विशेष खोजी व समाजशास्त्रीय रिपोर्ट, इंडिया स्पीक डेली संपादकीय टीम। वृंदावन का रमणरेती और परिक्रमा मार्ग स्थित ‘श्री हित राधा केली कुंज’। स्मार्टफोन के स्क्रीन पर साठ सेकंड की रील्स और यूट्यूब पर राधा-नाम संकीर्तन के जरिए करोड़ों युवाओं में वैराग्य का भाव जगाने वाला प्रेमानंद जी महाराज का यह आध्यात्मिक केंद्र आज गंभीर विधिक, संस्थागत और नैतिक सवालों के भंवर में फंसा है।
चंद दिनों के भीतर सामने आए दो मामलों ने केवल भक्तों को ही नहीं, बल्कि समूचे समाज को स्तब्ध कर दिया है। पहले एक युवा साधक द्वारा वीभत्स तरीके से अंग-भंग कर आत्महत्या का खौफनाक मामला, और उसके तुरंत बाद एक किशोर साधक के तीन महीने तक गायब रहने पर बिलखते परिजनों का आश्रम के बाहर धरना।
क्या धर्म और विरक्ति के नाम पर खड़ा हुआ यह विशाल तंत्र अब एक ऐसे ‘टोटल इंस्टीट्यूशन‘ (Total Institution) में तब्दील हो चुका है, जहां से बाहर की दुनिया का संपर्क कट जाता है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या आज की युवा पीढ़ी आध्यात्मिक साधना के नाम पर जीवन के संघर्षों और कर्तव्यों से भागकर एक आत्मघाती पलायन (Escapism) के जाल में फंस रही है?
तथ्यान्वेषण: दोनों साधकों का पूरा ब्योरा; एक केस स्टडीज।
1. दीपक लोधी उर्फ ‘रसिक दुलारी शरण‘ की वीभत्स मौत
* पहचान: मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित गौर क्षेत्र (परसवाड़ा गांव) का पच्चीस वर्षीय होनहार युवक दीपक लोधी। आश्रम में दीक्षा मिलने के बाद प्रबंधन ने उसका नाम बदलकर ‘रसिक दुलारी शरण’ रख दिया था।

* घटना: 25 सितंबर 2026 की सुबह लगभग 10:30 बजे, प्रेमानंद महाराज के ‘गुरु कृपा कुंज’ आश्रम से सटी चार मंजिला आवासीय इमारत की छत से गिरकर दीपक की संदिग्ध मौत हो गई।
* फॉरेंसिक साक्ष्य व वीभत्स दृश्य:
*सीसीटीवी फुटेज के अनुसार, दीपक लहूलुहान अवस्था में अपने कमरे से निकला और उसने नीचे छलांग लगा दी।

*पोस्टमार्टम और पुलिस जांच में जो तथ्य सामने आए, वे दिल दहला देने वाले हैं—छत से कूदने से पहले दीपक का जननांग कटा हुआ था।
*पुलिस को कमरे की तलाशी में खून से सना इलेक्ट्रिक ग्राइंडर मिला, जिससे उसने अपना जननांग काटा था।
*अत्यधिक रक्तस्राव (Severe Hemorrhage) और ऊंचाई से गिरने से आई मल्टीपल फ्रैक्चर व अंदरूनी चोटों को डॉक्टरों ने मौत का कारण बताया।
*परिजनों का क्रंदन: दीपक पढ़ाई में उत्कृष्ट था और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। परिजनों का कहना है कि 2024 में दीक्षा के बाद आश्रम के नियमों के तहत उसका परिवार से संवाद पूरी तरह कटवा दिया गया। जब भी बूढ़े माता-पिता मिलने आते, उन्हें घंटों बैठाकर यह कहकर लौटा दिया जाता कि “वह अब विरक्त साधु हो चुका है, उसका सांसारिक मोह छूट चुका है।”
2. अनुज चौधरी का 3 महीने से लापता होना और परिजनों का धरना
* पहचान: उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के सादाबाद (बरामाई खेड़ा) का अठारह वर्षीय युवक अनुज चौधरी। परिवार का इकलौता बेटा और चार बहनों का अकेला भाई।

* घटनाक्रम: इसी वर्ष इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद अनुज सोशल मीडिया के जरिए प्रेमानंद जी के प्रवचनों से गहराई से प्रभावित हुआ। 26 जून को उसने विधिवत दीक्षा ली और 3 जुलाई को घर से कंठी-माला व आध्यात्मिक पुस्तकें लेकर आश्रम के लिए निकला, जिसके बाद वह रहस्यमय ढंग से लापता हो गया।
*आश्रम की संवेदनहीनता: पिछले तीन महीने से पिता राजवीर चौधरी, मां, दादी और चारों बहनें केली कुंज के चक्कर काट रही थीं। आश्रम के प्रतिनिधियों का रवैया टालमटोल भरा रहा—कभी कहा गया कि “वह यहां नहीं है”, तो कभी कहा गया कि “उसे ढूंढकर भेज देंगे।”
* थक-हारकर 2 अक्टूबर को पूरा परिवार ग्रामीणों के साथ केली कुंज आश्रम के मुख्य द्वार पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गया। बुजुर्ग दादी ने बिलखते हुए आरोप लगाया कि पूछताछ करने पर उन्हें आश्रम के सुरक्षाकर्मियों द्वारा धक्के देकर भगाया गया।

* भारी हंगामे, पुलिस (सीओ वृंदावन) के कड़े हस्तक्षेप और मीडिया का दबाव बढ़ने पर आश्रम प्रबंधन बैकफुट पर आया और लिखित-मौखिक रूप से स्वीकार किया कि युवक उनके आश्रम नेटवर्क में ही मौजूद है। इसके बाद कागजी कार्रवाई कर उसे परिजनों के सुपुर्द किया गया।
कुछ और केस स्टडीज: नोएडा की विभा सिंह का मामला
* विवरण: नोएडा के सेक्टर-122 (थाना कोतवाली फेज-3 क्षेत्र) की निवासी 35 वर्षीय विभा सिंह 15 अगस्त 2024 (स्वतंत्रता दिवस) के दिन से अपने घर से अचानक लापता हो गईं।
* घटनाक्रम: परिजनों के अनुसार, विभा कई वर्षों से संत प्रेमानंद जी महाराज के प्रवचनों और विचारों से गहराई से प्रभावित थीं। वे अक्सर बिना बताए या बताकर 1-2 दिन के लिए वृंदावन दर्शन करने जाती थीं, लेकिन हमेशा वापस लौट आती थीं। 15 अगस्त को निकलने के बाद जब वह कई दिनों तक नहीं लौटीं और उनका फोन बंद मिला, तो परिजनों ने नोएडा पुलिस में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई।
* वृंदावन में परिजनों की खोजबीन: जब कोई सुराग नहीं मिला, तो परिजन (भाई और अन्य रिश्तेदार) खोजते हुए सीधे वृंदावन स्थित श्री हित राधा केली कुंज आश्रम पहुंचे। परिजनों को संदेह था कि शायद वह विरक्त होकर आश्रम में ही सेवादार या साधिका बन गई हों।
* आश्रम की प्रतिक्रिया: आश्रम प्रबंधन ने परिजनों को स्पष्ट किया कि विभा सिंह आश्रम परिसर में नहीं हैं। प्रबंधन ने अपना आधिकारिक नियम दोहराते हुए कहा कि “बिना माता-पिता/परिजनों की लिखित सहमति और कानूनी सत्यापन के आश्रम में किसी को भी स्थायी शरण या दीक्षा नहीं दी जाती।” पुलिस और स्थानीय स्तर पर खोजबीन के बावजूद आश्रम के भीतर उनकी मौजूदगी का कोई प्रमाण नहीं मिला।
घटनाओं के पीछे एक खास पैटर्न और अन्य घटनाएं!
विभा सिंह, दीपक लोधी और अनुज चौधरी के मामले कोई इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं हैं। पिछले 2–3 वर्षों में जैसे-जैसे प्रेमानंद जी महाराज के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, वृंदावन ‘लापता युवाओं और महिलाओं‘ का एक बड़ा केंद्र बिंदु बन गया है। मथुरा-वृंदावन पुलिस और स्थानीय मीडिया के रिकॉर्ड में ऐसे कई मामले दर्ज हैं:
1. राजस्थान के बीटेक छात्र का मामला (कोटा/जयपुर कनेक्शन)
* मामला: प्रतियोगी परीक्षा (JEE) की तैयारी कर रहा एक 20 वर्षीय छात्र अचानक हॉस्टल और घर छोड़कर गायब हो गया। उसने अपने सुसाइड नोट जैसे पत्र में लिखा कि “संसार व्यर्थ है, मैं राधा-रानी के चरणों में जा रहा हूँ।”
* बरामदगी: परिजनों ने जब साइबर सेल की मदद से उसका अंतिम मोबाइल लोकेशन ट्रैक किया, तो वह वृंदावन परिक्रमा मार्ग का निकला। कई दिनों की तलाश के बाद वह रमणरेती क्षेत्र में एक धर्मशाला में मिला। उसने बताया कि वह प्रेमानंद जी के सानिध्य में संन्यास लेने आया था, लेकिन आश्रम में प्रवेश के कड़े नियमों के कारण वह बाहर ही भटक रहा था।
2. हरियाणा (गुरुग्राम) की कॉर्पोरेट युवती का लापता होना
* मामला: 28 वर्षीय एक युवती, जो एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत थी, अचानक नौकरी और परिवार छोड़कर गायब हो गई। परिजनों ने उसकी डायरी और यूट्यूब हिस्ट्री से पाया कि वह पिछले 8 महीनों से लगातार प्रेमानंद जी के ‘एकांतिक वार्तालाप’ और वैराग्य के वीडियो देख रही थी।
* परिणाम: परिजन पुलिस के साथ वृंदावन पहुंचे और आश्रम के बाहर कई दिनों तक पोस्टर लगाए। बाद में पुलिस ने उसे वृंदावन के ही एक अन्य महिला आश्रम/गेस्ट हाउस से बरामद किया, जहां वह छद्म नाम से रह रही थी।
3. बिहार और मध्य प्रदेश से भागे किशोर (नाबालिग)
* स्थानीय पुलिस (वृंदावन कोतवाली) के अनुसार, हर महीने औसतन 3 से 5 ऐसे किशोर या युवक-युवतियां ट्रेस होते हैं जो घर से भागकर केवल इसलिए वृंदावन आ जाते हैं क्योंकि वे “महाराज जी के पास रहकर साधु बनना चाहते हैं।”
* अधिकांश को आश्रम की आंतरिक सुरक्षा टीम गेट से ही लौटा देती है या जब वे बाहर भटक रहे होते हैं, तो स्थानीय पुलिस/चाइल्ड हेल्पलाइन उन्हें पकड़कर परिजनों को सौंपती है।
‘वृंदावन सिंड्रोम‘ (The Vrindavan Syndrome)
समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसे विशेषज्ञों द्वारा ‘वृंदावन सिंड्रोम‘ या ‘धार्मिक सम्मोहन जनित पलायन‘ कहा जा रहा है:
1 . आश्रम का रक्षात्मक रुख बनाम जमीनी हकीकत: आश्रम का यह दावा कानूनी रूप से सही है कि वे ‘बिना सहमति दीक्षा नहीं देते’। लेकिन समस्या आश्रम के भीतर से ज्यादा आश्रम के बाहर पैदा हो रही है। सोशल मीडिया पर जो वैराग्य परोसा जा रहा है, वह कमजोर मानसिक स्थिति वाले लोगों (जैसे अवसादग्रस्त, पारिवारिक झगड़ों से परेशान या करियर में असफल लोग) के लिए एक ‘चुंबक’ बन गया है।
2 . अकेलापन और असुरक्षा: विभा सिंह जैसी महिलाएं या दीपक-अनुज जैसे युवा जब घर छोड़ते हैं, तो आश्रम उन्हें अंदर नहीं लेता। इसका भयावह परिणाम यह होता है कि ऐसे लोग वृंदावन की गलियों, घाटों, गेस्ट हाउसों और आपराधिक तत्वों के बीच लावारिस भटकने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
3 . संस्थागत दायित्व का अभाव: भले ही आश्रम हर किसी को शरण न देता हो, लेकिन क्योंकि यह पूरी भीड़ उनके नाम और डिजिटल प्रचार के प्रभाव से खिंची चली आ रही है, इसलिए संस्था केवल यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती कि “हमारे यहां कोई नहीं है।” एक बड़े धार्मिक केंद्र के रूप में उनके पास ‘लापता प्रकोष्ठ’ (Missing Helpdesk) और स्थानीय पुलिस के साथ त्वरित समन्वय का सिस्टम होना नैतिक रूप से अनिवार्य है।
दीपक और अनुज मामले में पुलिसिया कार्रवाई, फॉरेंसिक साक्ष्य और कानूनी धाराओं का आईना
इन दोनों प्रकरणों ने मथुरा-वृंदावन जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली को भी जांच के दायरे में खड़ा कर दिया है:
| प्रकरण | विधिक स्थिति व धाराएं | पुलिस जांच के अहम बिंदु |
| दीपक लोधी की मौत | BNSS धारा 194 (पूर्व CrPC 174) के तहत अस्वाभाविक मौत दर्ज। परिजनों के बयानों के आधार पर BNS धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना / पूर्व IPC 306) की संभावना। | इलेक्ट्रिक ग्राइंडर और कमरे के फिंगरप्रिंट की फॉरेंसिक जांच। यह पड़ताल कि घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी गई और अस्पताल ले जाने में क्या समय बीता (साक्ष्य छिपाने का पहलू – BNS 238)। |
| अनुज चौधरी का गायब होना | हाथरस व मथुरा में गुमशुदगी (Missing Report)। परिजनों के आरोपों के आधार पर BNS धारा 127 (अवैध रूप से बंधक बनाना / पूर्व IPC 342) का विधिक परीक्षण। | तीन महीने तक एक युवक को परिवार से छिपाकर रखने का औचित्य। बालिग होने की स्थिति में उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) बनाम परिवार को गुमराह करने के प्रशासनिक दायित्व की जांच। |
समाजशास्त्रीय विश्लेषण: ‘डिजिटल वैराग्य‘ और इरविंग गॉफमैन का ‘टोटल इंस्टीट्यूशन‘
यह घटना केवल दो युवकों की निजी त्रासदी नहीं है, बल्कि हमारे आधुनिक समाज के ताने-बाने में फैल रही एक गंभीर व्याधि का लक्षण है:
1. अल्गोरिद्म जनित सतही विरक्ति (Algorithm-Driven Asceticism)
सोशल मीडिया के अल्गोरिद्म ने ‘त्याग’, ‘मृत्यु-बोध’ और ‘संसार की व्यर्थता’ को छोटे-छोटे भावुक वीडियो में इतना महिमामंडित कर दिया है कि जीवन के शुरुआती संघर्षों, करियर के दबाव और पारिवारिक तनाव से जूझ रहे युवा इसे एक आसान ‘शॉर्टकट’ मान लेते हैं। इस सतही आकर्षण को युवा ‘सच्चा वैराग्य’ समझ बैठते हैं, जबकि वास्तविकता में यह जीवन की चुनौतियों से डरकर भागने का मनोवैज्ञानिक पलायन (Psychological Escapism) होता है।
2. इरविंग गॉफमैन का ‘टोटल इंस्टीट्यूशन‘ और ‘स्वत्व का हनन‘
प्रसिद्ध समाजशास्त्री इरविंग गॉफमैन (Erving Goffman) ने अपनी कृति ‘Asylums’ में ‘टोटल इंस्टीट्यूशन’ (पूर्ण संस्थान) की अवधारणा प्रस्तुत की थी—ऐसे स्थान (जैसे कठोर मठ, आश्रम, जेल) जहां व्यक्ति की बाहरी दुनिया से कड़ी पूरी तरह काट दी जाती है।

गॉफमैन के अनुसार, ऐसे संस्थानों में प्रवेश करते ही व्यक्ति का ‘मॉर्टिफिकेशन ऑफ द सेल्फ‘ (Mortification of Self – स्वत्व का विखंडन) किया जाता है। उसकी पुरानी पहचान, उसका नाम (जैसे दीपक लोधी से ‘रसिक दुलारी शरण’), उसके वस्त्र, उसका फोन और उसके पारिवारिक संबंध सब कुछ छीन लिए जाते हैं।
जब एक अपरिपक्व युवा अपनी पुरानी पहचान खो देता है और नए आध्यात्मिक सांचे में खुद को ढाल नहीं पाता, तो वह भीतर से पूरी तरह बिखर जाता है। बाहरी संबल खत्म हो चुका होता है और भीतर केवल एक भयावह अकेलापन बचता है।
3. एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim) का ‘अनोमी‘ और आत्मघात
आधुनिक समाजशास्त्र के जनक एमिल दुर्खीम ने अपने ऐतिहासिक अध्ययन ‘Suicide’ में स्पष्ट किया था कि जब समाज या किसी संस्था के नियम व्यक्ति पर इतने अधिक कठोर, दमनकारी और अस्वाभाविक हो जाते हैं कि उसके सोचने-समझने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, तो वह ‘भाग्यवादी आत्महत्या‘ (Fatalistic Suicide) की ओर बढ़ता है। दीपक लोधी का ग्राइंडर से अपना जननांग काटना और छत से छलांग लगाना इसी असहनीय संस्थागत दबाव और शून्य हो चुके जीवन का वीभत्स परिणाम प्रतीत होता है।

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: काम–दमन, सखीभाव का विकृत अनुकरण और साइकोसिस
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से किसी पच्चीस वर्षीय युवा द्वारा अपने ही जननांग को काटना एक अत्यंत गंभीर मानसिक टूटन की ओर इशारा करता है:
1. सिगमंड फ्रायड (Sigmund Freud) का काम–दमन (Repression of Libido)
भारतीय भक्ति परंपरा में सखीभाव या राधाभाव अत्यंत उच्च और सूक्ष्म आंतरिक साधना है। जब बीस-पच्चीस वर्ष का एक सामान्य जैविक युवा बिना किसी मानसिक तैयारी के इस मार्ग में उतरता है, तो उसकी स्वाभाविक शारीरिक और कामुक ऊर्जा (Libido) समाप्त नहीं होती। आश्रम के वातावरण में जब उसे निरंतर यह सिखाया जाता है कि “काम वासना नरक का द्वार है और शरीर अपवित्र है”, तो उसके भीतर स्वाभाविक जैविक प्रवृत्तियों के प्रति तीव्र अपराधबोध (Guilt) और आत्म-घृणा (Self-Loathing) भर जाती है। जब दमित इच्छाओं को कोई स्वस्थ अभिव्यक्ति (Sublimation) नहीं मिलती, तो वे विकृत रूप ले लेती हैं। दीपक का अपने ही लिंग को काटना इसी दमित अपराधबोध का हिंसक विस्फोट था। उसने काम-वासना को समाप्त करने के लिए अपने जननांग को ही शत्रु मान लिया—यह एक चरम एक्यूट साइकोसिस (Acute Psychosis) की अवस्था थी, जिसकी पहचान आश्रम में किसी ने नहीं की।

2. सखीभाव की उच्च आध्यात्मिक अवस्था बनाम कच्ची समझ का घातक अनुकरण
वृंदावन की सखी और राधावल्लभ परंपरा में ‘सखीभाव’ अथवा ‘गोपीभाव’ अत्यंत उच्च कोटि के, सिद्ध और पूर्णतः जितेंद्रिय संतों के लिए विहित साधना मानी गई है। यह कोई शारीरिक अनुकरण नहीं, बल्कि चेतना की पराकाष्ठा है। त्रासदी यह है कि सोशल मीडिया के इस दौर में सांसारिक तनाव से भागे अपरिपक्व युवाओं को बिना किसी साधना और मनोवैज्ञानिक परिपक्वता के इस गूढ़ मार्ग में धकेल दिया जाता है। जब स्थूल देह-भाव में जीने वाला युवा इस आंतरिक भाव का विकृत और बाह्य अनुकरण करने का प्रयास करता है, तो वह आत्मिक शांति पाने के बजाय भीषण मानसिक विक्षिप्तता और आत्म-विनाशकारी उन्माद का शिकार हो जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता का शाश्वत संदेश: अर्जुन का ‘विषाद‘ और श्रीकृष्ण का ‘कर्मयोग‘
आज के युवा जो घर, बूढ़े माता-पिता और सामाजिक उत्तरदायित्वों को लावारिस छोड़कर आश्रमों की ओर भाग रहे हैं, उन्हें कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के संवाद को गहराई से समझना चाहिए।

1. अर्जुन का झूठा वैराग्य (अर्जुन–विषाद योग)
महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन ने अपने परिजनों को सामने देखा, तो वह मोह और भय से ग्रस्त हो गए। उन्होंने अपने गांडीव को रखकर पलायनवादी संन्यास का तर्क दिया:
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च…श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके… (गीता 1.32, 2.5) (हे कृष्ण! मुझे ऐसा राज्य और सुख नहीं चाहिए। इससे तो भला यह है कि मैं भिक्षा मांगकर जीवन बिताऊं और संन्यास ले लूं।)
अर्जुन का यह वैराग्य किसी आत्मज्ञान से नहीं उपजा था, बल्कि यह जिम्मेदारी से भागने की कायरता और अवसाद (Depression & Escapism) था।
2. श्रीकृष्ण की फटकार: पलायन वैराग्य नहीं, नपुंसकता है
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस तथाकथित त्याग की कोई प्रशंसा नहीं की, बल्कि उसे तीखी डांट पिलाते हुए कहा:
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं
त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥ (गीता 2.3) (हे अर्जुन! इस नपुंसकता (कायरता) को मत प्राप्त हो, यह तेरे योग्य नहीं है। हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो!)
3. कर्म का त्याग नहीं, फल की आसक्ति का त्याग ही सच्चा संन्यास है
श्रीकृष्ण ने गीता के तीसरे और पांचवें अध्याय में स्पष्ट किया कि समाज और परिवार को छोड़कर जंगल या आश्रम भाग जाना संन्यास नहीं है:
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥ (गीता 3.4) (न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता को पाया जा सकता है, और न ही केवल कर्मों के बाह्य त्याग से सिद्धि मिलती है।)
भगवान ने उन लोगों को ‘मिथ्याचारी‘ कहा जो बाहर से तो कपड़े बदलकर संन्यासी बन जाते हैं, लेकिन मन ही मन सांसारिक वासनाओं में जलते रहते हैं:
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥ (गीता 3.6)
श्रीकृष्ण का संदेश स्पष्ट है: संसार में रहकर, अपने परिवार का भरण-पोषण करते हुए, अन्याय और संघर्षों से लड़ते हुए निष्काम भाव से कर्म करना ही परम धर्म है। बूढ़े मां-बाप को रोता-बिलखता छोड़कर भाग जाना धर्म नहीं, बल्कि कर्तव्य-च्युति और पाप है।
संपादकीय टिप्पणी
आज की युवा पीढ़ी को यह समझने की आवश्यकता है कि धर्म जीवन को समृद्ध, शक्तिशाली और संवेदनशील बनाने का साधन है, जीवन से पलायन करने का बहाना नहीं।
यदि आप करियर, बेरोजगारी, पारिवारिक तनाव या व्यक्तिगत असफलताओं से टूटकर किसी आश्रम में शरण खोज रहे हैं, तो रुकिए। वह भक्ति नहीं, आपका अवसाद है। संन्यास किसी भगोड़े का रास्ता नहीं है, वह तो अंतस की यात्रा है जो कर्तव्य पूरे करने के बाद स्वतः घटित होती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र छोड़कर वृंदावन की कुंज गलियों में छिपने को नहीं कहा था, बल्कि गांडीव उठाकर अपने हिस्से का युद्ध लड़ने का आदेश दिया था। अपने माता-पिता की सेवा कीजिए, अपनी पढ़ाई और काम में पसीना बहाइए, और जीवन के हर थपेड़े का सीना तानकर सामना कीजिए—यही गीता का अमर कर्मयोग है, और यही आज के भटके हुए युवाओं के लिए मुक्ति का एकमात्र सच्चा मार्ग है।
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जय सियाराम हर हर!गिता का कर्म योग जय योगेश्वर!
बहुत ही शोधपूर्ण लेख है
एक और पाखंड का रहस्य उजागर हुआ l
दुर्भाग्य है कि सनातनी स्वयं धर्म का अध्ययन और अनुभव करने के बजाय किसी भेड़चाल मे जीवन का महत्वपूर्ण समय बर्बाद करते हैं l