मनीश अग्रवाल । 1 . महाराजजी, सिद्धि माँ और राधा–कात्यायनी तत्त्व मेरी समझ और श्रद्धा यह है कि पूज्य नीम करौली बाबा महाराजजी स्वयं प्रभु श्रीराम—या यूँ कहें, साक्षात् प्रभु श्रीकृष्ण—थे (हैं)।
महाराजजी की पूरी लीला में एक बात बार-बार दिखाई देती है—वे स्वयं श्रेय लेने के स्थान पर अपने भक्तों का मान बढ़ाते थे। त्रेतायुग में परम भक्त श्रीहनुमान ने प्रभु श्रीराम की सेवा की; कलियुग में मानो स्वयं प्रभु ने अपने भक्त का गौरव बढ़ाने के लिए हनुमानजी को आगे रखकर उनकी पूजा, उनके मंदिर और उनकी महिमा का विस्तार किया। त्रेता में हनुमान ने पूजा राम तो कलि में राम पूज रहे हनुमान! अद्भुत! भक्त के वश में है भगवान! जय जय भक्तवत्सल भगवान!
इसी दृष्टि से यदि राम के साथ सीता और कृष्ण के साथ राधा-तत्त्व अनिवार्य है, तो महाराजजी की लीला में उस शक्ति-तत्त्व को कहाँ देखें? मेरा ध्यान स्वाभाविक रूप से श्री सिद्धि माँ की ओर जाता है।
2 . सबसे प्रत्यक्ष संकेत स्वयं महाराजजी का है—उन्होंने सिद्धि माँ को “राधे” कहा।
डॉ. जया प्रसादा की Sri Siddhi Ma: The Story of Neem Karoli Baba’s Spiritual Legacy के आरम्भ में, Foreword से पहले, महाराजजी द्वारा सिद्धि माँ के लिए कहा गया यह पद दिया गया है—
“Radhe tu bad bhagini,
Kaun tapasya keen?
Teen lok taaran tarana,
Soh tere aadheen.”
अर्थात्—“राधे, तुम कितनी धन्य हो! तुमने ऐसी कौन-सी तपस्या की कि तीनों लोकों का उद्धार करने वाला भी तुम्हारे अधीन हो गया?”
यह पद पुस्तक में स्पष्ट रूप से “Neem Karoli Baba to Sri Siddhi Ma”—अर्थात् नीम करौली बाबा द्वारा श्री सिद्धि माँ के लिए/उनसे कहा गया—के रूप में प्रकाशित है। डॉ. जया प्रसादा के साथ Nina Rao की प्रकाशित वार्ता में भी पुस्तक के Foreword से पहले दिया गया यही पद इसी attribution के साथ पुनः प्रस्तुत किया गया है। इसके अतिरिक्त महाराजजी की शिक्षाओं और परम्परा से प्रेरित Shree Sankat Mochan Trust, Gandhidham (Gujarat) की Siddhi Maa सम्बन्धी सामग्री भी इसे महाराजजी द्वारा सिद्धि माँ के लिए बार-बार कहा जाने वाला पद बताती है। अतः मेरा सिद्धि माँ को “राधे” के रूप में देखना केवल मेरी अवधारणा या कोई बाद की व्याख्या नहीं है—“राधे” स्वयं महाराजजी का सिद्धि माँ के लिए सम्बोधन है। और मेरी श्रद्धामूलक समझ में इसी पद की अगली पंक्तियाँ—“तीनों लोकों का उद्धार करने वाला भी तुम्हारे अधीन हो गया”—महाराजजी के अपने स्वरूप की ओर भी अत्यन्त गहरा संकेत करती हैं।
3 . दूसरा, और अत्यन्त स्पष्ट संकेत—महाराजजी ने सिद्धि माँ को “देवी कात्यायनी” कहा।
इसका मूल प्रकाशित विवरण ‘Divine Reality’ (अलौकिक यथार्थ) में मिलता है। प्रसंग नैनिताल का है। चाँदनी रात में महाराजजी अपने भक्त पूरन चन्द्र जोशी के साथ पाषाण देवी के पास एक चट्टान पर बैठे थे। उन्होंने झील के उस पार India Hotel की ओर संकेत किया, जहाँ उस समय सिद्धि माँ रहती थीं, और कहा—
“The goddess Katyayani lives there. It is for Her that Hanuman had to come.”
अर्थात्—“वहाँ देवी कात्यायनी रहती हैं। उन्हीं के लिए हनुमान को आना पड़ा।”
इस कथन में दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं। पहली—महाराजजी ने सिद्धि माँ को देवी कात्यायनी कहा। दूसरी—यहाँ “हनुमान” से उनका संकेत स्वयं अपनी ओर था। मूल पुस्तक भी इसके तुरन्त बाद लिखती है कि इस कथन द्वारा महाराजजी ने “Shri Ma and Himself” के विषय में सत्य प्रकट किया। इसके अतिरिक्त, महाराजजी की शिक्षाओं से प्रेरित Shree Sankat Mochan Trust, Gandhidham (Kutch, Gujarat) की Siddhi Maa सम्बन्धी सामग्री स्पष्ट करती है कि सिद्धि माँ “Devi Katyayani” थीं, जिनके लिए Hanuman—अर्थात् महाराजजी स्वयं—को आना पड़ा। अतः यहाँ किसी तीसरे व्यक्ति की चर्चा नहीं है: सिद्धि माँ = कात्यायनी; “हनुमान” = महाराजजी का अपने लिए संकेत। मेरे अनुसार महाराजजी (स्वयं श्रीराम) हनुमान लीला करते हुए अपने परम भक्त श्रीहनुमान जी का गौरव करते रहे।
4 . श्रीमद्भागवत में कात्यायनी का सीधा सम्बन्ध व्रज की कुमारिकाओं और श्रीकृष्ण-प्राप्ति से है—पर वहाँ “राधा” नाम प्रत्यक्षतः नहीं आता।
श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 22 में व्रज की कुमारिकाएँ मार्गशीर्ष मास में कात्यायनी-व्रत करती हैं। उनका मन्त्र है—
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ॥
अर्थात्—“हे कात्यायनी! हे महामाया! हे महायोगिनी, अधीश्वरी! नन्दगोप के पुत्र श्रीकृष्ण को मेरा पति बनाइए; आपको नमस्कार है।”
इसलिए भागवत से मिलने वाला प्रत्यक्ष सूत्र है—
व्रज की कुमारिकाएँ → देवी कात्यायनी की उपासना → श्रीकृष्ण की प्राप्ति।
यहाँ एक आवश्यक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: श्रीमद्भागवत में राधा का नाम प्रत्यक्षतः नहीं लिखा गया है—न इस कात्यायनी-व्रत प्रसंग में और न अन्यत्र। भागवत की प्रमुख गोपियों के नाम भी सामान्यतः नहीं दिये गये। बाद की गौड़ीय वैष्णव परम्परा भागवत की विशिष्ट, सर्वश्रेष्ठ अनामिका गोपी को श्रीराधा के रूप में पहचानती है। इसलिए केवल भागवत 10.22 से यह कहना कि “राधा ही कात्यायनी हैं” पाठ का शाब्दिक कथन नहीं होगा; भागवत यहाँ गोपी–कात्यायनी–कृष्ण सम्बन्ध स्थापित करता है। राधा और कात्यायनी के बीच सीधी तात्त्विक कड़ी हमें अगले प्रमाणों से मिलती है।
5 . राधा को स्वयं योगमाया और दुर्गा कहा गया है; और कात्यायनी नवदुर्गा का एक रूप हैं।
मानसतन्त्र-अन्तर्गत श्रीराधासहस्रनामस्तोत्र में श्रीराधा के लिए अत्यन्त स्पष्ट नाम आते हैं—
जगद्धात्री जगत्कर्त्री जगद्बीजस्वरूपिणी ।
जगन्माता योगमाया जीवानां गतिदायिनी ॥ ५१ ॥
अर्थात् श्रीराधा को यहाँ सीधे “जगन्माता योगमाया” कहा गया है। फिर उसी स्तोत्र में—
दिव्यानुलेपनारागा दिव्यालङ्कारभूषणा ।
दुर्गतिनाशिनी-राधा दुर्गा दुःखविनाशिनी ॥ ६४ ॥
अर्थात् श्रीराधा को स्पष्टतः “दुर्गा” भी कहा गया है।
इस सम्बन्ध का इससे भी अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण नारदपञ्चरात्र, द्वितीयरात्र, षष्ठ अध्याय के श्रीराधामाहात्म्य में मिलता है। वहाँ श्रीमहादेव राधा से आरम्भ करके बताते हैं कि वही शक्ति वैकुण्ठ में महालक्ष्मी, सरस्वती, सनातनी विष्णुमाया, दक्षकन्या सती और आगे चलकर पार्वती-दुर्गा के रूप में प्रकट होती हैं—
आविर्भूता पर्वते सा तेनेयं पार्वती सती ।
सर्वशक्तिस्वरूपा सा दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ॥ ७ ॥
अर्थात् यहाँ राधा → विष्णुमाया → सती/पार्वती → दुर्गा का सम्बन्ध उसी एक शक्ति के विविध रूपों के रूप में प्रत्यक्षतः किया गया है।
दूसरी ओर देवीकवच में नवदुर्गाओं का वर्णन करते हुए कहा गया है—
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥
और तत्पश्चात्—
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ॥
अर्थात् कात्यायनी स्वयं नवदुर्गाओं में छठा रूप हैं। अ
तः शास्त्रीय कड़ी अत्यन्त स्पष्ट बनती है:
राधा = योगमाया / दुर्गा-शक्ति और कात्यायनी = दुर्गा का स्वरूप।
इसलिए राधा और कात्यायनी को एक ही पराशक्ति के रूपों के रूप में समझना केवल भावात्मक समानता नहीं है; इसके पीछे स्पष्ट तान्त्रिक और वैष्णव पाठीय आधार उपस्थित है।
6 . श्रीमद्देवीभागवत में राधा और सीता को उसी परम देवी के विभिन्न स्थानगत स्वरूपों के रूप में रखा गया है।
श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, सप्तम स्कन्ध, अध्याय 30 में देवी के विभिन्न सिद्धपीठों और वहाँ प्रतिष्ठित उनके विविध नाम-रूपों का वर्णन है। उसी क्रम में कहा गया है—
रुक्मिणी द्वारवत्यां तु राधा वृन्दावने वने ॥ ६९ ॥
देवकी मथुरायां तु पाताले परमेश्वरी ।
चित्रकूटे तथा सीता विन्ध्ये विन्ध्याधिवासिनी ॥ ७० ॥
अर्थात् वही आराध्या देवी द्वारका में रुक्मिणी, वृन्दावन में राधा, मथुरा में देवकी और चित्रकूट में सीता नाम से प्रतिष्ठित हैं। अध्याय का पूर्वापर प्रसंग भी स्पष्ट करता है कि यह एक ही जगदम्बा/पराम्बिका के विभिन्न पीठगत नामों की सूची है। इसलिए सीता और राधा को एक ही आदिशक्ति की भिन्न लीलात्मक अभिव्यक्तियों के रूप में देखने का प्रत्यक्ष पुराण-आधार यहाँ उपलब्ध है।
7 . गौड़ीय वैष्णव परम्परा राधा–योगमाया–कात्यायनी सम्बन्ध को बिल्कुल सीधे शब्दों में व्यक्त करती है।
श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 24 मार्च 2002 को नवद्वीप-धाम परिक्रमा के दौरान, कोलद्वीप में प्रौढ़माया के विषय में अपने प्रवचन में पहले श्रीराधा को कृष्ण की मूल अन्तरंगा स्वरूप-शक्ति कहा। उसके बाद व्रज की कुमारिका-गोपियों द्वारा पूजित कात्यायनी के विषय में उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह कात्यायनी योगमाया की आंशिक अभिव्यक्ति हैं, और योगमाया स्वयं श्रीमती राधिका की आंशिक अभिव्यक्ति हैं।
उनके शब्दों में—
“That Katyayani … is a partial manifestation of Yogamaya, who is a partial manifestation of Srimati Radhika.”
पूज्य प्रेमानंद महाराज जी भी ऐसा ही मत रखते हैं और कहते हैं कि समस्त देवी शक्तियां लाड़ली जू (राधा जी) के अंश से ही उत्पन्न हुई हैं। इस वैष्णव तात्त्विक व्याख्या में सम्बन्ध एकदम सीधा है—
श्रीमती राधिका → योगमाया → कात्यायनी।
अर्थात् कात्यायनी कोई राधा-तत्त्व से असम्बद्ध शक्ति नहीं, बल्कि उसी राधा-शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में समझी जाती हैं। अतः इन सभी प्रमाणों को एक साथ रखने पर मेरे लिए महाराजजी की लीला का संकेत अत्यन्त अर्थपूर्ण हो जाता है। महाराजजी ने उसी सिद्धि माँ के लिए एक ओर कहा—
“Radhe tu bad bhagini…” और दूसरी ओर कहा— “The goddess Katyayani lives there.” अर्थात् महाराजजी के अपने कथनों में ही सिद्धि माँ के साथ “राधे” और “कात्यायनी”—दोनों संकेत एक साथ उपस्थित हैं।
फिर शास्त्रीय परम्परा बताती है—
राधा = योगमाया;
राधा = दुर्गा-शक्ति;
कात्यायनी = नवदुर्गा;
गौड़ीय तत्त्व में कात्यायनी = योगमाया की अभिव्यक्ति = श्रीराधिका की शक्ति की अभिव्यक्ति; और देवीभागवत में वही देवी वृन्दावन में राधा तथा चित्रकूट में सीता हैं। इसलिए मेरे लिए सूत्र स्वाभाविक रूप से जुड़ता है—
त्रेता — श्रीराम और सीता;
द्वापर — श्रीकृष्ण और राधा;
और महाराजजी की लीला — महाराजजी और सिद्धि माँ।
सबसे सटीक तात्त्विक भाषा में “राधा = कात्यायनी” का अर्थ यह है कि वे अलग-अलग, असम्बद्ध शक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि एक ही परम शक्ति-तत्त्व के परस्पर सम्बद्ध रूप हैं। और महाराजजी की लीला में यह सम्बन्ध विशेष रूप से उल्लेखनीय हो जाता है, क्योंकि उन्होंने स्वयं सिद्धि माँ को “राधे” भी कहा और “देवी कात्यायनी” भी। सिद्धि माँ का कात्यायनी (राधा) सिद्ध होना महाराजजी के वास्तविक श्रीराम/श्रीकृष्ण स्वरूप का प्रमाण है।
8 . यही तत्त्व ठाकुर श्रीश्रीरामकृष्ण परमहंसदेव और माँ श्रीशारदा देवी की लीला में भी अत्यन्त स्पष्ट रूप से सामने आता है।
ठाकुर ने दक्षिणेश्वर में पहले ही अपने सम्बन्ध में कहा था—“যাইবার আগে হাটে হাঁড়ি ভাঙিয়া দিব”—अर्थात्, “जाने से पहले हाट में हाँड़ी फोड़ दूँगा,” यानी जाने से पहले अपने देव-मानव स्वरूप को सबके सामने प्रकट कर दूँगा। स्वामी सारदानन्द ने श्रीश्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग में इसी अर्थ के साथ इस वाक्य को दर्ज किया है। और अन्ततः काशीपुर उद्यानबाटी में, महासमाधि से केवल दो दिन पहले, नरेन्द्रनाथ—जो आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द हुए—के मन में अन्तिम संशय उठते ही ठाकुर ने बिना प्रश्न सुने स्वयं उसकी ओर देखकर स्पष्ट कहा— “যে রাম, যে কৃষ্ণ, ইদানীং সে-ই এই শরীরে রামকৃষ্ণ; তবে তোর বেদান্তের দিক দিয়া নয়।” अर्थात्—“जो राम थे, जो कृष्ण थे, वही अब इस शरीर में रामकृष्ण हैं—और केवल तुम्हारे वेदान्त के अर्थ में नहीं।” इस प्रकार ठाकुर ने अपनी लीला के अन्त में स्वयं राम–कृष्ण–रामकृष्ण की अभिन्नता उद्घाटित कर दी।
और यदि राम के साथ सीता तथा कृष्ण के साथ श्रीराधा उनकी दिव्य शक्ति के रूप में अवतरित होती हैं, तो इसी सूत्र को माँ श्रीशारदा देवी की लीला में भी देखा जा सकता है। स्वामी गम्भीरानन्द “Holy Mother Sri Sarada Devi” के आरम्भ में ही तात्त्विक सिद्धान्त स्पष्ट करते हैं कि जब भगवान मनुष्य-रूप में अवतरित होते हैं, तब उनकी Divine Power भी प्रायः स्त्री-रूप में उनके साथ अवतीर्ण होती है—जैसे श्रीराम के साथ सीता और श्रीकृष्ण के साथ श्रीराधिका। उसी ग्रन्थ में वर्णित षोडशी-पूजा में ठाकुर श्रीरामकृष्ण ने माँ शारदा को जगन्माता त्रिपुरसुन्दरी के आसन पर बैठाकर पूजा की और अन्ततः उन्हें उस देवी से अभिन्न मानकर आराधना की। स्वामी गम्भीरानन्द स्पष्ट लिखते हैं कि इस पूजा ने अन्ततः माँ की देवी के साथ अभिन्नता स्थापित की। और वृन्दावन-प्रसंग में वही प्रामाणिक जीवनी माँ शारदा का यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथन दर्ज करती है—“I, indeed, am Radha.” — “मैं ही राधा हूँ।”
इसी तत्त्व को स्वामी विवेकानन्द ने दूसरी ओर से अत्यन्त स्पष्ट कर दिया। 1894 में स्वामी शिवानन्द को लिखे पत्र में वे माँ शारदा को मिट्टी की प्रतिमा में पूजी जाने वाली दुर्गा के विपरीत “the living Durga” — “जीवंत दुर्गा” कहते हैं और उनके लिए मठ स्थापित करने को अपनी प्राथमिकता बताते हैं। इस प्रकार रामकृष्ण-परम्परा के अपने प्रामाणिक स्रोतों से एक ही सूत्र सामने आता है—माँ शारदा श्रीराधा भी हैं; वे जीवंत दुर्गा भी हैं; और ठाकुर ने उन्हें स्वयं जगन्माता/षोडशी के रूप में पूजकर देवी से अभिन्न स्थापित किया। पूर्वोक्त शास्त्रीय प्रमाणों में श्रीराधा को योगमाया और दुर्गा कहा गया है; वही परम शक्ति महामाया/आद्याशक्ति के रूप में प्रकट होती है। अतः यहाँ भी राधा–योगमाया–महामाया–दुर्गा–जगन्माता किसी परस्पर असम्बद्ध देवियों का समूह नहीं, बल्कि उसी एक दिव्य शक्ति-तत्त्व की विभिन्न लीलात्मक अभिव्यक्तियाँ समझ में आती हैं।
9 . इस प्रकार महाराजजी–सिद्धि माँ और ठाकुर श्रीरामकृष्ण–माँ शारदा की लीलाएँ एक ही तत्त्व की ओर संकेत करती हुई दिखाई देती हैं।
मेरी समझ और श्रद्धा में महाराजजी और ठाकुर श्रीश्रीरामकृष्ण परमहंसदेव एक ही तत्त्व हैं—उन्हें साक्षात् प्रभु श्रीराम कहें अथवा साक्षात् प्रभु श्रीकृष्ण। ठाकुर ने स्वयं कहा—जो राम, जो कृष्ण, वही इस शरीर में रामकृष्ण; और महाराजजी की लीला में भी भक्तों ने उसी “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” [प्राचीन ऋग्वेद (1.164.46)] को बहुरूप में देखा-जाना-अनुभव किया। जित देखूं तित तू, महाराज जी! इसी प्रकार उनकी दिव्य शक्ति भी मूलतः एक ही तत्त्व है—उन्हें माता सीता, श्रीराधिका रानी, माँ शारदा, अथवा सिद्धि माँ के रूप में देखें।
श्रीरामकृष्ण-परम्परा स्वयं यह सिद्धान्त रखती है कि अवतार के साथ उसकी Divine Power भी आती है—राम के साथ सीता, कृष्ण के साथ राधिका; माँ शारदा ने स्वयं अपने को राधा कहा और स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें जीवंत दुर्गा कहा; दूसरी ओर महाराजजी ने सिद्धि माँ को “राधे” कहा और उन्हीं को “देवी कात्यायनी” कहा। अतः जिस समन्वित दृष्टि से राम और कृष्ण एक ही तत्त्व के लीलारूप हैं, उसी दृष्टि से सीता–राधा–दुर्गा–कात्यायनी–शारदा–सिद्धि माँ उसी एक परम शक्ति के लीलारूप समझ में आते हैं।
और तब महाराजजी के स्वरूप के सम्बन्ध में Divine Reality का वर्णन अत्यन्त अर्थपूर्ण हो उठता है। वहाँ भक्तों के अनुभवों का सार देते हुए लिखा गया है कि किसी ने महाराजजी को भगवान शिव के रूप में देखा, किसी ने श्रीराम के रूप में; किसी ने श्रीकृष्ण के रूप में; किसी ने देवी दुर्गा के रूप में; और किसी ने हनुमानजी के रूप में। ग्रन्थ इसके तुरन्त बाद कहता है कि महाराजजी भक्त के भाव के अनुरूप दिखाई देते थे और अपनी इच्छा से किसी भी रूप में प्रकट हो सकते थे। ग्रन्थ के लेखक श्रद्धेय रवि प्रकाश पाण्डे ‘राजीदा’ इसी अनुभूति को अपनी प्रार्थना में समेटते हैं—उनके लिए महाराजजी ही राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा और हनुमान हैं।
परन्तु इस पूरे विवेचन में मेरे लिए जो विशेष सूत्र प्रकट होता है, वह यह है कि महाराजजी स्वयं साक्षात् प्रभु श्रीराम—या यूँ कहें साक्षात् प्रभु श्रीकृष्ण—थे (हैं); और फिर भी उसी एक अनन्त तत्त्व ने भक्त के भाव के अनुसार कभी राम, कभी कृष्ण, कभी शिव, कभी हनुमान और यहाँ तक कि माँ दुर्गा के रूप में भी दर्शन दिये। तब प्रश्न उठता है—इस समष्टि को अन्ततः किस प्रकार समझा जाए?
यहीं आकर शब्द रुक जाते हैं और हम गोस्वामी तुलसीदासजी की शरण लेते हैं। श्रद्धेय रब्बू जी (Rabbu Joshi) ने भी इसी चौपाई को इतना केन्द्रीय माना कि अपनी पुस्तक का नाम ही रखा—सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। गोस्वामीजी कहते हैं—
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
अर्थात्—प्रभु को भक्त वैसा ही जानता है, जैसा प्रभु स्वयं जना देते हैं; और उन्हें वास्तव में जान लेने पर जानने वाला भी उन्हीं में एकाकार हो जाता है। यही शायद महाराजजी के स्वरूप के विषय में अन्तिम उत्तर है—उन्हें हमारी बुद्धि किसी एक नाम, एक रूप या एक परिभाषा में बाँध नहीं सकती; वे स्वयं जिसे, जितना और जिस रूप में अपना स्वरूप जना दें, वही उन्हें उतना जान पाता है।
10 . महाराजजी और ठाकुर श्रीश्रीरामकृष्ण—एक ही अद्वैत ब्रह्म-तत्त्व की दो लीलात्मक अभिव्यक्तियाँ
यदि पूर्वोक्त समस्त प्रसंगों को केवल अवतारवाद या सगुण भक्ति की दृष्टि से न देखकर अद्वैत ब्रह्म-तत्त्व की दृष्टि से देखा जाए, तो महाराजजी और ठाकुर श्रीश्रीरामकृष्ण के बीच एक और गहरा साम्य दिखाई देता है। श्रीश्री ठाकुर ने भक्ति, तन्त्र और विभिन्न सगुण-साकार साधनाओं की पराकाष्ठा के बाद तोतापुरी के निर्देशन में अद्वैत-वेदान्त की साधना की और निर्विकल्प समाधि प्राप्त की। रामकृष्ण परम्परा के आधिकारिक विवरण में इसे स्पष्टतः non-dualism (अद्वैत-ब्रह्म) की अवस्था तथा उनकी अद्वैत-साधना की पराकाष्ठा कहा गया है।
महाराजजी के सम्बन्ध में भक्त Ram Dass जी द्वारा संकलित ‘Miracle of Love’ में एक भक्त का अत्यन्त स्पष्ट कथन दर्ज है— “Maharajji was a follower of advait vad. He saw his own soul in everybody. For him it was all One.”
यह ध्यान रखना उचित है कि यह महाराजजी का स्वयं दिया हुआ दार्शनिक घोषणापत्र नहीं, बल्कि उनके निकट भक्त द्वारा उनके अनुभव का वर्णन है; किन्तु महाराजजी के विषय में उपलब्ध प्रत्यक्ष भक्त-साक्ष्यों में यह अद्वैत-तत्त्व का अत्यन्त स्पष्ट निरूपण है।
इसी ग्रन्थ में “(R.D.)” अर्थात स्वयं Ram Dass जी का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत संस्मरण है। वे लिखते हैं कि महाराजजी ने उनसे कहा— “Stay in the ajna chakra and think only of me.” अर्थात्—“आज्ञा-चक्र में स्थित रहो और केवल मेरा चिन्तन करो।” यह निर्देश अपने-आप में किसी सम्पूर्ण राजयोग-पद्धति का तकनीकी विवरण नहीं है; पर इतना अवश्य प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करता है कि महाराजजी ने कम-से-कम एक साधक को आज्ञा-चक्र में मन को स्थिर कर गुरु/ईश्वर पर एकाग्र रहने की साधना दी थी।
मेरे पूर्व लेख “DID MAHARAJ JI TEACH ADVAITA / RAJA-YOGA?” में उल्लिखित संकेतों—विशेषतः कैंची हनुमान तथा पनकी (कानपुर) नया हनुमान को महाराज जी द्वारा अद्भुत ढंग से ‘अद्वैत’ रूप में परिभाषित करते हुए “श्री अद्वैत संकटमोचन हनुमान” नाम देना तथा ‘Miracle of Love’ के उपरोक्त अद्वैत-विषयक वर्णन—के साथ इसे रखने पर द्वैत-भक्ति, भ्रूमध्य-एकाग्रता और अद्वैत-बोध के बीच एक गहरी अन्तःसम्बद्धता दिखाई देती है। यहीं उपनिषद् का सूत्र प्रासंगिक हो जाता है—
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।
— मुण्डक उपनिषद् 3.2.9
अर्थात्, “ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है।” अद्वैत-वेदान्त में इसका अर्थ किसी सीमित व्यक्ति का किसी दूसरी असीम सत्ता में परिवर्तित हो जाना नहीं, बल्कि उस मूल अभेद का प्रत्यक्ष अभेद-बोध है जो अज्ञान के कारण पहले छिपा हुआ था या द्वैतभाव से विभक्त प्रतीत होता था।
अतः इस लेख की श्रद्धामूलक (एवं अन्ततोगत्वा समाधिमूलक) अद्वैत-दृष्टि में महाराजजी और ठाकुर दो पृथक् महापुरुष नहीं हैं और न ही दो अलग-अलग तत्त्व हैं। नाम दो हैं, रूप दो हैं, लीलाएँ अलग-अलग हैं—किन्तु अन्तःस्थित ब्रह्म-तत्त्व एक है। सगुण-साकार भूमि पर वही तत्त्व राम, कृष्ण, रामकृष्ण अथवा महाराजजी के रूप में प्रेम और लीला करता है; और निर्गुण-निराकार भूमि पर वही रूपातीत, निर्विकल्प, अद्वैत ब्रह्म है।
11 . तुलसीदासजी के दो सूत्रों में साधना की सम्पूर्ण यात्रा—द्वैत और भाव से अद्वैत ब्रह्मबोध तक
गोस्वामी तुलसीदासजी के वाङ्मय की दो अत्यन्त गहरी पंक्तियों को साथ रखकर पढ़ने पर मेरे लिए साधना की पूरी यात्रा मानो एक सूत्र में स्पष्ट हो जाती है।
प्रथम—
सीय राममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
— श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड दोहा 7(घ).1
यहाँ साधक सम्पूर्ण जगत् को सीता–राममय देख रहा है। वृक्ष, मनुष्य, पशु, जगत्—सबमें वही प्रभु दिखाई देते हैं। फिर भी एक सूक्ष्म द्वैत अभी विद्यमान है—“मैं” देखने वाला हूँ, “वे” सर्वत्र दिखाई दे रहे हैं; मैं हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम कर रहा हूँ। अर्थात् द्रष्टा और दृश्य, भक्त और भगवान, उपासक और उपास्य का सम्बन्ध अभी बना हुआ है।
मेरे पूर्व लेखों में इसे साधना के मानचित्र पर सगुण-साकार भक्ति, द्वैतानुभूति, भाव-समाधि अथवा सविकल्प समाधि की भूमि के रूप में रखा गया है—जहाँ सर्वत्र ईश्वर का दर्शन तो हो गया है, किन्तु उस ईश्वर को देखने वाला चिंतक / विचारक / द्रष्टा / साधक “मैं” अभी विद्यमान है। इसी सीमित अर्थ में इसे द्रष्टा–दृश्य भेद की सांख्यवत् या द्वैतभावी अवस्था भी कहा जा सकता है। यहाँ “सांख्य” या “द्वैत” शब्द का प्रयोग कपिल के शास्त्रीय सांख्य-दर्शन के पर्याय के रूप में या मध्वाचार्य के द्वैतवाद की शास्त्रीय व्याख्या के रूप में नहीं, वरन् एक सच्चे साधक के अंतर्बोध की दृष्टि में ‘द्रष्टा–दृश्य’ अथवा जिद्दू कृष्णमूर्ति की भाषा में Observer–Observed के भेद की साधनात्मक उपमा के रूप में है। और फिर तुलसीदासजी कहते हैं—
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
— श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड 2.127
पहली अर्धाली—“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई”—में अभी भी भक्त और भगवान दो हैं: भगवान अपनी कृपा से भक्त को अपना स्वरूप जनाते हैं। यह भाव, भक्ति, अनुग्रह और सविकल्प भाव-समाधि की भूमि है।
किन्तु अगली ही अर्धाली में विलक्षण परिवर्तन होता है—
“जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।”
जानते-जानते ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिट जाता है। “तुम्हें” वास्तव में जानते-जानते “तुम्हइ”—तुम्हीं—हो जाता है। मुमुक्षु साधक की अद्वैतपरक साधनात्मक दृष्टि में यह सविकल्प से निर्विकल्प — भाव-समाधि से अद्वैत-ब्रह्मबोध — भक्त और भगवान के द्वैत से तत्त्वैक्य की ओर सहज प्रयाण है।
यही उपनिषद् दूसरे शब्दों में उद्घोषित करता है—
तत्त्वमसि श्वेतकेतो॥ — छान्दोग्य उपनिषद् 6.8.7
अर्थात्—वही सूक्ष्म परम तत्त्व इस सम्पूर्ण जगत् का आत्मस्वरूप है; वही सत्य है, वही आत्मा है—“तत् त्वम् असि”, हे श्वेतकेतु, तुम वही हो। शाङ्कर-अद्वैत परम्परा इस महावाक्य को जीवात्मा और ब्रह्म की मूल तात्त्विक अभिन्नता के उद्घोष के रूप में पढ़ती है।
अतः इन सूत्रों को एक साधनात्मक क्रम में इस प्रकार रखा जा सकता है
“सीय राममय सब जग जानी”
→ सर्वत्र प्रभु का दर्शन
→ सगुण-साकार
→ भक्त–भगवान सम्बन्ध
→ द्रष्टा–दृश्य भेद
→ भाव-समाधि / सविकल्प समाधि।
“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई”
→ प्रभु-कृपा से तत्त्व का प्रकाश
→ ज्ञाता अभी विद्यमान।
“जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई”
→ ज्ञाता–ज्ञेय भेद का विलय
→ सविकल्प से निर्विकल्प
→ निर्गुण-निराकार अद्वैत-ब्रह्मबोध। और— “तत्त्वमसि”
→ वह ब्रह्म तुम स्वयं हो। अखंड अभेद अद्वैत!
यही बात मुण्डक उपनिषद् दूसरे रूप में कहता है— ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।
इस दृष्टि में द्वैत असत्य अथवा व्यर्थ नहीं हो जाता; द्वैत साधना का प्रेममय द्वार है और अद्वैत उसका अन्तिम तत्त्वबोध। “मैं प्रभु को सर्वत्र देख रहा हूँ” से यात्रा आरम्भ होती है; “मैं और प्रभु मूलतः दो नहीं हैं” में वह पूर्ण होती है।
मेरे पूर्व लेखों में इसी कारण सगुण और निर्गुण, द्वैत और अद्वैत को परस्पर विरोधी खानों में बाँधने के बजाय एक ही परम सत्य की भिन्न अनुभूति-भूमियों के रूप में रखा गया है। और मेरी कविता “जित देखूं तित तू” में यही यात्रा मीन और जल, कुम्भ और जल की उपमाओं से आगे बढ़ती है—पहले दो दिखाई देते हैं; फिर दोनों की अभिन्नता दिखाई देती है; और अन्ततः नामकरण करने वाला “ज्ञानी” भी मौन हो जाता है। यह शब्दातीत, विचारातीत समाधि-स्थिति विचार-प्रदत्त ‘अद्वैत’ शब्द सहित प्रत्येक बौद्धिक संज्ञा से भी परे उस प्रत्यक्ष अनुभूति की ओर संकेत करती है, जिसके लिए शब्द केवल दिशा ही बता सकते हैं। यही जिद्दू कृष्णमूर्ति का “Observer-is-observed” या उपनिषद् का ‘तत्त्वमसि’ है।
जित देखूं तित तू
न जल बिनु मीन, न मीन बिनु पानी
जल ही मीन है, है मीन ही पानी।
यह मत कहे ग्यानी।
जल में कुंभ, कुंभ में जल है
भीतर बाहर पानी।
फूटा कुंभ, जल जल ही समाना
यह मत भी कहे ग्यानी।
न कोई मीन, न कोई पानी
न कुंभ, न मत, न कोई ग्यानी।
ओ मतवाले!
तू देख, तू देख जरा
सब बस पानी पानी!
सब बस पानी पानी!
इस प्रकार महाराजजी का—
“Stay in the ajna chakra and think only of me”
और तुलसीदासजी का—
“जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई”
मेरे लिए साधना के उसी एक आन्तरिक पथ का दो तरह से वर्णन है। प्रथम में गुरु/भगवान/साधना पर पूर्ण एकाग्रता; अन्त में उसी तत्त्व में ज्ञाता का अभेद-बोध। अब शब्द ही नहीं बचे महाराज जी! क्या बोलूं?
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
12 . (बाबा) आप कौन हैं? आपका मूल सत्य-स्वरूप क्या है?
महाराजजी के प्रथम दर्शन के कुछ वर्षों बाद श्री सिद्धि माँ को महाराजजी के विषय में बहुत-सी बातें सुनने को मिलीं—कुछ उल्टी-सीधी भी। लगभग 1946–50 के इस काल में उनके मन में महाराजजी के वास्तविक स्वरूप को जानने की जिज्ञासा और अधिक तीव्र हो उठी।
मन में प्रश्न उठने लगा—
“आप कौन हैं? आपका मूल सत्य-स्वरूप क्या है?”
तभी एक रात महाराजजी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा—
“तूने गीता के सातवें अध्याय का सातवाँ श्लोक पढ़ा है? मैं वही हूँ!”
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 7, श्लोक 7
भावार्थ:
हे धनञ्जय! मुझसे श्रेष्ठ अथवा मुझसे परे अन्य कोई परम तत्त्व नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें उसी प्रकार पिरोया हुआ है, जैसे मणियाँ एक सूत्र में पिरोई रहती हैं।
व्याख्या:
जैसे सूत से बनी मणियाँ और उन्हें पिरोने वाला सूत्र देखने में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, पर वास्तव में दोनों में सूत ही है; उसी प्रकार संसार के विविध नाम, रूप और प्राणी अलग-अलग दिखाई देते हैं, पर उन सबके मूल में वही एक परम तत्त्व है। स्वामी श्री रामसुखदासजी स्पष्ट करते हैं—“मणिरूप अपरा प्रकृति भी मेरा स्वरूप है और धागारूप परा प्रकृति भी मैं ही हूँ। दोनों में मैं ही परिपूर्ण हूँ, व्याप्त हूँ।” अर्थात् जड़ अपरा प्रकृति और चेतन परा प्रकृति—दोनों उस एक परम तत्त्व की ही प्रकृतियाँ हैं। जब वास्तविक तत्त्वबोध होता है, तब यह भेद मिटकर सर्वत्र वही एक परम तत्त्व दिखाई देता है।
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”
— छान्दोग्य उपनिषद् 3.14.1
प्रसंग: अनंत कथामृत, मुकुन्द (श्री प्रकाश चन्द्र जोशी), श्री कैंची हनुमान मंदिर एवं आश्रम।
(गीता-व्याख्या का आधार: स्वामी श्री रामसुखदासजी कृत श्रीमद्भगवद्गीता—साधक-संजीवनी, अध्याय 7, श्लोक 7, गीताप्रेस, गोरखपुर।)
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥ १॥
अर्थ:
तुम ही प्रत्यक्ष तत्त्व हो। तुम ही एकमात्र कर्ता हो, तुम ही एकमात्र धर्ता हो और तुम ही एकमात्र हर्ता हो। यह समस्त जगत् वास्तव में ब्रह्म है—और तुम वही ब्रह्म हो। तुम ही साक्षात् नित्य आत्मा हो।
— श्रीगणपत्यथर्वशीर्षम्
(गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद् / गणपत्युपनिषद्), मन्त्र 1
14 . पूज्य महाराजजी और श्रीश्री ठाकुर रामकृष्ण परमहंस वही हैं, जिनके लिए है श्रीमद्भगवद्गीता का यह अमर उद्घोष —
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
… धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
— श्रीमद्भगवद्गीता 4.7–4.8
15 . भ्रूमध्य समाधि – राजयोग सूत्र
पूज्य प्रेमानंदजी महाराज की एक एकांतिक वार्ता में एक महिला भक्त ने एक अत्यन्त गुह्य पद्यांश सुनाया था। उसे किंचित संशोधित करके मैं इस प्रकार प्रस्तुत कर रहा हूँ—
दृष्टिः स्थिरा विना दृश्यम्।
प्राणः स्थिरो विना यमम्।
वृत्तिः स्थिरा विना अवलम्बम्।
भ्रुवोर्मध्ये ब्रह्मास्मि सर्वथा॥
मेरी दृष्टि में इन चार पंक्तियों में राजयोग और समाधि-साधना के अनेक गहरे सूत्र एक साथ समाहित हो जाते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता 8.10 में भी यही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूत्र आता है—
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
इसी सूत्र की एक अद्भुत प्रतिध्वनि महाराजजी के उस प्रत्यक्ष निर्देश में मिलती है जो उन्होंने Ram Dass को दिया था—
“Stay in the ajna chakra and think only of me.”
अर्थात्—“आज्ञाचक्र में स्थित रहो और केवल मेरा चिन्तन करो।”
यहाँ श्रीमद्भगवद्गीता 9.22 का भाव भी सहज रूप से जुड़ जाता है—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
अर्थात् जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन और उपासना करते हुए निरन्तर मुझमें स्थित रहते हैं, उनका “योगक्षेमं वहाम्यहम्”—योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
ठाकुर श्रीश्रीरामकृष्ण की अद्वैत-साधना में भी भ्रूमध्य का यही सूत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रूप से सामने आता है। तोतापुरी महाराज ने श्रीरामकृष्ण को भ्रूमध्य-बिन्दु पर मन एकाग्र करने का निर्देश दिया और उसी साधना में ठाकुर निर्विकल्प समाधि में प्रविष्ट हुए। स्वामी सारदानन्द के श्रीश्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग के अनुसार नरेन्द्रनाथ ने जब ठाकुर से कहा कि उन्हें देह का बोध भूलकर साधना के लक्ष्य पर मन एकाग्र करने में कठिनाई होती है, तब ठाकुर ने अपने नाखून की नोक से उनके भ्रूमध्य में तीव्र संवेदना उत्पन्न कर उसी पर मन एकाग्र करने को कहा। नरेन्द्रनाथ के अनुसार इस उपाय से वे उस संवेदना पर मन स्थिर रख सके और शरीर के अन्य अंगों का बोध तक भूल गये। स्वामी सारदानन्द के श्रीश्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग में श्यामपुकुर-काल का भी एक प्रसंग आता है, जहाँ ठाकुर श्रीश्रीरामकृष्ण पद्मासन ग्रहण कर भ्रूमध्य में दृष्टि स्थिर करते हुए कहते हैं कि यह निराकार भगवान के ध्यान के लिए अत्यन्त प्रशस्त मुद्रा है। इसी प्रकार श्रीश्रीरामकृष्णकथामृत में भी निराकार-ध्यान के प्रसंग में ठाकुर दृष्टि को ललाट में स्थिर रखने की बात कहते हैं; प्रकाशित व्याख्या/टिप्पणी में इस “ललाट” को स्पष्टतः आज्ञा-चक्र—भौंहों के मध्य में कहा गया है। इस प्रकार श्रीश्रीठाकुर रामकृष्ण की शिक्षा में भ्रूमध्य/आज्ञा-चक्र को निराकार-ध्यान की साधना-भूमि के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पूज्य शिवरुद्रबालयोगी बाबाजी के भ्रूमध्य-केंद्रित ध्यान की शिक्षाएँ भी इसी संदर्भ में विशेष रूप से स्मरणीय हैं।
16 . महाराजजी का कथन—“Stay in the ajna chakra and think only of me”, अर्थात् “आज्ञाचक्र में स्थित रहो और केवल मेरा चिन्तन करो”—यदि भक्तिभाव अथवा द्वैतभाव से देखा जाए, तो साधक भ्रूमध्य में महाराजजी के स्वरूप का चिन्तन करता है। किन्तु तत्त्वदर्शन की दिशा में – पूज्य शिवरुद्रबालयोगी बाबाजी के “Just Watch”—न कोई मंत्र दोहराना, न कुछ कल्पना करना, केवल देखना—के अनुसार वही साधना क्रमशः निर्विषय साक्षीभाव में प्रवेश करती है; चित्तवृत्तियाँ शान्त होती हैं और द्रष्टा–दर्शन–दृश्य का भेद विलीन होकर अद्वैत ब्रह्मबोध प्राप्त होता है। यही पतञ्जलि का “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” (योगसूत्र 1.2) और अन्ततः उपनिषद् का “तत्त्वमसि” है। This is J. Krishnamurti’s effortless-choiceless awareness of ‘what is’ leading to Observer-is-observed. कैसी अद्भुत समष्टि!
17 . बाबा, राम भी तुम और कृष्ण भी तुम। व्यक्त भी तुम और अव्यक्त भी तुम। द्वैत भी तुम और अद्वैत भी तुम और इससे परे भी तुम! योग भी तुम और योगक्षेम भी तुम! तुम में हम! बस तुम ही तुम! बस तुम ही तुम!
जित देखूं तित तू!
न कोई मीन, न कोई पानी
न कुंभ, न मत, न कोई ग्यानी।
सब बस पानी पानी!
सब बस पानी पानी!
रमते कणे कणे इति रामः।
रमन्ते योगिनः यस्मिन् इति रामः।
जो कण-कण में रमते हैं, और जिनमें योगी रमण करते हैं—वही राम हैं।
संत कबीर कहते हैं—
सबमें रमै रमावै जोई, ताकर नाम राम अस होई।
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम हैं, दुनियाँ देखै नाँहि॥
अर्थात् वह राम बाहर कहीं दूर नहीं—घट-घट में, भीतर और सर्वत्र वही हैं। जिसे हम बाहर खोजते फिरते हैं, वही भीतर है, वही घट-घट में है, वही कण-कण में है।
लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल॥
जित देखूँ तित तू!
महाराजजी के समस्त भक्तों को मेरा शत-शत साष्टांग प्रणाम।
सीताराम। सीताराम।
श्री राम जय राम जय जय राम।
सीताराम। सीताराम।
महाराज जी, त्रिभुवन में आपकी जय होवे। इस अल्पज्ञ, अकिंचन दास का सिर आपके चरणों में झुका ही रहे। तेरा, तेरे ही द्वारा, तुझको ही अर्पण!
सन्दर्भ
1 . Jaya Prasada, Sri Siddhi Ma: The Story of Neem Karoli Baba’s Spiritual Legacy, India Penguin / Penguin Random House India, June 2022, ISBN 978-0-14-345783-1, 272 pp. “Radhe tu bad bhagini…” पद पुस्तक के Foreword से पहले के अनक्रमांकित प्रारम्भिक पृष्ठ पर है; इसलिए इसके लिए मुद्रित page-number देना उचित नहीं होगा। पुस्तक से वही आरम्भिक उद्धरण डॉ. जया प्रसादा के साथ Nina Rao की 7 August 2022 की प्रकाशित वार्ता में “from book before foreword” और “Neem Karoli Baba to Sri Siddhi Ma” के रूप में reproduced है।
2 . Ravi Prakash Pande ‘Rajida’, Divine Reality (Alokik Yatharath): Shri Baba Neem Karoli Ji Maharaj, translated from Hindi by Vidhu Bhushan Pant; translation edited by Jaya, Tara and Bali; published by Shri Kainchi Hanuman Mandir and Ashram, Kainchi, Nainital; First English Edition, 2003. अध्याय “His Omniscience”, Lila 1: Shri Siddhi Ma, p. 55: “The goddess Katyayani lives there. It is for Her that Hanuman had to come.”
- Shree Sankat Mochan Trust, “Neem Karoli Baba”, section “Shri Siddhi Maa”—महाराजजी द्वारा सिद्धि माँ के लिए “राधे तू बड़ी भगिनी…” पद तथा यह कथन कि वे “Devi Katyayani … for whom Hanuman (referring himself) had to come.”
- Śrīmad-Bhāgavata Mahāpurāṇa, Skandha 10, Adhyāya 22, विशेषतः 10.22.1–4—व्रज-कुमारिकाओं का कात्यायनी-व्रत तथा मन्त्र “कात्यायनि महामाये… नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।”
- Satyanarayana Dasa Babaji, “Śrī Rādhā in Bhāgavata Purāṇa,” Jiva Institute of Vedic Studies, 4 September 2022—भागवत में राधा का नाम प्रत्यक्षतः न आने तथा गौड़ीय परम्परा द्वारा अनामिका प्रधान गोपी की राधा के रूप में पहचान की व्याख्या।
- मानसतन्त्र-अन्तर्गत श्रीराधासहस्रनामस्तोत्रम्, विशेषतः श्लोक 51—“जगन्माता योगमाया”; तथा श्लोक 64—“दुर्गतिनाशिनी-राधा दुर्गा दुःखविनाशिनी।”
- Nārada-Pañcarātra, Dvitīya-rātra, Ṣaṣṭha Adhyāya, Śrī Rādhā-māhātmyam, verses 1–7—राधा को महालक्ष्मी, सरस्वती, सनातनी विष्णुमाया, सती-पार्वती और सर्वशक्तिस्वरूपा दुर्गा के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
- Devī-kavaca, verses 4–5—“पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च…” तथा “नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः”—कात्यायनी को छठी नवदुर्गा के रूप में स्थापित करता है।
- Śrīmad Devī-Bhāgavata Mahāpurāṇa, Skandha 7, Adhyāya 30, विशेषतः 7.30.53–54 में देवी-पीठों की सूची का प्रसंग और 7.30.69–70—“राधा वृन्दावने वने… चित्रकूटे तथा सीता…”।
- Śrīla Bhaktivedānta Nārāyaṇa Gosvāmī Mahārāja, “Who Is Praudhamaya?”, discourse delivered 24 March 2002, Koladvipa, Navadvipa Dhama Parikrama—श्रीराधिका को मूल अन्तरंगा स्वरूप-शक्ति तथा गोपियों द्वारा पूजित कात्यायनी को योगमाया की, और योगमाया को श्रीमती राधिका की आंशिक अभिव्यक्ति बताया गया है।
- Swami Vivekananda, The Complete Works of Swami Vivekananda, Vol. 6, p. 480, “Conversations and Dialogues” — काशीपुर में महासमाधि से दो दिन पूर्व ठाकुर का नरेन्द्रनाथ से कथन: “He who was Rama, He who was Krishna, verily is He now Ramakrishna in this body…”
- Swami Saradananda, Śrī Śrī Rāmakṛṣṇa Līlāprasaṅga, अन्त्यलीला/काशीपुर उद्यानबाटी प्रसंग — ठाकुर का पूर्वकथन: “যাইবার আগে হাটে হাঁড়ি ভাঙিয়া দিব”, जिसका स्वामी सारदानन्द स्वयं अर्थ देते हैं—जाने से पहले अपने देव-मानवत्व को सबके सामने प्रकट करना। पृष्ठ संख्या संस्करणानुसार बदलती है।
- Swami Gambhirananda, Holy Mother Sri Sarada Devi, Sri Ramakrishna Math, Chennai, Prelude — भगवान के अवतार के साथ Divine Power के अवतरण का सिद्धान्त; उदाहरण के रूप में Sita with Ramachandra और Sri Radhika with Krishna।
- Swami Gambhirananda, Holy Mother Sri Sarada Devi, Sri Ramakrishna Math, Chennai, षोडशी-पूजा का अध्याय; विशेषतः वर्णन कि श्रीरामकृष्ण ने माँ शारदा को देवी मानकर पूजा की और अन्ततः उनकी identity with the Deity स्थापित की। ग्रन्थ के online text में यह Shodashi-worship section तथा उसके note में स्पष्ट है।
- Swami Gambhirananda, Holy Mother Sri Sarada Devi, Sri Ramakrishna Math, Chennai, p. 142 — वृन्दावन-प्रसंग: “I, indeed, am Radha.”
- Swami Vivekananda, The Complete Works of Swami Vivekananda, Vol. 7, Epistles—Third Series, Letter to Swami Shivananda, U.S.A., 1894 — माँ श्रीशारदा देवी के लिए “the living Durga” तथा उनके मठ की स्थापना का आग्रह।
- Ravi Prakash Pande ‘Rajida’, The Divine Reality: Sri Baba Neeb Karori Ji Maharaj, First English Edition, Shri Kainchi Hanuman Mandir & Ashram, Kainchi, Nainital, 2003, Introduction, p. 27 — भक्तों द्वारा महाराजजी को शिव, राम, दुर्गा, बालक कृष्ण और हनुमान के रूप में देखे जाने का संक्षिप्त समेकित वर्णन; तथा “An Entreaty for Grace,” p. x में लेखक की प्रार्थना—महाराजजी में राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा और हनुमान का दर्शन।
- Goswami Tulsidas, Śrī Rāmacaritamānasa, Ayodhyā-kāṇḍa, Doha 127, Chaupai 2:
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
IIT Kanpur की Ramcharitmanas critical digital presentation में यही पाठ Ayodhyākāṇḍa 2.127 के अन्तर्गत है।
- Rabbu Joshi, सोइ जानइ जेहि देहु जनाई (Soi Janai Jehi Dehu Janai), Publisher: Rabindra Kumar Joshi, Delhi, Edition 2023, 306 pages, ISBN 9788190884310 — पुस्तक का शीर्षक ही गोस्वामी तुलसीदासजी की उक्त चौपाई से लिया गया है।
- Ram Dass, Miracle of Love: Stories about Neem Karoli Baba, E. P. Dutton, New York, First Edition, 1979, p. 141 — “Maharajji was a follower of advait vad. He saw his own soul in everybody. For him it was all One.” बाद के 1995 संस्करण में वही अंश p. 150 पर है।
- Ram Dass, Miracle of Love: Stories about Neem Karoli Baba, E. P. Dutton, New York, First Edition, 1979, p. 330 — “Stay in the ajna chakra and think only of me.” (R.D.) बाद के 1995 संस्करण में वही अंश p. 339 पर है।
- Ramakrishna Mission, “Sri Ramakrishna” — तोतापुरी के निर्देशन में श्रीरामकृष्ण द्वारा Nirvikalpa Samadhi प्राप्त करने और दीर्घकाल तक non-dual existence में रहने का आधिकारिक जीवन-वृत्तान्त।
- Chāndogya Upaniṣad, 6.8.7 — “तत्त्वमसि श्वेतकेतो”; उद्दालक–श्वेतकेतु संवाद।
- Muṇḍaka Upaniṣad, 3.2.9 — “स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति…”।
- Goswami Tulsidas, Śrī Rāmacaritamānasa, Bālakāṇḍa दोहा 7(घ).1 — “सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥” Gita Press पाठ में भी यही पाठ उपलब्ध है।
- Goswami Tulsidas, Śrī Rāmacaritamānasa, Ayodhyākāṇḍa 2.127 — “सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥”
- Manish Agarwala, “DID MAHARAJ JI TEACH ADVAITA / RAJA-YOGA?” — लेखक का निजी शोध-लेख/नोट; महाराजजी, Advait-vād, Ajñā-cakra, Bhrūmadhya-dṛṣṭi और Raja-Yoga सम्बन्धी संदर्भों का संकलन।
- Manish Agarwala, “WHO WAS THAKUR SRI SRI RAMAKRISHNA?” — लेखक का निजी शोध-लेख/नोट; श्रीरामकृष्ण के राम–कृष्ण स्वरूप, अद्वैत ब्रह्मबोध तथा “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” के आलोक में तात्त्विक विवेचन।
- Manish Agarwala, “प्रेमानंदजी महाराज के कथनानुसार एवं शिवरुद्रबालयोगी बाबाजी की शिक्षानुसार गोस्वामी तुलसीदास जी के वाङ्मय में अद्वैत ब्रह्म…” — निजी साधनात्मक टिप्पणी; “सीय राममय सब जग जानी” को सविकल्प/भाव-भूमि तथा “जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई” को सविकल्प से निर्विकल्प की दिशा में पढ़ने का प्रस्ताव।
- Manish Agarwala, “TAT TVAM ASI” — निजी आध्यात्मिक लेख; सगुण–निर्गुण, द्वैत–अद्वैत तथा “तत्त्वमसि” के समन्वित विवेचन पर।
- Manish Agarwala, “MA, WHO ARE YOU? DO I KNOW YOU?” — निजी आध्यात्मिक लेख; देवी के साकार एवं निराकार, द्वैत एवं अद्वैत दोनों आयामों का विवेचन।
- Manish Agarwala, “जित देखूं तित तू”, 17 May 2024 — सांख्य, विशिष्टाद्वैत, अद्वैत एवं अन्ततः शब्द/धारणा से परे प्रत्यक्ष दर्शन को मीन–जल तथा कुम्भ–जल की उपमाओं द्वारा व्यक्त करती रचना।
- अनंत कथामृत — मुकुन्द (श्री प्रकाश चन्द्र जोशी), श्री कैंची हनुमान मंदिर एवं आश्रम।
- स्वामी श्री रामसुखदासजी,
श्रीमद्भगवद्गीता—साधक-संजीवनी, 7.7। - छान्दोग्य उपनिषद् 3.14.1 — “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”।
- श्रीगणपत्यथर्वशीर्षम्, मन्त्र 1।
- श्रीमद्भगवद्गीता 4.7–8; 8.10; 9.22।
- नरेन्द्रनाथ–भ्रूमध्य प्रसंग के लिए स्वामी सारदानन्द का Sri Ramakrishna the Great Master / श्रीश्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग
