श्वेता पुरोहित :-
🔱 श्रावण मास में किए जाने वाले बुध-गुरु व्रत का वर्णन 🔱
ईश्वर बोले–‛हे सनत्कुमार ! अब मैं समस्त पापों का नाश करने वाले बुध-गुरु व्रत का वर्णन करूँगा जिसे श्रद्धा पूर्वक करके मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है।
ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को ब्राह्मणों के राजा के रूप में अभिषिक्त किया। किसी समय उसने रूप तथा यौवन से सम्पन्न तारा नामक गुरु पत्नी को देखा। उसकी रूप सम्पदा से मोहित होकर वह काम के वशीभूत हो गया और उसे उसने अपने घर में रख लिया।
इस प्रकार बहुत दिन बीतने पर उसे बुध नामक एक पुत्र हुआ जो बुद्धिमान, सौंदर्यशाली तथा सभी शुभ लक्षणों से युक्त था।
गुरु बृहस्पति को ज्ञात हुआ कि तारा, चन्द्रमा के घर में स्थित है तब उन्होंने चन्द्रमा से कहा कि मेरी पत्नी को वापिस कर दो, अनेक तरह से समझाने पर भी जब चन्द्रमा ने तारा को वापिस नहीं दिया तब बृहस्पति ने देवताओं की सभा में जाकर देवराज इन्द्र को यह वृत्तान्त बतलाया और कहा–‛हे शक्र ! आप देवताओं के राजा हैं अतः अपनी आज्ञा से आप उसे दिलाएँ अन्यथा उस चन्द्रमा के द्वारा किया गया पाप आप को ही निसन्देह लगेगा, क्योंकि शास्त्र निर्णय के अनुसार प्रजा के द्वारा किए गए पाप को राजा भोगता है। पुराण में भी ऐसा कहा गया है कि दुर्बल का बल राजा होता है।’
गुरु का यह वचन सुनकर चन्द्रमा ने कहा–‛मैं आपकी आज्ञा से तारा को तो दे दूँगा किन्तु इस पुत्र को नहीं दूँगा।’ शास्त्र के अनुसार विचार करके देवताओं ने उस बुध को चन्द्रमा को दे दिया।
इसके बाद गुरु को उदास देखकर देवताओं ने उन दोनों को वर प्रदान किया–‛हे चन्द्र ! अब तुम घर जाओ, यह तुम्हारा भी पुत्र है और बृहस्पति का भी है। यह तुम्हारा पुत्र ग्रहों में प्रतिष्ठित होगा।
हे सुराचार्य ! आप यह दूसरा भी शुभ वर ग्रहण कीजिए कि जो बुद्धिमान व्यक्ति आप दोनों–बुध-गुरु का व्रत मिलाकर करेगा उसकी सम्पूर्ण सिद्धि होगी, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। शंकर जी के लिए अत्यन्त प्रिय इस श्रावण मास के आने पर जो लोग बुधवार तथा बृहस्पतिवार को पूजन व्रत करेंगे उन्हें सिद्धि प्राप्त होगी।
इस व्रत में दही तथा भात का नैवेद्य व्रत सिद्धि में मूल हेतु है। स्थान भेद से आप दोनों की मूर्ति लिखकर पूजन करने से भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होता है। यदि कोई हिण्डोले के ऊपरी स्थान पर आप दोनों कि मूर्ति लिखकर पूजन करे तो वह सर्वगुणसम्पन्न तथा दीर्घायु पुत्र प्राप्त करेगा।
यदि मनुष्य कोषागार में मूर्ति को लिखकर पूजन करता है तो उसके कोष बढ़ते हैं और वे कभी क्षय को प्राप्त नहीं होते। इसी प्रकार पाकालय में पूजन करने से पाकवृद्धि और देवालय में पूजन करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है।
शय्यागार में लिखकर पूजन करने से स्त्री का वियोग कभी नहीं होता है। धान्यागार में लिखकर पूजन करने से धान्य की वृद्धि होती है। इस प्रकार मनुष्य उन-उन फलों को प्राप्त करता है।
इस प्रकार सात वर्ष तक करने के बाद उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन से पहले दिन अधिवासन करके रात्रि में जागरण करना चाहिए। सुवर्ण कि प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक सोलह उपचारों से पूजन करने के पश्चात् तिल, घृत, चारु और अपामार्ग तथा अश्वत्थ से युक्त समिधाओं से होम करना चाहिए, अन्त में पूर्णाहुति देनी चाहिए।
उसके बाद मामा व भांजे को प्रयत्न पूर्वक भोजन कराना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मणों को तथा अन्य लोगों को भी भोजन कराना चाहिए। स्वयं भी भोजन करना चाहिए। इस विधि से सात वर्ष तक करने पर मनुष्य सभी मनोरथों को प्राप्त कर लेता है।
जो इसे विद्या कि कामना से करता है, वह वेद व शास्त्र के अर्थों को जाने वाला हो जाता है। बुध बुद्धि प्रदान करते हैं और गुरु बृहस्पति गुरुता प्रदान करते हैं।’
सनत्कुमार बोले–‛हे भगवन ! आपने जो यह कहा है कि इस अवसर पर मामा तथा भांजे को भोजन करना चाहिए, यदि बताने योग्य हो तो इसका कारण बताइए।’
ईश्वर बोले–‛हे सनत्कुमार ! पूर्वकाल में अत्यन्त दीन तथा दरिद्र कोई दो ब्राह्मण थे, वे दोनों मामा-भानजे थे। उदार पूर्ति हेतु परिश्रमपूर्वक भ्रमण करते हुए वे दोनों किसी नगर में अन्न माँगने के लिए गए थे।
उन्होंने घर-घर में श्रावण मास में प्रत्येक वार को उस वार का व्रत होते हुए देखा किन्तु कहीं भी बुध-गुरु का व्रत नहीं देखा। तब उन्होंने बहुत देर तक परस्पर विचार किया कि सभी वारों का व्रत तो सर्वत्र दिखाई पड़ रहा है किन्तु बुध-गुरु का कहीं नहीं। अतः चूँकि यह व्रत अनुच्छिष्ट है इसलिए हम दोनों को चाहिए कि इस शुभ व्रत का अनुष्ठान आदरपूर्वक करें।
किन्तु हे सनत्कुमार ! इसकी विधि ना जानने के कारण वे दोनों संशय में पड़ गए तब रात्रि में उन्हें स्वप्न में इस व्रत की विधि दृष्टोगोचर हो गई। इसके बाद उन्होंने उसकी विधि के अनुसार व्रत को किया जिससे उन्होंने अपार सम्पदा प्राप्त की।
प्रतिदिन उनकी सम्पत्ति बढ़ने लगी और सभी लोगों को ज्ञात भी हो गयी। इस प्रकार सात वर्ष तक करके वे पुत्र व पौत्र आदि से सम्पन्न हो गए। उसके बाद उनके ऊपर प्रसन्न होकर बुध व गुरु प्रकट हुए और उन्होंने उन दोनों को यह वर दिया–आप दोनों ने हम दोनों के निमित्त इस व्रत को प्रवर्तित किया है अतः आज से कोई भी इस शुभ व्रत को करे उसे व्रत की समाप्ति पर मामा तथा भानजे को प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिए।
इस व्रत के प्रभाव से उसे सभी कामनाओं की परम सिद्धि हो जाती है और अन्त में चन्द्र सूर्य पर्यन्त उसका हमारे लोक में वास होता है।
॥इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रवण मास माहात्म्य में “बुधगुरुव्रत कथन” नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥८॥
🔱 ॐ नमःशिवाय 🔱
