इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। स्क्रीन पर 24 घंटे हिंदू-मुस्लिम का ज़हर उगलते एंकर, गलियों में एक-दूसरे का सर फोड़ते आम कार्यकर्ता और लुटियंस दिल्ली के सरकारी बंगलों में एक ही दस्तरख़्वान पर लज़ीज़ बिरयानी की दावत उड़ाते सत्ताधीश—यही भारत के लोकतंत्र का वह नंगा और घिनौना सच है, जिसे ‘ब्रो’ कल्चर के चमकदार पर्दे के पीछे छिपाने की कोशिश की जा रही है।
हाल ही में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार निधि राजदान के निकाह की तस्वीरें सामने आईं। निधि राजदान ने एक्स पर तस्वीर डालकर लिखा— “It’s done bro 💍”। पति को ‘ब्रो’ कहने की यह आधुनिक, कूल दिखने वाली औपचारिकता महज़ एक सोशल मीडिया शिगूफा नहीं है, बल्कि उस संभ्रांत वर्ग की बेशर्म बेपरवाही का प्रतीक है, जिसके लिए लाखों लोगों का ख़ून, विस्थापन और नफ़रत सिर्फ़ एक तमाशा है। यह शादी कोई आम व्यक्तिगत मिलन नहीं है; यह कश्मीर के लहूलुहान इतिहास, अब्दुल्ला घराने के पाखंड, सत्ता-मीडिया के अनैतिक संसर्ग और भाजपाई राष्ट्रवाद के खोखलेपन का जीवंत दस्तावेज़ है।

अब्दुल्ला परिवार का पाखंड
इस पूरे तमाशे की सबसे पहली और वीभत्स परत है अब्दुल्ला परिवार का दोहरा और सामंती चरित्र। जब फारूक अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन सारा अब्दुल्ला ने कांग्रेस नेता सचिन पायलट से प्रेम विवाह किया था, तब यही ‘उदारवादी’ और ‘सेक्युलर’ अब्दुल्ला घराना आगबबूला हो गया था। फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला ने सारा से सारे रिश्ते तोड़ लिए थे और उनकी शादी तक में शामिल नहीं हुए थे। उस बहिष्कार के पीछे की असली वजह क्या थी? क्या एक मुस्लिम लड़की का किसी हिंदू घराने में ब्याहा जाना इस ‘खानदान’ की कथित रवायतों और मज़हबी श्रेष्ठता को बर्दाश्त नहीं हुआ था?
यह वही खानदान है जिसने दशकों तक धारा 370 के उन पितृसत्तात्मक कानूनों का बचाव किया, जिसके तहत यदि कोई कश्मीरी महिला राज्य के बाहर किसी गैर-कश्मीरी से शादी कर ले, तो उसकी पैतृक संपत्ति के अधिकार छीन लिए जाते थे। लेकिन पुरुषों पर यह पाबंदी कभी लागू नहीं होती थी। पुरुष चाहे जितनी गैर-कश्मीरी या हिंदू महिलाओं से शादी करे, उसकी रियासत और संपत्ति पर कोई आंच नहीं आती। जब खुद उमर अब्दुल्ला की बारी आती है, तो सारा मजहबी कानून और उसूल हवा में उड़ जाते हैं।
उमर की पहली शादी हिंदू पायल नाथ से हुई और अब दूसरी शादी भी हिंदू निधि राजदान से हुई है। उमर की पहली शादी 1994 में पायल नाथ (सेना के पूर्व अधिकारी राम नाथ की बेटी) से हुई थी। दोनों के दो बेटे हैं—जमीर और जाहिर। वर्षों के अलगाव के बाद 2011 में यह रिश्ता औपचारिक तलाक की कानूनी प्रक्रियाओं में उलझा और आखिरकार दोनों अलग हो गए।

यानी अब्दुल्ला परिवार के लिए बेटी अगर किसी हिंदू से शादी करे तो वह नाता तोड़ने लायक गुनाह है, लेकिन बेटा जब चाहे हिंदू लड़कियों को अपनी बेडरूम में ले आए, तो वह ‘आधुनिकता’ और ‘प्यार’ बन जाता है! पाखंड का इससे घिनौना नमूना और क्या होगा?
स्टॉकहोम सिंड्रोम की शिकार निधि राजदान
इस पाखंड में बराबर की हिस्सेदार हैं निधि राजदान। निधि की भी यह दूसरी शादी है। निधि राजदान का पहला विवाह वरिष्ठ पत्रकार नीलेश मिश्रा के साथ 2005 में हुआ था, जो लगभग दो वर्ष चलने के बाद 2007 में आपसी सहमति से तलाक पर खत्म हुआ। इनके कोई बच्चे नहीं हैं। निधि-अब्दुल्ला दोनों के बीच संबंधों और नजदीकियों की चर्चाएं पत्रकारिता और सत्ता के गलियारों में 2010-2011 से ही शुरू हो गई थीं, जब उमर अब्दुल्ला पहली बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। उस दौर में इस रिश्ते की सार्वजनिक सुगबुगाहट राजनीतिक और मीडिया जगत दोनों में गंभीर चर्चा का विषय बनी थी, जिस पर अब जाकर औपचारिक मुहर लगी है।

निधि राजदान एक कश्मीरी पंडित है। एक कश्मीरी हिंदू (पंडित) महिला का उस अब्दुल्ला घराने की बहू बनना, जिसकी नाक के नीचे 1989-1990 में कश्मीरी हिंदुओं का वह नृशंस नरसंहार और जातीय संहार हुआ था, जिसे सोचकर आज भी रूह कांप जाती है। जब वादी की मस्जिदों से ‘रलीव, गलीज या चलीज’ के नारे गूंज रहे थे, जब कश्मीरी पंडितों के घरों पर निशान लगाकर उन्हें काटा जा रहा था और मां-बहनों की अस्मत लूटी जा रही थी, तब फारूक अब्दुल्ला लंदन में गोल्फ खेल रहे थे। उसी दौर में रुबैया सईद अपहरण कांड के दौरान कुख्यात आतंकवादियों को जेल से रिहा कर खुली छूट दी गई। हाल ही में फारूक अब्दुल्ला ने बेशर्मी से कहा कि “पाकिस्तान के कारण कश्मीरी सुरक्षित हैं।” जिस परिवार ने कश्मीरी अलगाववाद और पाकिस्तान-परस्ती को खाद-पानी देकर वादी को श्मशान बना दिया, उसी परिवार की बाहों में एक कश्मीरी पंडित पत्रकार का जा बैठना ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ की सबसे घिनौनी और मुकम्मल मिसाल है। यह निजी प्रेम नहीं, बल्कि अपने ही पुरखों की चिताओं और लाखों विस्थापितों के आंसुओं पर खड़े होकर सत्ता की मलाई चाटने की ललक है।
अब्ब्दुल्ला के लिए पत्रकारिता से कैसे समझौता करती थी निधि: एक केस स्टडी।
अब्दुल्ला-निधि गठजोड़ ने पत्रकारिता की नैतिकता की धज्जियां कैसे उड़ाईं, इसका सबसे भयावह दौर अमरनाथ भूमि विवाद के समय देखा गया था।
वर्ष 2008 का मई-अगस्त का दौर भारतीय राजनीति और जम्मू-कश्मीर के इतिहास का एक अत्यंत संवेदनशील मोड़ था। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को बालटाल में तीर्थयात्रियों के लिए अस्थायी शेल्टर और शौचालय बनाने हेतु मात्र 99 एकड़ बंजर वन भूमि अस्थायी रूप से हस्तांतरित की गई थी। इस प्रशासनिक निर्णय के खिलाफ कश्मीर घाटी में हुर्रियत और कट्टरपंथी अलगाववादियों ने यह झूठा नैरेटिव फैलाया कि “कश्मीर की डेमोग्राफी बदलने की साजिश हो रही है।” इसके विरोध में अलगाववादियों ने घाटी में उग्र प्रदर्शन शुरू किए, जिसके दबाव में आकर तत्कालीन गुलाम नबी आजाद सरकार ने भूमि आवंटन रद्द कर दिया। इसके बाद पूरे जम्मू संभाग में ‘श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति’ के बैनर तले ऐतिहासिक जनांदोलन खड़ा हुआ।
उस दौर में उमर अब्दुल्ला लोकसभा सांसद थे और नेशनल कॉन्फ्रेंस के भावी चेहरे थे। जुलाई 2008 में संसद में विश्वास मत के दौरान उमर अब्दुल्ला ने भड़काऊ तेवर अपनाते हुए कहा था— “यह जमीन की बात नहीं है, यह कश्मीरियों की पहचान की बात है… हम अपनी जमीन नहीं देंगे।” इसी दौर में एनडीटीवी के प्राइम-टाइम शो (विशेषकर निधि राजदान द्वारा होस्ट किए जाने वाले कार्यक्रमों) में इस पूरे विवाद को जिस तरह फ्रेम किया गया, वह निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं बल्कि सीधे-सीधे एकतरफा राजनीतिक नैरेटिव निर्माण था:
1 . आस्था बनाम ‘डेमोग्राफी का डर’: निधि राजदान के प्राइम-टाइम शो में अमरनाथ यात्रियों की मानवीय और बुनियादी जरूरतों (ठंड से बचने के शेल्टर, मेडिकल कैंप) को गौण कर दिया गया। स्क्रीन पर बार-बार अलगाववादी आशंकाओं और उमर अब्दुल्ला की लाइन को प्रमुखता दी गई कि यह आवंटन कश्मीर की स्वायत्तता और पर्यावरण पर हमला है।
2 . जम्मू के शांतिपूर्ण आंदोलन का विरूपण: जब जम्मू की लाखों की जनता भीषण गर्मी में शांतिपूर्ण धरने पर बैठी, तो एनडीटीवी के स्टूडियो से उसे “सांप्रदायिक ध्रुवीकरण” और “जम्मू द्वारा कश्मीर की आर्थिक नाकेबंदी” के रूप में चित्रित किया गया। जबकि जमीनी हकीकत यह थी कि हुर्रियत और स्थानीय आढ़तियों ने स्वयं घाटी की ओर जाने वाले ट्रकों को रोका था ताकि ‘मुजफ्फराबाद चलो’ मार्च निकाला जा सके। इस दुष्प्रचार को निधि राजदान की बहसों में तथ्यों की कसौटी पर कसने के बजाय, जम्मू के आंदोलनकारियों को ही कटघरे में खड़ा किया गया।
3 . उमर अब्दुल्ला की ‘इमेज लॉन्ड्रिंग’ और पीआर कवरेज: जनवरी 2009 में जब उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने, तब नई दिल्ली के मीडिया—खासकर एनडीटीवी—ने उन्हें एक ‘आधुनिक, सेक्युलर और प्रोग्रेसिव नेता’ के रूप में प्रोजेक्ट किया। निधि राजदान के साथ उनके रिश्तों की सुगबुगाहट इसी दौर में सत्ता के गलियारों में तेज हो चुकी थी। जब 2010 में कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसक पथराव (Stone Pelting) शुरू हुआ, 100 से अधिक मौतें हुईं और उमर अब्दुल्ला प्रशासन पूरी तरह पंगु नजर आया, तब भी एनडीटीवी के प्राइम-टाइम डिबेट्स में उमर अब्दुल्ला की प्रशासनिक विफलता और राज्य मशीनरी के ढहने पर तीखे सवाल पूछने के बजाय, सारा ठीकरा केंद्र सरकार, सेना, अफस्पा (AFSPA) और ‘कश्मीरी युवाओं के अलगाव’ (Alienation) पर फोड़कर मुख्यमंत्री को एक ‘बेबस लेकिन नेक नीयत’ वाले नेता के रूप में पेश किया गया।
हितों के खुले टकराव (Conflict of Interest) पर चुप्पी: पत्रकारिता की बुनियादी आचार संहिता कहती है कि यदि किसी पत्रकार के किसी राजनेता से व्यक्तिगत या घनिष्ठ संबंध हों, तो वह उस राजनेता, उसकी पार्टी या उसके राज्य से जुड़ी राजनीतिक रिपोर्टिंग से खुद को अलग कर लेता है (Recusal)। लेकिन निधि राजदान न केवल उमर अब्दुल्ला के सार्वजनिक इंटरव्यू करती रहीं, बल्कि कश्मीर के आंतरिक सुरक्षा मामलों पर प्राइम-टाइम पर राय बनाती रहीं। सत्ता और पत्रकार के इस निजी संसर्ग ने मीडिया की साख को उस दौर में सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई।
उमर अब्दुल्ला हिंदू श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाओं और आस्था के खिलाफ एक अलगाववादी नैरेटिव के साथ खड़े नजर आ रहे थे। ठीक उसी दौर में एनडीटीवी के प्राइम-टाइम शो ‘लेफ्ट, राइट एंड सेंटर’ में निधि राजदान की एंकरिंग का रुख पूरी तरह एकतरफा था। उस समय निधि राजदान के कार्यक्रमों में उमर अब्दुल्ला सरकार के फैसलों को सही ठहराने और अमरनाथ यात्रियों के पक्ष को हाशिए पर धकेलने की खुली कोशिशें की गईं। सवाल उठता है कि क्या उस दौर में जब लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और सुरक्षा दांव पर थी, तब एक राष्ट्रीय चैनल का प्राइम-टाइम शो मुख्यमंत्री के साथ चल रहे व्यक्तिगत संबंधों के चलते सत्ता के पीआर प्लेटफॉर्म में तब्दील हो चुका था? हितों के टकराव (Conflict of Interest) का इससे बड़ा और शर्मनाक उदाहरण भारतीय मीडिया के इतिहास में दूसरा नहीं मिलता, जहां देश के एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर जनता को गुमराह कर सत्ताधारी महबूब की कुर्सी बचाई जा रही थी।
देश भर में हिंदू–मुस्लिम दंगा भड़काने वाले संघी–भाजपाई का दोगला आचरण।
अब्दुल्ला-निधि निकाह में सबसे बड़ा पर्दाफाश हुआ है ‘हिंदुत्व’ और ‘राष्ट्रवाद’ का ठेका लेकर घूमने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का। आम गरीब, पिछड़े या मध्यमवर्गीय हिंदू के बच्चे अगर किसी मुस्लिम से शादी कर लें, तो यही भाजपाई तंत्र, उसकी आईटी सेल और उसकी पुलिस पूरी ताकत से ‘लव जिहाद’ का शोर मचाती है, मोहल्लों में दंगे भड़काती है और कानून की आड़ में जेलों में ठूंस देती है। लेकिन जब जम्मू-कश्मीर के उसी “अलगाववादी” और “राष्ट्रविरोधी” बताए जाने वाले उमर अब्दुल्ला के निकाह का रिसेप्शन होता है, तो हिंदुत्व के तथाकथित पहरुए प्लेटें लेकर सबसे आगे खड़े मिलते हैं।

तस्वीरें गवाह हैं कि भाजपा सांसद निशिकांत दुबे—जो संसद से लेकर सड़क तक 24 घंटे हिंदू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद की चाशनी में लिपटा ज़हर उगलते हैं—वे दिल्ली के जम्मू-कश्मीर हाउस में उमर अब्दुल्ला की शादी की बिरयानी खाने अपनी चमचमाती गाड़ी से पहुंच गए। अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत, जो हर दूसरे दिन विरोधियों को देशद्रोही और जिहादी साबित करने पर तुली रहती हैं, वे सोशल मीडिया पर लाल दिल के साथ इस शादी पर प्यार लुटा रही थीं। दक्षिणपंथी खेमे के लाडले अभिजीत अय्यर मित्रा इसे “खूबसूरत जोड़ी” का तमगा दे रहे थे और विरोध करने वालों को कुंठित बता रहे थे।

इस पाखंड की बानगी सिर्फ भाजपा नेताओं या समर्थकों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी भोंपू बने तथाकथित ‘राष्ट्रवादी’ पत्रकारों के चेहरे से भी नकाब उतर चुका है। दूरदर्शन के पत्रकार अशोक श्रीवास्तव—जो दिन-रात स्क्रीन और सोशल मीडिया पर कट्टर हिंदू-मुस्लिम विमर्श रचते हैं और संघी राष्ट्रवाद के स्वघोषित पहरुए बने फिरते हैं—वे भी इस मौके पर अपनी सारी ‘कट्टरता’ ताक पर रखकर सोशल मीडिया पर उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान को बधाई देने वालों की कतार में सबसे आगे खड़े हो गए।

जो एंकर आम जनता के लिए दिन-रात मजहबी जहर और राष्ट्रवाद की चाशनी परोसते हैं, सत्ता के उसी ‘अलगाववादी’ कहे जाने वाले अब्दुल्ला घराने के आगे नतमस्तक होकर उनका यह विनीत रूप साबित करता है कि यह कथित हिंदूवादी पत्रकारिता सिर्फ आम जनता को लड़ाने का धंधा है, सत्ताधीशों के आगे तो ये भी सिर्फ ‘जी हुजूर’ बनकर तालियां पीटने वाले दरबारी हैं।
यह तमाचा है उन भोले-भाले कार्यकर्ताओं के गाल पर, जो इन नेताओं के भड़काऊ बयानों पर सड़कों पर लाठियां खाते हैं, कश्मीर फाइल्स की स्क्रीनिंग कराते हैं, मुकदमे झेलते हैं और दंगों में मरते हैं। सच्चाई यही है: कार्यकर्ता लड़ते रहें, नफ़रत में झुलसते रहें, और सत्ता के दलाल शाम को एक-दूसरे के गले मिलकर शाही दावतों का स्वाद चखते रहें।
‘गोदी मीडिया‘ शब्द गढ़ने वाले रवीश कुमार अब्बुल्ला की गोदी में बैठी निधि पर तब चुप क्यों थे?
इस घिनौने पाखंड का चौथा खंभा है—भारतीय मीडिया। ‘गोदी मीडिया’ शब्द गढ़ने वाले रवीश कुमार आज निधि राजदान को बधाई दे रहे हैं। उनके दोगलेपन का यह जीता-जागता सबूत है। रविश कुमार एंड गिरोह जिस ‘गोदी मीडिया’ का रोना रोते हैं, वह कोई 2014 के बाद जन्मी बीमारी नहीं है; यह सिर्फ मालिक और सत्ता का चेहरा बदलने का नतीजा है।
यूपीए के दौर में एनडीटीवी के स्टूडियो से सत्ता के बेडरूम तक रिश्ते परवान चढ़ते थे। एनडीटीवी की एक एंकर अमृता राय ने कांग्रेस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से शादी की। दूसरी एंकर सोनिया सिंह ने केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह से ब्याह रचाया और तीसरी निधि राजदान ने उमर अब्दुल्ला से निकाह किया।
निधि राजदान और उमर अब्दुल्ला के रिश्तों की फुसफुसाहट उस दौर से थी जब उमर मुख्यमंत्री थे और निधि उसी सरकार की कवरेज करती थीं। कल तक जो मीडिया कांग्रेस की गोद में बैठकर सत्ता की मलाई चाटता था, आज वही एनडीटीवी जब अडानी के हाथों में चला गया, तो रातों-रात उसने भगवा चोला ओढ़ लिया और मौजूदा सत्ता का चारण बन गया। कल के कांग्रेसी पत्रकार आज के भाजपाई पत्रकार बन चुके हैं। पत्रकारिता पहले भी सत्ता की रखैल थी, आज भी है; बस कल वह कांग्रेस की रखैल थी, आज संघ-भाजपा की रखैल है!
निष्कर्ष:
निधि राजदान और उमर अब्दुल्ला की यह शादी कोई रूमानी दास्तान नहीं है। यह आईना है—उस संभ्रांत तबके के दोगलेपन का, जिसके लिए न तो कश्मीरी पंडितों का दर्द कोई मायने रखता है, न पत्रकारीय उसूल और न ही मानवता के प्रति निष्ठा। यह गठजोड़ साबित करता है कि हिंदुस्तान में सिर्फ दो ही जमातें हैं: एक वह ताकतवर एलीट वर्ग जो चाहे किसी भी मजहब, पार्टी या मीडिया घराने का हो, आपस में रिश्तेदारी और दावतें साझा करता है; और दूसरा वह आम आवाम, जिसे नफरत और मजहब के नाम पर आपस में लड़ाकर हर दिन कुर्बान किया जाता है।
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