विशेष खोजी रिपोर्ट | इंडिया स्पीक्स डेली आर्थिक एवं कॉर्पोरेट अपराध ब्यूरो। नीलामकर्ता ही जब खरीदार का वकील बन जाए तो फिर क्या कहिएगा? सार्वजनिक क्षेत्र के आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) को बेचने के मामले में ऐसा ही हुआ, जिसे बिजनेसवर्ल्ड ने अपनी खोजी पत्रकारिता में एक्सपोज किया है। India Speak Daily का यह पूरा आलेख बिजनेसवर्ल्ड इन्वेस्टिगेशन पर आधारित है।
सार्वजनिक क्षेत्र के आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) में 60.72% नियंत्रक हिस्सेदारी को कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स (Fairfax Financial Holdings) को 52,878 करोड़ रुपये में सौंपे जाने के पीछे जो कहानी आधिकारिक बयानों में सुनाई गई, वह सिर्फ एक झूठ था। ‘बिजनेसवर्ल्ड’ (BW) द्वारा उजागर किए गए वित्त मंत्रालय के निवेश एवं सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग DIPAM(Department of Investment and Public Asset Management) के 10 पन्नों के गोपनीय आंतरिक नोट (दिनांक: 13 अगस्त 2026, हस्ताक्षरित: दीपम सचिव अरुणिश चावला) ने इस सौदे की कलई खोलकर रख दी है। इस गोपनीय दस्तावेज का निष्कर्ष एक ही पंक्ति में समेटा जा सकता है: “नियम बाद में आए, लिफाफा पहले खुला।”
सरकारी नीलामी का यह बुनियादी और वैधानिक उसूल है कि खरीदार की वित्तीय बोली (Financial Bid) खोलने से पहले संपत्ति का न्यूनतम आरक्षित मूल्य (Reserve Price) सीलबंद और ‘ब्लाइंड’ तरीके से तय होना चाहिए। लेकिन आईडीबीआई के मामले में ठीक उलटा हुआ—पहले फेयरफैक्स का लिफाफा खोला गया, उसकी बोली देखी गई, और जब बोली तय आरक्षित मूल्य से कम निकली, तो पुराने मूल्य को कूड़ेदान में फेंककर नियमों को ही बदल दिया गया ताकि फेयरफैक्स की कम बोली को ‘उचित और विजयी’ साबित किया जा सके।
क्रोनोलॉजी का पर्दाफाश: 12 मार्च से 13 अगस्त 2026 तक का खेल
गोपनीय नोट में दर्ज तारीखें और मिनिट्स गवाही देते हैं कि कैसे व्यवस्था ने एक विदेशी कॉर्पोरेट के सामने घुटने टेके:
1 . 12 मार्च 2026 — पहली बोली फेल: पहले दौर की बोलियां खोली गईं। दोनों बोलीदाताओं (फेयरफैक्स और एक अन्य) की बोली सरकार द्वारा तय आरक्षित मूल्य (Reserve Price) से कम निकली। सरकार ने उनसे आरक्षित मूल्य से मिलान करने को कहा, लेकिन दोनों ने साफ इनकार कर दिया।
2 . मूल आरक्षित मूल्य क्या था? सार्वजनिक हुए आंकड़ों के अनुसार, सरकार ने बैंक का न्यूनतम मूल्य ₹94.42 प्रति शेयर तय किया था। जबकि फेयरफैक्स की पहली बोली महज ₹75 प्रति शेयर थी। कायदे से नीलामी यहीं रद्द होनी चाहिए थी।
3 . 1 जून 2026 — फेयरफैक्स की ‘अंतिम चेतावनी’: फेयरफैक्स ने एक संशोधित सीलबंद बोली सौंपी, लेकिन साथ में एक सख्त पत्र भी नत्थी किया:“यह हमारी अंतिम पेशकश है… हम पूरी पारदर्शिता से कहना चाहते हैं कि यदि दोबारा बोली लगाने या इसे और बढ़ाने का अनुरोध किया गया, तो हम पूरी प्रक्रिया से खुद को बाहर कर लेंगे।”
* 13 जुलाई 2026 (पहली बैठक) — बोली खोली गई: नई दिल्ली में अधिकारियों ने फेयरफैक्स का सीलबंद लिफाफा खोला और देखा कि उसने ₹81 प्रति शेयर का ऑफर दिया है।
* 13 जुलाई 2026 (दूसरी बैठक) — नियमों की हत्या: बोली देखने के ठीक बाद उसी दिन ‘कोर ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज ऑन डिसइन्वेस्टमेंट’ (CGD) की दूसरी बैठक हुई। इसमें आदेश दिया गया कि पुराना आरक्षित मूल्य (₹94.42) “रद्द और अमान्य” माना जाए। मूल्यांकन एजेंसियों को ‘नए नियमों’ के तहत नया मूल्यांकन करने का हुक्म दिया गया।
* 13 अगस्त 2026 — मनमुताबिक रिपोर्ट तैयार: नई गाइडलाइंस के तहत नया बेंचमार्क निकलकर आया ₹75.99 प्रति शेयर—यानी फेयरफैक्स की पुरानी बोली (₹75) से महज 99 पैसे ऊपर और उसकी नई बोली (₹81) से ठीक नीचे! दीपम सचिव ने नोट में लिख दिया कि फेयरफैक्स की ₹81 की बोली “उचित प्रतीत होती है।”
भाव गिराने के तीन सुनियोजित ‘हथकंडे‘
मूल्यांकन एजेंसियों (KPMG और BDO) को केवल दोबारा गणना करने को नहीं कहा गया, बल्कि उन्हें लिखित निर्देश दिए गए कि फॉर्मूला कैसे बदलना है:
हथकंडा 1: प्राइवेट बैंकों को तुलना से बाहर करना
शुरुआती मूल्यांकन में आईडीबीआई की कीमत तय करने के लिए उसकी तुलना अन्य निजी बैंकों से की गई थी। लेकिन सचिवों के समूह (CGD) ने आदेश दिया कि केवल ‘पब्लिक सेक्टर बैंकों’ (PSBs) से तुलना की जाए।
* दीपम (निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार।) के नोट में खुद स्वीकार किया गया: “निजी बैंकों को पूल में शामिल करने से आरक्षित मूल्य बहुत अधिक (Over-estimated) निकल रहा है।”
* विडंबना देखिए: 2019 से आरबीआई आईडीबीआई को ‘निजी बैंक’ मानता है, इसे एक निजी विदेशी कंपनी को बेचा जा रहा है जो इसे निजी बैंक की तरह चलाएगी, लेकिन इसका दाम लगाते वक्त इसे सरकारी बैंकों के सस्ते मूल्यांकन पर आंका गया ताकि दाम गिर जाए!
हथकंडा 2: शेयर बाजार भाव की सुविधापरक व्याख्या (Cherry-picking)
जब शेयर बाजार में आईडीबीआई का शेयर ऊंचा था, तो सरकार ने आदेश दिया कि “बाजार भाव का उपयोग न किया जाए क्योंकि इसमें अस्थिरता है।” लेकिन जब शेयर बाजार में भाव गिरकर फेयरफैक्स की बोली से नीचे आया, तो उसी नोट में तर्क दिया गया कि “चूंकि बाजार भाव पिछले तीन महीने से बोली से नीचे है, इसलिए फेयरफैक्स की बोली को स्वीकार करना उचित है।” यानी जब दाम बढ़ाना हो तो शेयर बाजार बेकार, और जब औने-पौने दाम पर बेचना हो तो शेयर बाजार ही पैमाना!
हथकंडा 3: ‘स्वतंत्र‘ वैल्यूअर का ढोंग
कैबिनेट ब्रीफिंग में दावा किया गया कि दो ‘स्वतंत्र’ सलाहकारों ने मूल्यांकन किया है। लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि एक मूल्यांकन KPMG India ने किया—जो कोई तटस्थ संस्था नहीं, बल्कि इस सौदे को पूरा कराने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त ‘ट्रांजेक्शन एडवाइजर’ (Transaction Adviser) थी, जिसकी फीस ही सौदा पूरा होने पर टिकी थी।
जनता की जेब पर डाका: टैक्स की देनदारी भी करदाताओं के सिर
इस सौदे में केवल शेयर सस्ते नहीं बेचे गए, बल्कि फेयरफैक्स को खुश करने के लिए सरकार ने एक ऐसा ‘स्वीटनर’ दिया जिसकी मिसाल नहीं मिलती:
* विवादित टैक्स का जिम्मा सरकार पर: सरकार ने सहमति दी कि आईडीबीआई बैंक पर आयकर विभाग के जितने भी पुराने विवादित टैक्स मामले लंबित हैं, उनका हर्जाना भारत सरकार भरेगी—चाहे वे बैंक की बैलेंस शीट में दर्ज हों या न हों (Indemnify all disputed income tax demands)।
* इसका सीधा अर्थ है कि यदि टैक्स विभाग केस जीतता है, तो पैसा निजी मालिक की जेब से नहीं जाएगा, बल्कि सरकारी खजाने से फेयरफैक्स को लौटाया जाएगा। मुनाफा विदेशी निवेशक का, और कानूनी टैक्स देनदारी देश के करदाताओं की!
स्क्रैप (कबाड़) बेचने वाले नियमों से बिका देश का बैंक!
दस्तावेज का सबसे शर्मनाक पहलू वह औचित्य है जो वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने दिया।
* जब अधिकारियों को दिखा कि ‘जनरल फाइनेंशियल रूल्स’ (GFR) में ऐसी मनमानी का कोई प्रावधान नहीं है, तो उन्होंने रेलवे स्टोर्स कोड (Railway Stores Code) का सहारा लिया, जो ‘कबाड़ और स्क्रैप’ की नीलामी के लिए इस्तेमाल होता है!
* नोट में बकायदा कोट किया गया कि रेलवे डिपो अधिकारी को यह अधिकार है कि वह विशेष परिस्थितियों में आरक्षित मूल्य से कम पर कबाड़ बेच सकता है। भारत के एक क्रियाशील, मुनाफे वाले बैंक को बेचने के लिए कबाड़ के नियमों की नजीर दी गई।
आनन–फानन में क्यों थी सरकार? राजकोषीय दिवालियापन का डर
पब्लिक डोमेन में सरकार ने इसे ‘भारत के बैंकिंग सुधारों का स्वर्णिम युग’ कहा, लेकिन दीपम (निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार।) के 10 पन्नों के नोट में आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) के हवाले से असली मजबूरी दर्ज है:
* खजाना खाली था: नोट में स्वीकार किया गया कि पश्चिम एशिया संघर्ष, उर्वरक-एलपीजी पर बढ़ी सब्सिडी, पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती से राजस्व का भारी नुकसान हुआ है। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव है और रुपया टूट रहा है।
* सरकार को अपना बजट घाटा (Fiscal Deficit) छिपाने के लिए तत्काल 52,000 करोड़ की नकद राशि की दरकार थी, और इसी हड़बड़ी में उसने विदेशी खरीदार की हर मनमानी शर्त, अल्टीमेटम और कम कीमत को स्वीकार कर लिया।
प्रेम वत्स का दोहरा खेल: फेयरफैक्स की अपनी कंपनियों की पूरी कीमत!
एक तरफ सरकार ने आईडीबीआई के शेयर भाव को यह कहकर गिराया कि बाजार भाव भरोसेमंद नहीं है। दूसरी तरफ, सौदे को मंजूरी मिलते ही फेयरफैक्स के चेयरमैन प्रेम वत्स ने सार्वजनिक ऐलान किया कि फेयरफैक्स अपनी कंपनियों—Go Digit और IIFL Capital—की हिस्सेदारी को आईडीबीआई बैंक में मर्ज करेगा, और यह विलय “बाजार भाव” (Market Price) पर होगा। यानी जब भारत सरकार का बैंक खरीदना हो, तो बाजार भाव ‘अविश्वसनीय’ है; लेकिन जब अपनी निजी कंपनियों को बैंक में ठूंसना हो, तो बाजार भाव ‘सर्वोपरि’ है!

पांच अनुत्तरित सवाल जिनका जवाब सरकार को देना होगा:
1 . क्या यह नीलामी थी या फिक्सिंग? जब 12 मार्च को पहली बोली खारिज हो चुकी थी, तो नियम पुस्तिका (Disinvestment Booklet) के तहत नया टेंडर (Fresh EoI) क्यों नहीं जारी किया गया?
2 . लिफाफा खुलने के बाद बेंचमार्क क्यों बदला? 13 जुलाई को फेयरफैक्स की बोली देखने के बाद ही आरक्षित मूल्य को ₹94.42 से घटाकर ₹75.99 करने का आदेश क्यों दिया गया?
3 . करदाताओं पर कितने हजार करोड़ का टैक्स जोखिम डाला गया? विवादित टैक्स देनदारी की गारंटी देने से पहले संसद या जनता को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया?
4 . गृह मंत्रालय का ‘रेड फ्लैग’ कौन था? नोट में दर्ज है कि 25 फरवरी को गृह मंत्रालय ने एक बोलीदाता को लेकर सुरक्षा इनपुट (Security Concerns) दिए थे। वह बोलीदाता कौन था और उसे क्लीन चिट किस दबाव में मिली?
5 . क्या यह क्रोनी कैपिटलिज्म और वित्तीय संप्रभुता का समर्पण नहीं है? एलआईसी के करोड़ों पॉलिसीधारकों के 21,600 करोड़ रुपये से जिस बैंक को जिंदा किया गया, उसे मुनाफे में आते ही विदेशी पूंजी के सामने औने-पौने दाम पर क्यों परोस दिया गया?
“जनता के पैसे से बना संस्थान जनता का है: राहुल गांधी
आईडीबीआई बैंक-फेयरफैक्स सौदे पर कड़ा प्रहार करते हुए लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 29 अक्टूबर 2026 को पत्र जारी कर सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कर्मचारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा:
“पिछले साल मार्च में आप मुझसे संसद भवन में मिलने आए थे और आपने मुझसे एक सीधा सवाल पूछा था: जिस बैंक को आपने कड़ी मेहनत से मुनाफे में पहुंचाया, सरकार उसे क्यों बेच रही है? मैंने यह सवाल लोकसभा में भी उठाया कि एक लाभ कमाने वाले सार्वजनिक बैंक को क्यों बेचा जा रहा है और कर्मचारियों व जमाकर्ताओं की सुरक्षा कैसे होगी? लेकिन सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। और अब इसे कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स को बेचने का फैसला कर लिया गया है।
सात साल पहले आईडीबीआई बैंक घाटे में था। पिछले साल इसने नौ हजार करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा कमाया।
यह ऐतिहासिक बदलाव (turnaround) आपकी मेहनत का नतीजा है। जनता के पैसे से बना संस्थान जनता का होता है। आज सरकार और एलआईसी के पास इस बैंक का 95% मालिकाना हक है। बिक्री के बाद यह घटकर महज 34% रह जाएगा।
वर्ष 2003 में सरकार ने संसद को भरोसा दिया था कि आईडीबीआई में वह हमेशा कम से कम 51% हिस्सेदारी बनाए रखेगी। भले ही वह वादा कानून में न लिखा गया हो, लेकिन संसद से किया गया वादा सीधे भारत की जनता से किया गया वादा होता है।
जैसे ही आईडीबीआई का निजी स्वामित्व होगा, एससी (SC), एसटी (ST) और ओबीसी (OBC) उम्मीदवारों के लिए आरक्षण भी इसके साथ ही खत्म हो जाएगा। आपकी सेवा शर्तें, जो पहले ही कमजोर की जा चुकी हैं, अपनी आखिरी सुरक्षा भी खो देंगी। सार्वजनिक बैंक बेची जाने वाली संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के औजार हैं। मैं आपकी इस लड़ाई में आपके साथ खड़ा हूं और आपकी सभी जायज मांगों का पूरा समर्थन करता हूं।“
लालबहादुर शास्त्री के बनाए गौरवशाली बैंक को नरेंद्र मोदी सरकार ने कबाड़ के नियम से कबाड़ के भाव बेच दिया!
आईडीबीआई (Industrial Development Bank of India) का जन्म किसी सामान्य जमा-पूंजी वाले कमर्शियल बैंक के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के आर्थिक स्वावलंबन के सबसे बड़े वित्तीय इंजन के तौर पर हुआ था। जुलाई 1964 में तत्कालीन लाल बहादुर शास्त्री सरकार (संसद के 1964 अधिनियम के तहत) ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की पूर्ण स्वामित्व वाली एक वैधानिक शाखा के रूप में इसकी नींव रखी थी, जिसे आगे चलकर 1976 में भारत सरकार ने सीधे अपने नियंत्रण में लेकर एक पूर्ण स्वायत्त ‘विकास वित्त संस्थान’ (DFI) का दर्जा दिया।
इसे बनाने का मूल उद्देश्य था—आजाद भारत में भारी उद्योगों, बुनियादी ढांचे, बिजली, इस्पात, रसायन और विनिर्माण परियोजनाओं को दीर्घकालिक कर्ज (Long-term Financing) मुहैया कराना, क्योंकि उस दौर में कोई भी निजी बैंक इतना बड़ा वित्तीय जोखिम उठाने को तैयार नहीं था। अपने इस राष्ट्रीय उद्देश्य में आईडीबीआई ऐतिहासिक रूप से अभूतपूर्व रूप से सफल रहा; इसने न केवल देश के औद्योगिक परिदृश्य को गढ़ा, बल्कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE), सेबी (SEBI), सिडबी (SIDBI), एक्सिम बैंक (EXIM Bank) और नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी (NSDL) जैसी देश की रीढ़ मानी जाने वाली शीर्ष वित्तीय संस्थाओं को जन्म देकर भारत का आधुनिक वित्तीय तंत्र खड़ा किया।
लेकिन 2014 के बाद सत्ता में आई मोदी सरकार ने, जिसने पूरे सार्वजनिक क्षेत्र को एक ‘सेल काउंटर’ में तब्दील कर दिया है, इस ऐतिहासिक धरोहर की विरासत और उद्देश्य को भी दरकिनार कर दिया। जिस बैंक ने दशकों तक भारत के औद्योगिक साम्राज्यों को खड़ा किया, जिस पर 2003 में संसद के भीतर सरकार ने कम से कम 51% हिस्सेदारी बनाए रखने का पवित्र संकल्प लिया था, और जिसे 2019 में खुद आम जनता व एलआईसी के पैसों से उबारकर 9,000 करोड़ के शुद्ध मुनाफे तक पहुंचाया गया—उसे भी ‘सबकुछ बेच दो’ की अंधाधुंध नीति के तहत विदेशी पूंजी के हवाले कर दिया गया।
2017 में जब यह बैंक 27% से अधिक के भयावह एनपीए के साथ वित्तीय आईसीयू में पड़ा था और आरबीआई ने इसे पीसीए के कड़े शिकंजे में कस दिया था, तब इसे किसने बचाया? तब कोई फेयरफैक्स या विदेशी निवेशक इसे छूने तक नहीं आया। सरकार ने देश के आम नागरिकों की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से चलने वाले भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के 21,600 करोड़ रुपये झोंककर इसमें 51% हिस्सेदारी खरीदवाई। आम जनता और करोड़ों पॉलिसीधारकों के भरोसे से बैंक का घाटा साफ किया गया, डूबे हुए कर्जों (Bad Loans) को राइट-ऑफ किया गया और कर्मचारियों के अथक परिश्रम से बैंक ने ऐसा ऐतिहासिक बदलाव दिखाया कि पिछले वित्तीय वर्ष में इसने 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का रिकॉर्ड शुद्ध मुनाफा कमाया। लेकिन जैसे ही जनता के पैसे से यह बैंक पूरी तरह सेहतमंद और मुनाफे की मशीन बना, सरकार ने अपनी और एलआईसी की कुल 60.72% नियंत्रक हिस्सेदारी को कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को महज 52,878 करोड़ रुपये में (लगभग ₹81 प्रति शेयर के औने-पौने भाव पर) बेचकर विदेशी हाथों में सौंप दिया।
एक संप्रभु राष्ट्र के औद्योगिकीकरण की जिस नींव को लालबहादुर शास्त्री जी के दौर में सींचा गया था, मोदी सरकार ने अपने राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए उसी ऐतिहासिक धरोहर को कबाड़ के भाव नीलाम कर दिया!
इंडिया स्पीक्स डेली का निष्कर्ष: विदेशी पूंजी के आगे घुटने और वित्तीय संप्रभुता का आत्मसमर्पण
आईडीबीआई बैंक और फेयरफैक्स का यह सौदा केवल एक वित्तीय लेन-देन या विनिवेश की सामान्य विफलता नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी विदेशी निवेशक के सामने व्यवस्था के साष्टांग दंडवत होने की सबसे शर्मनाक मिसाल है।
‘विश्वगुरु’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का दम भरने वाली सरकार का यह दोहरा चरित्र देखिए: जिस सौदे पर सीना ठोककर ऐतिहासिक एफडीआई का तमगा लगाया जा रहा है, उसके गोपनीय पन्नों में सिर्फ और सिर्फ बेबसी, नियमों की बलि और वित्तीय संप्रभुता का आत्मसमर्पण दर्ज है। जब फेयरफैक्स ने आँखें तरेरते हुए यह अल्टीमेटम दिया कि “यह हमारा अंतिम प्रस्ताव है, दोबारा मोलभाव किया तो हम नीलामी छोड़कर चले जाएंगे,” तब एक 140 करोड़ के संप्रभु राष्ट्र की सरकार ने
राष्ट्रहित में बोली रद्द करने की हिम्मत नहीं दिखाई। उल्टे, विदेशी खरीदार के अल्टीमेटम के आगे घुटने टेक दिए गए। खरीदार की जेब और उसकी मनमाफिक बोली के हिसाब से देश के नियम, मूल्यांकन और न्यूनतम आरक्षित मूल्य को ही बदल डाला गया।
इससे बड़ा संस्थागत पतन और क्या हो सकता है कि जिस देश ने 1964 में अपनी औद्योगिक रीढ़ खड़ी करने के लिए इस विकास बैंक की नींव रखी थी, आज उसी बैंक को बेचने के लिए वित्त मंत्रालय के अफसर ‘जनरल फाइनेंशियल रूल्स’ को ताक पर रखकर रेलवे के ‘कबाड़ और स्क्रैप‘ बेचने वाले कानूनों (Railway Stores Code) का सहारा ले रहे हैं? एक क्रियाशील, 9,000 करोड़ रुपये का वार्षिक मुनाफा कमाने वाले बैंक की औकात इस सरकार की फाइलों में रेलवे के यार्ड में पड़े जंग लगे लोहे जितनी तय की गई!
क्रूरता का आलम यह है कि जब बैंक 27% एनपीए के साथ ICU में पड़ा था, तब करदाताओं और एलआईसी के 30 करोड़ गरीब-मध्यमवर्गीय पॉलिसीधारकों के 21,600 करोड़ रुपये झोंककर उसका इलाज किया गया। और जब जनता के पैसे से यह बैंक तंदुरुस्त होकर मुनाफा कमाने लगा, तो इसे कबाड़ के भाव विदेशी पूंजीपति की झोली में डाल दिया गया। इतना ही
नहीं, विदेशी मालिक को खुश करने के लिए बैंक के भविष्य के मुकदमों और टैक्स की देनदारी का टोकरा भी भारत के करदाताओं के सिर मढ़ दिया गया।
‘इंडिया स्पीक्स डेली’ दो-टूक शब्दों में यह रेखांकित करता है कि यह विनिवेश नहीं, राष्ट्रीय संपदा की लूट और राजकोषीय दिवालियापन छिपाने की हताश कोशिश है। कबाड़ के कानून से कौड़ियों के भाव देश के बैंक बेचकर खजाना भरने वाली सत्ता जब अगली बार राष्ट्रवाद और आत्मनिर्भरता का भाषण दे, तो देश को याद रखना चाहिए कि एक विदेशी कंपनी के एक पत्र पर इस सरकार ने अपनी पूरी आर्थिक संप्रभुता को गिरवी रख दिया था।
नोट:- इस खोजी लेख का साभार संदर्भ: बिजनेसवर्ल्ड इन्वेस्टिगेशन और उस रिपोर्ट में दिया गया वित्त मंत्रालय (DIPAM) का गोपनीय नोट है।
