इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी स्नातकोत्तर (MA English) पाठ्यक्रम में ‘दलित स्टडीज़’ के अंतर्गत 19वीं सदी की पुस्तक ‘गुलामगिरी’ को अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनाया गया है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों के गलियारों में इसे दलितों और शोषितों की आवाज़ के नाम पर प्रस्तुत किया जा रहा है, किंतु इसके मूल पाठ और औपनिवेशिक ऐतिहासिक संदर्भों का गहन अध्ययन यह उजागर करता है कि ज्ञानार्जन की आड़ में किस प्रकार के विभाजनकारी और सभ्यता-विरोधी विमर्श को संस्थागत मान्यता दी जा रही है!
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ISD Radio : डीयू के पाठ्यक्रम में ‘गुलामगिरी’ और गजनवी का महिमामंडन
इस विभाजनकारी पाठ्यक्रम को किसने दी मंजूरी?
उल्लेखनीय है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के एम.ए. अंग्रेज़ी के सेमेस्टर-आधारित पाठ्यक्रम में ‘दलित स्टडीज़’ (Course Code: ENG XIX) को वर्ष 2009-2010 के दौरान औपचारिक रूप से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया था। इसके बाद, जब डीयू ने 2018–2019 में सीबीसीएस (LOCF) के तहत स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों का पुनर्गठन किया, तब इस पेपर को संशोधित रूप में आगे बढ़ाया गया जिसे अकादमिक परिषद ने 2019 में मंजूरी दी।
इस प्रक्रिया का अंतिम और सबसे निर्णायक पड़ाव 17 दिसंबर 2021 को आया, जब दिल्ली विश्वविद्यालय की कार्य परिषद (Executive Council) की बैठक में प्रस्ताव संख्या 42 (42-5) पारित हुआ। इसके तहत यूजीसी के ‘लर्निंग आउटकम बेस्ड करिकुलम फ्रेमवर्क’ (UGC LOCF) के अंतर्गत अंग्रेज़ी विभाग द्वारा तैयार एम.ए. अंग्रेज़ी के संशोधित पाठ्यक्रम (Appendix-X) को शैक्षणिक सत्र 2021-2022 से लागू करने की अंतिम वैधानिक स्वीकृति दे दी गई।
इसी ENG XIX (Core): Dalit Studies पेपर को एक अनिवार्य (Core) विषय बनाया गया—यानी अंग्रेज़ी साहित्य के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए इसे पढ़ना अनिवार्य है। इस पेपर की प्राथमिक और संदर्भ पठन सूची में ज्योतिराव फुले की पुस्तक “Jotiba Rao Phule: Gulamgiri (Collected Works of Mahatma Jotirao Phule)” को आधिकारिक रूप से शामिल किया गया। सारांश यह कि दिल्ली विश्वविद्यालय की स्वायत्त प्रशासनिक संस्थाओं, अंग्रेज़ी विभाग और कार्य परिषद (EC) के इसी आधिकारिक अनुमोदन के माध्यम से सत्र 2021-2022 से इस विवादित और विभाजनकारी पाठ को केंद्रीय विश्वविद्यालय के पठन-पाठन का अनिवार्य हिस्सा बना दिया गया।
गजनवी को ‘मुक्तिदाता‘ बताने की बौद्धिक विकृति
इस विमर्श का सबसे आपत्तिजनक और त्रासद पहलू वह वैचारिक विचलन है, जहां फुले ने सोमनाथ मंदिर के विध्वंसक महमूद गजनवी के बर्बर आक्रमण को शूद्रों की ‘मुक्ति’ के रूप में व्याख्यायित किया गया है। ‘गुलामगिरी’ के संवादों में सोमनाथ के विध्वंस को हिंदू आस्था और तथाकथित सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार बताते हुए विदेशी आक्रांताओं के कृत्यों को एक प्रकार की सामाजिक न्याय की कार्रवाई सिद्ध करने का प्रयास दिखाई पड़ता है।
इतिहास साक्षी है कि सोमनाथ का विध्वंस केवल एक मंदिर की लूट नहीं था; वह बर्बर संहार, सांस्कृतिक विनाश और एक पूरी सभ्यता को अपमानित करने का क्रूर अभियान था। उस आक्रांता को, जिसने हज़ारों निर्दोषों का रक्त बहाया, एक वर्ग-विशेष (फुले के अनुसार शूद्र) का त्राता या उद्धारक सिद्ध करना न तो इतिहास-सम्मत है और न ही सामाजिक न्याय। यह पीड़ित की संवेदना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित घृणा और आक्रमणकारियों की हिंसा को बौद्धिक आड़ देने की चेष्टा है।
भगवान विष्णु के दशावतार का विरूपण और सनातन प्रतीकों पर कुठाराघात
फूले की ‘गुलामगिरी’ में सोमनाथ पर गजनवी के हमले को जायज ठहराना कोई इकलौती घटना नहीं है; ‘गुलामगिरी’ का पूरा वैचारिक ताना-बाना ही सनातन प्रतीकों के ध्वंस पर टिका है। जिस पुस्तक को केंद्रीय विश्वविद्यालय में ‘दलित विमर्श’ के नाम पर अनिवार्य पढ़ाया जा रहा है, उसमें भगवान विष्णु के दशावतारों को ‘धूर्त विदेशी सेनापति’, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को ‘आक्रामक साम्राज्यवादी’ और वेदों को ‘षड्यंत्रकारी जाली साहित्य’ के रूप में चित्रित किया गया है। जब भारत की नई पीढ़ी अपनी ही सांस्कृतिक पहचान, रामायण और अवतार चेतना को आक्रांताओं के चश्मे से पढ़ेगी, तो वह अपनी सभ्यता से घृणा ही करना सीखेगी।
औपनिवेशिक तंत्र और मिशनरी एजेंडे का विस्तार
19वीं सदी का इतिहास खंगालने पर स्पष्ट होता है कि तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता और चर्च मिशनरी संस्थाओं (विशेषकर स्कॉटिश मिशन) ने भारतीय समाज के आंतरिक ढाँचे को छिन्न-भिन्न करने के लिए किस प्रकार के औज़ारों का निर्माण किया था। 1873 में प्रकाशित ‘गुलामगिरी’ का मूल ढांचा ब्रिटिश प्राच्यवादियों (Orientalists) द्वारा गढ़े गए ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ (Aryan Invasion Theory) पर आधारित था।
इस नैरेटिव का मुख्य उद्देश्य यह स्थापित करना था कि भारतीय समाज की स्वाभाविक संरचना कभी समरस थी ही नहीं, बल्कि ब्राह्मण बाहर से आए ‘आक्रामक विदेशी’ थे और स्थानीय समाज उनका गुलाम था। इस सिद्धांत को वैधता देकर अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को एक निष्पक्ष न्यायदाता और मुक्तिदाता (Providential Rule) के रूप में स्थापित किया। पुस्तक का समर्पण सीधे अमेरिकी दासों के संदर्भ से जोड़ना और ब्रिटिश राज को ईश्वरीय कृपा मानना इसी औपनिवेशिक साठगांठ का दस्तावेजी प्रमाण है। जब एक विशिष्ट समुदाय (यहां ब्राह्मण) को लक्ष्य बनाकर निरंतर घृणा का प्रचार किया जाता है, तो वह सुधार का आंदोलन नहीं रहता, बल्कि विदेशी शासकों की ‘बांटो और राज करो’ नीति का हथियार बन जाता है।
भारतीय संत परंपरा बनाम विभाजनकारी विमर्श
भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों और आडंबरों पर प्रहार की एक अत्यंत समृद्ध, प्रामाणिक और आध्यात्मिक परंपरा रही है, जिसे औपनिवेशिक विमर्श ने योजनाबद्ध तरीके से ओझल किया। संत कबीर, संत रविदास और संत तुकाराम जैसे संतों ने पाखंड और सामाजिक जड़ता का तीखा विरोध किया, किंतु उन्होंने कभी अपनी सभ्यतागत जड़ों, संस्कृति और हिंदू समाज के प्रति विद्वेष का प्रचार नहीं किया।
संत रविदास का उदाहरण इस संदर्भ में सर्वाधिक प्रामाणिक है। उन्होंने सामाजिक समानता और ईश्वर-भक्ति का संदेश दिया। उसी चित्तौड़गढ़ के राजघराने में, जहाँ के शासक हिंदुत्व के गौरव के प्रतीक थे, महारानी मीराबाई ने संत रविदास को अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार किया। आज भी मेवाड़ के चित्तौड़गढ़ दुर्ग में मीरा मंदिर के ठीक सामने संत रविदास की छतरी और पदचिह्न विद्यमान हैं। यदि भारतीय समाज का ताना-बाना केवल जातिगत घृणा पर आधारित होता, तो एक क्षत्रिय राजघराना एक चर्मकार संत के चरणों में न झुकता और न ही राजसी दुर्ग के भीतर उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखता। भारतीय परंपरा का मूल आत्मा और ज्ञान की समरसता में था, समाज को जातियों में बांटकर लड़ाने में नहीं।
अकादमिक जगत की दिशा और भयावह भविष्य
विश्वविद्यालयों में आलोचनात्मक अध्ययन (Critical Inquiry) आवश्यक है, किंतु जब आक्रांताओं की बर्बरता को सही ठहराने वाले और सभ्यतागत विखंडन को पोषित करने वाले ग्रंथों को बिना किसी ऐतिहासिक संदर्भ और आलोचनात्मक संतुलन के छात्रों के मस्तिष्क में रोपा जाता है, तो यह शिक्षा नहीं बल्कि वैचारिक विषाक्तता का प्रसार बन जाता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के नीति-नियंताओं और अकादमिक परिषदों को यह समीक्षा करनी होगी कि क्या स्वायत्तता के नाम पर औपनिवेशिक दौर के गढ़े गए विभाजनकारी और राष्ट्र-विरोधी आख्यानों को स्वीकृति दी जा सकती है?
इसका सबसे भयावह परिणाम यह होगा कि बिना किसी ऐतिहासिक विवेक के ऐसे विकृत पाठों को पढ़ते-पढ़ते भविष्य में भारत के बच्चे और नई पीढ़ी सोमनाथ पर महमूद गजनवी के बर्बर हमले को सही मानने और खुलेआम उसे जायज ठहराने लगेगी। सुधार की वास्तविक प्रेरणा संत रविदास और भक्ति आंदोलन के उस समरसतावादी दर्शन से मिलती है जिसने समाज को जोड़ा, न कि उन औपनिवेशिक सांचों से जिन्होंने (जैसे ज्योतिबा फुले और उनकी लिखी ‘गुलामगिरी’) आक्रांताओं का महिमामंडन कर भारतीय सभ्यता की मूल आत्मा पर ही आघात किया।
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घुन की तरह, खाकर बर्बाद कर दिया हमारी सभ्यता संस्कृति और ऋषि मुनियों की तपस्या से निर्मित गुरु कुलों की मर्यादा को! हमारे बच्चे तो बच गए, पर नाती पोते सब बर्बाद कर दिये,इन मूर्खो ने।।
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सरकारी स्कूलों को बंद करके, प्राइवेट स्कूलों को इसीलिए बढ़ावा दिया जा रहा जिससे अपनी सभ्यता संस्कृति और ज्ञान को त्यागकर अंग्रेज बना सकें जो इधर के रहें और न उधर के।
हमने भी उच्च शिक्षा प्राप्त की, अपनी भाषा में पर ये फुले सुले नहीं पढ़े।
इस शिक्षा की ही उपज आज शीर्ष पर है जिस वजह से अगर किसी को सच बताए तो वो हमें ही बेवकूफ समझते हैं।
Modi ji ne to desh ko barbaad karne ka poora mann bana liya hai, jab hamare bachche aise vishaya ko compulsory taur par padhenge to unka Mann mastishk to bhramit hoga hi, apno se,apne samaj se nafrat karna hi sekhenge aur heen bhavna ka shikar honge , videshiyon ka kaam poora ho jayega.
मोदी, बीजेपी और आरएसएस स्कूल-कॉलेज की किताबों में ऐसी शिक्षाओं के ज़रिए हिंदुओं को बर्बाद कर रहे हैं और जातिगत नफ़रत बढ़ा रहे हैं, जो सनातन धर्म, संस्कृति और सभ्यता के लिए हानिकारक हैं।
इस तरह के देशद्रोही कार्य हमारी सरकारें करती हैं पर कहीं हमारी सहभागिती भी है। अब हर हाल में इन से मुक्ती मिलनी ही चाहिए। दुनिया के नक्शे पर हास्यास्पद वा दरिद्र छवि अंकित की है, चीन हमारे दो साल बाद आज़ाद होने के बाद भी आज शीर्ष तीन में एक है और हम•••••••!