संदीप देव। सनातन धर्म की ज्ञान-परंपरा सहस्राब्दियों से श्रुति, स्मृति, पुराण और आचार्य-परंपरा की शास्त्रीय मर्यादा पर टिकी है। यह किसी राजनीतिक दल का चुनावी घोषणापत्र नहीं है और न ही किसी कॉर्पोरेट योगपीठ का व्यावसायिक उत्पाद। किंतु हरिद्वार के पतंजलि परिसर में बाबा रामदेव की अगुवाई में ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ का गठन कर धर्मग्रंथों में ‘संशोधन’ का प्रस्ताव पारित किया जाना यह दिखाता है कि राजनीतिक प्रभुत्व अब सीधे धार्मिक ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों को नियंत्रित करने की चेष्टा कर रहा है।

इस पूरे प्रकरण पर ज्योतिर्मठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने जो सवाल खड़े किए हैं, वे सनातन धर्म के संस्थागत प्राधिकार (Religious Authority) के अस्तित्व की लड़ाई हैं। यह विवाद केवल दो संतों का नहीं, बल्कि संघ-संघाचार्य गठजोड़ द्वारा सनातनी शास्त्रों की अपनी मनमानी व्याख्या प्रस्तुत कर हिंदू समाज को पथभ्रष्ट करने का सुनियोजित षड्यंत्र है!
1. बाबा रामदेव का मंच, लेकिन स्क्रिप्ट नागपुर की?
हरिद्वार के सम्मेलन में बाबा रामदेव के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के केंद्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार का मंच साझा करना कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह उसी पुरानी जुगलबंदी का अगला चरण है, जिसने 2014 के राजनीतिक परिवर्तन की जमीन तैयार की थी।

* 2011 का रामलीला मैदान आंदोलन: जून 2011 में जब बाबा रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ तथाकथित ‘सत्याग्रह’ शुरू किया, तो पर्दे के पीछे उस पूरे तंबू, भोजन, व्यवस्था और भीड़ का प्रबंधन संघ के स्वयंसेवकों के हाथों में था। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद संघ नेतृत्व ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था कि उसने रामदेव के आंदोलन को अपना पूरा जमीनी समर्थन दिया था। यह आंदोलन शुद्ध रूप से तत्कालीन केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का एक सुनियोजित राजनीतिक उपक्रम था।
* मोदी को भाजपा से पहले पीएम प्रोजेक्ट करना: 2012-2013 के दौरान, जब स्वयं भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर लालकृष्ण आडवाणी और अन्य वरिष्ठ नेता नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी को लेकर हिचकिचा रहे थे, तब बाबा रामदेव ने अपने योग शिविरों, आस्था/संस्कार चैनलों और प्रेस सम्मेलनों से नरेंद्र मोदी को ‘देश का एकमात्र तारणहार’ घोषित कर दिया था। रामदेव ने भाजपा के औपचारिक संसदीय बोर्ड के फैसले से पहले ही देश भर में मोदी के पक्ष में माहौल तैयार किया।
आज जब संघ को अपनी पार्टी भाजपा के लिए ‘हिंदू समरसता’ के नाम पर सामान्य जाति और उनके बच्चों को जन्मजात अपराधी साबित करते हुए SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक वोटों की लामबंदी करनी है तो वह खुलकर हमारे शास्त्रों में छेड़छाड़ करने के लिए अपनी विचारधारा वाले संघाचार्यों की लामबंदी में जुटा है। संघ के ‘पोलिटिकल प्रोजेक्ट’ में कुछ धर्मग्रंथों (विशेषकर मनुस्मृति) के श्लोकों से असहजता महसूस हो रही है, तो नागपुर की इसी स्क्रिप्ट को क्रियान्वित करने के लिए फिर से बाबा रामदेव के कंधे का सहारा लिया जा रहा है। मार्च 2023 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में कहा था कि “स्वार्थी लोगों ने ग्रंथों में गलत चीजें घुसा दीं, इसलिए उन ग्रंथों और परंपराओं के ज्ञान की फिर एक बार समीक्षा जरूरी है।” भागवत यहीं नहीं रुके, एक बार उन्होंने ब्राह्मणों के विरुद्ध बयान दिया कि “जाति पंडितों ने बनाई है।” हिंदू विरोधी डॉ आंबेडकर-फुले-पेरियार की विचारधारा वाले संघ-भाजपा को जब तक हिंदुओं के वोटों की आवश्यकता थी, तब तक ‘हिंदुत्व’ का नारा बुलंद किया गया और अब जब जातिगत खेल खेलना है तो सनातन मंदिर, तीर्थों और सनातन धर्म शास्त्रों को टारगेट किया जा रहा है। संघ-भाजपा के ‘पोविटिकल प्रोजेक्ट’ मूर्त रूप देने के लिए ही पतंजलि के मंच से ठीक वही प्रस्ताव पारित करवा दिया गया, जो मोदी-भागवत की असली मंशा है! यह स्पष्ट करता है कि बाबा रामदेव के मंच पर जुटे सारे ‘संघाचार्य’ संघ के वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले मोहरा बनकर काम कर रहे हैं।
2. इनको अधिकार किसने दिया? सनातनी प्राधिकार का खुला अपहरण
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का सबसे बुनियादी सवाल यही है: “संशोधन करने का अधिकार किसको है?”
सनातन धर्म में धर्म, नीति, श्रुति और स्मृति के निर्णयों का प्राधिकार आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार आम्नाय पीठों (बद्रिकाश्रम/ज्योतिर्मठ, द्वारका, शृंगेरी और पुरी) और पारंपरिक संप्रदायों के धर्माचार्यों के पास सुरक्षित रहा है।

* क्या बाबा रामदेव, जिनका पूरा जीवन योग शिविरों और व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा करने में बीता है, वे सनातन धर्म के सर्वमान्य धर्माचार्य हैं?
* क्या किसी अपंजीकृत एनजीओ, कंपनी और उनके समर्थक आचार्यों को यह वैधानिक या धार्मिक जनादेश प्राप्त है कि वह सनातन के हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों का संपादन करे?
* पतंजलि ने जिस ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ की रूपरेखा बनाई, उसमें केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी को ‘विद्वत परिषद’ का प्रमुख बनाया गया। क्या सरकारी या अर्ध-सरकारी तंत्र के वेतनभोगी कुलपतियों और प्रशासनिक शिक्षाविदों को धर्मग्रंथों में कांट-छांट करने का अधिकार सनातन की परंपरा देती है?
शंकराचार्य का यह आरोप पूरी तरह प्रासंगिक है कि जब काशी में देश भर के प्रकांड विद्वानों ने विचार-विमर्श करके यह स्पष्ट घोषित कर दिया था कि मनुस्मृति सहित धर्मशास्त्रों का मूल पाठ अपरिवर्तनीय है, तब पतंजलि के मंच से समानांतर समिति बनाना पारंपरिक आचार्यों की पीठों के विशेषाधिकार का खुला अपहरण और धार्मिक सत्ता को हड़पने की अनधिकृत चेष्टा है।
3. दोहरे मापदंड: क्या कुरान, बाइबल या ओल्ड टेस्टामेंट को छूने की हिम्मत है?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा नैतिक और बौद्धिक पाखंड यह है कि यह तथाकथित ‘सुधारवादी’ पराक्रम केवल हिंदू धर्मशास्त्रों पर ही क्यों दिखाया जाता है? सुधार की आवश्यकता तो और भी मजहबों के किताबों में है? उस पर क्यों चुप्पी है?
अब्राहमिक मजहबों—इस्लाम और ईसाइयत—के धर्मग्रंथों (कुरान, हदीस, बाइबल, ओल्ड टेस्टामेंट) में भी ऐसे अनगिनत संदर्भ, आयतें और नियम हैं, जो आधुनिक मानवाधिकार, जेंडर समानता, युद्ध के नियमों और आधुनिक विज्ञान की कसौटियों पर कड़े अंतरराष्ट्रीय विवादों के केंद्र में रहते हैं। दुनिया भर के विचारकों ने उन पर सवाल उठाए हैं। किंतु क्या संघ परिवार और ‘संघाचार्यों’ में यह नैतिक साहस है कि वे सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर सकें कि:
“कुरान, बाइबल या ओल्ड टेस्टामेंट में समय के साथ कुछ स्वार्थी तत्वों ने अशुद्धियां मिला दी हैं, इसलिए हम उनका शोधन करने के लिए एक ‘शुद्धि समिति‘ बनाते हैं और उन आयतों व वचनों को हटा देंगे?”
वहां तो ‘ईशनिंदा’ (Blasphemy) का खौफ, अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव और संगठित धार्मिक प्रतिरोध के डर से ये संगठन हाथ भी नहीं लगा सकते।
परंतु जब बात सनातन धर्म की आती है, तो उसकी सहिष्णुता, उदारता और आंतरिक खुलापन ही उसकी कमजोरी बना दिया जाता है। चूंकि हिंदू समाज धर्मग्रंथों के नाम पर हिंसक फतवे जारी नहीं करता, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन या एक विचारधारा विशेष का ‘संघाचार्य’ उठकर शास्त्रों का ‘ऑडिट’ करने बैठ जाता है। यह सनातन की सहनशीलता का फायदा उठाकर किया जाने वाला खुला दोहरा मापदंड (Double Standard) है।
4. आर्य समाजी मानसिकता और पौराणिक सनातन का टकराव
इस विवाद की एक और गहरी वैचारिक परत है। बाबा रामदेव की मूल दीक्षा और सोच स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाज और गुरुकुल कांगड़ी परंपरा से प्रेरित है। आर्य समाज का बुनियादी सिद्धांत ही यह रहा है कि केवल चार वेद ही निर्विवाद और अपौरुषेय सत्य हैं, जबकि बाद के 18 महापुराण, उपपुराण, स्मृतियां और रामायण-महाभारत के कई हिस्से मध्यकाल में रचे गए ‘प्रक्षेप’ (मिलावट) हैं। आर्य समाज पौराणिक मान्यताओं, मूर्तिपूजा, तीर्थाटन और अवतारवाद का मुखर विरोधी रहा है।

इसके विपरीत, आदि शंकराचार्य की स्मार्त परंपरा और पारंपरिक सनातनी समाज अठारह पुराणों और स्मृतियों को वेदों का ही प्रामाणिक और व्यावहारिक विस्तार मानता है। पुराणों के बिना सनातन धर्म की उपासना पद्धति, मंदिर और आस्था का ढांचा टिक ही नहीं सकता। बाबा रामदेव जो ‘शास्त्र शुद्धि’ का आंदोलन चलाने का दावा कर रहे हैं, वह असल में आर्य समाज की उसी पुरानी संशोधनवादी दृष्टि को मुख्यधारा के पौराणिक सनातन पर थोपने की कोशिश है। यह सीधे तौर पर सनातन समाज की मान्यताओं और स्मार्त पीठों की प्रामाणिकता पर आघात है।
5. बाबा रामदेव के मंच पर आपराधिक और विवादित चेहरे!
सहस्राब्दियों पुराने सनातन धर्मग्रंथों, वेदों, उपनिषदों और स्मृति संहिताओं की समीक्षा कर उनमें ‘त्रुटियां’ निकालने और उनका ‘शुद्धिकरण’ करने के लिए हरिद्वार के पतंजलि परिसर में जो मंच सजाया गया था, उसकी गंभीरता उस पर आसीन चेहरों के इतिहास से ही पूरी तरह तार-तार हो जाती है। सनातन की मूल ज्ञान-परंपरा को ‘संपादित’ करने का बीड़ा उठाने वाले इस मंच पर बैठे प्रमुख चेहरों का ब्योरा इस प्रकार है:-

* स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती (अदालतों द्वारा खारिज दावेदारी): इनकी तथाकथित ज्योतिष पीठ की दावेदारी को देश की निचली अदालत से लेकर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक ने खारिज कर दिया था। अदालतों ने पाया था कि वे संन्यास दीक्षा और दंडी संन्यासी के अनिवार्य शास्त्रीय नियमों पर खरे नहीं उतरते और उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग कर अवैध वसीयत के जरिए पीठ पर आधिपत्य जमाने की चेष्टा की थी। वह वेतनभोगी होते हुए संन्यास का दिखावा कर रहे थे! अदालत ने उनके लिए ‘फ्रॉड’ शब्द का उपयोग किया है। इसके बावजूद संघ द्वारा राजनीतिक और संगठनात्मक संरक्षण के बल पर उन्हें समानांतर शंकराचार्य बनाकर स्थापित करने की कोशिशें की जाती रही हैं।

* स्वामी अधोक्षजानंद सरस्वती (अलगाववादियों से नजदीकी और अदालती पाबंदी): यह स्वयं को जगन्नाथ पुरी गोवर्धन पीठ का ‘शंकराचार्य’ प्रचारित करते रहे हैं, जबकि ओडिशा उच्च न्यायालय ने पुरी मठ के आंतरिक मामलों में इनके अनधिकृत प्रवेश और मठ परिसर के आसपास इनकी गतिविधियों पर कानूनी रोक लगाई थी। इसके अलावा इनका अतीत कश्मीर के अलगाववादी हुर्रियत नेताओं से संपर्कों, राजनीतिक मुलाकातों और संदिग्ध गतिविधियों को लेकर लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों और विवादों के घेरे में रहा है।

* सतुआ बाबा उर्फ संतोष दास (भौकाल और विलासिता का प्रदर्शन): काशी के इस चेहरे की पहचान वैराग्य, तप, शास्त्र-अध्ययन या तत्वज्ञान के बजाय सोशल मीडिया पर लग्जरी डिफेंडर गाड़ियों, विदेशी ब्रांडेड चश्मों के प्रदर्शन और राजनीतिक रसूखदारों के साथ उठक-बैठक के लिए अधिक रही है।

* स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती (अखिल भारतीय संत समिति और विवादित बयानबाजी): इनकी पहचान शास्त्रीय विमर्श के बजाय टीवी बहसों में आक्रामक राजनीतिक पक्षधरता और हाल के वर्षों में गोवंश तथा धार्मिक विषयों पर पारंपरिक मान्यताओं के विपरीत विवादित रही है।

* स्वामी चिदानंद सरस्वती (भूमि अतिक्रमण और एनजीटी के नोटिस): ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन के प्रमुख चिदानंद सरस्वती पर स्वर्गाश्रम क्षेत्र में वन विभाग और राजस्व विभाग की सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे व निर्माण के गंभीर आरोप और प्रशासनिक जांचें दर्ज रही हैं। इसके अलावा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के गंगा तटीय नियमों की अवहेलना और वीआईपी-कॉर्पोरेट कल्चर वाले पीआर-संचालित संन्यास को लेकर भी ये निरंतर सवालों के घेरे में रहे हैं।

* स्वामी राजेंद्र दास, मलूक पीठ (शास्त्रीय विचलन और कलमा विवाद): कथावाचक और वैष्णव संत के रूप में प्रतिष्ठा रखने वाले राजेंद्र दास की इस मंच पर मौजूदगी सबसे अधिक स्तब्ध करने वाली रही। कुछ समय पूर्व इनका एक वीडियो सार्वजनिक रूप से विवादों में रहा, जिसमें वे सर्वधर्म समन्वय के नाम पर वैष्णव दीक्षा में इस्लामिक कलमा पढ़ने की वकालत करते सुने गए थे। पारंपरिक बीज-मंत्र और नाम-दीक्षा के शास्त्रीय विधान के विपरीत इस बयान ने वैष्णव समाज में भारी आक्रोश पैदा किया था।

व्यासपीठ, श्रुति और स्मृति के गूढ़ रहस्यों को ‘अशुद्ध’ बताने वाली इस पूरी मंडली में सनातन धर्म की चारों आम्नाय पीठों के चारों प्रामाणिक शंकराचार्य, रामानुज संप्रदाय या वल्लभ संप्रदाय के मूल पीठाधीश्वर पूरी तरह नदारद थे।
इस पूरे जमावड़े को असली ताकत तब मिलती है जब मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के केंद्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार जैसे सत्ता-समीपस्थ शीर्ष रणनीतिकार ताल ठोक कर बैठते हैं, जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि शास्त्रों पर कैंची चलाने वाले इस अनधिकृत गिरोह को स्वयं संघ परिवार का सीधा वैचारिक, संगठनात्मक और राजनीतिक प्रश्रय प्राप्त है।
6. ऐतिहासिक तर्क: क्या संपूर्ण आचार्य परंपरा अनभिज्ञ थी?
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने जो ऐतिहासिक प्रश्न खड़े किए हैं, वे संघ और रामदेव के सुधारवाद के खोखलेपन को उजागर करते हैं:
* यदि शास्त्रों में मिलावटें थीं, तो वे किस कालखंड में हुईं, किसने कीं, और उनका मूल हस्तलेख (Manuscript) क्या था?
* क्या आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य या सायणाचार्य जैसे महान भाष्यकार इतने विवेकहीन थे कि उन्हें इन तथाकथित ‘अशुद्धियों’ का पता ही नहीं चला? क्या पूरी आचार्य परंपरा सदियों तक ‘अशुद्ध’ शास्त्रों का पाठ करती रही?
* क्या सदियों से चली आ रही काशी, मिथिला, दक्षिण और कश्मीर की शास्त्रार्थ परंपरा इन मिलावटों को पकड़ने में असमर्थ थी?
सनातन परंपरा में जब भी किसी नियम या व्यवस्था को युगानुकूल बनाने की आवश्यकता पड़ी, आचार्यों ने ‘नूतन भाष्य‘ (नई व्याख्याएं) लिखे। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार स्मृतियों के अर्थों की नई रोशनी में व्याख्या की गई, लेकिन किसी ने मूल संहिताओं से पन्ने फाड़ने या श्लोकों को विलोपित करने की जुर्रत नहीं की।

7. वहां उपस्थित प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज जी का विचार
पतंजलि में जब यह आयोजन हो रहा था तब मैंने वहां उपस्थित प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज से इस बारे में जानना चाहा। मैंने पतंजलि का पक्ष भी संस्थान से जानना चाहा, परंतु वह हमें नहीं मिल पाया। प्रो.रामेश्वर मिश्र पंकज बाबा रामदेव के प्रति श्रद्धा रखते हैं और मंच पर आखिर में उनका वक्तव्य आया।
उनसे जब मैंने ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ के गठन पर आलेख लिखने और वीडियो करने से पूर्व उनको सूचित कर उनका पक्ष जानना चाहा तो उनका जवाब आया। उन्होंने कहा, “वहाँ कोई शास्त्र शुद्धि की बात हुई ही नहीं है। कुछ पुराणों में जो ऐसे अंश है जो प्रथम दृष्टि में वेद शास्त्र सम्मत नहीं दिखते, उन पर एक विद्वत परिषद अध्ययन कर प्रतिवेदन देगी। तब उस पर धर्म आचार्य विचार करेंगे कि क्या कोई प्रक्षेप हुआ है मनु स्मृति या किसी पुराण में या नहीं हुआ है। तब उनका मत सबके सामने रखा जायेगा। वह कोई बाध्यकारी प्रारूप नही होगा। मत होगा। उस पर सर्वांनुमति बने तो ठीक। अन्यथा एक विचार के
रूप में समाज के सामने वह भी होगा जैसे अन्य मत या टीकाएँ हैं।वेद अपौरुषय है यह सर्व बिदित और सर्व मान्य है। धर्म सूत्र और धर्म शास्त्र सब श्रद्धा के योग्य शास्त्र हैं। टीका में आचार्य स्वतंत्र होते है। केवल कतिपय कथित प्रक्षेपों का परीक्षण विद्वान कर आचार्यों को निवेदन करेंगे। यह बात हुई है। मैं स्वयं तीनों दिन उपस्थित था। परिषद में मैं नही हूँ।”
8. रामेश्वर मिश्र पंकज जी के बयान पर मेरे 4 तार्किक बिंदु!
रामेश्वर मिश्र पंकज जी मेरे लिए (संदीप देव) श्रद्धेय और विद्वान पुरुष हैं। उनकी बातों का सम्मान करते हुए उनकी बातों पर मैं कुछ तर्क पाठकों के समक्ष रखना चाहता हूं:-
1. पतंजलि का आधिकारिक प्रेस नोट क्या कहता है?
पंकज जी कह रहे हैं कि “वहां कोई शास्त्र शुद्धि की बात हुई ही नहीं।“
* सच्चाई: पतंजलि के आधिकारिक विज्ञापनों, प्रेस रिलीज और मीडिया को जारी खबरों में खुद पतंजलि और बाबा रामदेव ने समिति का नाम ही ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ (Sanatan Shastra Shuddhi Committee) रखा।
* आचार्य बालकृष्ण ने खुद ऑन-कैमरा कहा कि वे ‘शास्त्र शुद्धि अभियान’ चला रहे हैं। जब समिति के नाम में ही आधिकारिक तौर पर ‘शास्त्र शुद्धि’ दर्ज है, तो अब विवाद की गुंजाइश कहां रह जाती है?
2. “शास्त्र सम्मत नहीं दिखते“ तय करने का पैमाना किसका?
पंकज जी कहते हैं कि “कुछ पुराणों में जो ऐसे अंश हैं जो शास्त्र सम्मत नहीं दिखते…”
* सवाल: पुराण स्वयं शास्त्र और पंचम वेद हैं। कोई अंश ‘शास्त्र सम्मत’ है या नहीं, यह तय करने की कसौटी किसकी होगी?
* क्या 21वीं सदी के आधुनिकतावादी, संघी, आर्य समाजी पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग या प्रशासनिक कुलपति यह तय करेंगे कि वेदव्यास रचित पुराणों में कौन सा अंश शास्त्र सम्मत है और कौन सा नहीं?
* आदि शंकराचार्य से लेकर रामानुजाचार्य तक ने पुराणों के आधार पर ब्रह्मसूत्र और उपनिषदों की व्याख्या की है। आज अचानक इन लोगों को कौन सा नया ज्ञान प्राप्त हो गया कि पुराणों में उन्हें ‘अशास्त्रीय’ अंश दिखने लगे?
3. “बाध्यकारी नहीं होगा, केवल मत होगा“—यह वैचारिक घुसपैठ का तरीका है
यह तर्क कि “यह कोई बाध्यकारी प्रारूप नहीं होगा, केवल एक विचार होगा“—वैचारिक घुसपैठ (Subversion) का पुराना फॉर्मूला है।
* पहले एक सरकारी/कॉर्पोरेट वित्तपोषित समिति बनाकर रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
* फिर उस रिपोर्ट को आधार बनाकर एनसीईआरटी (NCERT), विश्वविद्यालयों के सिलेबस और सोशल मीडिया पर यह विमर्श चलाया जाएगा कि “अमुक श्लोक या पुराण का यह अध्याय तो मिलावटी है।”
* धीरे-धीरे मूल ग्रंथों को विकृत कर नई छपी प्रतियों से उन श्लोकों को हटा दिया जाएगा। जब यह बाध्यकारी नहीं है, तो फिर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलन बुलाकर, संघ और विहिप के शीर्ष नेताओं को बिठाकर समिति बनाने का तमाशा क्यों रचा गया? क्या यह अकादमिक शोध था या राजनीतिक प्रायोजित प्रोपेगैंडा?
4. ‘धर्माचार्य विचार करेंगे‘—तो पहले शंकराचार्यों या अन्य पारंपरिक आचार्यों से अनुमति क्यों नहीं ली?
पंकज जी का कहना है कि “तब उस पर धर्माचार्य विचार करेंगे…”
* सनातन धर्म में सर्वोच्च धर्माचार्य चारों आम्नाय पीठों के शंकराचार्य हैं।
*जब सम्मेलन से पहले ही ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य ने मनुस्मृति के संदर्भ में काशी में विद्वानों की सहमति से कह दिया था कि ‘शास्त्रों में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता’, तब उनके आदेश की अवहेलना कर समानांतर समिति बनाई ही क्यों गई?
* यदि धर्माचार्यों से ही पूछना था, तो समिति के गठन से पहले चारों शंकराचार्यों और पारंपरिक अन्य सांप्रदायिक आचार्यों से लिखित मार्गदर्शन क्यों नहीं लिया गया? क्या यह शंकराचार्य पीठों को बाईपास करने की नीयत नहीं थी?
9. मेरे सवाल पर पंकज जी का पुनः जवाब
मेरा सवाल:- सर, पतंजलि के आधिकारिक प्रेस रिलीज और मीडिया को जारी खबरों में खुद पतंजलि और रामदेव जी ने समिति का नाम ही ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ (Sanatan Shastra Shuddhi Committee) रखा है।
आचार्य बालकृष्ण जी ने खुद ऑन-कैमरा कहा कि वे ‘शास्त्र शुद्धि अभियान’ चला रहे हैं। जब समिति के नाम में ही आधिकारिक तौर पर ‘शास्त्र शुद्धि’ दर्ज है तो फिर विवाद कहां रह जाता है?
पंकज जी का जवाब: शास्त्र शुद्धि शब्द पर आपकी आपत्ति सर्वथा उचित है। आचार्य जी ने शायद उत्साह में या शब्द के उस अर्थ पर ध्यान दिये बिना यह शब्द प्रयोग कर दिया है। उसे वे बदल दें यह आग्रह किया जा सकता है। इस संदर्भ मे “शुद्धि “शब्द असम्यक् है।
निष्कर्ष:
धर्मशास्त्र किसी राजनीतिक दल का घोषणापत्र नहीं हैं कि उन्हें आधुनिक चुनावी प्राथमिकताओं, जनसंपर्क (PR) और राजनीतिक सुविधा के अनुसार ‘एडिट’ किया जाए। संघ और गेरुआधारी संघाचार्यों का यह गठजोड़ आधुनिक राजनीतिक हमलों से बचने और हिंदू समाज को लामबंद रखने के रक्षात्मक उद्देश्य से प्रेरित हो सकता है, लेकिन शास्त्रों के मूल पाठ पर कैंची चलाने का अधिकार उन्हें न तो शास्त्र देते हैं, न परंपरा और न ही सनातन समाज। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का यह कड़ा प्रतिरोध सत्ता, संगठन और बाजार के सिंडिकेट के सामने सनातन की शास्त्रीय मर्यादा को बचाने की एक खुली चुनौती है।
