संदीप देव। मैं जब बच्चा था तो गांव में ‘बहुरूपिया’ आता था। कभी देवी-देवताओं का रूप धर कर आता था तो कभी राक्षस और असुर का रूप धर कर हमें डराता था। हम बच्चे बहुत डर जाते थे।
अकसर वह नवरात्रि के समय नौ दिनों तक अलग-अलग रूप धर कर आता था। देवी-देवताओं का जब रूप धरता था तो लोग उसे प्रणाम भी करते थे और राक्षस का जब रूप धरता था तो लोग उससे डरते भी थे!
अंतिम दिन वह सभी घर से भीक्षा एकत्र करता था। लोग अच्छा-खासा अनाज उसे खुशी-खुशी देते थे और फिर कहते थे कि अगले नवरात्र भी अवश्य आना। उसकी प्रतीक्षा रहती थी।
हिंदू बहुरूपिया संस्कृति में ऐसा रच-बस गया कि वह वास्तविक जीवन के बहुरूपिया को भी नहीं पहचान पाया! यह वास्तविक बहुरूपिया भी तरह-तरह के रूप धरता है और भीक्षा में वोट मांगता है। हिंदू खुशी-खुशी उसे वोट देते और प्रतीक्षा करते हैं कि वह फिर अगले चुनाव में आए नया करतब दिखाए और वोट हमसे ले!
बहुरूपिया आएगा,
रूप दिखाएगा,
तुम खुश होना,
लेकिन फंसना नहीं!
हिंदू यह कहावत ही भूल गया! बहुरूपिया को ही हिंदू नायक मान बैठा, इसलिए भोगना भी तो हिंदुओं को ही है!
