By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
India Speak DailyIndia Speak Daily
  • समाचार
    • देश
    • विदेश
    • मुद्दा
    • न्यायपालिका
    • अपराध
    • भ्रष्टाचार
    • जन समस्या
    • Events and Activities
    • Health Report
    • English content
  • मीडिया
    • खोजी आलेख
    • मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म
    • डिजिटल मीडिया
    • फिफ्थ कॉलम
    • फेक न्यूज भंडाफोड़
    • कानाफूसी
  • वैचारिकी
    • संघवाद
    • अस्मितावाद
    • जातिवाद
    • पंचमक्कारवाद
    • व्यक्तिवाद
    • समाजशास्त्र
    • राजनीतिक व्यक्तित्व
    • संपादकीय
  • इतिहास
    • स्वर्णिम भारत
    • गुलाम भारत
    • आजाद भारत
    • विश्व इतिहास
    • अनोखा इतिहास
  • धर्म
    • सनातन हिंदू धर्म
    • दर्शन और संप्रदाय
    • वास्तु एवं ज्योतिष
    • अब्राहमिक मजहब
    • उपदेश एवं उपदेशक
  • ब्लॉग
    • मूवी ज़ोन
    • भाषा और साहित्य
    • स्वयंसेवी प्रयास
    • कुछ नया
    • पर्यटन
    • नारी जगत
    • पुस्तकें
    • प्रेरक व्यक्तित्व
    • AI | Tech & Careers
    • SDEO’s Story
    • Sponsored Post
  • Members Only
  • ISD Daily Live
  • Video Library
  • JOIN US / LOGIN
Reading: व्यासपीठ पर विदूषक: पहले भगवान का उपहास, फिर ‘व्याजस्तुति’ और ‘सूरदास’ की आड़ में बौद्धिक धूर्तता!
Share
Notification
Latest News
संपादकीय: ट्रंप-नेतन्याहू पर जनता ने डाली राजनीतिक नकेल! भारत में ‘दरबारी भांडों’ ने ‘मोदी फ़ैक्टर’ का पाखंड उछाला!
संपादकीय
व्यासपीठ पर विदूषक: पहले भगवान का उपहास, फिर ‘व्याजस्तुति’ और ‘सूरदास’ की आड़ में बौद्धिक धूर्तता!
SDEO's Story सनातन हिंदू धर्म
अंगद का पैर सत्ता के दंभ पर नही अपितु सत्य,धर्म के आधार पर स्थिर था- शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी
Events and Activities
हिटलर और मुसोलिनी जैसा
भाषा और साहित्य
क्या मजाक है? संघ सिंडिकेट अब करेगा सनातनी शास्त्रों का उद्धार?
SDEO's Story
Aa
Aa
India Speak DailyIndia Speak Daily
  • ISD Daily Live
  • Video Library
  • JOIN US / LOGIN
  • समाचार
    • देश
    • विदेश
    • मुद्दा
    • न्यायपालिका
    • अपराध
    • भ्रष्टाचार
    • जन समस्या
    • Events and Activities
    • Health Report
    • English content
  • मीडिया
    • खोजी आलेख
    • मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म
    • डिजिटल मीडिया
    • फिफ्थ कॉलम
    • फेक न्यूज भंडाफोड़
    • कानाफूसी
  • वैचारिकी
    • संघवाद
    • अस्मितावाद
    • जातिवाद
    • पंचमक्कारवाद
    • व्यक्तिवाद
    • समाजशास्त्र
    • राजनीतिक व्यक्तित्व
    • संपादकीय
  • इतिहास
    • स्वर्णिम भारत
    • गुलाम भारत
    • आजाद भारत
    • विश्व इतिहास
    • अनोखा इतिहास
  • धर्म
    • सनातन हिंदू धर्म
    • दर्शन और संप्रदाय
    • वास्तु एवं ज्योतिष
    • अब्राहमिक मजहब
    • उपदेश एवं उपदेशक
  • ब्लॉग
    • मूवी ज़ोन
    • भाषा और साहित्य
    • स्वयंसेवी प्रयास
    • कुछ नया
    • पर्यटन
    • नारी जगत
    • पुस्तकें
    • प्रेरक व्यक्तित्व
    • AI | Tech & Careers
    • SDEO’s Story
    • Sponsored Post
  • Members Only
  • ISD Daily Live
  • Video Library
  • JOIN US / LOGIN
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Website Design & Developed By: WebNet Creatives
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
Home » Blog » SDeo blog » व्यासपीठ पर विदूषक: पहले भगवान का उपहास, फिर ‘व्याजस्तुति’ और ‘सूरदास’ की आड़ में बौद्धिक धूर्तता!
SDEO's Storyसनातन हिंदू धर्म

व्यासपीठ पर विदूषक: पहले भगवान का उपहास, फिर ‘व्याजस्तुति’ और ‘सूरदास’ की आड़ में बौद्धिक धूर्तता!

Ssandeep Deo
By Ssandeep Deo 17 Min Read
Share
17 Min Read
SHARE

संदीप देव। अहंकार और अज्ञान जब मंच पर राजनीतिक संरक्षण की बैसाखियों के सहारे खड़े होते हैं, तो सबसे पहले व्यासपीठ की आध्यात्मिक शुचिता और उसकी शास्त्रीय मर्यादा का हनन होता है। बागेश्वर धाम के कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य विग्रहों, उनकी चेष्टाओं, नामों की बनावट और तीर्थों की तुलना करते हुए जो फूहड़ प्रलाप किया गया, उसने सनातन चेतना के मर्म पर आघात किया है।

विवाद के तूल पकड़ने पर पहले उन्होंने कैमरे के सामने आकर ‘हमसे तो कई बार चूक हो जाती है’ कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया। किंतु जब संत समाज, वैष्णव पीठों और प्रबुद्ध वर्ग का आक्रोश शांत नहीं हुआ, तो अब इनके बचाव में दो नए कुतर्क गढ़े जा रहे हैं—पहला, इसे काव्यशास्त्र का ‘व्याजस्तुति’ अलंकार बताकर ढंकने की चेष्टा; और दूसरा, स्वयं धीरेंद्र शास्त्री का यह नया दांव कि “गोपियों और सूरदास जी ने भी तो श्रीकृष्ण को छलिया, चोर और काला कहा था, मैंने भी उसी भाव में कहा!”

यह न केवल अपने अक्षम्य प्रमाद से बचने की धूर्तता है, बल्कि सनातन के भक्ति-रसशास्त्र, अलंकार-शास्त्र और अष्टछाप के महाकवियों की साधना का खुला उपहास है।

1. धीरेंद्र शास्त्री का प्रलाप: शब्दशः उद्धरण और छिछोरापन

More Read

क्या मजाक है? संघ सिंडिकेट अब करेगा सनातनी शास्त्रों का उद्धार?
धीरेंद्र शास्त्री! अपनी जुबान को लगाम दीजिए और शास्त्रों का पहले गहन अध्ययन कीजिए!
त्रेतायुग में सूफियाना कव्वाली? ‘आदिपुरुष’ के गुनहगार मुंतशिर ने विश्वास-रहमान को मारा थप्पड़!
पत्रकारिता निष्पक्षता की नहीं, वस्तुनिष्ठता की मांग करती है!

शिवपुरी (करैरा) की कथा में धीरेंद्र शास्त्री ने व्यासपीठ से जो कुछ कहा, वह किसी भी शास्त्रज्ञ के लिए स्तब्धकारी है:

“तुम अपने वाले ठाकुर जी की एक भी फोटो देख लो, कहीं बैठे हैं तो टेढ़े… वो खड़े भी होते हैं तो तीन जगह से टेढ़े—पांव के ऊपर पांव, कमर कहीं लचकाएं, बंसी बजाएं तो टेढ़े… हमाए वाले खड़े भी होते तो सीधे। हमाए वाले का नाम भी सीधा, चलना भी सीधा, दिखते भी सीधे… तुम्हारे वाले का नाम भी टेढ़ा, चलते भी टेढ़े, खड़े भी टेढ़े होते… वो ‘क’ में जो ‘ऋ’ की मात्रा नीचे लगी है न, वो भी ऐसे टेढ़ी मुड़ी है… हमाए वाले राम सीधे खड़े हैं, सीधे लिखे जाते हैं… हमारे वाले का धाम भी सीधा—अयोध्या, तुम्हारे वाले का वृंदावन… बंसी का बजाना तो खेल भी है, धनुष का चलाना खेल नहीं… बंसी तो हमारे यहां जे (ये) भी बजाता है, बजा भाई बजा (मंच के वादक की ओर इशारा करते हुए)… गायों को चराना तो खेल है, बंदरों को नचाना खेल नहीं।”

यह वक्तव्य भक्ति का कोई सहज उद्गार नहीं, बल्कि मंच पर सस्ती तालियां और ठहाके बटोरने के लिए की गई स्तरहीन लतीफेबाजी है।

2. ‘व्याजस्तुति‘ का फर्जी चोला: काव्यशास्त्र की खुली हत्या

धीरेंद्र शास्त्री के बचाव में रामभद्राचार्य के ही एक दूसरे शिष्य नित्यानंद मिश्रा उतरे हैं, जो स्वंय को संस्कृत का विद्वान कहते हैं। उन्होंने अपने गुरु भाई के अंध-समर्थन में इसे ‘व्याजस्तुति’ अलंकार कहकर बचाव करना चाहा है। यह उनकी बौद्धिक बेईमानी तो है ही, शास्त्रीय दृष्टि से भी पूर्णतः हास्यास्पद है। संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों ने व्याजस्तुति का जो लक्षण निर्धारित किया है, वह इनके दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए पर्याप्त है।

रामभद्राचार्य के शिष्य धीरेन्द्र शास्त्री का 'व्याजस्तुति' की आड़ में बचाव करने रामभद्राचार्य के दूसरे शिष्य नित्यानंद मिश्रा जी उतरे हैं।

१) सच तो यह है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान को 'व्याजस्तुति' अलंकार कहकर बचाव (डिफेंड) करना साहित्य शास्त्र और अलंकार शास्त्र के… https://t.co/kKj4Yr4W1t

— संदीप देव | SSandeep Deo (@sdeo76) November 4, 2026

* आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश):व्याजस्तुतिर्मुखे निन्दा स्तुतिर्वा रूढिरन्यथा। अर्थात—जहाँ देखने में प्रत्यक्ष रूप से निंदा प्रतीत हो, किंतु उसका वास्तविक फलितार्थ और गूढ़ अर्थ परम स्तुति (प्रशंसा) में समाप्त होता हो; अथवा मुख पर स्तुति दिखे और मर्म निंदा में हो।

* आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण):उक्तिर्व्याजस्तुतिः स्यात् यदि स्तुतेर्निन्दा निन्दाया वा स्तुतिर्भवेत्।

शास्त्रीय उदाहरण:

“यमुना तुम अविवेकनी, कौन तिहारो ढंग।पातकियन पति लोक तैं, राखति निज जल संग॥“ यहाँ प्रत्यक्ष में यमुना जी को ‘अविवेकनी’ (मूर्ख) कहा गया है कि तुम पापियों को भी अपने जल का आश्रय देती हो, किंतु गूढ़ अर्थ यह है कि यमुना इतनी परम कृपालु और पावन हैं कि घोर पापी का भी उद्धार कर देती हैं।

एक दूसरा उदाहरण देखते हैं:

“काशी तुम सम कुटिल नहिं, सब जग दियो बसाय।जो नर मरै तुव गोद में, सो मुकती पद पाय॥“ यहाँ काशी को ‘कुटिल‘ कहा गया, लेकिन गूढ़ अर्थ काशी की मोक्षदायिनी महिमा का बखान करना है।

धीरेंद्र शास्त्री के बयान में व्याजस्तुति क्यों असंभव है?

(क). अंतिम फलितार्थ का अभाव: शास्त्री के पूरे वक्तव्य में कहीं भी अंत में श्रीकृष्ण के किसी अलौकिक ऐश्वर्य, परब्रह्म स्वरूप या असीम महिमा की स्तुति नहीं निकलती। वहाँ केवल शारीरिक लचक, मात्राओं की वक्रता और कार्यों के खोखलेपन का प्रहसन है।

(ख). तुलनात्मक हीनता (Comparative Belittling): व्याजस्तुति में कभी दो पक्षों को आमने-सामने खड़ा करके एक को नीचा और दूसरे को ऊंचा नहीं दिखाया जाता। यहाँ “हमाए वाले सीधे और तुम्हारे वाले टेढ़े” कहकर अवतार-भेद और द्वेष का प्रदर्शन किया गया है।

परंतु @Sanjay_Dixit जी भक्ति-रसशास्त्र, विशेषकर श्रील रूप गोस्वामी कृत 'उज्ज्वल नीलमणि' और 'भक्ति-रसामृत-सिंधु' में प्रेम के विभिन्न सोपानों—स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग और महाभाव—का सूक्ष्म विवेचन है, उस आधार पर धीरेन्द्र शास्त्री का वचन न उलाहना है, न अनुराग। वहां सिर्फ… https://t.co/KA6qw2VNIH

— संदीप देव | SSandeep Deo (@sdeo76) November 5, 2026

(ग). स्वयं वक्ता की स्वीकारोक्ति: यदि कुछ पल के लिए नित्यानंद मिश्रा के कुतर्क को मान भी लिया जाए कि यह काव्यात्मक व्याजस्तुति थी, तो विरोध होते ही शास्त्री ने वीडियो जारी कर यह क्यों कहा कि “हमसे चूक हो जाती है”? जब वक्ता स्वयं इसे अपनी भूल मान रहा है, तो समर्थक किस मुंह से इसे अलंकार का जामा पहना रहे हैं?

3. ‘उलाहना‘ बनाम ‘सड़कछाप निंदा‘: सूरदास और गोपियों की आड़

अपने नए बयान में सूरदास जी और ब्रज की गोपियों का नाम घसीटना धीरेंद्र शास्त्री के बौद्धिक दिवालियापन का सबसे घिनौना प्रमाण है। भक्ति-रसशास्त्र (विशेषकर श्रील रूप गोस्वामी कृत भक्ति–रसामृत–सिंधु और उज्ज्वलनीलमणि) में भगवान और भक्त के संबंध के कई सोपान बताए गए हैं।

भाजपा-संघ के बाद अब कथावाचकों का झुंड उतर आया है, गलत को सही ठहराने! आखिर एक की दुकान गिरेगी, तो भविष्य में दूसरे की दुकान पर भी ताला लग सकता है! यही भाव इनको जोड़े हुए है। ईश्वर तत्व इनके अंदर नहीं है, व्यापार तत्व इनके अंदर है!

ये पुराणों में बताए अवतार-भेद के पाप को करने के… https://t.co/tEMU9nmj9J

— संदीप देव | SSandeep Deo (@sdeo76) November 5, 2026

1 . गोपियों का ‘उलाहना’ (प्रणय-मान और महाभाव): गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण को ‘चोर’, ‘छलिया’ या ‘काला’ कहना किसी तीसरे के सामने उनका उपहास उड़ाना नहीं था। वह ‘मान’ और ‘अहैतुकी प्रीति’ की वह पराकाष्ठा है जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई पर्दा या मर्यादा की दूरी नहीं बचती। जब गोपियाँ ‘माखनचोर’ या ‘चित्तचोर’ कहती हैं, तो उसमें अपने अहंता और ममता का संपूर्ण समर्पण होता है।

2 . सूरदास जी का वात्सल्य और सख्य अधिकार: सूरदास जी जब श्रीकृष्ण को ‘चोर’ या ‘सखा’ रूप में उलाहना देते हैं (“मैया मैं नहिं माखन खायो” या “खेलन में को काको गुसाईं”), तो वह वात्सल्य और सख्य भाव की तन्मयता से निकलता है। सूरदास जी ने जिस कृष्ण को ‘माखनचोर’ कहा, उन्हीं को ‘अविगत गति कछु कहति न आवै’ कहकर निर्गुण-सगुण से परे साक्षात परब्रह्म भी स्वीकारा।

3 . उलाहना सम्मुख होता है, चौराहे पर उपहास नहीं: प्रेम-शास्त्र का शाश्वत नियम है कि उलाहना सदैव आराध्य के सम्मुख, एकांत प्रेम-संवाद में दिया जाता है। धीरेंद्र शास्त्री ने श्रीकृष्ण के सम्मुख बैठकर अश्रुजल बहाते हुए प्रेम-संवाद नहीं किया। उन्होंने हज़ारों की भीड़, लाउडस्पीकरों और कैमरों के सामने, मंच के एक वादक की ओर हाथ चमकाते हुए विदूषकों की तरह भगवान के त्रिभंग विग्रह और मुरलीवादन का उपहास उड़ाया है। यदि कोई व्यक्ति एकांत में अपने प्रियतम से रूठकर कुछ कहे तो वह प्रेम है; किंतु वही व्यक्ति यदि चौराहे पर माइक लेकर अपने प्रियतम के अंगों और चाल-ढाल का मज़ाक उड़ाए, तो उसे ‘उलाहना’ नहीं, ‘सड़कछाप लफ्फाजी’ कहा जाता है।

अनिरुद्धाचार्य जी महाराज उलाहना और निंदा में अंतर होता है, सख्य भाव और अवतार-भेद में अंतर होता है, प्रेम और उपहास में अंतर होता है। महाराज जी शास्त्रों और साहित्य का अवलोकन किए बिना, आप लोग व्यासपीठ पर बैठकर जो मन में आ रहा है, बोलते चले जा रहे हैं!

आपने जो इस वीडियो में पद गाया… https://t.co/1Nc0Zx8LyT

— संदीप देव | SSandeep Deo (@sdeo76) November 5, 2026

4 . “हमाए वाले” बनाम “तुम्हारे वाले” का विभाजन: गोपियों या सूरदास जी ने कभी राम और कृष्ण में विभाजन करके नहीं कहा कि “हमारे राम सीधे हैं और तुम्हारे कृष्ण टेढ़े हैं।” उन्होंने कभी अयोध्या को सीधा और वृंदावन को टेढ़ा नहीं बताया। जब आप दो अवतारों के बीच खाई खोदकर एक का उपहास उड़ाते हैं, तो वह भक्ति का सख्य भाव नहीं, बल्कि घोर नामापराध और संप्रदाय-विद्वेष है।

4. शास्त्रीय प्रमाण: गीता और पुराण 

सनातन धर्म का आधारभूत सिद्धांत है कि राम और कृष्ण एक ही सच्चिदानंद घन परब्रह्म के दो नित्य लीला-विग्रह हैं:

* श्रीमद्भगवद्गीता (१०.३१): गीता के दसवें अध्याय में स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥ अर्थात: “पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ और शस्त्रधारियों में मैं ही श्रीराम हूँ।” जब स्वयं जगद्गुरु श्रीकृष्ण श्रीराम को अपना ही स्वरूप बता रहे हैं, तब यह अनपढ़ कथावाचक किस धृष्टता से राम को “हमाए वाले” और कृष्ण को “तुम्हारे वाले” में बांट रहा है?

* पद्म पुराण (स्वर्गखंड):शिवस्य श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादि सकलं।धिया भिन्नं पश्येत्स खलु हरिनामाहितकरः॥ पद्म पुराण के अनुसार भगवान के नामों, रूपों और अवतारों में भेदबुद्धि रखना दस नामापराधों में से एक घोर महापाप है।

* ‘त्रिभंग’ का मर्म: ब्रह्मसंहिता (५.३१) में गोविंद को साक्षात ‘त्रिभङ्गललितम्’ कहा गया है। यह त्रिभंग मुद्रा कामदेव के दर्प को चूर करने वाली और जीवात्मा के त्रितापों (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) का हरण करने वाली पराभक्ति की मुद्रा है। इसे “कमर लचकाना” या ‘टेढ़ा’ कहना वैष्णव रस-शास्त्र का घोर अनादर है।

* ‘ऋ’कार की दिव्यता:‘कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः’ के अनुसार ‘कृष्ण’ नाम सत्ता और परमानंद का मिलन है। संस्कृत का ‘ऋ’ स्वर पूर्णता का प्रतीक है। नाम की बनावट और मात्राओं को “टेढ़ा-मुड़ा” कहना देववाणी संस्कृत और मंत्र-शास्त्र के प्रति घोर अज्ञानता का प्रमाण है।

सर क्षमा कीजिए, मैं धर्मशास्त्र, समाजशास्त्र और साहित्य का विद्यार्थी रहा हूं। हिंदी साहित्य में पूरा मध्यकालीन भक्ति आंदोलन पढ़ा है मैंने। भक्ति परंपरा में निंदा-स्तुति में कभी अवतारों की उपहासात्मक तुलना नहीं होती। अपने प्रिय भगवान को भक्त केवल उलाहना देता है। उनकी उलाहना में… https://t.co/tgngrTJg9R

— संदीप देव | SSandeep Deo (@sdeo76) November 4, 2026

5. अयोध्या, वृंदावन, बंसी और धनुष: धाम और प्रतीकों का अनादर

* अयोध्या और वृंदावन: स्कंद पुराण की सप्तपुरियों (‘अयोध्या मथुरा माया…’) में अयोध्या और मथुरा-वृंदावन दोनों समान रूप से मोक्षदायिनी हैं। भागवत के अनुसार वृंदावन वह भूमि है जहाँ भक्ति ‘नवयौवना’ स्वरूप को प्राप्त हुई। अयोध्या धर्म और मर्यादा का मेरुदंड है, तो वृंदावन निष्काम प्रेम का हृदय। इनमें ‘सीधे-टेढ़े’ का भेद करना धाम-अपराध है।

* बंसी बनाम धनुष: भगवान राम का ‘कोदंड’ (धनुष) अधर्म के विनाश और न्याय की स्थापना का प्रतीक है, तो भगवान कृष्ण का ‘वेणुनाद’ साक्षात प्रणव (ॐकार) की अनाहत ध्वनि है जो जड़-चेतन को समाधिस्थ कर देती है।

* गाय बनाम वानर: गाय वेदों की ‘सर्वदेवमयी’ गो-महिमा (गावो विश्वस्य मातरः) का विग्रह है, जिसे कृष्ण ने नंगे पांव चलकर पूजा। वहीं वानर सेना भगवान श्रीराम की शरणागत-वत्सलता, आत्म-निवेदन और अहैतुकी दास्य-भक्ति की साक्षात प्रतीक है। इसे ‘खेल’ और ‘बंदर नचाना’ कहकर खारिज करना वेदों और रामायण की आत्मा पर सीधा प्रहार है।

6. “जस गुरु तस चेला“ और ‘मदारी सत्ता‘ की उपज

धीरेंद्र शास्त्री का यह आचरण कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह उसी संघ-भाजपा की ‘मदारी सत्ता’ की उपज है, जिसने सनातन धर्म के गहरे वेदांत, शास्त्रीय मर्यादा और शंकराचार्यों की परंपरा को दरकिनार कर ऐसे अनपढ़ लाउडस्पीकरों को समाज के सिर पर बैठा दिया है।

इनके गुरु रामभद्राचार्य स्वयं वर्षों से व्यासपीठों से आदि शंकराचार्य की पीठों, अन्य वैष्णव संप्रदायों और रामचरितमानस, हनुमान चालीसा के मूल पाठ पर मनमानी टिप्पणियां करते रहे हैं। जब गुरु ही दंभ में परंपराओं को लांघता रहा हो, तो चेला भगवान के अक्षरों और कमर की बनावट का उपहास उड़ाए तो क्या अचरज!

धीरेन्द्र शास्त्री के अनर्गल प्रलाप का सबसे वीभत्स रूप प्रयागराज महाकुंभ (जनवरी 2025) में देखने को मिला था। जब प्रशासनिक कुप्रबंधन, वीआईपी कल्चर और भारी भगदड़ के चलते 30 से अधिक निर्दोष श्रद्धालुओं की कुचलकर अकाल मृत्यु हो गई, तो योगी सरकार की नाकामी को छिपाने के लिए धीरेंद्र शास्त्री ने कैमरे पर अत्यंत बेशर्मी से कहा था:

​“इस देश में प्रतिदिन लोग मर रहे हैं और करोड़ों लोग मर रहे हैं। कुछ दवा के बिना मर रहे हैं, कुछ स्वास्थ्य व्यवस्था के बिना मर रहे हैं… ये महाप्रयाग है, मृत्यु सबकी आनी है, एक दिन मरना तो सबको है। लेकिन जो गंगा के किनारे मरेगा उसे मोक्ष मिलेगा। यहाँ मरा नहीं है कोई, हाँ असमय चले गए तो दुख है, लेकिन जाना तो सबको है। कोई पहले चला गया, कोई बाद में जाएगा… यहाँ जो मरे हैं उनकी मृत्यु नहीं हुई है, उनको मोक्ष मिला है।”

प्रशासनिक लापरवाही से तड़प-तड़प कर मरे निर्दोष गरीबों की लाशों पर खड़े होकर सत्ता को बचाने के लिए उसे ‘मोक्ष’ का नाम देना अमानवीयता और चाटुकारिता का निकृष्टतम स्तर था। इस पर ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने करारा तमाचा जड़ते हुए कहा था कि “यदि गंगा किनारे कुचलकर मरना ही मोक्ष है, तो धीरेंद्र शास्त्री तैयार हों तो उन्हें भी धक्का देकर मोक्ष दिला दिया जाए।” इस पर जब देश भर में थू-थू हुई, तो शास्त्री ने बगलें झांकते हुए सफाई दी थी।

निष्कर्ष

व्यासपीठ सनातन धर्म की आत्मा है, यह किसी राजनीतिक दल की चुनावी रैली या स्टैंड-अप कॉमेडी का मंच नहीं है। धीरेंद्र शास्त्री का यह अक्षम्य कृत्य न तो ‘व्याजस्तुति’ के झूठे तर्कों से ढंका जा सकता है और न ही सूरदास व गोपियों की पवित्र भक्ति की आड़ लेकर इसे जायज ठहराया जा सकता है।

गोपियों के उलाहने में अहंकार का संपूर्ण विसर्जन था, जबकि धीरेंद्र शास्त्री के प्रलाप में मंच का दंभ, अज्ञान और सस्ती लोकप्रियता की भूख टपक रही है। पहले ‘चूक’ का रोना रोना, फिर अलंकार का फर्जी मुखौटा पहनना और अब सूरदास व गोपियों जी का नाम घसीटना—सनातन समाज इस पाखंड को भली-भांति समझ चुका है। यदि लेशमात्र भी लज्जा शेष है, तो अपनी बेलगाम जुबान को लगाम दो, व्यासपीठ का मोह त्यागो और पहले किसी प्रामाणिक गुरुकुल में जाकर शास्त्रों का ककहरा सीखो। भगवान श्रीकृष्ण के अपमान का यह पाप किसी खोखले स्पष्टीकरण से धुलने वाला नहीं है।

इससे संबंधित अन्य खबर का लिंक

धीरेंद्र शास्त्री! अपनी जुबान को लगाम दो और शास्त्रों का पहले गहन अध्ययन करो!

नोट: यूट्यूब और सोशल मीडिया की बंदिशों के बाद अब यह तय है कि सच बोलने के लिए अपना आजाद प्लेटफार्म चाहिए। India Speak Daily केवल मेरा नहीं, आपकी निडर आवाज़ का मंच है। आइए, मिलकर इस पर अपनी स्वतंत्र Live Streaming और Video Platform को सनातनियों का वैचारिक अधिष्ठान बनाएं। ​नीचे ‘ISDian बनें’ बटन पर क्लिक कर आज ही इसके सदस्य बनें 👇

Ssandeep Deo November 5, 2026
🇮🇳 राष्ट्रहित और सत्य के पक्षधर बनें

साहसी पत्रकारिता की शक्ति बनें।

एल्गोरिदम की सेंसरशिप के विरुद्ध आपका साहस ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। India Speak Daily की खोजी पत्रकारिता और विशेष ऑडियो विश्लेषण तक सीधी पहुंच के लिए हमारे कुटुंब के सारथी बनें।

❤️ ISDian बनें — सदस्यता लें।

📢 हमारे WhatsApp और Telegram से जुड़ें

ब्रेकिंग न्यूज़, विशेष रिपोर्ट्स और महत्वपूर्ण अपडेट्स सीधे अपने मोबाइल पर प्राप्त करें।

✈ Telegram से जुड़ें ☘ WhatsApp से जुड़ें
⚡ तुरंत अपडेट्स • 📰 बड़ी खबरें • 🎙 विशेष रिपोर्ट्स • कोई स्पैम नहीं

जुड़ने के बाद आपको क्या मिलेगा?

⚡ ब्रेकिंग न्यूज़ अलर्ट

महत्वपूर्ण खबर प्रकाशित होते ही तुरंत अपडेट पाएं।

📰 दिनभर की प्रमुख खबरें

बड़ी खबरों का आसान और संक्षिप्त सार सीधे आपके मोबाइल पर।

🛡 फेक न्यूज़ के खिलाफ

भ्रामक सूचनाओं पर तथ्य आधारित रिपोर्टिंग और विश्लेषण।

🇮🇳 राष्ट्रहित कवरेज

भारत और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विशेष रिपोर्ट्स।

TAGGED: bageshwar dham, bageshwar dham controversy, bageshwar dham sarkar, dhirendra, Dhirendra Krishna Shastri, Dhirendra Shastri Maharaj

Related

अयोध्याजी का श्री मणि पर्वत

श्वेता पुरोहित :- रामायण में इस बात का उल्लेख किया...

November 5 2026

RSS and the Syndicate Files (किस्त 3): ‘कश्मीर प्रिंसेस’ विमान धमाका (1955): जब सिंडिकेट के ‘टाइम-बम’ ने दहलाया भारत का रक्षा और कूटनीतिक तंत्र !

May 23 2026

सनातन धर्म के महान सेवक किशोर कुणाल नहीं रहे!

संदीप देव । प्रशासनिक सेवा में रहते हुए किशोर कुणाल...

November 5 2026

चित्र का रहस्य बहुत ही मार्मिक एवम् गूढ़ है!

श्वेता पुरोहित- चित्र में हाथी रूपी पूर्व जन्म के कर्म...

November 5 2026

Share this Article
Facebook Twitter Whatsapp Whatsapp Telegram Print
Ssandeep Deo
Posted by Ssandeep Deo
Follow:
Journalist from 2.5 decades | Bestseller Author by Nielsen Jagran | Awarded the Sahitya Akademi Award for his book writing | He also received the Pandit Madan Mohan Malaviya Award and the Shivaji Ratna Award for journalism | Founder Editor of https://www.indiaspeakdaily.in
Leave a comment

Leave your Comments Below Cancel reply

--- Advertisement ---
Ad imageAd image
Ad imageAd image
Ad imageAd image

You Might Also Like

SDEO's Story

क्या मजाक है? संघ सिंडिकेट अब करेगा सनातनी शास्त्रों का उद्धार?

November 3, 2026
SDEO's Storyसनातन हिंदू धर्म

धीरेंद्र शास्त्री! अपनी जुबान को लगाम दीजिए और शास्त्रों का पहले गहन अध्ययन कीजिए!

November 3, 2026
Movie ZoneSDEO's Story

त्रेतायुग में सूफियाना कव्वाली? ‘आदिपुरुष’ के गुनहगार मुंतशिर ने विश्वास-रहमान को मारा थप्पड़!

October 30, 2026
SDEO's Story

पत्रकारिता निष्पक्षता की नहीं, वस्तुनिष्ठता की मांग करती है!

October 26, 2026
//

India Speak Daily – No Left – No Right, Only Sanatani Voice.

Popular Categories

  • ISD Daily Live
  • Video Library
  • JOIN US / LOGIN

Quick Links

  • Refund & Cancellation Policy
  • Privacy Policy
  • Contact Us
  • Terms of Service
  • Advertise With ISD

Copyright © 2015 - 2026 - Kapot Media Network LLP. All Rights Reserved.

Removed from reading list

Undo
Welcome Back!

Sign in to your account

Register Lost your password?