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Home » धर्म » उपदेश एवं उपदेशक » महेश भट्ट, विनोद खन्ना और ओशो!
उपदेश एवं उपदेशक

महेश भट्ट, विनोद खन्ना और ओशो!

ISD News Network
By ISD News Network 9 Min Read
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“ओशो तुम्हें बर्बाद कर देंगे। नहीं तो तुम खुद आश्रम आओ उनकी माला लौटाने। वो बहुत नाराज़ हैं तुमसे।” विनोद खन्ना ने टेलीफोन पर महेश भट्ट से कहा। ये तब की बात है जब महेश भट्ट का मन ओशो से ऊब गया था। और ओशो का आश्रम छोड़कर वो वापस मुंबई लौट आए थे। महेश भट्ट ने ओशो की माला के साथ भी एक बुरी सी हरकत कर दी थी। चलिए एकदम शुरुआत से ये कहानी जानते हैं।

ये कहानी साल 1975 के किसी महीने की है। वो अमिताभ बच्चन का दौर था। मगर उनके स्टाडम को टक्कर देने वाले भी चंद एक्टर्स मौजूद थे फ़िल्म इंडस्ट्री में। विनोद खन्ना उनमें से एक थे। खलनायक के तौर पर फ़िल्म करियर स्टार्ट करने वाले विनोद खन्ना अपनी खूबसूरत काया के चलते हीरो भी बन गए। मगर जब अचानक ही विनोद खन्ना साहब ने फ़िल्में छोड़कर संन्यास लेने की घोषणा की तो हर कोई दंग रह गया। विनोद खन्ना ओशो के शिष्य बन गए थे। काफ़ी वक्त तक तो विनोद खन्ना ओशो के पूना आश्रम में ही रहे। और फिर जब ओशो अमेरिका शिफ़्ट हो गए तो विनोद खन्ना भी उनके पीछे-पीछे अमेरिका पहुंच गए।

ओशो के साथ विनोद खन्ना बहुत मामूली सा जीवन बिता रहे थे। साफ़-सफ़ाई का काम करते और ध्यान लगाते। ओशो ने ने विनोद खन्ना का नाम भी स्वामी विनोद भारती कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि विनोद खन्ना अपना सारा जीवन ओशो को समर्पित कर देंगे। मगर पांच साल बाद ही विनोद खन्ना की आध्यात्मिकता खत्म हो गई। और वो भारत वापस लौट आए। फिर से फ़िल्मों में काम करने लगे। विनोद खन्ना फ़िल्म जगत की अकेली हस्ती नहीं थी जो ओशो को गुरू मानने लगी थी। और भी कई फिल्मकार ओशो से प्रभावित थे। जैसे नामी डायरेक्टर विजय आनंद व महेश भट्ट। महेश भट्ट ने ही विनोद खन्ना को ओशो से मिलवाया था।

महेश भट्ट भी ओशो के मोहपाश में उसी तरह बंधे थे जैसे विनोद खन्ना बंधे थे। मगर बाद में ओशो के प्रति जो आकर्षण महेश भट्ट में था, वो खत्म हो गया। जबकी उस वक्त तक विनोद खन्ना खुद को पूरी तरह ओशो को समर्पित कर चुके थे। विनोद खन्ना ने अपना परिवार भी छोड़ दिया था। एक बार महेश भट्ट अरबाज़ खान के चैट शो पर आए थे। तब अरबाज़ से बात करते हुए महेश भट्ट ने खुलासा किया था कि उन्हें ओशो ने एक धमकी भरा मैसेज भेजा था। महेश भट्ट की बात सुनकर सिर्फ़ अरबाज़ खान ही नहीं, अन्य लोग भी हैरान रह गए थे। और ओशो के बहुत से अनुयायियों ने तो महेश भट्ट की उस बात को झूठ भी कहा था।

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स्वामी रजनीश उर्फ़ ओशो का पूरा नाम था चंद्र मोहन जैन। दुनिया की एक अच्छी-खासी आबादी ओशो को आधूनिक ज़माने का दार्शनिक मानती है। अरबाज़ खान के चैट शो में महेश भट्ट ने ओशो संग अपने रिश्ते पर काफ़ी बात की। महेश भट्ट खुलकर बोले थे। महेश भट्ट के शब्दों में,”मैं एक सामान्य आदमी था। मैंने ‘विश्वासघात’ और ‘मंज़िलें और भी हैं’ फ़िल्में बनाई थी। मगर ये दोनों फ़िल्में फ्लॉप हो गई। इसलिए मैं अध्यात्म की तरफ़ बढ़ गया। मैं ओशो के पास गया, जो पुणे में रहते थे और बहुत करिश्माई थे। मैंने अपने आप को ओशो के प्रति समर्पित कर दिया। भगवा कपड़े पहनना और दिन में पांच बार ध्यान लगाना। मैं भी ये सब करने लगा था।”

महेश भट्ट ने आगे कहा,”मैं ही ओशो के पास विनोद खन्ना को ले गया था। बाद में मैंने तो ओशो से अपना कनैक्शन तोड़ लिया था। मगर विनोद खन्ना का सफ़र जारी रहा। मैंने ओशो की माला तोड़कर कमोड में फेंक दी। मैंने सोचा कि मुझमें अभी भी जलन की भावना है। मगर मैं पवित्र शब्दों का उच्चारण कर रहा हूं। अपने भीतर मुझे एक पाखंडी जैसा महसूस होता था। मैं खुद से और दुनिया से झूठ नहीं बोल सकता था।” महेश भट्ट ने आगे बताया कि जब ओशो को माला तोड़ने वाली उनकी बात पता चली तो ओशो को बुरा लगा। वो नाराज़ हो गए। ओशो को वो सब महेश भट्ट का धोखा लगा।

ओशो ने विनोद खन्ना के ज़रिए महेश भट्ट तक एक मैसेज भिजवाया। महेश भट्ट के शभ्दों में,”विनोद ने मुझे फिल्मिस्तान में फोन किया। विनोद ने कहा कि भगवान बहुत गुस्से में हैं। तुमने उनकी माला तोड़कर कमोड में फेंक दी? मैंने कहा हां, मैंने ऐसा ही किया है। ये सब बेकार है। और मैं एक बहुत बड़ा बेवकूफ़ हूं। विनोद ने मुझसे कहा कि भगवान ने कहा है महेश से कहो कि वो खुद आकर माला लौटाए। नहीं तो… भगवान तुम्हें बर्बाद कर देंगे। ये बर्बाद करने वाली बात विनोद ने धीमी आवाज़ में कही थी।” महेश बट्ट की ये बात सुनकर अरबाज़ खान को भी बहुत हैरत हुई थी।

ओशो ने भी अपनी किताब में महेश भट्ट संग हुई इस घटना का ज़िक्र किया था। ओशो ने ‘द 99 नेम ऑफ़ नथिंगनेस’ नाम से एक किताब लिखी थी जिसमें उन्होंने कई बातें बताई थी अपने जीवन से जुड़ी। इस किताब में महेश भट्ट के बारे में ओश ने लिखा था कि वो जानते थे कि ऐसा कुछ होने वाला है। उन्हें पता था। क्योंकि सिर्फ़ दो ही ऑप्शन्स थे महेश भट्ट की ज़िंदगी में। या तो उसकी प्रेमिका संन्यासी बनने वाली थी। या वो खुद गैर-सन्यासी होने वाला था। और वो हार गया। गैर-सन्यासी बन गया। ओशो ने महेश भट्ट वाली घटना को ट्रैजेडी बताया था।

ओशो के शब्दों में पढ़ें तो,”मैं इसे एक ट्रैजेडी कहता हूं। क्योंकि एक बार जब पावर खत्म हो जाती है तो उस लड़की को उस आदमी में कोई दिलचस्पी नहीं रहेगी। यही दुविधा है। उसे पावर में दिलचस्पी है। फिर वही पावर डराने लगती है। अगर आदमी इतना पावरफुल रहता है तो वो उस पर निर्भर रहेगी। वो कभी पूरी नहीं होगी। जल्द ही वो औरतों वाली चालें चलना शुरू कर देगी। क्योंकि वो उससे मुहब्बत करता है तो वो झुकता रहेगा। आदमी झुकता रहता है। और एक बार जब वो झुकना शुरू कर देता है तो उसके भीतर का शेर गायब हो जाता है। एक चूहा पैदा हो जाता है। और किसी औरत को एक चूहे में दिलचस्पी नहीं होती। ज़रा भी नहीं। एक बार जब औरत किसी आदमी का चूहा बना देती है तो सब खत्म हो जाता है। और जैसा कि मैं देख सकता हूं। वही हुआ भी है।”

खैर, समय गुज़रा और विनोद खन्ना का ओशो मोह भी खत्म हुआ। वो जिस जोश में ओशो के पीछे अमेरिका गए थे, उतने ही निराश होकर भारत वापस लौट आए। वो महेश भट्ट से मिलने आए भी। दोनों ने साथ बैठकर खूब शराब पी। तब तक पी जब तक कि दोनों पूरी तरह से नशे में नहीं डूब गए। लेकिन विनोद खन्ना ने ओशो के बारे में ज़्यादा बात नहीं की। महेश भट्ट के मुताबिक, उस शाम विनोद खन्ना बहुत कम बोले। अधिकतर वो चुपचाप ही रहे। उनके अंदर जो एक आग दिखती थी कभी, वो गायब हो चुकी थी। विनोद ने फिर से फ़िल्मी दुनिया में वापसी की। मगर पहले जैसी ऊंचाईयां उन्हें दोबारा नहीं मिली। फिर वो राजनीति में चले गए। और महेश भट्ट अपनी कहानियों के साथ ही रह गए। #osho #MaheshBhatt #VinodKhanna

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