इंडिया स्पीक डेली ब्यूरो। लुटियंस दिल्ली में सत्ता के फैसले अक्सर बंद कमरों से निकलते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी कड़वाहट और मंशा सड़कों पर साफ दिखाई देती है। 31 अक्टूबर 2026 को भारतीय वायु सेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह (ए. पी. सिंह) अपनी 42 वर्षों की सुदीर्घ और गौरवशाली सैन्य सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं। सशस्त्र बलों की स्थापित सैन्य परंपरा के अनुसार, निवर्तमान वायु सेना प्रमुख का फेयरवेल राउंड—’गोल्फिंग-आउट’—7, लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास के ठीक बगल में मौजूद ‘एयर फोर्स स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ (AFSC) में होना तय था।
लेकिन रिटायरमेंट से ठीक 48 घंटे पहले, केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अधीन आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने एक अचानक आदेश जारी कर इस खेल परिसर के मुख्य द्वार पर ताला जड़ दिया। परिसर के बाहर चस्पा नोटिस में कहा गया कि जमीन के ‘सर्वे’ के लिए इसे आगामी आदेश तक बंद किया जा रहा है।

नतीजा यह हुआ कि दशकों पुरानी विदाई परंपरा एक झटके में रद्द हो गई। जिस ज़मीन का विवाद 2017 से यानी नौ साल से फाइलों में धूल फांक रहा था, उस पर अचानक सर्वे की ऐसी क्या राष्ट्रीय आपात स्थिति आ गई कि सरकार देश के एयर चीफ के रिटायर होने तक महज दो दिन का इंतज़ार नहीं कर सकी?
‘गोल्फिंग–आउट‘ का इतिहास: यह केवल खेल नहीं, सैन्य सौहार्द की रीढ़ है
भारतीय सशस्त्र बलों में रेजिमेंटल और अनौपचारिक विदाई की अपनी एक पवित्र गरिमा रही है। आजादी के बाद से ही नई दिल्ली स्थित एयर फोर्स स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में वायु सेना प्रमुख के सम्मान में यह विदाई मैच खेला जाता रहा है।
वायु सेना प्रमुख पारंपरिक रूप से इस गोल्फ कोर्स के ‘पेट्रन-इन-चीफ’ होते हैं। अपने कार्यकाल के अंतिम सप्ताह में आयोजित इस 18-होल मैच में सेवारत वरिष्ठ कमांडर, पूर्व वायु सेना प्रमुख (वेटरन्स) और कनिष्ठ अधिकारी एक साथ कोर्स पर उतरते थे। खेल के बाद क्लब हाउस में स्मृति-चिह्न भेंट करना और प्रमुख की चार दशकों की सेवा के प्रति कृतज्ञता जताना इस रस्म का हिस्सा था। यह परंपरा सिर्फ एक खेल आयोजन नहीं, बल्कि सेना के भीतर आपसी सौहार्द, सम्मान और कमान की निरंतरता का प्रतीक थी, जिसे एक प्रशासनिक झटके से छीन लिया गया।
गौरतलब है कि इस स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में केवल 18-होल गोल्फ कोर्स ही नहीं, बल्कि एक बड़ा स्विमिंग पूल और अन्य खेल सुविधाएं भी मौजूद हैं, जिनका उपयोग वायु सेना के जवान, अधिकारी और उनके परिवार करते हैं। सरकार के इस अचानक फैसले से न केवल विदाई परंपरा रुकी, बल्कि सेवारत रक्षा कर्मियों और उनके परिजनों की रोजमर्रा की खेल व कल्याणकारी गतिविधियां भी ठप हो गईं।
प्रोफेशनल सच: जब आईना दिखाया, तो सिस्टम को रास नहीं आया
इस घटनाक्रम की टाइमिंग पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि एयर चीफ मार्शल ए. पी. सिंह ने अपने पूरे कार्यकाल में ‘यस-मैन’ बनने के बजाय सामरिक कमियों पर खुलकर बात की थी:
* HAL की लेटलतीफी पर कड़ा प्रहार: उन्होंने सार्वजनिक रक्षा सम्मेलनों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा एलसीए तेजस Mk-1A की डिलीवरी में हो रही देरी को लेकर साफ कहा कि रक्षा उत्पादन में ‘मिशन मोड’ की भारी कमी है। उन्होंने चेताया था कि घटती स्क्वाड्रन क्षमता वायु सेना की मारक क्षमता को सीधे प्रभावित कर रही है।
* चीन से बढ़ता तकनीकी व संख्यात्मक अंतर: जहाँ प्रचार तंत्र सब कुछ चाक-चौबंद दिखाने में जुटा था, वहीं एयर चीफ ने दो-टूक कहा कि चीन के आक्रामक वायु सेना विस्तार के मुकाबले भारत की उत्पादन गति बेहद धीमी है और देश को हर साल 36 से 40 नए लड़ाकू विमानों की दरकार है।
* थिएटराइजेशन पर संतुलित चेतावनी: उन्होंने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के स्तर पर आगे बढ़ाए जा रहे थिएटर कमांड पर आगाह किया था कि पश्चिमी या चीनी मॉडल की अंधी नकल करने के बजाय भारत को अपनी विशिष्ट भौगोलिक चुनौतियों और बजट सीमाओं के अनुसार आगे बढ़ना होगा।
* अग्निपथ और वेटरन्स की चिंताएं: उन्होंने तकनीकी सेवाओं में कुशल कार्यबल की निरंतरता और सेवानिवृत्त सैनिकों (वेटरन्स) की गरिमा को लेकर भी पेशेवर रुख बनाए रखा।
विपक्ष का तीखा हमला: ‘क्या सच बोलने की यही सजा है?’
इस घटना के सामने आते ही कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर सीधा हमला बोलते हुए इसे मोदी सरकार की “प्रतिशोधात्मक राजनीति” करार दिया।
खेड़ा ने सवाल उठाया कि क्या 30 सितंबर 2024 को पदभार संभालने के बाद से राष्ट्रीय सुरक्षा और वायु सेना की कमियों पर लगातार सवाल उठाने के कारण एयर चीफ मार्शल को यह सजा दी गई है? उन्होंने पूछा, “यदि एक अलंकृत वायु सेना प्रमुख देश की रक्षा तैयारियों पर असहज और जायज सवाल उठाता है, तो क्या उसे सच बोलने के लिए दंडित किया जाना चाहिए या सरकार को उन कमियों को दूर करना चाहिए? क्या कोई राष्ट्र अपने नायकों का ऐसा सम्मान करता है?”
डैमेज कंट्रोल: राजभवन से मंत्रालय तक औपचारिकताओं का पर्दा
विपक्ष के आरोपों और सैन्य वेटरन्स में गहराते असंतोष के बीच सरकार और रक्षा प्रतिष्ठान ने औपचारिक बयानों का सहारा लेकर लीपापोती शुरू की:
1 . रक्षा मंत्रालय का बचाव: रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर गिनाया कि 26 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एयर चीफ मार्शल को उनके 42 वर्षों के गौरवशाली करियर के लिए विदाई दी थी। मंत्रालय ने रेखांकित किया कि रक्षा मंत्री ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के सफल क्रियान्वयन और वायु सेना के आधुनिकीकरण में एयर चीफ की भूमिका की सराहना की है। साथ ही यह भी बताया गया कि 31 अक्टूबर को वे नेशनल वॉर मेमोरियल पर श्रद्धांजलि देंगे और एयर फोर्स स्टेशन पर औपचारिक ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ का निरीक्षण करेंगे।
2 . राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से विदाई भेंट: तीनों सेनाओं की सर्वोच्च कमांडर और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी एयर चीफ मार्शल ने अपनी पत्नी सरिता सिंह के साथ राष्ट्रपति भवन में शिष्टाचार मुलाकात की। राष्ट्रपति भवन ने इसकी तस्वीरें साझा करते हुए लिखा:“Chief of the Air Staff, Air Chief Marshal A. P. Singh along with spouse Smt Sarita Singh called on President Droupadi Murmu at Rashtrapati Bhavan.”
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कागजी प्रोटोकॉल और औपचारिक तस्वीरों से उस कड़वाहट को ढंका जा सकता है, जो जमीन पर प्रशासनिक असंवेदनशीलता के कारण पैदा हुई? जब रक्षा मंत्री 26 अक्टूबर को विदाई दे रहे थे, तो क्या रक्षा मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय के बीच इतना भी संवाद नहीं था कि इस ज़मीन कार्रवाई को 1 नवंबर तक टाला जा सके?
ज़मीन वापसी का कानूनी पेंच और झुग्गियों का उजड़ता दर्द
सरकारी सूत्रों का तर्क है कि L&DO लुटियंस दिल्ली के हाई-सिक्योरिटी ज़ोन (पीएम आवास के आसपास) में 150 एकड़ से अधिक सरकारी ज़मीन को वापस लेने (Reclamation) का व्यापक अभियान चला रहा है।
* अगस्त में 53 एकड़ में फैले दिल्ली रेस क्लब की लीज़ रद्द कर कब्ज़ा लिया गया।
* जयपुर पोलो ग्राउंड को अधिग्रहित किया गया।
* 27 एकड़ के दिल्ली जिमखाना क्लब की लीज़ को ‘डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा’ का हवाला देकर रद्द किया गया।
कानूनी अंतर्विरोध: जिमखाना क्लब, रेस क्लब और पोलो ग्राउंड ने L&DO के बेदखली नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दे रखी है और मामला अदालत में विचाराधीन है। विडंबना देखिए कि जिस जिमखाना क्लब की ज़मीन को सरकार ने “डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने” के नाम पर अधिग्रहित करने का नोटिस दिया, उसी अभियान के तहत खुद सेना (एयर फोर्स) के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स पर ताला जड़ दिया गया।
गायब होता मानवीय पक्ष: इस पूरी हाई-प्रोफाइल सियासी रस्साकशी के बीच सबसे दर्दनाक पहलू वह है, जिस पर मुख्यधारा की राजनीति ने आंखें मूंद ली हैं। अखबार की रिपोर्ट साफ बताती है कि इसी जमीन अधिग्रहण अभियान के तहत पिछले दो हफ्तों में जयपुर पोलो ग्राउंड और दिल्ली रेस क्लब के आसपास दशकों से बसी गरीबों की झुग्गियों (slum clusters) पर बुलडोज़र चलाए गए हैं। बेघर हुए कामगारों की टूटी झोपड़ियों का मलबा आज भी वहीं बिखरा पड़ा है। एक तरफ एलीट क्लबों और गोल्फ कोर्स के बंद होने पर सत्ता और विपक्ष में जुबानी जंग चल रही है, वहीं दूसरी तरफ उस ज़मीन पर पसीना बहाने वाले बेबस गरीबों के उजड़ने का दर्द लुटियंस की चौड़ी सड़कों में कहीं खो गया है।
सशस्त्र बलों का चरित्र गैर-राजनीतिक होता है और एक पेशेवर सेना प्रमुख का कर्तव्य सरकार को युद्ध की वास्तविकताओं और सामरिक कमियों से आगाह करना है। लेकिन जब सामरिक सच्चाइयों को सत्ता के अहंकार पर चोट मान लिया जाए, 48 घंटे का बुनियादी शिष्टाचार भी भुला दिया जाए, और सुरक्षा समीक्षा के नाम पर गरीबों की छतें उजाड़ दी जाएं—तो यह सिर्फ एक एयर चीफ के गोल्फ मैच का रद्द होना नहीं रह जाता। यह उस प्रशासनिक असंवेदनशीलता की नंगी तस्वीर है, जहाँ न तो वर्दी के मान की परवाह है और न ही हाशिए पर खड़े इंसान की।
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(जिठानी द्वारा देवरानी पर अत्याचार और दादागिरी जैसा प्रतीत होता है) खिसियाहट है! सम्भावित हार की!!
कोई इनको इनकी कमियां न दिखायें!बस चारणों की तरह गुणगान करता रहे वहीं प्रिय है।
बचपन में एक कविता पढ़ी थी, यदि होता किन्नर नरेश मैं राजमहल में रहता… चारण मेरे गुण गाते रहते संध्या और सवेरे..वहीं हैं