मैं कभी कोई फ़िल्म या सीरीज़ रिकमेंड नहीं करता लेकिन जिओ हॉटस्टार पर ‘चिरैया’ देखना ज़रूरी है. पहली बात, मेरा इस शो से कोई संबंध नहीं है. ये पोस्ट सिर्फ़ इसलिए लिख रहा हूँ कि बेतुके क्राइम और वाहियात कॉमेडी शोज़ की अंधी दौड़ में किसी ने तो सोचा, घर और समाज भी कोई चीज़ है, कला और क़लम का इनके लिए भी कोई उत्तरदायित्व है. ‘तारे ज़मीन पर’ जैसी फ़िल्म जब डिस्लेक्सिया पर खुल के बात करती है, ‘3 इडियट्स’, हमारे एजुकेशन सिस्टम को एक्सपोज़ करती है और ‘पिंक’, ताल ठोंककर कहती है नो मीन्स नो, तो OTT अपनी सामाजिक जवाबदेही कब समझेगा, ये सवाल बहुत दिनों से हवाओं में झूल रहा था।
दिव्यनिधि शर्मा हमारे दौर के सशक्त राइटर्स में एक बड़ा नाम है, और मैं बड़े गर्व से कहता हूँ कि दिव्य की क़लम ने चिरैया लिखकर अपना धर्म निभा दिया. शशांत शाह का निर्देशन, ‘एक्शन’ और ‘कट’ से परे जा कर, संवेदनशीलता की एक नई परिभाषा गढ़ता है. एक-एक सीन ऐसा लगता है, लेखक-निर्देशक ने पहले ख़ुद जिया फिर पर्दे पर उतारा. प्रसन्ना नई एक्टर हैं, लेकिन जिस तरह से वो दिव्या दत्ता जैसी सीज़ंड और बेहतरीन कलाकार के सामने जँच रही हैं, उसकी तारीफ़ किए बिना आप भी नहीं रह पायेंगे।
‘औरत ही औरत की दुश्मन है’ ये शो न सिर्फ़ इस सदियों पुराने मुहावरे को चैलेंज करता है, बल्कि तोड़-फोड़ के रख देता है. चिरैया ज़रूर देखिए क्यूंकि हमारा सभ्य समाज, अब तक इतना सभ्य नहीं हो पाया कि एक जरा सी बात समझ पाये, ‘शादी लाइसेंस नहीं है’. चिरैया देखिए ताकि आप विश्वास कर पायें, देवरानी-जेठानी के युगों पुराने और उपेक्षित रिश्ते को ऐसा पॉज़िटिव ट्विस्ट भी दिया जा सकता है. ‘भाभी’ जैसे पवित्र शब्द को अश्लील गीतों की भेंट चढ़ते देखकर अगर आपका मन दु:खा है, तो ‘चिरैया’ उस घाव पर मरहम रख देगी, बड़ी सहजता से आप भाभी और माँ का फ़र्क़ भूल जाएँगे।
चिरैया देखिए ताकि हम एक व्यक्ति और समाज के धरातल पर और संवेदनशील, और ज़िम्मेदार बन पायें. कुछ सीन्स आपको विचलित कर सकते हैं, लेकिन ज़िंदगी ‘पिंक रिबन में बँधा हुआ बेल्जियम चॉकलेट का गिफ़्ट पैक’ नहीं है, एक कड़वा सच है और इस सच का सामना ज़रूरी है।
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