Vijay Shukla : कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, कोई विदाई समारोह नहीं, और न ही कोई मीडिया कवरेज। विश्वगुरु ने चुपचाप अपना सामान बांधा और एक रात खामोशी से लौट आया। महामानव जो अपनी हर छोटी उपलब्धि पर ढोल पीटते हैं, अपनी दो दशकों की मेहनत और कूटनीतिक पूंजी को बिना एक शब्द कहे दफन कर दिया।
साल 20021 ताजिकिस्तान की ज़मीन और भारत का एक रणनीतिक सपना। दुशांबे के ठीक पश्चिम में हमने अपना विदेशी सैन्य बेस Ayani Air Base बनाना शुरू किया। 20 साल का समय और लगभग 80 से 100 मिलियन डॉलर का भारी निवेश। भारत का पहला और एकमात्र विदेशी सैन्य ठिकाना। यह 3,200 मीटर लंबी एक ऐसी हवाई पट्टी है, जहाँ से हमारे C-17 ग्लोबमास्टर और सुखोई Su-30 लड़ाकू विमान आसमान नाप सकते थे।
इसकी भौगोलिक अहमियत को समझिए, यह अफगानिस्तान के वाखान कॉरिडोर से महज़ 20 किलोमीटर दूर था। वही संकरी पट्टी जो एक साथ पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर (PoK) और चीन के शिनजियांग को छूती है। वहाँ बैठकर हम एक ही नज़र में पाकिस्तान और चीन दोनों की चालों को भांप सकते थे। बिना पाकिस्तान की ज़मीन छुए या किसी के आगे हाथ फैलाए, हम मध्य एशिया और अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा सकते थे। यह एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र की दूरदृष्टि थी।
लेकिन फिर 2022 आया। हमने बिना किसी को बताए चुपचाप वह बेस खाली कर दिया और चाबियाँ ताजिकिस्तान को सौंप दीं। तीन साल तक इस सच को राष्ट्र से छिपाए रखा गया, जब तक कि 2025 के अंत में दबी ज़ुबान में इसे स्वीकार नहीं किया गया। क्यों? क्या हमने कोई गलती की थी? नहीं। बस रूस और चीन ने दुशांबे पर दबाव डाला। रूस इस इलाके को अपना आंगन मानता है और चीन वहाँ अफगान सीमा के पास अपनी सुरक्षा चौकियाँ बना रहा है।
दोनों में से कोई नहीं चाहता था कि कोई बाहरी ताक़त उनके प्रभाव क्षेत्र में बैठे। रूस हमारा रणनीतिक साझेदार है, और चीन वह प्रतिद्वंद्वी जिसे हम सीधे तौर पर नाराज़ करने का ज़ोखिम नहीं उठाना चाहते। हमारे पास इस दबाव का सामना करने के लिए कोई ताकत नहीं थी। तो हमने क्या किया? हमने चुपचाप अपना बोरिया-बिस्तर बांधा और घर आ गए।
2023 की शुरुआत तक उसी ऐनी बेस पर रूसी सेना ने कब्ज़ा जमा लिया। जिसे हमने अपने पसीने और पैसे से बनाया, उसे रूस ने बिना एक गोली चलाए विरासत में पा लिया। ज़रा रुकिए, कहानी की त्रासदी यहाँ खत्म नहीं होती। 26 अप्रैल को चाबहार बंदरगाह का आत्मसमर्पण भी तो हुआ है।
23 सालों तक जिस चाबहार को हमने ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में सींचा, उसे अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में एक ईरानी संस्था को सौंप दिया गया। सोचिए… ऐनी बेस 2022 में गया और चाबहार 2026 में। मध्य एशिया में हमारे दो सबसे बड़े रणनीतिक लंगर। एक को रूसी और चीनी दबाव ने उखाड़ फेंका, दूसरे को अमेरिकी प्रतिबंधों ने निगल लिया। महज़ चार साल के भीतर हमारी दशकों की तपस्या शून्य हो गई। एक और एयरबेस है, ताजिकिस्तान में फरखोर।
लगभग 2008 में फरखोर बेस को बंद करने के बाद , भारत ने आयनी एयरबेस विकसित किया, जो उसका दूसरा विदेशी सैन्य अड्डा बन गया । लेकिन आयनी के बाद कोई एयरबेस नहीं है भारत के पास विदेश में। फरखोर पर अब पाकिस्तान की नज़र है। जल्दी ही वहां से भी कोई न्यूज आएगी।
हम एक ही झटके में मध्य एशिया नहीं हार रहे हैं। हम इसे किश्तों में, बहुत खामोशी से हार रहे हैं। एक-एक सैन्य बेस, एक-एक बंदरगाह करके। जब नीतियाँ केवल नारों में सिमट जाती हैं, तो ज़मीन पर यथार्थ अपना क्रूर रंग दिखाता है। एक राष्ट्र की असली ताकत उसके घरेलू शोर में नहीं, बल्कि दुनिया की आँखों में आँखें डालकर अपनी जगह बनाए रखने के मौन साहस में होती है।
अफ़सोस, जब हम अपने घर के आंगनों में विश्वगुरु होने का जश्न मना रहे थे, तब दुनिया के नक़्शे से हमारी सबसे कीमती रणनीतिक ज़मीनें चुपचाप खिसक रही थीं। और सबसे दुखद और डरावनी बात यह है कि राष्ट्र की इस मूक पराजय पर, कोई एक शब्द भी नहीं बोल रहा है। 4 मई को मीडिया का जश्न देखिएगा,जब सभी गुलाम संवैधानिक संस्थाओं पर चढ़कर ज़िले इलाही हाथ हिलाते हुए बंगाल विजय यात्रा निकालेंगे। कोई सवाल आयनी और चाबहार पर नहीं पूछे गए न पूछे जायेंगे।
