संदीप देव, प्रधान संपादक, इंडिया स्पीक डेली। कल मैं और मेरी धर्मपत्नी श्वेता नितेश तिवारी और नमित मल्होत्रा की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘रामायण: पार्ट 1’ (Rise of a Legend) सीधे IMAX 3D में देखकर लौटे हैं। इस फिल्म को लेकर उत्सुकता का आलम यह था कि हमने पूरे 15 दिन पहले ही एडवांस बुकिंग करा ली थी। इसके बावजूद पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ था; पीछे की कोई मुफीद सीट तक नहीं मिल सकी और हमें आगे कोने की सीटों से ही संतोष करना पड़ा। आँखों पर भारी 3D चश्मा चढ़ाकर उस विशाल स्क्रीन पर जब त्रेतायुग का विहंगम दृश्य खुला, तो सिनेमाई माध्यम के प्रत्यक्षदर्शी के नाते एक बात निर्विवाद रूप से स्वीकार करनी होगी—तकनीकी धरातल, कैनवास और दृश्य-भव्यता (Visual Grandeur) के स्तर पर यह भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे विशाल और साहसिक छलांग है। डीनेग (DNEG) के वीएफएक्स ने जिस गरिमा और विस्तार के साथ इस कालखंड को रचा है, वह किसी भी वैश्विक क्लासिक फैंटेसी के समकक्ष खड़ा नजर आता है। रणबीर कपूर का अभिनय भी शांत, गंभीर और मर्यादा के अनुरूप है।

विशेषकर मध्यांतर के बाद आकाश में लड़ा गया जटायु और रावण का महायुद्ध इस पहले भाग का सबसे बड़ा सिनेमाई ‘हाई पॉइंट’ और विजुअल मास्टरपीस है। पुष्पक विमान की गति, बादलों के बीच की प्रकाश व्यवस्था और जटायु के पंखों का विहंगम फैलाव देखकर स्पष्ट होता है कि तकनीक पर विश्वस्तरीय काम हुआ है। त्रिलोक-विजयी रावण की शक्ति को जानते हुए भी, अपने मित्र दशरथ के पुत्र की पत्नी और साक्षात् जानकी की रक्षा के लिए अपनी वृद्धावस्था के सामने खड़े जटायु जिस निर्भयता से प्राणों की बाजी लगाते हैं—उस पराक्रम, निष्ठा और लाचारी के द्वंद्व को पर्दे पर अत्यंत गहराई से उभारा गया है।
प्रशंसनीय बात यह भी है कि फिल्म में जटायु के अंतिम संस्कार की मर्यादा को सुरक्षित रखा गया है। वाल्मीकि रामायण की तरह ही प्रभु श्रीराम द्वारा जटायु को पिता तुल्य मानकर स्वयं संस्कार करना और फिर रावण के समूल विनाश की भीषण प्रतिज्ञा के साथ पहले भाग का समापन करना—यह दृश्य दर्शक के भीतर एक गहरा आध्यात्मिक और वीरोचित स्पंदन छोड़ जाता है।
किंतु, जब इस फिल्म को विशुद्ध ‘वाल्मीकि रामायण’ के शास्त्रीय तराजू पर तौला जाता है, तो इसके भीतर सिनेमाई जल्दबाजी, आधुनिक संकोच और कई गंभीर शास्त्रीय विचलन साफ दिखाई देते हैं। दूसरी ओर, इस फिल्म पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उसने हमारे समाज के तथाकथित ‘हिंदूवादी’ समीक्षकों के बौद्धिक दिवालियेपन और वामपंथी खेमे के सांस्कृतिक अवसाद को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
इस पूरे परिदृश्य का बिंदुवार और साक्ष्य-आधारित विश्लेषण:
1. जनस्थान का महायुद्ध: श्रीराम के एकाकी पराक्रम की बलि
जटायु युद्ध जहाँ दृश्य-भव्यता का शिखर छूता है, वहीं दंडकारण्य (जनस्थान) में खर-दूषण के 14,000 राक्षसों के साथ हुआ युद्ध भव्य नहीं बन पाया है। फिल्म का दृश्य निराशाजनक करता है।
* वाल्मीकि रामायण का अकाट्य सत्य (अरण्यकाण्ड, सर्ग 24–30): यह समूचे रामायण कालखंड में प्रभु श्रीराम के जीवन का सबसे भीषण एकाकी (Solo) युद्ध था। श्रीराम ने लक्ष्मण को सीता जी की रक्षा का दायित्व सौंपकर कठोर आज्ञा दी थी कि वे जानकी को लेकर एक सुरक्षित पर्वतीय गुफा में चले जाएं। उस दिन बिना किसी की सहायता के, अकेले राघव ने एक पहर के भीतर खर, दूषण, त्रिशिरा और उनकी 14,000 की दुर्धर्ष सेना का समूल संहार किया था।
* फिल्म की विफलता: फिल्म में इस दृश्य का न तो वह भयावह और विहंगम स्केल खींचा जा सका, और न ही श्रीराम का वह अप्रतिम शौर्य दिखा। उल्टे, इसमें लक्ष्मण और यहाँ तक कि माता सीता को भी रण-समीकरण में शामिल दिखाकर पटकथा ने भगवान राम के उस अलौकिक एकाकी पराक्रम को एक सामान्य सीक्वेंस बनाकर अत्यंत छोटा कर दिया। फिल्म में श्रीराम दिव्यास्त्र का प्रयोग कर सभी राक्षसों का विनाश करते हैं।
2. शूर्पणखा प्रकरण: पश्चिमी दबाव और ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस‘ का शिकार
शूर्पणखा के अंग-भंग के बाद राम और सीता द्वारा लक्ष्मण को यह कहना कि “ऐसा नहीं करना चाहिए था”, फिल्म की सबसे हास्यास्पद कड़ी है:
* सभ्यतागत अपराधबोध (Civilizational Guilt): निर्देशक के अवचेतन में यह औपनिवेशिक डर बैठ गया था कि 100 से अधिक देशों में रिलीज हो रही फिल्म और भगवान श्रीराम को कहीं पश्चिमी समीक्षक ‘महिला-विरोधी’ (Misogynistic) न ठहरा दें।
* श्रीराम को अपोलोजेटिक (शर्मिंदा) बनाना: वाल्मीकि रामायण (अरण्यकाण्ड, सर्ग 18) में स्वयं श्रीराम का स्पष्ट आदेश था—“इमां विरूपिकां कर्तुं सौमित्रे त्वमिहार्हसि”। क्षत्रिय मर्यादा में आततायी का कोई लिंग नहीं होता; जो नरभक्षी राक्षसी साक्षात् माता सीता को चबाने झपटी थी, उसे तत्काल अंग-भंग कर दंडित करना राजधर्म था। किंतु फिल्मकार ने अपने ही नायक को अपनी आधुनिक उदारवादी सांचे में ढालकर पेश कर दिया। यह निर्देशक और पटकथा लेखक का अपराध-बोध (गिल्ट) है, जो लक्षमण को गलत साबित करने में झलकता है।
* लगातार दो प्रहारों से भय: ताड़का वध को संक्षेप में निपटाने के बाद निर्देशक डर गया कि यदि शूर्पणखा पर भी श्रीराम के आदेश से दंड दिखाया गया, तो वैश्विक आलोचक इसे श्रीराम के विरुद्ध एक ‘पैटर्न’ न बना लें।
3. पटकथा की अन्य शास्त्रीय और ऐतिहासिक चूकें
सिनेमाई ड्रामे और कहानी को 3 घंटे में समेटने की हड़बड़ी में कई मूल प्रसंगों को तोड़ा-मरोड़ा गया:
* विद्युज्जिह्व की हत्या: वाल्मीकि के उत्तरकाण्ड में रावण ने पाताल युद्ध के घमासान में अज्ञानतावश (unintentionally) अपने बहनोई को मार गिराया था, जिसके बाद उसने पश्चाताप कर शूर्पणखा को जनस्थान का राज्य दिया। फिल्म में इसे कुंभकर्ण की राजसभा में रावण द्वारा सीधे मारा गया दिखाकर शूर्पणखा के भीतर एक आधुनिक ‘रिवेंज-एंगल’ ठूँस दिया गया।
* परशुराम संवाद: परशुराम जी का परशु फेंकना ‘एवेंजर’ के एक नायक थॉर के हाथ में हथौड़ा पहुंचने की नकल दिखती है। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में वे केवल शांत भाव से श्रीराम को दिव्य वैष्णव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की चुनौती देते हैं।
* धनुष और आभूषण का घालमेल: महर्षि अगस्त्य द्वारा श्रीराम को दिया जाने वाला दिव्य वैष्णव धनुष (जिससे खर-दूषण और अंत में रावण का वध होना था) और चित्रकूट के आगे महर्षि अत्रि की पत्नी सती अनुसूया द्वारा माता सीता को दिए गए दिव्य वस्त्र-आभूषण—इन दोनों ऐतिहासिक प्रसंगों को पटकथा ने काटकर एक ही जगह समेट दिया।
* लोककथाओं और मानस की खिचड़ी: वाल्मीकि के नाम पर प्रचारित फिल्म में सीता द्वारा बचपन में पिनाक उठाना (आनंद रामायण/लोककथा), लक्ष्मण रेखा (कृत्तिवास रामायण) और विवाह पूर्व मंदिर में प्रथम दर्शन (रामचरितमानस मानस की पुष्प वाटिका का रूपांतरण) को मिलाकर पटकथा में शामिल किया गया है।
4. स्वयंभू ‘हिंदूवादी‘ समीक्षकों का वैचारिक दिवालियापन, संघी कुंठा और कुतर्क!
सोशल मीडिया पर पिछले तीन दिनों से खुद को ‘हिंदूवादी’ कहने वाले समीक्षकों, आईटी सेल और संघी ईको-सिस्टम का जो प्रलाप चल रहा है, उसने इनके घोर शास्त्रीय अज्ञान, बौद्धिक दिवालियेपन और संकीर्ण राजनीतिक कुंठा को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। आश्चर्यजनक दृश्य यह है कि एक तरफ वामपंथी छाती पीट रहे हैं और दूसरी तरफ भाजपा-संघ विचारधारा से जुड़ा यह दक्षिणपंथी कुनबा—दोनों की भाषा और निष्कर्ष एक जैसे हैं, भले ही उनके छिपे हुए अजेंडे अलग-अलग हों।
बिना वाल्मीकि रामायण का एक पृष्ठ पढ़े, इनमें से कइयों ने तो बिना फिल्म देखे ही अपना काम-धाम छोड़कर केवल फॉल्स नैरेटिव (झूठा विमर्श) गढ़ने में दिन-रात एक कर दिया है। इनकी कुत्सित आपत्तियों और कुतर्कों की परत-दर-परत सच्चाई इस प्रकार है:
* माता सीता का ‘योद्धा स्वरूप’ और जटायु युद्ध का कुतर्क: यह कुतर्क बड़े जोरों से उछाला जा रहा है कि—“सीता जी को अस्त्र-शस्त्र चलाते क्यों दिखाया? और अगर दिखाया, तो जटायु-रावण युद्ध के समय वे क्यों नहीं लड़ीं?”
* शास्त्र का सच: इन अज्ञानियों को पता ही नहीं कि सनातन वाङ्मय में केवल एक रामायण नहीं है। माता सीता का शस्त्रधारी और रणचंडी स्वरूप ‘अद्भुत रामायण’ में विशद रूप से वर्णित है, जहाँ वे सहस्रमुख रावण का वध करती हैं।
* तर्क और परिस्थिति: फिल्म में सीता जी जब भी लड़ती हैं, उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं। जब पंचवटी से रावण उनका छलपूर्वक अपहरण करके ले जाता है, तब वे पूरी तरह निहत्थी हैं। क्या इन सतही आलोचकों के हिसाब से माता सीता को आकाश में उड़ते पुष्पक विमान के भीतर त्रिलोक-विजयी रावण के साथ अखाड़े की कुश्ती लड़नी चाहिए थी? क्षत्रिय वीरांगना के पास जब अस्त्र न हो, तो वह बंदी अवस्था में होती है, न कि निरर्थक बाहुबल का प्रदर्शन करती है।
* निर्देशक का ‘पश्चिमी गिल्ट’ बनाम हिंदू समाज का अपराधबोध: यह सच है कि फिल्म 100 से अधिक देशों में रिलीज हुई है। शूर्पणखा प्रसंग में निर्देशक नितेश तिवारी के अवचेतन में यह औपनिवेशिक भय जरूर था कि पश्चिमी दर्शक और समीक्षक हमारे भगवान को ‘महिला-विरोधी’ (Misogynistic) न ठहरा दें। इसलिए उसने राम-सीता से लक्ष्मण को टोकवा दिया।
* यह पूरी तरह निर्देशक का अपना निजी गिल्ट और आधुनिक संकोच है, उसने हिंदू समाज को किसी अपराधबोध में नहीं धकेला है। निर्देशक के इस वैचारिक भटकाव की आलोचना डंके की चोट पर होनी चाहिए और हम कर भी रहे हैं, लेकिन इसकी आड़ में पूरी फिल्म को खारिज कर देना केवल कुंठा है।
* रामानंद सागर के धारावाहिक से बेतुकी तुलना: इनकी पूरी ‘रामायण’ रामानंद सागर के टीवी सीरियल पर खत्म हो जाती है। यह समझना होगा कि रामानंद सागर का धारावाहिक पहला प्रयास था, उसका नॉस्टेल्जिया कभी समाप्त नहीं हो सकता।
* उस धारावाहिक के कलाकार नए थे, जो बाद में जीवन भर उसी दैवीय छवि में लोकमानस में पूजे गए। दूसरा, वह टीवी धारावाहिक था जिसमें सैकड़ों कड़ियों का लंबा समय और डिटेलिंग थी।
* सबसे बड़ा अंतर यह है कि रामानंद सागर का धारावाहिक महर्षि वाल्मीकि के इतिहास पर नहीं, बल्कि गोस्वामी तुलसीदास जी कृत ‘रामचरितमानस’ पर आधारित था—जो विशुद्ध भक्ति साहित्य है। जबकि वाल्मीकि रामायण विशुद्ध इतिहास और क्षत्रिय पराक्रम का महाकाव्य है। इन दोनों शैलियों का अंतर समझे बिना 3 घंटे के वैश्विक सिनेमा की तुलना 78 कड़ियों के भक्ति धारावाहिक से करना अज्ञान का ही परिचायक है।
* पुष्पक विमान में पायल का टूटना: ‘निमंत्रण’ नहीं, रावण का अहंकार: सीता जी जब नीचे आभूषण गिराती हैं, तो रावण उनका टूटा हुआ पायल खुद तोड़कर नीचे फेंकता है। आलोचक कह रहे हैं कि “रावण मानो खुद राम को लंका आने का निमंत्रण दे रहा हो!” रावण कोई आमंत्रण नहीं दे रहा था; वह अपने अजेय होने के घमंड में माता सीता का उपहास उड़ा रहा था, उन्हें चिढ़ा रहा था कि—‘फेंको जितने आभूषण फेंकने हैं, इस त्रिलोक में कोई माई का लाल नहीं जन्मा जो रावण के चंगुल से तुम्हें छुड़ा सके!’ यह रावण का अट्टहास और उद्दंडता थी, जिसे इन कुतर्कियों ने ‘निमंत्रण’ का बचकाना नाम दे दिया।
* दासी प्रसंग को ‘स्त्री-सम्मान’ मान बैठना: कुंभकर्ण की सभा में मदिरा परोसने वाली दासी का हाथ पकड़ने पर रावण विद्युज्जिह्व को रोकता है और कहता है कि “शयनकक्ष और राजसभा में अंतर समझो!” रावण वहाँ कोई नारीवादी नहीं बना था; वह लंका की राजसभा के अनुशासन और राजमर्यादा की बात कर रहा था। इसके तुरंत बाद वह विद्युज्जिह्व के षड्यंत्र और कुलद्रोह के लिए उसका वध कर देता है। जो व्यक्ति भरी सभा में अपनी सगी बहन शूर्पणखा का सुहाग उजाड़ दे, उसे ये अल्पज्ञानी “स्त्री-सम्मान करने वाला” बता रहे हैं!
* सीता हरण में ‘स्पर्श’ न दिखाना: निर्देशक का संकोच: फिल्म में रावण द्वारा माता सीता के शरीर को स्पर्श (कमर या बाल पकड़ना) न करते हुए सीधे पुष्पक विमान में दिखाना निर्देशक नितेश तिवारी के भीतर के द्वंद्व को उजागर करता है। एक ओर उनके भीतर सनातन के प्रति श्रद्धा और भक्ति का भाव है कि वे माता सीता के पावन स्वरूप की गरिमा पर्दे पर अक्षुण्ण रखना चाहते हैं, तो दूसरी ओर उनके अवचेतन में यह औपनिवेशिक चिंता भी गहरे बैठी है कि पश्चिम हमारे देवी-देवताओं और आख्यानों को किस नजर से देखेगा! यही कारण है कि जहाँ शूर्पणखा प्रसंग में वे भगवान श्रीराम को पश्चिम की दृष्टि में ‘स्त्री-विरोधी’ दिखने से बचाने के लिए लक्ष्मण को टोकवा देते हैं, वहीं सीता हरण के दृश्य में भी वे रावण द्वारा माता जानकी के शारीरिक स्पर्श को पूरी तरह छुपा ले गए हैं ताकि दृश्य किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर देवी सीता की गरिमा पर ठेंस न लगाए। परंतु दक्षिणपंथी कुतर्की निर्देशक के इस सिनेमाई संकोच और सेंसरशिप को रावण का “सदाचार और स्त्री-सम्मान” मान बैठे! इन तथाकथित ज्ञानियों से पूछा जाना चाहिए कि अपनी सगी बहन शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए दूसरी निर्दोष स्त्री का अपहरण करना स्त्री-सम्मान है या घोर अपराध? अरे मूर्खों, किसी विवाहिता, असहाय स्त्री का छलपूर्वक अपहरण कर लेना ही उसकी मर्यादा पर सबसे बड़ा घृणित हमला है।
* असुरों के ‘शोषण’ की मार्क्सवादी बाइनरी में फँसना: सुमाली आदि असुरों के पाताल भागने को ये ऐसे देख रहे हैं मानो असुरों को शोषित दिखा दिया गया हो। सनातन ब्रह्मांड विज्ञान में पाताल और रसातल असुरों का ही स्वाभाविक वास है। विष्णु द्वारा उन्हें पाताल धकेलना सृष्टि का संतुलन था। फिल्म के पहले ही मिनट के वॉइसओवर में उन्हें स्पष्ट रूप से ‘अत्याचारी असुर’ कहा गया है।
* रावण को शक्तिशाली दिखाने पर छाती पीटना और सच: यदि रावण दुर्बल होता, तो भगवान को अवतार लेने की क्या आवश्यकता थी?
* अपराजेयता का भ्रम टूटना: जब मारीच रावण से कहता है कि—‘आपने ब्रह्मा से मनुष्य से अभय नहीं मांगा था, हो न हो यह वही विष्णु है जो नर रूप में आया है’, तब रावण के चेहरे पर जो भय और संशय का भाव आता है, वह उसके भीतर के खौफ को साफ दिखाता है।
* जटायु द्वारा सिर काटना: आकाश-युद्ध में वृद्ध जटायु अपने पराक्रम से रावण का सिर धड़ से अलग कर देते हैं! वह सिर केवल ब्रह्मा के वरदान के कारण पुनः जुड़ता है। फिल्म ने साफ दिखाया कि रावण का बल उसका अपना शौर्य नहीं, बल्कि वरदान की बैसाखी है।
* स्क्रीन टाइम और ‘लव स्टोरी’ के झूठे लांछन: फिल्म में रावण जहाँ जाता है वहाँ अंधकार, भस्म और धुआँ है; श्रीराम जहाँ हैं वहाँ प्रकृति, सात्विक तेज और हरियाली है। स्क्रीन टाइम पूरी तरह प्रभु श्रीराम के जीवन-वृत्त का ही है। और राम-सीता के बीच कोई छिछोरा रोमांस नहीं, जैसा टि कई दक्षिणपंथी दावा कर रहे हैं! बल्कि फिल्म में मर्यादा, त्याग, संवाद और आदर्श दांपत्य का पारस्परिक आदर दिखाया गया है।
संघी ईको–सिस्टम का असली दर्द: श्रीराम पर ‘कॉपीराइट‘ का खतरा!
सवाल उठता है कि आखिर भाजपा-संघ से जुड़े लोग इस कदर बौखलाए क्यों हैं? इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक सच समझना बहुत जरूरी है:
1 . ‘अजैविक’ का महिमामंडन न होना: यह तय दिखता है कि भारत का संघी ईको-सिस्टम शायद इस वैश्विक फिल्म में अपने किसी ‘अजैविक भगवान’ का राजनीतिक महिमामंडन चाहता था, या इसके निर्माता-निर्देशक इनके द्वारे माथा टेकने और विशेष स्क्रीनिंग का न्योता लेकर नहीं गए—इस उपेक्षा से इनका अहंकार बुरी तरह आहत हुआ है।
2 . श्रीराम पर एकाधिकार छिनने का भय: जिस तरह पश्चिमी जगत इस फिल्म की भव्यता देखकर अचंभित है और वैश्विक स्तर पर इसकी गूंज सुनाई दे रही है, उससे संघियों को डर सता रहा है कि प्रभु श्रीराम पर उनका राजनीतिक ‘कॉपीराइट’ अब खतरे में है! जब राम वैश्विक हो जाएंगे, तो इनका स्थानीय राजनीतिक धंधा कैसे चमकेगा?
3 . टूलकिट की तरह एक जैसा विरोध: सभी संघी हैंडल एक जैसी ही रटी-रटाई बातें लिख रहे हैं, जो साबित करता है कि यह निष्पक्ष फिल्म समीक्षा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित एजेंडा है ताकि छुट्टियों में लोग सिनेमाघरों तक न पहुँचें।
अरे अल्पज्ञानियों! अगर तुमने सचमुच वाल्मीकि रामायण पढ़ी होती, तो तुम्हें पता चलता कि इस फिल्म में कई कथाएं लोक-परंपराओं से बुनी गई हैं, जिन्हें तुम पकड़ तक नहीं पाए।
यदि इस फिल्म की वास्तविक और निष्पक्ष आलोचना करनी ही है, तो इसके कमजोर और प्रभावहीन गीत–संगीत (Music) को धोना चाहिए था, जो फिल्म के विशाल कैनवास के साथ बिल्कुल न्याय नहीं कर पाता! और निर्माता-निर्देशक ने इस विरोध को समझते हुए गानों का कुछ हिस्सा दिखाकर के हिस्से सारा गाना ही गायब कर दिया है।
तकनीकी धरातल पर पहली बार भारतीय सिनेमा हॉलीवुड के ‘एवेंजर्स’ से भी आगे निकलकर हमारी सांस्कृतिक धरोहर को दुनिया के सामने सीना तानकर खड़ा कर रहा है। इसे उत्सव की तरह मनाने के बजाय अपने संकीर्ण राजनीतिक कुएं में बैठकर पत्थर फेंकना केवल तुम्हारी हीनभावना को दर्शाता है।
‘जयपुर डायलॉग्स‘ और खोणिका गोप के खोखले प्रलाप का पंचनामा
सोशल मीडिया पर पिछले दो-तीन दिनों से खुद को ‘प्रखर हिंदूवादी’ साबित करने वाले मंचों, विशेषकर ‘द जयपुर डायलॉग्स‘ और उनके पूरे ईको-सिस्टम का जो तमाशा चल रहा है, उसने इन सभी के पाखंड और बौद्धिक दिवालियेपन को पूरी तरह नंगा कर दिया है। बिना फिल्म देखे व्हाट्सएप-मार्का सतही ज्ञान के दम पर ‘जयपुर डायलॉग्स’ उसी एक रटी-रटाई टूलकिट पर फिल्म के बहिष्कार और विरोध का नैरेटिव चला रहा है। इसी टूलकिट को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने खोणिका गोप (Khonika Gope) नाम की एक समीक्षक की लंबी-चौड़ी अंग्रेजी पोस्ट को हवा दी है।
इन्होंने जो बिंदु उठाए हैं, वे दर्शाते हैं कि इन लोगों ने न तो महर्षि वाल्मीकि का मूल ग्रंथ कभी पलटकर देखा है और न ही इन्हें सिनेमाई भाषा और सनातन मर्यादा का कोई भान है। इनके उठाए एक-एक कुतर्क का वाल्मीकि रामायण और तथ्यात्मक साक्ष्यों के आधार पर बिंदुवार उत्तर:
1. असुरों का ‘विद्रोह’ और रावण को ‘दयालु समाजवादी राजा’ बताने का बचकाना आरोप
* खोणिका गोप और जयपुर डायलॉग्स का दावा:“असुरों को देवताओं का गुलाम दिखाया गया और रावण ने लंका छीनकर विद्रोह किया। राज्याभिषेक के बाद रावण कहता है कि ‘जो मैं खाऊंगा, वही तुम खाओगे’, यानी फिल्म रावण को एक दयालु समाजवादी (Socialist) राजा बनाकर उसका 4,000 करोड़ का व्हाइटवॉश कर रही है।”
* उत्तर: यह आरोप इन तथाकथित दक्षिणपंथियों की उसी मार्क्सवादी मानसिकता का प्रमाण है, जिसे ये दिन-रात कोसते हैं। सनातन ब्रह्मांड विज्ञान में पाताल और रसातल लोक असुरों और दैत्यों का स्वाभाविक वास हैं। देवासुर संग्राम के बाद भगवान विष्णु द्वारा सुमाली आदि को पाताल खदेड़ना कोई “शोषण” नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की व्यवस्था और सृष्टि का संतुलन था। फिल्म के पहले ही मिनट के वॉइसओवर में उन्हें स्पष्ट रूप से ‘अत्याचारी और उत्पाती असुर’ कहा गया है। रही बात कुबेर से लंका छीनने और सेना को संबोधित करने की—तो कबीलाई और युद्धोन्मादी शासक अपने लड़ाकों को लामबंद करने के लिए ऐसे ही सामरिक उद्घोष (War-cry) देते हैं। एक निरंकुश आक्रांता के उस कबीलाई संवाद को ‘मार्क्सवादी समाजवाद’ करार देकर छाती पीटना केवल इनकी वैचारिक हीनभावना और अंग्रेजीदां शब्दों की बाजीगरी है।
2. सीता हरण पर भद्दा तंज: “सीता न रोईं, न लड़ीं, मानो पिकनिक पर जा रही हों“
* खोणिका गोप और जयपुर डायलॉग्स का दावा:“सीता हरण देखकर मैं अवाक रह गई। सीता न रोईं, न संघर्ष किया। वह एकदम शांत खड़ी रहीं, मानो किसी पिकनिक पर जा रही हों! अगर वे रावण की दयालुता देखकर उसके साथ भागते हुए भी दिखा देते, तो मुझे आश्चर्य नहीं होता।”
* उत्तर: माता सीता के पावन चरित्र पर इससे अधिक घृणित, विकृत और लंपट टिप्पणी कोई दूसरा नहीं कर सकता! फिल्म में उस भयावह क्षण में जानकी के मुख पर गहरा आघात, स्तब्धता (Shock) और असहायता का भाव है। निर्देशक ने सिनेमा के पर्दे पर माता सीता के वस्त्र खिंचते या उन्हें असभ्य रूप से चीखते-बिलखते इसलिए नहीं दिखाया, क्योंकि वे जानकी की पावन छवि की गरिमा और पारिवारिक दर्शकों की मर्यादा का सम्मान करना चाहते थे।
दूसरी बात, जिस स्त्री का अचानक छलपूर्वक अपहरण हुआ हो, जो आकाश में उड़ते पुष्पक विमान में पूरी तरह निहत्थी और असहाय हो—क्या तुम्हारे कुतर्क के अनुसार वह त्रिलोक-विजयी रावण के साथ पुष्पक विमान में कुश्ती लड़ती? माता सीता ने उस घोर संकट में भी अपने सतीत्व और विवेक का परिचय देते हुए मार्ग में एक-एक आभूषण नीचे गिराए ताकि श्रीराम को अपनी दिशा का संकेत दे सकें। उस अलौकिक संयम और सामरिक प्रज्ञा को “पिकनिक पर जाना” कहना दिखाता है कि इन आलोचकों की सोच कितनी उथली और सड़कछाप है!
3. रावण को ‘काम–मुक्त‘ और केवल ‘प्रतिशोधी‘ दिखाने का झूठ
* खोणिका गोप और जयपुर डायलॉग्स का दावा:“फिल्म में दिखाया गया कि रावण को सीता में कोई कामुक रुचि नहीं थी, वह केवल बहन का बदला लेने गया था। वाल्मीकि में शूर्पणखा सीता के सौंदर्य का वर्णन करती है, जिससे रावण में कामुक वासना जगती है। वासना ही पूरी रामायण का इंजन है, उसे हटाकर रावण को पाक-साफ किया गया।”
* उत्तर: वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड (सर्ग 31-33) को यदि पढ़ा होता, तो पता चलता कि शूर्पणखा जब लंका पहुँची थी, तो उसने सीधे सौंदर्य का गान नहीं किया था; उसने पहले रावण को जनस्थान में खर-दूषण के संहार, 14,000 राक्षसों के विनाश और लंका की प्रभुसत्ता के ध्वस्त होने पर जमकर धिक्कारा था। फिल्म में रावण का पंचवटी जाकर छल से सीता को चुराना ही सिद्ध करता है कि उसके भीतर काम और प्रतिशोध दोनों का विष था। यदि केवल क्षत्रिय प्रतिशोध होता, तो रावण सेना लेकर राम-लक्ष्मण से सीधे युद्ध करने जाता! एक साधु का कपटी वेश धरकर एक विवाहिता स्त्री को चुरा ले जाना अपने आप में कामुक लंपटई और दुर्भावना का सबसे बड़ा प्रमाण है। फिल्म ने इसे रावण का ‘व्हाइटवॉश’ नहीं, बल्कि उसका कुत्सित षड्यंत्र ही दिखाया है।
4. विद्युज्जिह्व के वध का दृश्य: रावण की ‘महानता‘ नहीं, उसका हिंसक तानाशाही रूप
* खोणिका गोप और जयपुर डायलॉग्स का दावा:“विद्युज्जिह्व और रावण के बीच 10 मिनट की गैर-जरूरी लड़ाई केवल रावण को महान दिखाने के लिए थी। विद्युज्जिह्व को स्त्री का अपमान करते दिखाया गया, जबकि यह रावण की फितरत थी।”
* उत्तर: इन्हें सिनेमाई दृश्यों का ककहरा तक नहीं आता। कुंभकर्ण की सभा में मदिरा परोसने वाली दासी का हाथ पकड़ने पर रावण विद्युज्जिह्व को इसलिए नहीं टोकता कि वह कोई ‘फेमिनिस्ट’ बन गया था, बल्कि वह लंका के सम्राट की हैसियत से कहता है कि “शयनकक्ष और राजसभा में अंतर समझो!” वह राजदरबार के अनुशासन की बात करता है। इसके तुरंत बाद रावण उसके लंका की सत्ता हथियाने के गुप्त षड्यंत्र को उजागर करता है और भरी सभा में अपनी ही सगी बहन शूर्पणखा के पति का सिर धड़ से अलग कर देता है। अपनी बहन का सुहाग उजाड़ देना, उसे विधवा बनाकर भरी सभा में विलाप करने पर छोड़ देना क्या रावण को ‘महान’ दिखाता है? यह तो रावण की निरंकुश सत्ता-लोलुपता, क्रूरता और हिंसक अहंकार को स्थापित करता है!
5. शूर्पणखा प्रसंग और संगीत की आलोचना का दोहरा मापदंड
* खोणिका गोप और जयपुर डायलॉग्स का दावा:“शूर्पणखा के सीता पर आक्रमण को हटा दिया गया, जिससे लक्ष्मण का प्रहार अकारण लगा और सीता ने ज्ञान दिया। संगीत भी बहुत लाउड और खराब था।”
* उत्तर: इस बिंदु पर हम स्वयं पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि शूर्पणखा प्रसंग में राम और सीता से लक्ष्मण को टोकवाना निर्देशक नितेश तिवारी का अपना औपनिवेशिक और पश्चिमी संकोच था, जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। और फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर व संगीत निश्चित रूप से बेहद कमजोर और फिल्म के विशाल कैनवास के साथ अन्याय करता है। किंतु फर्क यह है कि हम निर्देशक की इस रचनात्मक और वैचारिक कमजोरी की शास्त्रीय आलोचना कर रहे हैं, जबकि ‘जयपुर डायलॉग्स’ और खोणिका गोप जैसे लोग इस एक कमजोरी की आड़ में पूरे सनातन आख्यान, वैश्विक उपलब्धि और तकनीकी चमत्कार पर कालिख पोतकर अपना राजनीतिक एजेंडा साध रहे हैं। यह पूरा प्रकरण सिद्ध करता है कि ‘जयपुर डायलॉग्स’ जैसे मंचों का ‘हिंदुत्व’ केवल सोशल मीडिया पर व्यूज बटोरने, राजनीतिक आकाओं के इशारे पर टूलकिट चलाने और सनातन के किसी भी वास्तविक, भव्य और वैश्विक विस्तार को अपनी हीनभावना की भेंट चढ़ाने तक सीमित है। जिस वैश्विक स्वीकृति से आज वामपंथी अवसाद में हैं, उसी से यह स्वयंभू दक्षिणपंथी कुनबा भी थर-थर कांप रहा है।
5. वामपंथियों का दोहरा संकट और छटपटाहट
दूसरी ओर, वामपंथी तंत्र की अपनी अलग छाती-कुटाई जारी है:
* ‘आदिपुरुष’ जैसा उपहास न बन पाने की कुंठा: वामपंथियों को आशा थी कि यह फिल्म भी किसी भद्दी ‘आदिपुरुष’ जैसी बनेगी, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सनातन और श्रीराम का उपहास उड़ा सकेंगे। लेकिन इस फिल्म के भव्य कैनवास, वीएफएक्स और दुनिया भर के आईमैक्स थिएटर्स में मिल रही दृश्य प्रशंसा ने उनके नैरेटिव पर पानी फेर दिया है।
* वैश्विक स्वीकार्यता का डर: वे कभी नहीं चाहते थे कि भारतीय महाकाव्य पश्चिम की मुख्यधारा में ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ के समकक्ष एक श्रेष्ठ सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा जाए। इसलिए वे भी इसे नकारने के नए-नए बहाने तलाश रहे हैं।
6. पिछले दो दिन का वैश्विक बॉक्स ऑफिस कलेक्शन
गौरतलब है कि जब भी किसी अमर शास्त्रीय आख्यान को आधुनिक सिनेमाई रूप दिया जाता है, तो संतुलन की तलवार की धार पर चलना पड़ता है। यदि बॉक्स ऑफिस के शुरुआती आंकड़ों को देखें, तो फिल्म ने पहले दो दिनों में ही घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार को हिलाकर रख दिया है। पहले दिन भारत में लगभग ₹65 करोड़ नेट (वर्ल्डवाइड ₹126+ करोड़ ग्रॉस) और दूसरे दिन शुक्रवार को भी ₹48 करोड़ नेट के साथ यह फिल्म शुरुआती 48 घंटों में ही ₹220 करोड़ से अधिक का वैश्विक ग्रॉस पार कर चुकी है। शनिवार और रविवार की जो अग्रिम बुकिंग दिख रही है, वह सीधे संकेत दे रही है कि यह फिल्म अपने पहले सप्ताहांत में ही ₹350 से ₹400 करोड़ के क्लब में दाखिल होकर बॉक्स ऑफिस पर एक नया इतिहास रचने की ओर अग्रसर है। करीब 1300 करोड़ की कमाई यह फिल्म रिलीज से पहले ही अपने विभिन्न राइट्स को बेचकर पूरा कर चुकी है।
7. वैश्विक स्वीकार्यता और समीक्षकों की अवाक करने वाली प्रतिक्रियाएं
वैश्विक मंचों और अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों की प्रतिक्रियाएं तो अवाक कर देने वाली हैं। हॉलीवुड और पश्चिम के सिनेमाई आलोचक इसे एक तकनीकी चमत्कार बता रहे हैं; यहाँ तक लिखा जा रहा है कि मार्वल वाले बारह ‘एवेंजर्स’ भी बना लें, तो इस भारतीय महाकाव्य जैसी विहंगम दृश्य-भव्यता और जटायु-रावण संग्राम जैसा रोंगटे खड़े कर देने वाला आकाश-युद्ध नहीं रच सकते।
फिल्म का अंत श्रीराम द्वारा रावण-वध की भीषण प्रतिज्ञा पर हुआ है, जिससे स्पष्ट है कि शबरी, कबन्ध, सुग्रीव-सख्य और बालि-वध का विस्तार हमें पार्ट-2 में देखने को मिलेगा।
इसलिए, तमाम पटकथा संबंधी चूकों, जनस्थान युद्ध के अति-संक्षिप्तीकरण और शूर्पणखा प्रसंग में किए गए आधुनिकतावादी समझौतों के बावजूद—एक बार यह फिल्म थिएटर में जाकर अवश्य देखी जानी चाहिए।
यह देखना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि सहस्राब्दियों के इतिहास में पहली बार किसी ने भारतीय दर्शन, वाल्मीकि के महाकाव्य और हमारे आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को हॉलीवुड की छाती पर इतने विराट, भव्य और विश्वस्तरीय स्केल पर ले जाकर स्थापित करने का साहस दिखाया है।
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