संदीप देव। मेरे स्वर्गीय पिताजी की साईकिल सवारी की यह तस्वीर हमारे गांव के मंगेश चाचा ने खींची थी। इसी 5 नवंबर को जब पिताजी की आकस्मिक मृत्यु हुई, उस दिन गांव के अधिकांश लोगों ने उनकी याद में यह फोटो शेयर किया था।
मंगेश चाचा जब गांव में मिले तो मुझे कहा कि “सोशल मीडिया पर अशोक भैया की जो तस्वीर सबसे अधिक शेयर है, वह मैंने खींची थी। अपने गांव में वह अकेले थे जो राजकुमार जैसे लगते थे। एक दिन देखा साईकिल पर बैठकर सब्जी लेने चौक पर जा रहे हैं तो मैंने कहा, अशोक भैया बहुत स्मार्ट लग रहे हैं। रुकिए आपकी एक तस्वीर खींचता हूं। वह हमेशा हंसते-मुस्कुराते रहते थे। पता नहीं कैसे अचानक चले गये!” मंगेश चाचा ने कहा, “भैया अब नहीं रहे, लेकिन तुम गांव मत छोड़ना। यहां आते रहना।”
आज प्रभाष चाचा ने भी फोन करके कहा कि “गांव में हर छह महीने पर जाते रहना, अन्यथा घर वीरान पड़ जाएगा। गांव मत छोड़ना।”
हममें से अधिकांश लोगों को पता नहीं चला कि पिताजी कैसे चले गये? मंगेश चाचा आपका धन्यवाद कि आपने उनकी यह जीवन्त तस्वीर खींची। गांव मैं आता-जाता रहूंगा।
पिताजी ने प्रेम से गांव में घर बनवाया था। मां और हम सभी की याद उस घर से जुड़ी हुई है। मां-पिताजी दोनों की आत्मा गांव में बसती है।
मां को गांव से अपने साथ बहादुरगढ़ ले आया हूं, लेकिन वो रात-दिन रोती रहती हैं। पूरे दिन उनके पास बैठा रहता हूं, लेकिन समझ नहीं आता क्या समझाऊं, कैसे समझाऊं? ईश्वर की महिमा निराली है। यह घाव भी एक दिन भरेगा, लेकिन कब हममें से किसी को नहीं मालूम।
