुमान अंश’ केवल एक फिल्म की व्यावसायिक सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह बाज़ारवाद द्वारा गढ़ी गई उन मान्यताओं पर एक करारा प्रहार है जो यह मान बैठी थीं कि भारतीय दर्शक केवल अश्लीलता, हिंसा और तकनीक के तमाशे से ही आकर्षित हो सकता है।
फिल्म यह स्थापित करती है कि जब कला अपनी जड़ों से जुड़ती है, जब उसमें त्याग और लोक-कल्याण की सच्ची संवेदना होती है, तो उसे किसी महंगे विज्ञापन की आवश्यकता नहीं होती। बाबा नीब करौरी का संदेश—“सबको प्रेम करो, सबकी सेवा करो, सबको भोजन कराओ और ईश्वर का स्मरण रखो”—आज के दिशाहीन और मानसिक संत्रास से जूझते समाज के लिए एकमात्र संजीवनी है। ‘हनुमान अंश’ इसी सनातन सत्य की परदे पर एक प्रमाणिक और मौन अभिव्यक्ति बनकर उभरी है।

जय सियाराम हर हर महादेव!
जयश्री राम जी जय वीर हनुमान जी।।
जय बाबा नीब करौली महाराज।।
जय नींबू करौली बाबा।