शंकराचार्य जी के पावन सान्निध्य में गोरखपुर से निकली 81 दिवसीय गविष्ठी धर्मयुद्ध यात्रा के काशी पहुंचने पर काशी के रोहनिया के प्राचीन शिव मंदिर में गौसभा के अंतर्गत ही शंकराचार्य जी महाराज के चल रहे प्रवचन के दौरान मधुमक्खियों ने हमला कर दिया जिसमें 40 से अधिक लोग घायल हो गए।शंकराचार्य जी के चल रहे प्रवचन में भारी भीड़ जुट गई थी।इसी दौरान वहां पीपल के वृक्ष में लगे मधुमक्खियों के छत्ते में किसी गौद्रोही में ईट से प्रहार कर दिया।जिससे क्रोधित मधुमक्खियों ने वहां उपस्थित गौभक्तों पर हमला कर दिया और मधुमक्खियों के काटने से 40 से अधिक लोग घायल हो गए।
लेकिन इस दौरान शंकराचार्य जी आसपास मौजूद सैकड़ों मधुमक्खियों ने शंकराचार्य जी को नही काटा।इसे देखकर उपस्थित लोगों ने कहा कि जिस प्रकार जंगलों में हिंसक पशु तपस्वी ऋषि मुनियों को क्षति नही पहुंचाते थे।उसी प्रकार शंकराचार्य जी के तप व तेज के प्रभाव से मधुमक्खियों ने उनको क्षति नही पहुंचाई।
इस दौरान शंकराचार्य जी ने अपना प्रवचन जारी रखा और कहा कि जब भी धर्मकार्य होता है तो विघ्न संतोषी लोग उपद्रव करते ही हैं।यह जब कार्यक्रम में भक्तों की भीड़ बढ़ने लगी तो किसी व्यक्ति ने पहले से तय योजना के अंतर्गत मधुमक्खियों को कुरेद दिया जिससे वो हमला कर बैठी है।शंकराचार्य जी ने उपस्थित गौभक्तों से कहा कि आप पत्थर की मूरत बन कर बैठ जाइए मधुमक्खियां आपको क्षति नही पहुंचाएंगी।
वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की टिप्पणी:-
शंकराचार्य के काशी में प्रवचन के दौरान मधुमक्खी का हमला।
शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय के मुताबिक़ इस दौरान किसी ने छत्ते में ढेला मारा।
40 से अधिक लोग प्रभावित।
बड़ी बात ये रही कि इस दौरान शंकराचार्य अविचलित रहे।
मधुमक्खियाँ उन्हें छू तक न सकीं।
एक वास्तविक संत की अध्यात्मिक शक्ति ने विपदा के पैरों में ज़ंजीर बाँध दी।
इसीलिए कहते हैं कि अध्यात्मिक शक्ति अपराजेय होती है।
सत्ता जनित अहंकार की परिस्थितिजन्य ताक़तें उसके आगे उसी तरह बौनी होती हैं,
जैसे बरगद के वृक्ष के आगे करौंदे का पेड़!!
