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India Speak Daily > धर्म > सनातन हिंदू धर्म > ॥ श्रीहरिः शरणम् ॥ महात्मा विदुर – भाग १
सनातन हिंदू धर्म

॥ श्रीहरिः शरणम् ॥ महात्मा विदुर – भाग १

ISD News Network
By ISD News Network 13 Min Read
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श्वेता पुरोहित॥ श्रीहरिः शरणम् ॥ महात्मा विदुर – भाग १

धर्म की गति बड़ी गहन है। कौन-सा कर्म धर्म है और कौन-सा अधर्म, इसका निर्णय सामान्य बुद्धि नहीं कर सकती। धर्म और अधर्म का तत्त्व तो स्वयं भगवान् जानते हैं अथवा भगवान् का साक्षात्कार करने वाले महर्षि लोग जानते हैं। भगवान् का वह रूप जिसके द्वारा प्राणियों के हृदय में स्थित होकर वे जगत् को, प्राणियों को धारण करते हैं, धर्म नाम से कहा गया है। धर्म के आधार पर ही सबकी स्थिति है, धर्म में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है, इसलिये धर्मको ही परम तत्त्व कहते हैं।’

भाव-भेदसे धर्म के तीन रूप होते हैं – आध्यात्मिक, आधि दैविक और आधि भौतिक। धर्मके आध्यात्मिक रूप स्वयं भगवान् हैं। आधिदैविक रूप धर्मराज या यमराज हैं, जो अपने लोकमें रहकर पुण्यात्मा और पापात्माओं के कर्मफल की व्यवस्था करते हैं। उन्हें हम व्यावहारिक धर्म के अधिष्ठातृ-देवता कह सकते हैं। धर्म का आधिभौतिक रूप है सामाजिक व्यवस्था; जो कि शास्त्रों और शास्त्रतत्त्वदर्शी ऋषियों के द्वारा निर्मित होती है। वह देश, काल, पात्र, शक्ति, वय आदि के भेद से विभिन्न प्रकार की होती है और इस व्यवस्था को जो भंग करता है, उसको दण्ड देनेवाले हैं धर्मदेवता। धर्मदेवता का ही नामान्तर यमराज भी है। उन्हें कितना सावधान रहना पड़ता है और जरा-सी भी त्रुटि होने पर किस प्रकार स्वयं दण्डित होना पड़ता है, यह बात हमलोग बहुत ही कम जान सकते हैं।

हाँ, तो पृथ्वी के नैऋर्त्य कोणपर धर्मराज की संयमनीपुरी है। उसमें अनेकों योजनों के बहुत-से सुन्दर-सुन्दर महल हैं। उसमें धर्मराज अपने मन्त्रियों और धार्मिक सभासदों के साथ निवास करते हैं। उनके सभासदों में ऋषि, महर्षि, देवता सभी प्रकार के लोग हैं। मनुष्यों के पाप-पुण्य का हिसाब रखनेवाले चित्रगुप्तजी महाराज हैं। काल, दिशा, आकाश, वायु, अग्नि, सूर्य आदि बहुत-से उनके दूत हैं, जो मनुष्यों से एकान्त में होने वाले कर्मों को भी देखा करते हैं और तुरंत उनके पास समाचार पहुँचा देते हैं। उनकी सभा में चार दरवाजे हैं। जिनमें तीन से पुण्यात्मा लोगों का प्रवेश होता है और दक्षिण द्वार से पापी लोग आते हैं। उस मार्ग से आने में पापियों को महान् कष्ट उठाना पड़ता है और वैतरणी भी लाँघनी पड़ती है। उधर के मार्ग से ले आनेवाले दूत भी बड़े ही भयंकर हैं और कुम्भीपाक, रौरव, असिपत्रवन आदि भी उसी दिशा में पड़ते हैं। उस द्वार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो उस मार्ग से आता है, उसे धर्मराज का स्वरूप बड़ा ही भयंकर दीखता है और यों तो वे बड़े ही सौम्य हैं।

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यों तो धर्मराज भगवान्के ही एक स्वरूप हैं, परंतु भागवत-धर्म को जानने वाले बारह महात्माओं में वे प्रमुख गिने जाते हैं। अर्थात् वे भगवान्के बहुत ही बड़े भक्त और उनके रहस्य को जानने वाले ऊँचे ज्ञानी हैं। उन्होंने अपने दूतों को भागवत-धर्म का रहस्य समझाया है और बार-बार समझाते रहते हैं कि किनको किस मार्ग से ले आना चाहिये और किनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये। वे कर्म, मन और वाणी से भगवान्के भक्त हैं तथा अपने दूतों को भी इस बात की शिक्षा दिया करते हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि ‘मेरे भयंकर दूतो ! जिनकी जीभ भगवान्के पवित्र गुण, लीला और नामों का गायन नहीं करती, जिनका चित भगवान्के चरण-कमलोंका स्मरण नहीं करता, जिनका सिर भगवान् और उनके भक्तों के सामने एक बार भी नहीं झुकता, जिन्होंने अपने कर्तव्य पालन द्वारा उनकी आराधना नहीं की है और जो उनके सत्स्वरूप से विमुख हैं, उन्हें ही तुम भयंकर नरकके रास्ते ले आना। धर्मराज केवल वहाँ जानेपर ही पाप-पुण्य का फल नहीं देते, बल्कि इसी लोक में, इसी जीवन में, यहीं के लोगों को निमित्त बनाकर भी उनके फल दिया करते हैं।

प्राचीन काल में माण्डव्य नामके एक बड़े ही तपस्वी ऋषि रहते थे। वे बड़े ही धर्मज्ञ, प्रभावशाली और मौनी थे। वे अपने हाथों को ऊपर उठाये तपस्या में संलग्न रहते थे। एक दिन कुछ डाकू धन लूटकर ऋषि माण्डव्य के आश्रम के पास से निकले। उसी समय राज्य के सिपाहियों ने उनका पीछा किया और वे ऋषि के आश्रम के पास ही धन गाड़कर चलते बने। सिपाहियों ने आकर ऋषि से पूछा कि ‘महाराज ! वे डाकू किधर गये ?’ परंतु अपने मौनव्रत के कारण ऋषि ने कोई उत्तर न दिया। सिपाहियों ने आश्रम के आस-पास ही ढूँढ़कर डाकुओं को पकड़ लिया। धन भी वहाँ मिल गया। उन्हें सन्देह हुआ कि यह तपस्वी नहीं कोई डाकू है, इसने जान-बूझकर हमारे पूछनेपर जवाब नहीं दिया। इसलिये इसे भी पकड़ ले चलें। उन्होंने माण्डव्य को पकड़ लिया और डाकुओं के साथ ही उन्हें भी राजा के सामने पेश किया।

राजा ने भी उनके जवाब न देने पर उन्हें डाकू समझ लिया और डाकुओं के साथ सूली की सजा दे दी। ऋषि माण्डव्य सूली पर चढ़ा दिये गये, परंतु सूली उनके शरीर को छेद न सकी। वे बहुत दिनोंतक सूलीपर बैठकर तपस्या करते रहे। जब दूसरे ऋषियों को यह समाचार मिला तब वे पक्षियों का रूप धारण करके माण्डव्य के पास आने लगे और पूछने लगे कि तुम्हें किस पापका यह फल मिला है। माण्डव्य भी सोचने लगे कि मुझे किस पाप का यह फल मिला है। थोड़े ही दिनों के बाद राजा को यह मालूम हुआ कि सूलीपर चढ़ाये जानेपर भी एक डाकू की मृत्यु नहीं हुई, वह अभी जीवित है। उन्होंने जान लिया कि वह तो कोई ऋषि है। राजा ने जाकर बड़ी प्रार्थना की, उन्हें सूलीपर से उतारा, परंतु सूली की छोटी-सी अणि उनके शरीर में लगी ही रह गयी, वह न छूट सकी। इसी से उनका नाम अणिमाण्डव्य पड़ा।

माण्डव्य ऋषि एक दिन धर्मराज की सभा में उपस्थित हुए। उन्होंने कहा कि मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके फलस्वरूप मुझे सूलीपर चढ़ना पड़ा ? धर्मराज ! यदि तुम इसका ठीक-ठीक उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हें अपने इस कर्म का फल भोगना पड़ेगा। धर्मराज ने कहा-‘तपोधन ! आपने बचपन में एक सींक में कई टिड्डियों को छेदकर उड़ाया था, उस पाप का फल आपको भोगना पड़ा है।’ छोटा-सा भी पाप छोटा-सा नहीं होता। पाप हमेशा बड़ा ही होता है। माण्डव्यने कहा- ‘धर्मराज ! उस समय मैं नन्हा सा बालक था, मुझे पाप-पुण्य का कुछ ज्ञान नहीं था। उस छोटे-से पाप का इतना बड़ा दण्ड कि ब्राह्मण सूलीपर चढ़ाया जाय ! यह कदापि उचित नहीं हो सकता। इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम मर्त्यलोक में सौ वर्षतक शूद्र होकर रहो।’ धर्मराजने प्रसन्नतापूर्वक ऋषिका शाप स्वीकार किया।

उन दिनों पृथ्वी पर दैत्योंकी संख्या बढ़ गयी थी। क्षत्रियों के रूप में पैदा होकर उन्होंने पृथ्वी को व्याकुल कर दिया था। उनका दमन करने के लिये प्रायः सभी देवता अपने-अपने अंश से अवतीर्ण हो रहे थे। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण भी धरातलपर अवतार ग्रहण करने वाले थे। ऐसे अवसर पर धर्म के अवतार की आवश्यकता तो थी ही, माण्डव्य का शाप एक निमित्त बन गया। देवताओं में शरीर-निर्माण की शक्ति होती है। वे एक ही साथ अनेक स्थानों पर अनेक रूपों में प्रकट हो सकते हैं और अनेक यज्ञों में भाग ले सकते हैं। धर्म ने भी अपने को दो रूपों में प्रकट किया। एक तो विदुर और दूसरे युधिष्ठिर। विदुर के निर्वाण के प्रसंग में दोनों की एकता स्पष्ट की जायगी। यहाँ केवल विदुर का ही प्रसंग है।

सत्यवती ने वेदव्यास से प्रार्थना की कि बेटा ! तुम्हारे-जैसे तपस्वी महात्मा के रहते हुए हमारा कुरुवंश डूबने पर आ गया है। भीष्म ब्रह्मचारी हैं, विचित्रवीर्य मर गये, अब हमारा वंश कैसे चले ? तुम अपनी तपस्या के प्रभावसे हमारा वंश चला दो। व्यास ने अपनी माता का आग्रह स्वीकार किया और कहा कि ‘अम्बिका तथा अम्बालिका यदि मेरे सामने से वस्त्रहीन होकर निकल जायँ तो मेरी दृष्टि-शक्ति से उन्हें सन्तान प्राप्त हो सकती है।’ सत्यवती ने उन दोनों को बारी-बारी से व्यासदेव के सामने भेजा; परंतु वे दोनों बड़े ही संकोच से उनके सामने गयीं। एकने अपनी आँखें बंद कर लीं, दूसरी मारे भय से पीली पड़ गयी। व्यास ने उन्हें देखा और बतलाया कि ‘पहली से जो पुत्र होगा, वह अंधा होगा और दूसरी से जो पुत्र होगा वह पाण्डु-वर्ण का होगा।’ वही धृतराष्ट्र और पाण्डु हुए। जिनके वंशज दुर्योधन और युधिष्ठिर आदि थे।

सत्यवती को इतने से संतोष नहीं हुआ। उसने फिर अम्बिका से आग्रह किया कि एक सर्वगुण सम्पन्न पुत्र पैदा करो। अम्बिका ने उनके सामने ‘हाँ’ कह दिया; परंतु उसकी हिम्मत व्यास के सामने जाने को नहीं पड़ी। अपनी परम सुन्दरी दासी को उसने व्यासदेव के सामने भेज दिया। वह दासी संकोचरहित होकर व्यासके सामने गयी और उनकी कृपादृष्टि से उसे गर्भ रह गया। व्यास ने उसी दिन से उसका दासीभाव छूट जाने का वर दिया और कहा कि ‘तुम्हारे गर्भ से एक बड़ा ही धार्मिक पुत्र उत्पन्न होगा।’ भगवान् व्यासकी वाणी भला कभी व्यर्थ हो सकती है ? समय आनेपर धर्मराज ने इसी दासी के गर्भ से विदुर के रूपमें जन्म ग्रहण किया।

धर्मावतार विदुर मनुष्य होने पर भी अपने देवत्व के ज्ञान को भूले नहीं थे। परंतु वे अपने को कभी देवता के रूप में प्रकट भी नहीं करते थे। सदा मनुष्यधर्म का ही पालन करते थे। बचपनसे ही वे बड़े गम्भीर थे। व्यासदेव, भीष्मपितामह आदि गुरुजनों की सेवा में ही प्रायः वे लगे रहते थे। इतने चुप रहते थे, मानो कुछ जानते ही न हों। वे निरन्तर भगवद्भजन में लगे रहते थे और अवकाश पाते ही ध्यानस्थ हो जाते थे। उनके जीवन में कभी बहिर्मुखता आयी ही नहीं। उनकी सेवासे, उनके सदाचार से और उनके भगवत्प्रेम से सभी प्रसन्न थे। बड़े भाई धृतराष्ट्रकी तो वे आँख ही थे। धृतराष्ट्र कोई भी काम बिना विदुर की सलाह के नहीं करते थे।

भीष्मपितामह ने पाण्डु और धृतराष्ट्र को बहुत बड़ी सम्पत्ति दी। जब उन्होंने विदुर से धन लेने को कहा तब उन्होंने स्पष्ट अस्वीकार कर दिया। उनके मत में धन का कोई मूल्य ही नहीं था। संसार की झूठी वस्तुएँ जो इस क्षण हैं और अगले क्षण नहीं रह सकती हैं उन्हें लेकर, उनके चिन्तन में अपना समय कौन बितावे। इनके लिये भगवान्के चिन्तन से विमुख कौन हो, यह सब सोचकर वे धनसे अलग ही रहते थे।

जब भीष्मपितामह ने पाण्डु और धृतराष्ट्र का विवाह कर दिया, तब विदुर के विवाह की भी बारी आयी। उन दिनों मथुरा में देवक का बड़ा प्रभाव था। उनके यहाँ एक पारशवी दासी थी। उसी की सर्वगुण-सम्पन्न कन्या के साथ भीष्मपितामह ने विदुर का विवाह करा दिया। विदुर अपनी धर्मपत्नीके साथ गार्हस्थ्यधर्म का पालन करते हुए भगवान्का भजन करने लगे।

एक प्रकार से वे धृतराष्ट्र के मन्त्री ही थे और उनके मन्त्रित्व में तबतक राज-काज चलता रहा, जबतक दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण आदिकी प्रधानता नहीं हो गयी। स्वयं धर्म के मन्त्रित्व में राज-काज का संचालन किस प्रकार होता था, यह कहने की आवश्यकता नहीं। उन दिनों वहाँ बड़ा सुख था, बड़ी शान्ति थी, पाण्डु जहाँ रहते, वहीं उनके लिये आवश्यक सामग्री उपस्थित रहती और किसी भी प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट नहीं था। क्यों न हो, धर्म के हाथों में जो प्रबन्ध था ।

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