इंडिया स्पीक्स डेली संपादकीय। क्या अंतरराष्ट्रीय कूटनीति किसी एक व्यक्ति के निजी ‘इवेंट मैनेजमेंट’, गले मिलने के तमाशों और यूट्यूब के चीप क्लिकबेट थंबनेल्स से चलती है? या फिर दुनिया का भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन ज़मीनी अर्थशास्त्र, सैन्य ताक़त और सामरिक हितों की कठोर चट्टान पर टिका होता है?
पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और यूट्यूब पर संघ और भाजपाई तंत्र के पाले हुए तथाकथित “राष्ट्रवादी” यूट्यूबर्स का प्रलाप देखने लायक है। जब अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के दोनों सदनों में बहुमत गँवा बैठी और इज़रायल में महीनों से चल रहे बर्बर सैन्य संघर्ष के बीच बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता संसद (नेसेट) में अल्पमत के कगार पर आकर लड़खड़ा गई—तो इस भांड मंडली ने तुरंत एक नया शिगूफ़ा छोड़ दिया: “मोदी जी से पंगा लेना ट्रंप को महंगा पड़ा!”, “विश्वगुरु का क्रोध देख कांपे ट्रंप!”
यह लफ्फाजी सिर्फ हास्यास्पद नहीं है, बल्कि उस मानसिक दिवालियापन और बौद्धिक दासता का जीता-जागता प्रमाण है, जिसने भारत के आम जनमानस को अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बुनियादी समझ से वंचित कर दिया है।
आइए, इन चारण-भाटों के मुगालते की धज्जियां उड़ाते हुए तथ्यों और कूटनीतिक दस्तावेज़ों के आईने में सच को दर्ज करें।
ट्रंप और नेतन्याहू का पतन: कारण उनका कर्म है, न कि कोई काल्पनिक ‘मोदी फैक्टर’
अमेरिकी और इज़रायली राजनीति का निष्पक्ष विश्लेषण किसी भी शोधकर्ता को यह बता देगा कि इन दोनों दक्षिणपंथी और आक्रामक नेताओं को किसी विदेशी नेता के “रूठने” ने नहीं, बल्कि उनकी अपनी ही नीतियों और जनता के आक्रोश ने अर्श से फर्श पर पटका है:
- अमेरिका में महंगाई, बेलगाम टैरिफ और युद्ध–थकान: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले मध्यावधि
चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को अमेरिकी कांग्रेस (सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स दोनों) में बड़ा झटका लगा है और डेमोक्रेट्स ने दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ और विदेशों में अरबों डॉलर के अंतहीन सैन्य अभियानों को बंद करने का वादा करके सत्ता हासिल की थी। लेकिन सत्ता में आते ही उन्होंने संरक्षणवाद के नाम पर जो मनमाने टैरिफ थोपे, उससे अमेरिका के घरेलू बाज़ारों में महंगाई ने आम अमेरिकी नागरिकों की कमर तोड़ दी। अमेरिका में ट्रंप की टैरिफ नीतियों और आक्रामक संरक्षणवाद के कारण घरेलू आयात लागत बढ़ी, जिसने महंगाई को ट्रिगर किया। मतदाता विदेश नीति के नारों से अधिक अपनी जेब और जीवन-यापन की लागत को लेकर चिंतित थे।
वेनेजुएला से लेकर ईरान के मोर्चों पर नए सैन्य तनाव ने अमेरिकी कामकाजी वर्ग को यह समझा दिया कि वाशिंगटन की सत्ता फिर से आम नागरिकों को अंतहीन टैक्स की आग में झोंक रही है। अमेरिकी मतदाता अपनी जेब, गिरती क्रय शक्ति, रोज़गार और स्वास्थ्य सेवाओं के संकट पर वोट देने निकला और ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को संसद के दोनों सदनों में बाहर का रास्ता दिखा दिया।
ट्रंप का घरेलू संस्थाओं, न्यायपालिका और राजनीतिक विरोधियों पर तीखा हमला स्वतंत्र और उदार मतदाताओं को डेमोक्रेट्स की ओर धकेल गया।
2. इज़रायल में नेतन्याहू का सैन्य दलदल और आंतरिक अविश्वास: अक्टूबर 2026 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी संसद (नेसेट) में आवश्यक 61 सीटों के बहुमत आंकड़े से दूर रह गई है। विपक्षी गठबंधन (गादी आइजनकोट के नेतृत्व में) और अरब दलों के उभार के चलते नेतन्याहू सरकार बनाने के लिए अल्पमत और राजनीतिक गतिरोध से जूझ रहे हैं।
बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा और लेबनान से लेकर ईरान तक युद्ध को अपनी निजी कुर्सी बचाने की ढाल बनाया। महीनों तक चले इस खूनी संघर्ष ने इज़रायल के भीतर आर्थिक मंदी पैदा की। इजरायल में रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी और युद्ध जनित आर्थिक मंदी ने मध्यम वर्ग को हतोत्साहित किया।
नेतन्याहू की सनक ने हज़ारों रिज़र्विस्ट सैनिकों के परिवारों को सड़क पर ला खड़ा किया और बंधकों की सुरक्षित वापसी को लेकर पूरे इज़रायली समाज में फूट डाल दी। जिस ‘मिस्टर सिक्योरिटी’ के नाम पर नेतन्याहू वोट मांगते थे, वही इज़रायल के इतिहास की सबसे असुरक्षित और अलग-थलग स्थिति के जनक बन गए।
इसके अलावा नेतन्याहू के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले और इजरायली न्यायपालिका को कमजोर करने की कोशिशों ने शहरी एवं उदारवादी इजरायलियों के बीच पहले ही व्यापक अविश्वास पैदा कर रखा था।
नेसेट में बहुमत का आंकड़ा (61 सीटें) खोना इज़रायली जनता द्वारा नेतन्याहू के आत्मघाती राष्ट्रवाद को नकारा जाना है।
तानाशाही प्रवृत्तियों पर संसदीय लगाम
इस दोहरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के पूरे गणित को बदल दिया है:
* ट्रंप की मनमानी पर विधायी ताला: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और सीनेट पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने का सीधा अर्थ है कि ट्रंप अब मनमाने कार्यकारी आदेशों, अचानक लगाए जाने वाले व्यापारिक प्रतिबंधों और विदेश नीति के एकतरफा फैसलों को मनमर्जी से लागू नहीं कर पाएंगे। उनके हर कदम पर संसदीय समितियां और बजट कटौती का डंडा चलेगा।
* यूक्रेन और नाटो की बहाली: नाटो को खारिज करने और यूक्रेन की मदद एक झटके में बंद करने की ट्रंप की नीति अब अमेरिकी संसद के बजटरी नियंत्रण के सामने नहीं टिक पाएगी।
* पश्चिम एशिया में आग लगाने की नीति पर रोक: नेतन्याहू के राजनीतिक रूप से पंगु होने और वाशिंगटन में ट्रंप पर विधायी शिकंजा कसने के बाद, तेहरान और पूरे मध्य पूर्व में बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय युद्ध भड़काने की साजिशों पर ब्रेक लगना तय है।
वैश्विक भू–राजनीति पर प्रभाव और आने वाले बदलाव
| क्षेत्र | मौजूदा स्थिति / अनुमानित बदलाव |
| पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) | ट्रंप के विधायी अधिकारों पर लगाम और नेतन्याहू की राजनीतिक कमजोरी से ईरान के खिलाफ एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों को समर्थन मिलना सीमित होगा। खाड़ी देशों में स्थायी युद्ध विराम और कूटनीतिक समझौतों का दबाव बढ़ेगा। |
| अमेरिकी विदेश नीति का संतुलन | दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक नियंत्रण के बाद ट्रंप प्रशासन के टैरिफ फैसलों, रक्षा बजट और मनमाने कार्यकारी आदेशों पर भारी विधायी जांच (oversight) बैठेगी। |
| यूक्रेन एवं नाटो | कांग्रेस पर नियंत्रण के साथ अमेरिकी संसद यूक्रेन और नाटो सहयोगियों के लिए रक्षा वित्तीय सहायता को बहाल या मजबूत करने की दिशा में दबाव बनाएगी, जिससे ट्रंप की एकतरफा अलगाववादी नीति पर ब्रेक लगेगा। |
अब आइए, उस घिनौने झूठ पर: क्या अमेरिका में ‘मोदी फ़ैक्टर’ जैसी कोई चिड़िया है?
अब उस शर्मनाक नैरेटिव का पोस्टमार्टम करते हैं जिसे कुछ भाड़े के यूट्यूब चैनलों ने फैलाया है कि “मोदी से टकराने के कारण ट्रंप हारे।”
पहला सच—अमेरिकी चुनाव में विदेशी नेता का शून्य वजूद: अमेरिकी चुनाव विशुद्ध रूप से स्थानीय अमेरिकी मुद्दों—इन्फ्लेशन, जॉब्स, सोशल सिक्योरिटी, टैक्स और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर लड़े जाते हैं। किसी अमेरिकी किसान, मजदूर या उपनगरीय महिला को भारत के घरेलू राजनीतिक नारों से कोई लेना-देना नहीं होता।
दूसरा सच—भारतीय-अमेरिकियों का मतदान पैटर्न: यदि यह तर्क दिया जाए कि भारतीय-अमेरिकी प्रवासियों ने मोदी के कहने पर ट्रंप को हरा दिया, तो यह डेटा के मुंह पर तमाचा मारने जैसा है। प्यू रिसर्च (Pew Research) और कार्नेगी एंडोमेंट के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि भारतीय मूल के 65 से 70 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक दशकों से डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट देते हैं। वे उदारवादी, नागरिक अधिकारों और आव्रजन समर्थक नीतियों के पक्षधर हैं।
जब 2019 में ह्यूस्टन में “हाउडी मोदी” के मंच से नरेंद्र मोदी ने मर्यादा ताक पर रखकर “अबकी बार ट्रंप सरकार” का नारा दिया था, तब भी भारतीय-अमेरिकियों के बहुमत ने जो बाइडन को ही वोट दिया था। तो आज यह अचानक “मोदी के कारण ट्रंप की हार” कैसे बन गया?
तथ्यगत आईना: कौन किसके आगे झुका हुआ है?
दरबारी मीडिया चाहे जितनी भी छाती पीट ले, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के आधिकारिक दस्तावेज़ और घटनाएं यह गवाही देती हैं कि मोदी सरकार ट्रंप और अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के सामने हमेशा रक्षात्मक और नतमस्तक मुद्रा में रही है:
* टैरिफ की मार और भारत की खामोशी: डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम, सार्वजनिक मंचों से और बार-बार भारत को दुनिया का “टैरिफ किंग” (Tariff King) और सबसे बड़ा “अब्यूज़र” (व्यापारिक नियमों का दुरुपयोग करने वाला) कहा। ट्रंप ने भारत को दशकों से मिल रहे सामान्यीकृत प्राथमिकता प्रणाली (GSP) के व्यापारिक दर्जे को एक झटके में छीन लिया। इसके जवाब में क्या हुआ? क्या भारत ने कड़े जवाबी कदम उठाए? नहीं! उल्टे भारत ने अमेरिकी सेब, बादाम, अखरोट और हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिलों पर आयात शुल्क घटाकर वाशिंगटन को खुश करने की हर मुमकिन कोशिश की।

* भारतीयों का अपमानजनक निर्वासन (Deportation): ट्रंप के आव्रजन विरोधी बयानों और वीजा नियमों में सख्ती के बाद जब हज़ारों भारतीय छात्रों और कामगारों पर तलवार लटकी, या जब अवैध प्रवासियों के नाम पर भारतीयों को हथकड़ियों में जकड़कर वापस भेजा गया, तब दिल्ली के सत्ता गलियारों से एक भी कड़ा आधिकारिक विरोध पत्र वाशिंगटन नहीं भेजा जा सका।

* ईरान से सस्ता कच्चा तेल बंद करना: जब ट्रंप ने भारत को धमकाया कि ईरान से तेल खरीदना तुरंत बंद करो, तो भारत ने अपनी पुरानी ऐतिहासिक और रणनीतिक साझेदारी को ताक पर रखकर ईरान से शून्य बैरल तेल आयात करने का ट्रंप का फरमान हू-ब-हू मान लिया। नतीजा क्या हुआ? भारत को महंगा तेल खरीदना पड़ा और देश की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हुई। इसे कहते हैं संप्रभुता या अमेरिकी हुक्म के आगे घुटने टेकना?
* चाबहार बंदरगाह और अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार: रणनीतिक दृष्टि से भारत के लिए चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान को बाइपास कर मध्य एशिया तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता था। लेकिन वाशिंगटन के प्रतिबंधों और अमेरिकी नाराजगी के खौफ से मोदी सरकार ने इस परियोजना की गति को वर्षों तक सुस्त रखा। भारत अपनी सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना पर भी अमेरिकी वीटो के सामने केवल रियायतें (waivers) मांगता रहा।
* क्वाड (QUAD) का भ्रम और चीन सीमा पर अमेरिकी पाखंड: दरबारी मीडिया दावा करता है कि ट्रंप के रहते चीन कांपता था और अमेरिका भारत के साथ खड़ा था। लेकिन सच यह है कि लद्दाख और गलवान में जब चीनी सेना ने यथास्थिति बदली, तब अमेरिका ने भारत को केवल ‘क्वाड’ के मंच पर अपने सामरिक हित साधने के लिए एक ‘बफर स्टेट’ की तरह इस्तेमाल किया। सीमा पर भारत के पक्ष में कोई सीधी, ठोस और निर्णायक सैन्य गारंटी अमेरिका ने कभी नहीं दी।
* गुरपतवंत सिंह पन्नू और राजनयिक दबाव: अमेरिकी धरती पर खालिस्तानी अलगाववादी पन्नू मामले को लेकर जब अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और एफबीआई ने भारतीय अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए, तो भारत की तरफ से कोई आक्रामक प्रतिवाद नहीं हुआ। उल्टे भारत सरकार ने तुरंत उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की और वाशिंगटन के साथ “पूर्ण सहयोग” की मुद्रा अपनाई। यह घटनाक्रम साफ़ करता है कि राजनयिक दबाव में असल में कौन किसके सामने झुकता है।

* डॉलर पर निर्भरता और ‘डी-डॉलराइजेशन’ से पैर खींचना: ब्रिक्स (BRICS) की बैठकों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के लंबे-चौड़े भाषण दिए जाते हैं, लेकिन जैसे ही अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की भृकुटि तनती है, भारत आक्रामक डी-डॉलराइजेशन से अपने कदम पीछे खींच लेता है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार आज भी भारी मात्रा में अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी बॉन्ड्स में बंधा हुआ है। जिस देश की पूरी व्यापारिक व्यवस्था डॉलर की मोहताज हो, उसके यूट्यूबर्स का यह दावा कि “हमने ट्रंप को झुका दिया”, हास्यास्पद नहीं तो क्या है?
* रक्षा तकनीक का एकाधिकार और भारत की लाचारी: भारत आज भी अपने तथाकथित स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के ‘GE-F414’ जेट इंजन और तकनीक ट्रांसफर (ToT) की एक-एक फाइल पास कराने के लिए पेंटागन के चक्कर लगाता है। प्रीडेटर ड्रोन्स से लेकर सेमीकंडक्टर फैब की बुनियादी तकनीक तक, भारत पूरी तरह अमेरिकी दया पर निर्भर है। जब रणनीतिक तकनीक की चाबी वाशिंगटन के हाथ में हो, तो बराबरी की बात करना केवल आत्म-प्रवंचना है।
राष्ट्रवाद का खोखला आवरण और तानाशाही का हश्र: मोदी के लिए सबक
अमेरिका में ट्रंप की पराजय और इज़रायल में नेतन्याहू की सत्ता का लड़खड़ाना केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत विफलता नहीं है, बल्कि उस दक्षिणपंथी राजनीतिक शैली का हश्र है जो खोखले राष्ट्रवाद, युद्धोन्माद और प्रचार तंत्र के सहारे जनविरोधी नीतियों को ढकने का प्रयास करती रही है।
ट्रंप, नेतन्याहू और नरेंद्र मोदी की कार्यशैली में एक ख़तरनाक साम्य दिखता है—संस्थाओं को पंगु बनाना, जनमुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए स्थायी शत्रु गढ़ना और आत्ममुग्धता को ही राष्ट्रीय नीति का नाम दे देना। लेकिन ट्रंप और नेतन्याहू का यह सबक चीख-चीख कर कह रहा है कि राष्ट्रवाद के घोड़े पर सवार होकर जनता के बुनियादी सवालों को अनंत काल तक रौंदा नहीं जा सकता।
भारत की ज़मीनी हक़ीक़त आज अमेरिका और इज़रायल से भी अधिक भयावह मोड़ पर खड़ी है। अर्थव्यवस्था का ढांचा चरमरा चुका है, जहाँ रिकॉर्ड तोड़ बेरोज़गारी और बेलगाम महंगाई ने आम परिवार की थाली छीन ली है। दूसरी ओर, सरकार नीतिगत स्तर पर तुगलकी फैसले थोप रही है—खाद्य सुरक्षा और वाहन उद्योग की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ कर जबरन एथेनॉल ब्लेंडिंग का तानाशाही थोपना इसका जीता-जागता उदाहरण है।
युवाओं के भविष्य के साथ क्रूर मज़ाक बन चुका अनवरत पेपरलीक का सिलसिला हो, या असहमति की आवाज़ों को कुचलने के लिए सोशल मीडिया पर डिजिटल सेंसरशिप की नई बंदिशें; सत्ता का हर कदम लोकतंत्र को बंधक बनाने जैसा है।
स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता का जो हनन इज़रायल में न्यायपालिका के खिलाफ हुआ, वही आज भारत में चुनाव आयोग और कुछ हद तक न्यायपालिका के मामले में भी हो रहा है। भारत में चुनाव आयोग को सरकार के एक विस्तारित प्रकोष्ठ (एक्सटेंशन काउंटर) में तब्दील कर पूरी चुनावी प्रक्रिया की साख को ही तार-तार कर दिया गया है।
जो दरबारी भांड और चाटुकार विश्लेषक आज भी कैमरे के सामने बैठकर यह अलाप रहे हैं कि “मोदी अजेय हैं” और वैश्विक पराजयों से भारत का कोई लेना-देना नहीं, वे दरअसल सत्ता को उसी आत्मघाती खाई की ओर धकेल रहे हैं जहाँ ट्रंप और नेतन्याहू जा गिरे हैं। इन दरबारियों को समझ लेना चाहिए कि जब आर्थिक तंगी, बेरोज़गारी और दमन हद से पार हो जाता है, तो जनता राष्ट्रवाद के प्रायोजित तमाशों को लात मारकर शासक की तानाशाही पर नकेल कस देती है—और इतिहास गवाह है कि सत्ता के नशे में चूर नेताओं को यह सबक हमेशा देर से ही समझ आता है।
दरबारी भोंपुओं और सत्ता तंत्र द्वारा अब पूरे ज़ोर-शोर से यह नया राग अलापा जा रहा है कि “मोदी कहीं नहीं जाएंगे।” किसी भी जीवंत लोकतंत्र में यह दावा न केवल आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा है, बल्कि एक गहरी छटपटाहट का स्पष्ट संकेत भी है। यह हताश नैरेटिव दरअसल यह उजागर कर रहा है कि चुनाव आयोग के कथित पक्षपात और गिरती साख के विरुद्ध ज़मीन पर सुलगता जन आक्रोश, और दूसरी तरफ वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक अपने सबसे करीबी वैचारिक मित्रों—ट्रंप और नेतन्याहू—की राजनीतिक दुर्गति देखकर स्वयं मोदी और उनका पूरा दरबारी तंत्र भीतर से बुरी तरह सहमा हुआ है। यह ‘राग दरबारी’ दरअसल किसी अजेय शक्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि आने वाले जन-फैसले के ख़ौफ़ से कांपते दरबारियों की मिमियाहट है।
इंडिया स्पीक डेली निष्कर्ष: मुगालते से बाहर निकलिए
यह बहुत आसान होता है कि स्टूडियो में बैठकर या अपने बेडरूम में कैमरा लगाकर चार मूर्खतापूर्ण थंबनेल बनाए जाएं और एक कमजोर, पराधीन कूटनीति को “महाशक्ति” का चोला पहना दिया जाए।
ट्रंप का मध्यावधि चुनाव हारना अमेरिकी घरेलू राजनीति और जनता के आर्थिक गुस्से का परिणाम है। नेतन्याहू का बेनकाब होना उनके अपने युद्धोन्माद और भ्रष्टाचार का नतीजा है। इसमें भारत के प्रधानमंत्री का कोई हाथ नहीं है। सच तो यह है कि अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान चाहे रिपब्लिकन का हो या डेमोक्रेट्स का—वह भारत को केवल एक बड़े बाज़ार और चीन के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले पैदल सिपाही से ज़्यादा कुछ नहीं समझता।
देश की जनता को झूठे गर्व की अफीम चटाना बंद कीजिए। जब तक भारत अपनी अर्थव्यवस्था, घरेलू विनिर्माण और सैन्य तकनीक में आत्मनिर्भर नहीं होता, तब तक वाशिंगटन के हर शासक के सामने नई दिल्ली को समझौते ही करने पड़ेंगे—चाहे यूट्यूब के मसखरे छाती पीट-पीटकर कितना भी झूठ क्यों न परोस लें।
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