27 जनवरी को शंकराचार्य जी और प्रशासन के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। यह बैठक शंकराचार्य जी के मेला क्षेत्र छोड़ने से लगभग 15 घंटे पहले हुई थी। बैठक में प्रशासन ने यह स्वीकार किया कि शंकराचार्य जी को ससम्मान स्नान न करा पाना एक गंभीर प्रशासनिक चूक थी।
अधिकारियों ने खेद व्यक्त किया और यह आश्वासन भी दिया कि वे पालकी सहित ससम्मान स्नान कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि भविष्य में सभी पीठाधीश्वर शंकराचार्यों के स्नान में पूरा सहयोग किया जाएगा।
लेकिन यहीं पर बात रुक नहीं गई। शंकराचार्य जी की ओर से गए प्रतिनिधियों ने स्पष्ट मांग रखी— कि इस गंभीर त्रुटि के लिए प्रशासन सार्वजनिक रूप से शंकराचार्य जी से क्षमा याचना करे।
इस पर अधिकारियों ने कहा— हम सार्वजनिक माफी नहीं मांग सकते, केवल खेद जता सकते हैं। जब यही बात लिखित रूप में मांगी गई, तब भी प्रशासन तैयार नहीं हुआ। स्पष्ट शब्दों में कह दिया गया— “यह संभव नहीं है।”
यही वह क्षण था, जब प्रश्न केवल स्नान का नहीं रहा, बल्कि शंकराचार्य की गरिमा और सम्मान का बन गया। इसी के बाद शंकराचार्य जी अपने निर्णय पर अडिग रहे और बिना स्नान किए ही मेला क्षेत्र छोड़ने का फैसला लिया।
28 जनवरी की प्रातः शंकराचार्य जी मेला क्षेत्र से प्रस्थान कर गए। यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं था— यह सनातन परंपरा, संत मर्यादा और धर्मगुरुओं के सम्मान का प्रश्न है। निर्णय इतिहास करेगा… पर प्रश्न आज भी जीवित है।
