इंडिया स्पीक डेली ब्यूरो, नई दिल्ली। भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर एक अभूतपूर्व संवैधानिक और प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया खोजी रिपोर्ट ने निर्वाचन सदन के भीतर चल रहे गहरे आंतरिक टकराव, एकतरफा फैसलों और नियमों की अनदेखी का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर साथी चुनाव आयुक्तों ने लगातार गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं, नियमों को ताक पर रखकर सॉफ्टवेयर का केंद्रीकरण किया गया और युवा मतदाताओं के पंजीकरण तक को रोके रखा गया। अब यह पूरा मामला बॉम्बे हाईकोर्ट की चौखट तक पहुँच चुका है।
10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्तियां, कैबिनेट सचिव तक पहुंची बात
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की पड़ताल के मुताबिक, नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर साथी चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने फाइलों पर 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं। स्थिति इतनी असामान्य थी कि एक ही दिन में चार-चार आपत्तियां दर्ज की गईं।
मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े ‘फॉर्म-6’ में वैधानिक प्रक्रियाओं के बिना बदलाव थोपे गए, जिसे चुनाव आयुक्त संधू ने आधिकारिक नोट में साफ़ तौर पर ‘अनाधिकृत और अवैध’ (Unauthorised and Illegal) करार दिया। इसके साथ ही, राज्य स्तर पर संचालित होने वाले मतदाता सूची के डेटाबेस और सॉफ्टवेयर के दिल्ली में हो रहे ‘क्रमिक केंद्रीकरण’ पर कड़ा ऐतराज जताते हुए दोनों आयुक्तों ने देश के कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र भेजकर सीधे हस्तक्षेप की मांग की थी।
‘फुल कमीशन‘ की मंजूरी के बिना जारी हुए आदेश
खुलासे से यह भी सामने आया है कि अप्रैल 2026 में दोनों चुनाव आयुक्तों ने आंतरिक नोट लिखकर कड़ा विरोध दर्ज कराया था कि निर्वाचन आयोग के नाम पर कई अहम नीतिगत परिपत्र और आदेश ‘पूरे आयोग’ (Full Commission) की वैधानिक सहमति के बिना ही एकतरफा जारी किए जा रहे हैं। संविधान के तहत बहु-सदस्यीय आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को दरकिनार किए जाने से आयोग के भीतर प्रशासनिक अधिकारों का खुला टकराव पैदा हो गया।
गोवा राज्य निर्वाचन आयोग की अनदेखी और Gen-Z वोटरों पर अड़ंगा
अखबार के खुलासे में यह तथ्य भी सामने आया है कि गोवा राज्य निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के अनुपालन को लेकर महज 7 दिनों के भीतर केंद्रीय निर्वाचन आयोग को 8 बार ईमेल भेजे, लेकिन निर्वाचन सदन की ओर से उन पर कोई जवाब तक नहीं दिया गया।
इसके अलावा, रिपोर्टों में यह सनसनीखेज दावा भी सामने आया है कि जनवरी 2024 से नई पीढ़ी के पहली बार बने युवा मतदाताओं (‘Gen-Z’ voters) के नाम जोड़ने की प्रक्रिया पर मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा अड़ंगा लगाया गया था। साथी दोनों चुनाव आयुक्त इस रोक के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने इस पर अपनी असहमति जताई थी।
बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका: CEC के 14 आदेशों को रद्द करने की मांग
इस खुलासे के सामने आते ही मामला अदालत की चौखट पर पहुँच गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद पारित किए गए सभी 14 प्रशासनिक आदेशों को रद्द (Quash) करने की गुहार लगाई गई है।
याचिकाकर्ताओं ने महाराष्ट्र में चल रही मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) की प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे तुरंत रोकने की मांग की है। साथ ही अदालत से अपील की गई है कि जब तक हटाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा बहाल कर पारदर्शी मतदाता सूची तैयार न हो, तब तक महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों को टाला जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक समिति का गठन किया जाए। याचिका में दलील दी गई है कि एकतरफा आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 (वयस्क मताधिकार) का खुला उल्लंघन हैं।
सुप्रीम कोर्ट में जजों की राय बंटी, मामला संविधान पीठ को रेफर
यह आंतरिक घमासान ऐसे समय में फूटा है जब मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की पीठ पहले ही विभाजित हो चुकी है। इस कानून के तहत चयन समिति से देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर प्रधानमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री को रखा गया था।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की राय बंटने के बाद यह मामला 5 जजों की संविधान पीठ के पास भेजा गया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि अगर क्रिकेट मैच में एक टीम का कप्तान ही अंपायर चुनेगा, तो अंपायर के फैसलों पर हमेशा संदेह बना रहेगा।
2023 कानून की धारा 18: आयुक्तों को कानूनी मुकदमों से ‘सुरक्षा कवच‘
इस पूरे घटनाक्रम के बीच 2023 के अधिनियम की धारा 18 (Protection against legal proceedings) भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। इस धारा के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके कार्यकाल के दौरान आधिकारिक कर्तव्यों के तहत लिए गए फैसलों के खिलाफ किसी भी अदालत में दीवानी या आपराधिक मुकदमे से कानूनी छूट (Immunity) दी गई है। राजनीतिक और कानूनी विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि जब पूर्व राष्ट्रपति या पूर्व प्रधानमंत्री तक को इस तरह की छूट हासिल नहीं है, तो चुनावी फैसलों को अदालती जवाबदेही से बाहर रखने का यह प्रावधान संस्थागत पारदर्शिता को प्रभावित करता है।
फिलहाल विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और संसद में महाभियोग की मांग तेज कर दी है, जबकि निर्वाचन आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि आयोग में आंतरिक विचार-विमर्श एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
खबर के अंत में जोड़ने के लिए एक तीखी और विश्लेषणात्मक निष्कर्ष टिप्पणी:
निष्कर्ष: लोकतंत्र के अंपायर का आत्मसमर्पण
निर्वाचन सदन की बंद दीवारों से रिसकर अदालतों की चौखट तक पहुँची यह कलह महज दो नौकरशाहों के अहं का टकराव नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की रीढ़ पर हुआ संस्थागत हमला है। जब चुनाव आयोग के अपने ही आयुक्त के फैसलों को ‘अवैध’ लिखने लगें, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को रद्दी की टोकरी में डालकर युवा मतदाताओं के पंजीकरण पर कुंडली मार ली जाए, और फिर उसी मनमानी को चुनौती देने के लिए नागरिकों को बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़े—तो समझ लेना चाहिए कि ‘अंपायर’ अर्थात् चुनाव आयोग अब निष्पक्ष नहीं रहा, बल्कि उसने अपनी जिम्मेदारी और निष्पक्षता को सत्ता के चरणों में गिरवी रख दी है।
2023 के विवादित कानून के जरिए मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बेदखल करना और फिर धारा 18 के तहत आयुक्तों को अभूतपूर्व कानूनी ढाल (इम्यूनिटी) पहनाना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संवैधानिक चक्रव्यूह था। मकसद साफ था—मनचाहा अंपायर चुनो, मनमाने नियम थोपो और फिर किसी भी अदालती जवाबदेही से बेखौफ रहो। लेकिन व्यवस्था चलाने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतांत्रिक वैधता किसी सरकारी गजट या कानूनी ढाल से नहीं, जन-विश्वास से हासिल होती है।
यदि देश के मतदाताओं का भरोसा टूट गया तो फिर संसद, सरकार और जनादेश—सब कुछ केवल एक छलावा बनकर रह जाएगा। अब गेंद सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ और हाईकोर्ट के पाले में है; देखना यह है कि न्यायपालिका इस ‘संदिग्ध अंपायर’ को नियम पुस्तिका दिखाती है या भारतीय लोकतंत्र को व्यवस्थागत साठगांठ की भेंट चढ़ने के लिए वह भी सत्ता के साथ समझौते करती है?
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