जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज हिंदू धर्म के एक प्रखर ध्वजवाहक, आध्यात्मिक गुरु और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें ‘क्रांतिकारी साधु’ के रूप में भी जाना जाता था क्योंकि उन्होंने धर्म के साथ-साथ राष्ट्र के मुद्दों पर भी मुखर होकर अपनी राय रखी।
यहाँ उनका विस्तृत विवरण दिया गया है:
1. जीवन परिचय (संक्षिप्त)
जन्म: 2 सितंबर, 1924 (मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गाँव में)।
बचपन का नाम: पोथीराम उपाध्याय।
ब्रह्मलीन (निधन): 11 सितंबर, 2022 (मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में)।
गुरु: स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती (ज्योतिर्मठ के तत्कालीन शंकराचार्य)।
2. पद और उत्तरदायित्व
वे एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे क्योंकि उन्होंने एक साथ दो प्रमुख पीठों के शंकराचार्य के रूप में कार्य किया:
द्वारका-शारदा पीठ (गुजरात): पश्चिम भारत की प्रमुख पीठ।
ज्योतिर्मठ पीठ (उत्तराखंड): उत्तर भारत की प्रमुख पीठ।
3. स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
स्वामी स्वरूपानंद जी केवल आध्यात्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि एक देशभक्त भी थे।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942): मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में भाग लिया।
जेल यात्रा: उन्होंने वाराणसी और मध्य प्रदेश की जेलों में क्रमशः 9 और 6 महीने की सजा काटी। उन्हें ‘क्रांतिकारी साधु’ की उपाधि भी इसी संघर्ष के कारण मिली।
4. प्रमुख कार्य और योगदान
सनातन धर्म का संरक्षण: उन्होंने शास्त्र सम्मत परंपराओं को जीवित रखने के लिए निरंतर कार्य किया।
राम मंदिर आंदोलन: वे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के कट्टर समर्थक थे, हालांकि उनकी विचारधारा अन्य संगठनों से थोड़ी भिन्न और पूरी तरह शास्त्र सम्मत थी।
समाज सुधार: उन्होंने छुआछूत जैसी कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई और गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाने की पुरजोर वकालत की।
संस्थानों की स्थापना: उन्होंने नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) में ‘झोतेश्वर परमहंसी गंगा आश्रम’ की स्थापना की, जो आज एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है।
5. व्यक्तित्व की विशेषताएं
विद्वता: वे वेदों और शास्त्रों के महान ज्ञाता थे।
निर्भीकता: वे राजनीतिक नेताओं की आलोचना करने से कभी नहीं हिचकिचाते थे यदि उन्हें लगता था कि वे धर्म के विरुद्ध जा रहे हैं।
सरलता: ऊँचे पद पर होने के बावजूद वे अपने भक्तों के लिए सदैव सुलभ रहते थे।
”स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी का मानना था कि धर्म और राष्ट्र अलग नहीं हैं; धर्म के बिना राष्ट्र और राष्ट्र के बिना धर्म की रक्षा संभव नहीं है।”
श्री भक्ति दर्शन
