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India Speak Daily > Blog > Blog > SDeo blog > मेरे स्वर्गीय पिताजी को गाड़ी का बड़ा शौक था।
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मेरे स्वर्गीय पिताजी को गाड़ी का बड़ा शौक था।

Sandeep Deo
Last updated: 2025/12/02 at 5:16 PM
By Sandeep Deo 12 Views 6 Min Read
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6 Min Read
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संदीप देव। मेरे स्वर्गीय पिताजी को गाड़ी का बड़ा शौक था। उनके पास चढ़ने के लिए हमेशा कोई न कोई गाड़ी रहती थी। उनकी आखिरी गाड़ी #MahindraQuanto थी। काफी समय वह गाड़ी उनके पास रही। उस गाड़ी के इंजन में जब कुछ समस्या आई तो पिताजी ने 2020 में उसे बेच दिया।

मैंने अपनी कमाई से पहली गाड़ी #HondaAmaze ली। पिताजी ने ही फोन पर कहा था कि ‘कार लेना!’ उनको लगता होगा कि उनके पत्रकार और लेखक बेटे की पर्सनालिटी पर कार सूट करेगा SUV आदि नहीं। मैंने उनके कहे अनुसार ही 2020 में कार (सिडान सेक्शन) लिया। यह ऑटोमैटिक गाड़ी है। यह सुनकर पिताजी बहुत खुश हुए कि घर में पहली ऑटोमैटिक गाड़ी आई है!

जब उसी वर्ष छठ महापर्व पर हम गाड़ी से गांव पहुंचे तो पिताजी हमेशा की तरह दरवाजे पर मुस्कुराते हुए हमारे स्वागत के लिए खड़े थे। हम उतरे, उन्हें प्रणाम किया, उन्होंने आशीर्वाद दिया और झट से गाड़ी की चाभी लेकर गाड़ी का टेस्ट ड्राइव करने लगे। मां को भी बुलाकर आगे की सीट पर बैठा लिया। फिर वह गाड़ी चलाने लगे। यह तस्वीर तब की ही है। लगा ही नहीं कि वह ऑटोमैटिक गाड़ी पहली बार चला रहे हैं। वह कितने खुश थे! बाद में मुझे समझ आया कि उनकी यह खुशी इसलिए थी कि उनके बेटे ने अपनी कमाई से पहली गाड़ी ली थी!

किसी भी नयी तकनीक को सीखने के प्रति उनका जो लगाव था, उसकी बराबरी तो हम लोग भी नहीं कर सकते‌। मोबाइल पर जैसे हम लोग अपना ऑफिस चलाते हैं, वैसे ही वह सबकुछ ऑनलाइन शापिंग से लेकर पेमेंट तक और सोशल मीडिया उपयोग करने से लेकर कुछ देखने तक सबकुछ वह मोबाइल पर करते थे।

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पिछले ही साल पोता जिज्ञासु अपनी कमाई से दादाजी के लिए मोबाइल लेकर आया था। जब पिताजी चले गये तो रोती हुई मेरी मां ने मुझसे कहा, ‘बउआ महापात्र के दान में मोबाइल जरूर दीहे। पिताजी के मोबाइल बहुत पसंद रहउ!’ (बेटा महापात्र को दान में मोबाइल देना। तुम्हारे पिताजी को वह बहुत पसंद था) मैंने मां के आदेशानुसार महापात्र और अपने पुरोहित पंडित जी को लेटेस्ट मोबाइल दान में दिया। पूरे परिवार को खुशी मिली कि पिताजी का प्रिय चीज हम दान कर सके!

टेलीविजन का भी उन्हें बड़ा शौक था। दिन के हिसाब से वह भजन सुनते थे। जैसे सोमवार को शिव जी का, मंगलवार को हनुमान जी का भजन टीवी पर सुबह ही चलने लगता था। जब वह हमारे साथ बहादुरगढ़ रहते थे तो सुबह-सुबह टीवी पर भजन की आवाज से हमारी नींद टूटती थी। धर्मपत्नी Shweta Deo कहती थी कि ‘बच्चों और बुजुर्गो के कारण घर में रौनक रहती है, अन्यथा लगता ही नहीं कि घर में कोई रहता है!’

पिछले ही साल पिताजी का टीवी खराब हो गया। मुझे उन्होंने फोन किया। मैंने कहा बनने के लिए भेज दीजिए। उन्होंने एजेंसी को फोन किया, एजेंसी ने कहा कि अभी पार्ट्स नहीं है। एक सप्ताह लग जाएगा। मैंने सोचा, बिना टीवी पिताजी एक सप्ताह कैसे रहेंगे? मैंने समस्तीपुर के टीवी एजेंसी को फोन कर नया टीवी खरीद कर पिताजी को भिजवा दिया। मां कहती है कि ‘वह बच्चों की तरह दरवाजे पर टीवी लाने वाले की प्रतीक्षा कर रहे थे!’

मेरे बेटे जिज्ञासु ने अपनी कमाई से जब मुझे #TataCURVV गाड़ी खरीद कर दिया तो मैंने पिताजी से कहा कि अमेज आप रख लीजिए। आपके पास गाड़ी रहेगी तो मां को घुमाइएगा। अपनी मृत्यु के केवल 26 दिन पहले वह दिल्ली से बिहार के लिए गाड़ी से ही चल दिए थे।

मैं कहता था कि मैं गाड़ी भिजवा देता हूं। मेरा ड्राईवर यहां से लेकर गांव पहुंचा देगा। उन्होंने कहा, ‘नहीं मैं अयोध्या घूमते हुए घर जाऊंगा।’ उन्होंने बिहार से ड्राइवर को बुला लिया और मां के साथ अमेज से अयोध्या घूमते हुए एवं रामलला का दर्शन करते हुए गांव पहुंचे थे।

आज गांव में कवर लगा अमेज घर के पोर्टिको में खड़ा है! पिताजी उस गाड़ी पर ठीक से चढ़ भी नहीं सके और इस दुनिया से विदा हो गये!

पिताजी के फोटो एलबम से अमेज चलाती उनकी यह तस्वीर निकल आई तो यादों का पिटारा खुलता चला गया! भाग्यशाली हैं वो लोग जो लंबे समय तक अपने माता-पिता के साए में रहते हैं। यह साया जब तक रहता है, हमें अपने बड़े होने का एहसास नहीं होता! आज अचानक लगता है कि मैं अनाथ भी हो गया हूं और अपनी उम्र से बड़ा भी हो गया हूं‌!

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Sandeep Deo December 2, 2025
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Sandeep Deo
Posted by Sandeep Deo
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