श्वेताभ पाठक श्वेत प्रेम रस। एक साधक का प्रश्न :: किसी भी कार्य में भगवद भावना डालने का क्या अर्थ है भैया? ये भावना कैसे डाली जाती है??
आदरणीय श्वेताभ पाठक भैया जी द्वारा उत्तर :: भगवद भावना डालने का अर्थ है भगवदीय गुणों को सभी में प्रतिष्ठित करके उनका लाभ लेना ।
भगवदीय गुण क्या हैं ?
दया , क्षमा , सहनशीलता , समत्व की भावना , राग द्वेष न करना , त्याग , तितिक्षा , वैराग्य आदि जितने भी गुण हैं , सब भगवदीय गुण हैं ।
इनको जन जन में प्रतिष्ठित करना ही भगवान भावना बनाना या धारणा बनाना है ।
आप लोग पढ़ते हैं न दुर्गा शतनाम ।
वह एक एक नाम हर तत्त्व में भावना डालने के लिए ही है ।
आप पढ़ते हैं न –
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके …
आप पढ़ते हैं न –
या देवी सर्वभूतेषु निद्रा रूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
विद्या रूपेण
कांति रूपेण
क्षान्ति रूपेण
तुष्टि रूपेण
क्षुधा रूपेण
आदि आदि , यह सब भगवद भावना बनाने हेतु ही है । इसी की पुष्टि के लिए ही है ।
आप पढ़ते हैं न त्वं स्वधा त्वं स्वाहा , त्वं ष्टकार इत्यादि , यह सब भगवद भावना बनाने हेतु ही है ।
भगवद भावना का अर्थ क्या है ??
सीय राम मय सब जग जानी ।
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी ।।
क्या है भगवादभावना ??
जित देखूँ दीखै , गोविन्द राधे ।
ऐसा जादू का डंडा , घुमा दे ।।
क्या है भगवदभावना ??
त्वमेव माता च पिता त्वमेव …
वेद शास्त्र से लेकर आप जितने भी स्तुतियाँ या स्तव्ययन पढ़ते हैं , सब भगवद भावना के लिए है ।
आप जितने भी सहस्त्रनाम , शतनाम , विंशति पंचाशत , 32 नाम से लेकर जो भी नाम , चालीसा , आरती इत्यादि गाते हैं या पढ़ते हैं , वह सब भगवदभावना हेतु ही है ।
लेकिन हमने कभी इनको पढ़ते या पाठ करते हुए भगवद भावना बनाने की सोचा तक नहीं ।
क्योंकि बाबा बुबियों ने कहा है कि बस पाठ कर लो , नाम रटो , मन्त्र रटो या इतनी बार कर लो ।
कभी भी उसके अंतर्निहित अर्थ पर गए ही नहीं ।
तो भगवदभावना का अर्थ है कि इस समस्त सृष्टि में जो कुछ भी है , उसको भगवदीय तत्त्व या सत्ता मानकर स्वीकार करना ।
ईशावास्यमिदं सर्वं । ईशान: सर्व विद्यानाम ।
सर्वं खल्विदं ब्रह्म । अहं ब्रह्मास्मि ।तत्त्वमसि ।
अयमात्मा ब्रह्म ।
सर्वभूतस्थितं ब्रह्म तदेवाहं न संशयः ।सर्वो वै रुद्रः ।
यह सब भगवद्भावना हेतु ही है ।
लेकिन जब हमें सुख मिलता है तभी हम भगवान की कृपा मानते हैं और दुःख मिलते ही समस्त वेदों शास्त्रों पुराणों की बातों को लात मार देते हैं ।
जो हमें अच्छा लगता है , उसे ही हम भगवान की कृपा मानते हैं । जो हमारे अनुकूल नहीं है , उसे हम उसकी सत्ता मानने से इनकार कर देते हैं । अगर हम भगवद भावना रखते और सर्वं खल्विदं ब्रह्म मानते तो कभी सुख और दुःख दोनों में selective न होते ।
दोनों तत्त्व उसी के हैं । जब दोनों तत्वों को एक मानने लगेंगे तो भेद बुद्धि समाप्त हो जाएगा और सुख मिलने पर न सुखी होंगे और न दुःख मिलने पर दुःखी होंगे।
इसे ही समत्व और भगवदीय भावना होना बोलते हैं ।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।।
यहाँ युद्ध का अर्थ है संसार में रहते हुए ।
जब हम इस स्थिति या इस भगवद्भावना मे रहना शुरू करेंगे तो हमें सांसारिक कृत्य करते हुए भी कोई पाप नहीं लगेगा और हम इससे परे रहेंगे ।
फॉलो अवश्य करे …www.shwetpremras.in
