इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। भारतीय लोकतंत्र की नींव किसी बहुमंजिला सचिवालय, भारी-भरकम बजट या चुनावी नारों पर नहीं, बल्कि उस निहत्थे नागरिक के विश्वास पर टिकी है जो भीषण गर्मी और लंबी कतारों की परवाह किए बिना मतपेटी तक पहुँचकर यह भरोसा करता है कि उसका एक वोट इस देश की सत्ता का भाग्य तय करेगा। लेकिन जब उसी विश्वास के सबसे बड़े संवैधानिक प्रहरी—भारत निर्वाचन आयोग (ECI)—के गर्भगृह से संस्थागत दरारें, नियम-कायदों की धज्जियां और मनमाने तानाशाही नियंत्रण की असहज करने वाली गंध आने लगे, तो यह सवाल किसी एक पद या अधिकारी की प्रतिष्ठा का नहीं रह जाता। यह सीधे-सीधे भारत के गणतांत्रिक अस्तित्व, नागरिक संप्रभुता और चुनावी शुचिता पर लगा गंभीर आघात है।
गौरतलब है कि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के ताज़ा दस्तावेजी खुलासे ने निर्वाचन सदन के भीतर चल रही इस संस्थागत कलह की कलई पूरी तरह खोलकर रख दी है। दस्तावेजों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर साथी चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में एक-दो बार नहीं, बल्कि 14 बार फाइलों पर लिखित और औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं—यहाँ तक कि एक ही दिन में चार-चार आपत्तियां दर्ज की गईं। मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े ‘फॉर्म-6’ में वैधानिक प्रक्रियाओं और नियमों को दरकिनार कर बदलाव थोपे गए, जिसे आयुक्त संधू ने आधिकारिक नोट में साफ़ शब्दों में ‘अनाधिकृत और अवैध’ (Unauthorised and Illegal) करार दिया।

इतना ही नहीं, राज्य स्तर पर संचालित होने वाले मतदाता सूची के सॉफ्टवेयर और डेटाबेस के दिल्ली में हो रहे ‘क्रमिक केंद्रीकरण’ (Gradual Centralisation) पर कड़ा ऐतराज जताते हुए दोनों आयुक्तों को देश के कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को सीधे अलग-अलग पत्र लिखकर गुहार लगानी पड़ी। यही नहीं, अप्रैल 2026 में लिखे गए आंतरिक नोटों से यह सनसनीखेज सच भी बाहर आया कि निर्वाचन आयोग के नाम पर कई नीतिगत आदेश ‘पूरे आयोग’ (Full Commission) की वैधानिक सहमति के बिना ही एकतरफा जारी किए जा रहे थे।
यह कोई सामान्य ‘प्रशासनिक असहमति’ या स्वस्थ विचार-विमर्श नहीं है, बल्कि उस संवैधानिक भावना की खुली हत्या है जिसके तहत बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने निर्वाचन आयोग को एक स्वायत्त, बहु-सदस्यीय और सामूहिक विवेक से चलने वाली संस्था के रूप में गढ़ा था। राज्य स्तर पर विकेंद्रीकृत रहने वाले मतदाता सूची के डेटाबेस को दिल्ली के केंद्रीय नियंत्रण में खींचने की यह बेचैनी और तकनीकी फेरबदल आखिर किसके अदृश्य इशारे पर और किस राजनीतिक लाभ को साधने के लिए किए जा रहे थे? जब आयोग के भीतर से ही आदेशों की वैधता पर सवाल उठने लगें, तो बाहर बैठी जनता इस पूरी चुनावी मशीनरी पर किस आधार पर विश्वास करे?
इस पूरे संस्थागत संकट की जड़ें दिसंबर 2023 के उस विवादित कानून में गहरे धंसी हैं, जिसके जरिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की सुविचारित संवैधानिक व्यवस्था को दरकिनार करते हुए चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया था। चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री—यानी कार्यपालिका के पास 2:1 का अटूट बहुमत। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता की वह तीखी टिप्पणी आज पूरे देश के सामने आईने की तरह खड़ी है—”यदि क्रिकेट मैच में एक टीम का कप्तान ही अंपायर चुनेगा और उसकी टीम जीतेगी, तो उस अंपायर के फैसलों पर हमेशा संदेह का साया रहेगा”। आज उसी ‘संदिग्ध अंपायरिंग’ का खेल लोकतंत्र के खुले मैदान में उजागर हो रहा है। 2023 के इस कानून पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की राय का बंटना और मामले का 5 जजों की संविधान पीठ के पास जाना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मौजूदा चयन व्यवस्था अपने जन्मकाल से ही संवैधानिक नैतिकता के अभाव से ग्रस्त थी।
पश्चिम बंगाल से लेकर देश के विभिन्न राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के नाम पर मतदाता सूची से नाम कटना और फिर अपीलीय प्रक्रियाओं को उलझा देना कोई साधारण तकनीकी गड़बड़ी नहीं है। यह लोकतंत्र के उस अंतिम पंक्ति के गरीब, वंचित और आम नागरिक के नागरिक अस्तित्व को राजनीतिक शतरंज की बिसात पर मिटाने की क्रूर चेष्टा है। जिस साधारण नागरिक के पास व्यवस्था में अपनी भागीदारी दर्ज कराने के लिए सिर्फ उसका ‘वोटर कार्ड’ है, अगर वही केंद्रीय सॉफ्टवेयर के संदिग्ध खेल में रातों-रात गायब हो जाए, तो इसे तकनीकी चूक नहीं बल्कि व्यवस्थागत छल कहा जाएगा।
सत्तारूढ़ दल अब इसे ‘आंतरिक विचार-विमर्श की जीवंत परंपरा’ कहकर ढंकने की हास्यास्पद कोशिश कर रहा है, जबकि विपक्ष इसे सीधे ‘वोट चोरी और संस्थागत तख्तापलट’ करार देकर सड़कों पर उतर आया है। लेकिन राजनीतिक नूराकुश्ती से परे, सच्चाई यह है कि भारतीय निर्वाचन आयोग की नैतिक साख आज अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच चुकी है।
लीपापोती वाले प्रेस नोट जारी करने से खोया हुआ जनास्था का संबल वापस नहीं लौटाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को अब बिना किसी टालमटोल के 2023 के नियुक्ति कानून की समीक्षा कर सीजेआई की निष्पक्ष उपस्थिति वाली चयन प्रक्रिया को बहाल करना होगा। साथ ही, SIR और फॉर्म-6 में किए गए तमाम अनाधिकृत बदलावों की स्वतंत्र तकनीकी व न्यायिक जांच कराई जानी चाहिए। जब तक चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक रीढ़ और निष्पक्ष अंपायर की साख वापस नहीं पा लेता, तब तक देश में होने वाले किसी भी चुनाव के जनादेश को संदेह से मुक्त नहीं माना जा सकेगा।
वहीं दूसरी ओर, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ और एक आर्थिक अखबार की ताज़ा खोजी रिपोर्टों ने इस पूरे प्रकरण में और भी सनसनीखेज तथ्यों का पर्दाफाश कर दिया है। सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की फाइलों पर दर्ज आपत्तियों के बाद अब गोवा राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से भी गंभीर शिकायत सामने आई है।
दस्तावेजों के मुताबिक, गोवा राज्य निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक अहम आदेश को लागू करने के लिए केंद्रीय निर्वाचन आयोग को महज 7 दिनों के भीतर 8 बार ईमेल भेजकर त्वरित कार्रवाई की गुहार लगाई, लेकिन निर्वाचन सदन की तरफ से उन पत्रों का कोई जवाब तक नहीं दिया गया।
इसके साथ ही एक और विस्फोटक तथ्य यह सामने आया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने जनवरी 2024 से नई पीढ़ी—’Gen-Z’—के नए मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया पर अड़ंगा लगा रखा था, जबकि बाकी दोनों चुनाव आयुक्त इस रोक के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे और उन्होंने इसका विरोध किया था।
यह कोई सामान्य प्रशासनिक ढिलाई या फाइलों का अटकाव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के साथ सीधे तौर पर किया गया सुनियोजित विश्वासघात है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद 7 दिनों में 8 ईमेल पर निर्वाचन सदन का कुंभकर्णी चुप्पी साधे रहना यह साबित करता है कि संवैधानिक संस्थाओं की अवहेलना अब इस आयोग की आधिकारिक कार्यशैली बन चुकी है।
उससे भी बड़ा और चुभने वाला सवाल यह है कि आखिर नई पीढ़ी के ‘Gen-Z’ मतदाताओं की लोकतांत्रिक लहर से सत्ता का कौन-सा गलियारा डरा हुआ था? पहली बार मताधिकार पाने वाले लाखों युवा वोटरों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखकर किसका राजनीतिक समीकरण साधा जा रहा था और इसका चुनावी फायदा किसे पहुँचाने की तैयारी थी?
जब निर्वाचन सदन के भीतर ही संविधान, अदालत और युवा नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को ताक पर रख दिया जाए, तो यह अंपायर केवल संदिग्ध ही नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र के इतिहास में सबसे कमजोर और कटघरे में खड़ी कड़ी के रूप में दर्ज होता है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को अब केवल कानूनों की व्याख्या तक सीमित न रहकर निर्वाचन सदन के इन बंद कमरों की मनमानी और युवाओं के मताधिकार पर चले इस हथौड़े का पाई-पाई का हिसाब तय करना होगा।
सवाल यह भी उठता है कि यदि निर्वाचन सदन के भीतर नियमों को ताक पर रखकर यह सब हुआ, तो मुख्य चुनाव आयुक्त पर जवाबदेही कैसे तय होगी? बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि दिसंबर 2023 में पारित नए कानून की धारा 18 के तहत चुनाव आयुक्तों को एक अभूतपूर्व कानूनी ढाल (Immunity) थमा दी गई है, जिसके अनुसार उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए आधिकारिक फैसलों पर भविष्य में कोई दीवानी या आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता—जबकि ऐसी असीम वैधानिक सुरक्षा देश के पूर्व प्रधानमंत्री या पूर्व राष्ट्रपति तक को हासिल नहीं है।
जब कार्यपालिका पहले खुद अपना पसंदीदा अंपायर चुने और फिर उसके फैसलों पर किसी भी अदालत में मुकदमा न चलने का रक्षा-कवच तैयार कर दे, तो व्यवस्था पर उठने वाले सवाल स्वाभाविक हैं। लेकिन सत्ता और नौकरशाही को यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी संकीर्ण कानून भारत के संविधान, जन-आक्रोश और सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्च शक्तियों से बड़ा नहीं हो सकता।
यदि लोकतंत्र की धुरी के साथ खिलवाड़ करने वाले अधिकारियों को वैधानिक ढाल के पीछे छिपाने की कोशिश की गई, तो यह न केवल स्वतंत्र भारत के चुनावी इतिहास का सबसे काला अध्याय होगा, बल्कि न्याय और जवाबदेही के बुनियादी सिद्धांत पर भी हमेशा के लिए एक अमिट कलंक बन जाएगा।
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