विशेष संपादकीय, इंडिया स्पीक डेली (India Speak Daily) क्या स्वतंत्र भारत के विश्वविद्यालयों और विद्यालयों के पाठ्यक्रम सनातन धर्म, हिंदू आस्था और भारतीय संस्कृति के विरुद्ध वैचारिक युद्ध छेड़ने की खुली प्रयोगशाला बन चुके हैं? जब कक्षा आठवीं के एनसीईआरटी पाठ्यक्रम से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी साहित्य में ज्योतिराव फुले की कृति ‘गुलामगिरी’ को अनिवार्य बनाकर यह नैरेटिव गढ़ा गया कि भारतीय संस्कृति का समूचा इतिहास केवल ‘शोषक सवर्ण बनाम शोषित बहुजन’ का संघर्ष है, तब समाज ने इसे अकादमिक विमर्श मानकर अनदेखा कर दिया।
परंतु अब दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के पाठ्यक्रम (DSC-10: Modern Sanskrit Literature) में प्रभु श्रीराम के पावन जीवन-चरित्र ‘रामायण’ की तर्ज पर गढ़े गए ग्रंथ ‘भीमायणम्‘ (Bhimayanam) का बकायदा समावेश यह प्रमाणित करता है कि यह कोई छिटपुट अकादमिक प्रयोग नहीं,
बल्कि पारंपरिक सनातन विमर्श के समानांतर एक नया ‘प्रति-आख्यान’ खड़ा करने का सुनियोजित संस्थागत खेल है—जिसे मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं का सीधा संरक्षण प्राप्त है।

1. पाठ्यक्रम में कब और किस रूप में हुआ शामिल?
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के संस्कृत विभाग ने आधिकारिक रूप से शैक्षणिक सत्र 2023–2024 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के तहत लागू किए गए UGCF-2022 (Undergraduate Curriculum Framework) के माध्यम से ‘भीमायणम्’ को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया।
* सेमेस्टर और प्रश्नपत्र: यह बीए (ऑनर्स) संस्कृत के चौथे सेमेस्टर (Semester-IV) में कोर पेपर ‘DSC-10: आधुनिक संस्कृत साहित्य (Modern Sanskrit Literature)’ के रूप में पढ़ाया जा रहा है।
* पाठ्यक्रम का निर्धारित भाग: इस प्रश्नपत्र के यूनिट-1 (महाकाव्य और चरितकाव्य) में प्रो. रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत ‘स्वातंत्र्यसंभवम्’ के साथ प्रो. प्रभाकर शंकर जोशी रचित ‘भीमायणम्’ के दशम सर्ग (Canto X) के पद्य 20 से 29 को अनिवार्य अध्ययन हेतु रखा गया है।
* विस्तार: केवल दिल्ली विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि इग्नू (IGNOU) के संस्कृत बीए (ऑनर्स) पाठ्यक्रम (BSKC-109) में भी इसके एकादश सर्ग को शामिल कर इसे अखिल भारतीय अकादमिक मान्यता दी जा चुकी है।
2. ‘भीमायणम्‘ के जरिए गढ़े जा रहे झूठे और विभाजनकारी आख्यान
दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में निर्धारित ‘भीमायणम्’ के दशम सर्ग (पद्य 20 से 29) में जो प्रसंग और श्लोक छात्रों को रटाए जा रहे हैं, वे ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर हिंदू समाज के ताने-बाने को भीतर से विषाक्त करने वाले हैं:
* ‘महार सेना’ द्वारा अंग्रेजों की विजय का महिमामंडन (पद्य 22): पाठ्यक्रम के पद्य-22 में यह पढ़ाया जा रहा है कि अंग्रेजों ने पूरे भारत और भू-मंडल पर शासन महार-सेना की वीरता के बल पर ही स्थापित किया (महार-सेना-निवहेन जित्वा प्रशास्ति भूमाविदमाङ्ग्लराष्ट्रम्)। विदेशी आक्रांताओं और औपनिवेशिक दासता की स्थापना का श्रेय एक जाति विशेष के सैन्य बल को देकर उसे ‘गौरव’ के रूप में स्थापित किया जा रहा है।
* सवर्णों को ईर्ष्यालु और देशद्रोही ठहराने का कुतर्क (पद्य 23): पद्य-23 में यह आख्यान गढ़ा गया है कि जब महार-सेना के जरिए दलितों की समृद्धि, शिक्षा और प्रतिष्ठा बढ़ रही थी, तो ‘ईर्ष्यालु और असहिष्णु सवर्णों’ ने अंग्रेजों पर दबाव डालकर उस सेना को भंग करवा दिया। यह आख्यान सीधे तौर पर हिंदू समाज के भीतर एक वर्ग को दूसरे वर्ग के विरुद्ध स्थायी घृणा और प्रतिशोध की भावना से भरने का काम करता है।
* ‘रामायण’ के समानांतर ‘भीमायण’ का खड़ा होना: महर्षि वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, मर्यादा और धर्म का प्राणतत्व है। उसी की तर्ज पर ‘भीमायणम्’ की रचना करना और उसे संस्कृत विभाग में ‘महाकाव्य/चरितकाव्य’ के रूप में स्थापित करना भविष्य के लिए यह आधार तैयार कर रहा है कि आने वाले समय में यह कुतर्क गढ़ा जाए कि वैदिक व पौराणिक आख्यान काल्पनिक अथवा शोषक थे, और वास्तविक संघर्ष ‘भीमायण’ में दर्ज है।
* 5000 साल के शोषण का एकतरफा नैरेटिव: ‘चवदार तालाब (महाड सत्याग्रह)’ के प्रसंग के बहाने यह स्थापित किया जा रहा है कि सनातन हिंदू परंपरा अनादि काल से अमानवीय रही है। इसमें यह तथ्य पूरी तरह दबा दिया जाता है कि मध्यकाल से पहले छुआछूत का यह विकृत स्वरूप नहीं था और समाज में आई कुरीतियां विदेशी आक्रमणों और सामाजिक पतन का परिणाम थीं।
3. रचनाकाल और सत्ता प्रतिष्ठान का राजनीतिक गठजोड़
यह सोचना भारी भूल होगी कि यह केवल कुछ आधुनिकतावादी या वामपंथी प्रोफेसरों का शैक्षणिक एजेंडा है; इसके सूत्र सीधे राजनीतिक सत्ता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े हैं:
* रचना एवं प्रकाशन काल: ‘भीमायणम्’ की रचना महाराष्ट्र के संस्कृत विद्वान प्रो. प्रभाकर शंकर जोशी ने 1990 के दशक में की थी। वर्ष 1999 में यह पुणे की संस्कृत पत्रिका ‘शारदा’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई और वर्ष 2009 में इसका पुस्तकाकार प्रकाशन हुआ।
* विमोचनकर्ता — नरेंद्र मोदी (2012): 9 जुलाई 2012 को पुणे में जब ‘भीमायणम्’ महाकाव्य का भव्य सार्वजनिक लोकार्पण हुआ, तब इस समारोह के मुख्य अतिथि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे।
* पंचतीर्थ और 2047 का वैचारिक रोडमैप: 2014 में केंद्र की सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने वोट बैंक की राजनीति के तहत डॉ भीमराव आंबेडकर के नाम पर और उनसे संबंधित जगहों- महू, नागपुर, दिल्ली, मुंबई और लंदन में ‘पंचतीर्थ’ का निर्माण कराया। भौतिक स्मारकों के बाद अब अकादमिक पाठ्यक्रमों में साहित्य का नया आधार तैयार किया जा रहा है। इसका घोषित-अघोषित लक्ष्य वर्ष 2047 तक ऐसे प्रतीकों और आख्यानों को देश के मुख्य विमर्श में सर्वोपरि बना देना है, जिससे मूल सनातन पहचान को हाशिए पर धकेला जा सके। यही कारण है कि मोदी सहित समूची भाजपा और संघ आम जनता से बार-बार विकसित भारत के बहाने 2047 का समय मांग रही है ताकि भारत के दूसरे विभाजन (जातिगत विभाजन) को वह अंजाम दे सके। मत भूलिए कि भारत का पहला विभाजन (मजहबी विभाजन) का वर्ष 1947 था। भारत विभाजन के 100 साल बाद संघी विचारधारा जाति के आधार पर भारत का दूसरा विभाजन कराने की तैयारी कर रही है और इसमें ईंधन के रूप में उन्हीं हिंदुओं का उपयोग कर रही है, जिनकी लाशों पर यह विभाजन होना है!
4. ‘गुलामगिरी‘ से लेकर ‘भीमायणम्‘ तक: बौद्धिक दरिद्रता और आत्ममुग्ध हिंदू समाज
यह पूरी कवायद सनातन परंपरा को बौद्धिक रूप से पराजित करने की एक सुविचारित श्रृंखला है:
* कक्षा आठवीं स्तर पर: एनसीईआरटी के माध्यम से ज्योतिराव फुले की ‘गुलामगिरी’ को इतिहास में पढ़ाकर बच्चों के कोमल मन में यह बैठाया गया कि सनातन धर्म के अवतारी देवता और महापुरुष शोषक थे।
* विश्वविद्यालय स्तर पर: दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी साहित्य में इसे विमर्श का अनिवार्य अंग बनाया गया।
* देववाणी संस्कृत के केंद्र में: अब स्वयं संस्कृत वाङ्मय का उपयोग करके ‘भीमायणम्’ के जरिए सवर्ण-अवर्ण का मार्क्सवादी द्वंद्व और अंग्रेजों की सेना का महिमामंडन अनिवार्य पाठ्यक्रम बना दिया गया।
विडंबना यह है कि जिस हिंदू समाज को अपनी मर्यादा, धर्म और ‘रामायण’ की विरासत की रक्षा के लिए खड़ा होना चाहिए था, वह राजनीतिक नारों और पुनर्जागरण के खोखले दावों के सम्मोहन में जकड़ा हुआ है। जब आपकी अपनी भाषा, आपके अपने विश्वविद्यालय और आपकी अपनी चुनी हुई सरकार आपके मूल सांस्कृतिक प्रतीकों के समानांतर प्रति-आख्यान खड़े कर रही हो, तब समाज का मौन केवल उसकी बौद्धिक दरिद्रता को दर्शाता है।
यदि इस संस्थागत सांस्कृतिक तोड़फोड़ का समय रहते बौद्धिक और सामाजिक प्रतिकार नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपने ही आराध्यों और इतिहास पर लज्जित होने को विवश कर दी जाएंगी।
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