संदीप देव। आधुनिक भारत के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में डॉ. भीमराव आंबेडकर के लेखन को अक्सर एक निर्विवाद सत्य और अकाट्य ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परंतु एक गंभीर समाजशास्त्री और शोधार्थी के रूप में डॉ. आंबेडकर का मूल्यांकन करते समय हमें यह देखना अनिवार्य है कि उन्होंने जाति की उत्पत्ति और अस्पृश्यता के कारणों को समझाने के लिए कौन सी कार्यपद्धति (Methodology) अपनाई और उनके निष्कर्षों का ऐतिहासिक आधार क्या था।
एपिसोड-3: डॉ. आंबेडकर का जाति विमर्श: ‘Who Were the Shudras?’ और ‘The Untouchables’ की मूल परिकल्पनाएँ एवं उनके अंतर्विरोध
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Journalist from 2.5 decades | Bestseller Author by Nielsen Jagran | Awarded the Sahitya Akademi Award for his book writing | He also received the Pandit Madan Mohan Malaviya Award and the Shivaji Ratna Award for journalism | Founder Editor of https://www.indiaspeakdaily.in
2 Comments

ये अम्बेडकर भी बड़ा अजीब Odd-Even खेल रहे हैं—पहले कुछ लिख देते हैं, फिर बाद में सोचते हैं कि अब इसे साबित कैसे किया जाए! 😂
आश्चर्य की बात तो ये है कि उनके समर्थक उन्हें 32 डिग्रियों वाला विद्वान बताते हैं, लेकिन ऐसी परिकल्पनाओं को तथ्य की तरह पेश करने में ज़रा भी संकोच नहीं करते। 🤣
सबसे मज़ेदार बात यह है कि उनके समर्थक शायद मूल बात पढ़ते ही नहीं जो आंबेडकर ने लिखा । अगर उनके कथन के अनुसार 2500 वर्षों से छुआछूत चली आ रही थी, तो फिर यह सवाल तो बनता है कि पानी कब बंद हुआ, किसने बंद किया और इसका ऐतिहासिक प्रमाण क्या है?
इतिहास में दावा करना आसान है, लेकिन दावे को प्रमाणित करना ही असली परीक्षा है। 😂
nice information! please keep it up ..your effort might just be milestone ..even if it just re-telling of facts