संदीप देव। 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में भारतीय जनता पार्टी द्वारा पूरे देश में शाम 6 से 7 बजे तक घरों में ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने का व्यापक आह्वान किया गया है। सत्ता-संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों से लेकर पूरे प्रचार तंत्र को आम जनमानस को इस आनुष्ठानिक भावुकता में बांधने के लिए झोंक दिया गया है।
किंतु एक सजग लोकतंत्र में यह दृश्य केवल एक राजनीतिक जन्मदिन का उत्सव नहीं, बल्कि विमर्श-प्रबंधन (Perception Management) की वह विसंगति है जहाँ राष्ट्र की धड़कती और लहूलुहान वास्तविकताओं पर आस्था और उत्सव का पर्दा डालने का प्रयास किया जा रहा है। जिस समय पूरे देश से ‘व्यक्ति’ नरेंद्र मोदी के 25 साल तक सत्ता के शीर्ष पर रहने (मुख्यमंत्री+प्रधानमंत्री) का उत्सव मनाते हुए दीया जलाने की अपील की जा रही है, ज़मीनी स्तर पर जनता अभूतपूर्व संकटों से जूझ रही है:
*सामाजिक विखंडन और संस्थागत अन्याय: समाज के भीतर जातीय तनाव की खाई लगातार चौड़ी की जा रही है। यूजीसी (UGC) से जुड़े नए कानूनी ढांचों और नीतिगत प्रावधानों को लेकर सामान्य वर्ग के युवाओं के भीतर यह गहरी पीड़ा और भय बैठ गया है कि उन्हें व्यवस्थागत रूप से जन्मजात अपराधी के कटघरे में खड़ा कर दिया गया है।
*युवाओं के स्वप्न और पेपर लीक का दंश: भर्ती परीक्षाओं के निरंतर निरस्त होने और सर्वव्यापी पेपर लीक तंत्र ने करोड़ों होनहार युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। रोज़गार के अभाव और कमरतोड़ महंगाई ने साधारण परिवारों को हताशा के गर्त में धकेल दिया है।
*मध्यवर्ग पर नीतिगत दोहरी मार: हालिया प्रशासनिक अधिसूचनाओं (जैसे वित्त मंत्रालय द्वारा डिजिटल लेन-देन के नियमों में ₹2000 तक की सीमा तय कर अन्य संव्यवहारों पर अप्रत्यक्ष शुल्कों का दबाव बनाना) ने डिजिटल अर्थव्यवस्था पर आश्रित मध्यवर्ग की चिंता बढ़ा दी है। वहीं, अनियोजित और जबरन थोपे गए इथेनॉल मिश्रण ने लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों के निजी वाहनों के इंजनों को भारी क्षति पहुँचाकर और उनकी गाड़ी का माइलेज घटाकर उनकी गाढ़ी कमाई को तबाह किया है।
*धार्मिक शुचिता का हनन और संस्थागत क्लीन चिट: अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के पीछे जिन करोड़ों सनातनियों की निश्छल आस्था और पाई-पाई का समर्पण था, वहां चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आक्षेपों के बीच चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसों को बिना किसी पारदर्शी, निष्पक्ष जांच के व्यवस्था द्वारा क्लीन चिट दे दी गई।
जब सामाजिक विद्वेष, पेपर लीक, महंगाई, वित्तीय मार और धार्मिक ट्रस्ट की शुचिता जैसे गंभीर प्रश्न सत्ता के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे हों, तब पूरे राष्ट्र के ध्यान को एक ‘दीये’ की लौ में उलझा देना केवल संयोग नहीं है। यह जनसंपर्क और प्रोपगैंडा (Propaganda – 1928) का वह शास्त्र है जिसकी बुनियाद करीब एक सदी पहले सिग्मंड फ्रायड के भा़जे एडवर्ड बर्नेज ने रखी थी और जिसे आज के ‘स्पिन डिक्टेटर्स’ ने अपने चरम पर पहुँचा दिया है।
1. एडवर्ड बर्नेज: ‘इंजीनियरिंग ऑफ कंसेंट’ और विमर्श का अपहरण
आधुनिक जनसंपर्क (Public Relations) के जनक एडवर्ड बर्नेज (सिगमंड फ्रायड के भांजे) ने 1928 में अपनी कालजयी पुस्तक ‘प्रोपगैंडा’ में लिखा था। उन्होंने लिखा कि आधुनिक लोकतंत्रों में जनता को तार्किक तर्कों और आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसकी अचेतन इच्छाओं, भयों और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करके हांका जाता है। बर्नेज के तीन आधारभूत सिद्धांत आज की भारतीय राजनीति पर हूबहू लागू होते हैं:

1 . सहमति का निर्माण (Engineering of Consent): बर्नेज का तर्क था कि एक ‘अदृश्य सरकार’ जनता की सोच को ऐसे सांचे में ढालती है कि जनता स्वयं यह मान बैठती है कि उसका निर्णय स्वतंत्र है, जबकि वह सत्ता द्वारा रची गई पटकथा का मात्र एक पात्र होती है।
2 . इवेंट का निर्माण (The Created Event): बर्नेज ने सिखाया कि जब किसी अप्रिय सच, नीतिगत विफलता या घोटाले पर पर्दा डालना हो, तो सीधे तार्किक उत्तर मत दीजिए; बल्कि एक ऐसी ‘भव्य घटना’ (Event) रच दीजिए जो मीडिया और जनमानस के पूरे दृश्यपटल पर एकाधिकार कर ले।
3 . प्रतीकों का मनोवैज्ञानिक दोहन (Manipulation of Symbols): मनुष्य तर्कों से ज्यादा प्रतीकों से संचालित होता है। दीपक, मशाल, वस्त्र या पूजा-पाठ जैसे पवित्र प्रतीकों को जब किसी राजनीतिक सत्ता या नेता की छवि से जोड़ दिया जाता है, तो उस नेता की आलोचना स्वतः ही उस पवित्र प्रतीक की आलोचना जैसी लगने लगती है।
2. गांधी का प्रतीकात्मक संसार: ‘नैतिक प्रोपगैंडा’ और सामूहिक चेतना
बर्नेज ने जब 20वीं सदी के जन-आंदोलनों का विश्लेषण किया, तो उन्होंने महात्मा गांधी की जन-गोलबंदी की क्षमता को भी बहुत पैनी नजर से देखा। बर्नेज की दृष्टि से देखें तो गांधी राजनीति के नहीं, बल्कि जन-मनोविज्ञान के सबसे बड़े शिल्पी थे। गांधी ने यह भली-भांति समझ लिया था कि एक विशाल, अशिक्षित और भाषाई विविधताओं से भरे देश में बौद्धिक भाषणों से साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष नहीं छेड़ा जा सकता। उन्हें ऐसे प्रतीकों की आवश्यकता थी जो जनसाधारण की सामूहिक अचेतनता को सीधे छू सकें।
बर्नेज लिखते हैं कि विचार अमूर्त होते हैं, जनता को उन्हें समझने के लिए मूर्त रूपाकार चाहिए। गांधी ने ‘स्वावलंबन’ जैसे दार्शनिक विचार को चरखा और खादी में बदल दिया। चरखा केवल सूत कातने का यंत्र नहीं था; वह विदेशी सत्ता के आर्थिक बहिष्कार का एक दृश्य-प्रतीक (Visual Symbol) बन गया। गांधी ने इवेंट का निर्माण कर (The Created Event) अमूर्त विचारों को ‘मूर्त ईवेंट’ में बदल दिया। बर्नेज के सिद्धांत में प्रचार तब सबसे शक्तिशाली होता है जब आप सीधे उपदेश न देकर एक ऐसी ‘घटना’ पैदा कर देते हैं जिससे मीडिया और जनता स्वतः खिंचे चले आएं।
दांडी यात्रा (1930) इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण थी। मुट्ठी भर नमक कानूनन बहुत छोटी चीज थी, लेकिन उस साधारण से नमक को जीवन, स्वाभिमान और ब्रिटिश कर-शोषण के विरुद्ध एक विराट प्रतीक बना दिया गया।जैसा कि पश्चिमी शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया, गांधी प्रेस के रुख को सटीक पहचानते थे। बर्नेज की शब्दावली में कहें तो गांधी ने अपने ‘अर्धनग्न फकीर’ के स्वरूप को एक नैतिक ब्रांड में तब्दील कर दिया था।
गांधी का यह ‘प्रोपगैंडा’ आत्मिक और नैतिक सरोकारों पर आधारित था, जिसका उद्देश्य लोगों को नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना था।
3. नरेंद्र मोदी का समकालीन युग: आधुनिक ‘इंजीनियरिंग ऑफ कंसेंट’
गांधी के प्रतीकात्मक कौशल को यदि 21वीं सदी के तकनीकी युग, 24×7 टेलीविजन मीडिया, बिग डेटा और सोशल मीडिया एल्गोरिदम के साथ जोड़ दिया जाए, तो जो राजनीतिक शिल्प उभरता है, वह नरेंद्र मोदी की राजनीति है। बर्नेज ने जिस ‘अदृश्य सरकार’ और मनोवैज्ञानिक हेरफेर की बात 1928 में की थी, मोदी-काल उसका मूर्त भारतीय संस्करण प्रतीत होता है।
बर्नेज का मानना था कि जनता को निष्क्रिय दर्शक से सक्रिय सहभागी (Participant) बनाना ही प्रोपगैंडा की पराकाष्ठा है। मोदी की राजनीति में हर योजना या संदेश एक राष्ट्रव्यापी उत्सव (Event) बन जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वच्छ भारत अभियान में गांधी के चश्मे को प्रतीक बनाना और स्वयं झाड़ू उठाना—यह सीधे तौर पर गांधीवादी दृश्य-प्रचार को अपनी छवि से जोड़ना था।
इसी तरह जब देश में महामारी के दौरान वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और दवाओं की कमी थी, तब ‘थाली बजाने’ और ‘दीया जलाने’ के सामूहिक इवेंट रचे गए। आज जब पेपर लीक, सामाजिक-जातिगत विद्वेष, बेरोजगारी और राम मंदिर ट्रस्ट के भीतर की विसंगतियां सवाल पूछ रही हैं, तब एक बार फिर 17 सितंबर को ‘आशीर्वाद का दीया’ सामने रख दिया गया है।
कोविड महामारी के दौरान ‘थाली-ताली बजाना’ और आज अपने जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद का दीया जलाने’ की अपील करना बर्नेज की उस थ्योरी का सटीक उदाहरण है जहाँ सामूहिक क्रिया (Collective Action) के ज़रिये जन-मानस के भय को एकता और नेतृत्व के प्रति निष्ठा में बदल दिया जाता है।
बर्नेज की थ्योरी के अनुसार, ‘इवेंट’ तार्किक विमर्श को समाप्त कर देता है। दीया जलाते ही नागरिक की भूमिका एक ‘प्रश्नकर्ता’ (Questioner) से बदलकर एक ‘भक्त’ या ‘आशीर्वाद देने वाले’ भावुक दर्शक में बदल जाती है। आप उस व्यवस्था से सवाल कैसे पूछ सकते हैं जिसके स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए आप स्वयं दीपक जला रहे हों?
दीपक सनातन परंपरा में ज्ञान, अंधकार-निवारण और आत्म-साक्षात्कार का प्रतीक है। किंतु प्रोपगैंडा मशीनरी ने इस पवित्र आध्यात्मिक प्रतीक को एक व्यक्ति के राजनीतिक आभामंडल के विस्तार का जरिया बना दिया।
गांधी जहाँ सादगी और आश्रम-संस्कृति के प्रतीक गढ़ रहे थे, वहीं मोदी की शैली ‘ग्रैंड नैरेटिव’ और भव्यता (Monumentality) के माध्यम से जन-सहमति बनाती है।
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, नया संसद भवन (सेंगोल की स्थापना) और अयोध्या में राम मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा अनुष्ठान—ये मात्र बुनियादी ढांचे या धार्मिक कार्य नहीं हैं। बर्नेज की भाषा में, ये ‘मनोवैज्ञानिक एंकर’ (Psychological Anchors) हैं, जो जनता के मन में यह भाव स्थापित करते हैं कि भारत एक नए युग में प्रवेश कर चुका है और उस युग के सूत्रधार स्वयं मोदी हैं।
बर्नेज ने कहा था कि एक प्रभावी प्रचारक मध्यस्थों (Intermediaries) को दरकिनार करके सीधे जनता के दिल में उतरता है। मोदी का रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ प्रेस वार्ता की पारंपरिक जवाबदेही को समाप्त कर एकतरफा, पिता-तुल्य या संरक्षक-समान संवाद स्थापित करता है। यह जनता के भावनात्मक जुड़ाव को राजनीतिक लाभ में बदलने का क्लासिक पीआर ढांचा है।
4. गांधी और मोदी के इवेंट में बुनियादी अंतर!
एडवर्ड बर्नेज ने माना था कि लोकतंत्र को सुचारू चलाने के लिए जनमत को हांकना (herd करना) जरूरी है, लेकिन आलोचक हमेशा इस बात पर चिंतित रहे कि यह तकनीक जनता को नागरिकों से ‘उपभोक्ताओं’ और ‘आज्ञाकारी मतदाताओं’ में बदल देती है।
गांधी ने जिस प्रतीकात्मकता का उपयोग एक दमनकारी साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ जन-जागरण के लिए किया था, नरेंद्र मोदी के दौर में उसी प्रतीकात्मकता को ‘कॉरपोरेट पीआर’ और ‘बर्नेजियन प्रोपगैंडा’ के साथ मिलाकर राज्य-सत्ता की
विफलताओं पर पर्दा डालने का हथियार बना दिया गया है। गांधी और मोदी के प्रतीकात्मक प्रयोगों में सबसे बड़ा फर्क यह है कि गांधी के प्रतीक राज्य-सत्ता के प्रतिरोध के लिए गढ़े गए थे, जबकि समकालीन राजनीति में ये प्रतीक राज्य-सत्ता को सर्वव्यापी, निर्विवाद और आभामंडल से युक्त बनाए रखने के लिए प्रयुक्त होते हैं।
जब किसी लोकतंत्र में नीति, बेरोजगारी, शिक्षा और संस्थागत स्वतंत्रता जैसे बुनियादी और जटिल तार्किक मुद्दों की जगह ‘भव्य आयोजन’ और ‘भावनात्मक प्रतीक’ मुख्य विमर्श बन जाते हैं, तब समझना चाहिए कि एडवर्ड बर्नेज का ‘प्रोपगैंडा मॉडल’ अपने चरम पर काम कर रहा है। सहमति का निर्माण (Engineering of Consent) इतना मुकम्मल हो चुका है कि जनता उन सवालों को भूल जाती है जो सत्ता से पूछे जाने चाहिए थे, और उन दृश्यों में मुग्ध हो जाती है जो सत्ता उसे दिखाना चाहती है।
गांधी और आधुनिक सत्ता-प्रचारकों के बीच एक बुनियादी और नैतिक खाई थी:
* प्रतिरोध का प्रतीक, न कि सत्ता का कवच: गांधी ने चरखा, खादी और नमक को प्रतीक बनाया। मुट्ठी भर नमक कोई व्यापारिक उत्पाद या सत्ता का तमाशा नहीं था, बल्कि वह साम्राज्यवादी ब्रिटिश कर-शोषण के विरुद्ध एक शोषित और भूखे समाज का नैतिक प्रतिरोध था।
*भागीदारी में त्याग, न कि खोखला उत्सव: गांधी जब प्रतीक गढ़ते थे, तो जनता से केवल ताली या दीया जलाने का आनुष्ठानिक प्रदर्शन नहीं मांगते थे; वे आत्म-संयम, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और लाठी खाने का नैतिक साहस मांगते थे।
*साधनों की शुचिता: बर्नेज के लिए प्रोपगैंडा जनमत को साधने की एक तकनीकी बाजीगरी थी, चाहे उसमें सत्य हो या भ्रम। किंतु गांधी के लिए साधन की शुचिता (Purity of Means) साध्य से भी बड़ी थी। गांधी जनमत को छल से ‘मैनिपुलेट’ नहीं कर रहे थे, बल्कि नैतिक चेतना को जगाकर अत्याचारी सत्ता की नींव हिला रहे थे।
5. ‘स्पिन डिक्टेटर्स’: 21 वीं सदी का परिष्कृत अधिनायकवाद
बीसवीं सदी के एडवर्ड बर्नेज ने जनमत को प्रभावित करने के मनोवैज्ञानिक औजार गढ़े थे, लेकिन इक्कीसवीं सदी के राजनीतिक वैज्ञानिकों सर्गेई गुरिएव (Sergei Guriev) और डैनियल ट्रेइसमैन (Daniel Treisman) ने अपनी युगांतरकारी पुस्तक ‘स्पिन डिक्टेटर्स: द चेंजिंग फेस ऑफ टायरेनी इन द ट्वेंटी-फर्स्ट सेंचुरी’ में यह सिद्ध किया कि आधुनिक सत्ताएं अब डर और खुली हिंसा के बजाय ‘छवि, सूचना-नियंत्रण और कृत्रिम लोकप्रियता’ के जरिए अधिनायकवाद चलाती हैं।

पारंपरिक तानशाह (हिटलर, स्टालिन या माओ) सड़कों पर सेना उतारकर और विरोधियों को खुलेआम मारकर राज करते थे। इसके विपरीत, ‘स्पिन डिक्टेटर’:
*लोकतांत्रिक मुखौटा पहनता है और नियमित चुनाव करवाता है, किंतु व्यवस्थागत स्तर पर खेल के मैदान को पूरी तरह एकतरफा कर देता है।
*विरोधियों को सीधे समाप्त करने के बजाय मीडिया-ट्रोलिंग, चरित्र-हनन, कानूनी मुकदमों और टैक्स जांचों के जरिए उनकी साख नष्ट करता है।
*सेंसरशिप के बजाय ‘शोर’ (Noise) का इस्तेमाल करता है। वह सवाल पूछने वालों की आवाज दबाने के लिए अपने पीआर तंत्र का लाउडस्पीकर इतना तेज कर देता है कि पीड़ित की चीख किसी को सुनाई न दे।
वैश्विक फलक के स्पिन डिक्टेटर्स और समकालीन भारत के उदाहरण में हम अनेक साम्यता पाते हैं:-
1. पुतिन शुरुआती वर्षों में कोई खुली हिंसा नहीं करते थे; वे राज्य प्रायोजित टेलीविजन और मीडिया इवेंट्स (जैसे साइबेरिया में भालू के साथ फोटो, वार्षिक फोन-इन कार्यक्रम) के माध्यम से अपनी 80% लोकप्रियता की छवि बनाए रखते थे।
समकालीन भारत में जब देश में बेरोजगारी, पेपर लीक और जातीय तनाव सुलग रहा हो, तब ‘ग्लोबल लीडर’ की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग, विदेशी दौरों की रील्स और जन्मदिन पर देशव्यापी ‘दीपक’ का अनुष्ठान यह स्थापित करने के लिए रचा जाता है कि जनसमर्थन निर्विवाद है।
2. हंगरी में ओर्बन ने कभी संविधान को सीधे खारिज नहीं किया। उन्होंने अदालतों, चुनाव आयोग और मीडिया घरानों को अपने कॉरपोरेट मित्रों के जरिए कानूनी रूप से खरीद या नियंत्रित कर लिया। समकालीन भारत में अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट में चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोपों के बाद चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसों को संस्थागत तरीके से ‘क्लीन चिट’ मिलना। न्यायपालिका और जांच एजेंसियों की चुनिंदा सक्रियता- जहाँ सत्ता पक्ष के जुड़े मामलों में स्वतः शुद्धिकरण हो जाता है, असहमति रखने वालों पर कानूनों का शिकंजा कसना और एनडीटीवी आदि को अपने दोस्तों के जरिए खरीद कर नियंत्रित करना ऐसा ही उदाहरण है।
3. जब तुर्की की मुद्रा (लीरा) तेजी से गिर रही थी और महंगाई चरम पर थी, तब एर्दोगन ने ‘हागिया सोफिया’ को मस्जिद में तब्दील कर जनमानस को धार्मिक राष्ट्रवाद के नशे में झोंक दिया ताकि लोग अपनी खाली जेबों को भूल जाएं। समकालीन भारत में भी डॉलर के मुकाबले गिरती भारतीय रुपया, बढ़ती महंगाई, इथेनॉल मिश्रण से मध्यवर्ग की गाड़ियों के इंजन तबाह होने और यूपीआई पर लगने वाले नए वित्तीय शुल्कों के बोझ से कराह रहा है, तब ध्यान खींचने के लिए आर्थिक आंकड़ों के बजाय ‘सांस्कृतिक गौरव’, ‘मंदिर’ और ‘आशीर्वाद का दीया’ जैसे भावनात्मक आवरण आगे कर दिए जाते हैं।
दरअसल स्पिन डिक्टेटर कभी समाज को पूरी तरह शांत नहीं होने देते; वे नियंत्रित अंतर्विरोध बनाए रखते हैं। समकालीन भारत में यूजीसी और शिक्षा नीति के नए प्रारूपों के जरिए सामान्य वर्ग के युवाओं के भीतर यह अविश्वास गहरा करना कि वे जन्मजात दोषी हैं, और साथ ही जातियों को आपस में उलझाए रखना—यह विमर्श को वास्तविक आर्थिक व नीतिगत विफलता से भटकाने का आजमाया हुआ नुस्खा है।
17 सितंबर को ‘आशीर्वाद का दीया’ जलवाने का पूरा आयोजन इसी ‘स्पिन डिक्टेटरशिप’ की उत्कृष्ट मिसाल है। यह सीधे आदेश देकर डराने के बजाय जनता के मन में यह भ्रम पैदा करता है कि वे स्वेच्छा से अपने “प्रिय नेता” की दीर्घायु की कामना कर रहे हैं।
6. तुलनात्मक रूपरेखा: गांधी, बर्नेज और समकालीन स्पिन मॉडल
| आयाम | महात्मा गांधी (नैतिक जन-आंदोलन) | एडवर्ड बर्नेज (पीआर सिद्धांत) | नरेंद्र मोदी व स्पिन मॉडल (समकालीन सत्ता) |
| प्रतीक और माध्यम | चरखा, नमक, प्रार्थना (त्याग और आत्मबल) | विज्ञापन, प्रेस, मनोवैज्ञानिक अचेतन का दोहन | दीया, थाली, सेंगोल, 24×7 टीवी, रील्स, अल्गोरिदम |
| जनता की स्थिति | स्वाभिमानी, नैतिक रूप से जागृत सत्याग्रही | अवचेतन इच्छाओं का बंधक ‘उपभोक्ता’ | विमर्श-विहीन, आनुष्ठानिक रूप से सम्मोहित ‘फॉलोअर’ |
| विपक्षी स्वर का सामना | खुला संवाद, आत्मनिरीक्षण और प्रायश्चित | प्रतिस्पर्धी ब्रांड की बेहतर पैकेजिंग | कानूनी जांचें, नैरेटिव-वॉर, और आलोचकों का चरित्र-हनन |
| मूल उद्देश्य | क्रूर सत्ता के विरुद्ध नैतिक जन-प्रतिरोध | जन-सहमति का निर्माण (Engineered Consent) | संस्थागत चूकों और नाकामियों से ध्यान भटकाना (Distraction) |
उपसंहार: ‘दीये’ के पीछे छुपा अधिनायकवाद और अंधेरे में घिरे बुनियादी सवाल!
एडवर्ड बर्नेज ने आगाह किया था कि प्रोपगैंडा का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह एक स्वतंत्र नागरिक को सम्मोहित, विचारहीन आज्ञाकारी इकाई में बदल देता है। वहीं, गुरिएव और ट्रेइसमैन ने स्पष्ट किया कि ‘स्पिन डिक्टेटर’ कभी आपको यह महसूस नहीं होने देता कि आप गुलाम हैं; वह आपको यह भ्रम देता है कि आप अपनी मर्जी से सत्ता के आगे नतमस्तक हैं।
एडवर्ड बर्नेज ने बताया था कि जन-मानस को ‘कैसे’ हांका जाए, लेकिन सर्गेई गुरिएव और डैनियल ट्रेइसमैन ने यह साबित किया कि आधुनिक लोकतंत्रों में तानशाह ‘सेंसरशिप’ की जगह ‘शोर’ (Noise) का इस्तेमाल करते हैं। वे आपकी आवाज नहीं दबाते, बल्कि इतना तेज लाउडस्पीकर बजा देते हैं—चाहे वह थाली का शोर हो या जन्मदिन के दीयों का तमाशा—कि कराहते हुए बेरोजगार युवा, लुटते हुए श्रद्धालु और पिसते हुए मध्यमवर्ग की चीख उस शोर में विलीन हो जाए।
*17 सितंबर को शाम 6 से 7 बजे के बीच प्रज्वलित होने वाले दीयों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कितनी बत्तियां जलीं; असल सवाल यह है कि:
*क्या वह दीया उन लाखों बेरोजगार नौजवानों के घरों का चूल्हा जला पाएगा जिनके सपने पेपर लीक माफिया ने लूट लिए?
*क्या वह रोशनी उन सामान्य वर्ग के छात्रों की व्यथा मिटा पाएगी जो यूजीसी के कानूनी शिकंजे में हाशिए पर धकेल दिए गए हैं?
*क्या वह प्रकाश उस मध्यवर्ग के घावों को भर पाएगा जो महंगाई, टैक्स और इथेनॉल की नीतिगत मार से कराह रहा है?
*और क्या वह दीया राम मंदिर के चढ़ावे पर उठे वित्तीय संशयों और चंपत राय व अनिल मिश्रा जैसे जिम्मेदारों को दी गई त्वरित क्लीन चिट के अंधेरे को दूर कर पाएगा?
यदि प्रतीक जनता की वास्तविक पीड़ा को अभिव्यक्ति देने के बजाय सत्ता की जवाबदेही को ढकने का आवरण बन जाएं, तो वह साधना नहीं, बल्कि बर्नेज और स्पिन डिक्टेटरशिप का सबसे क्रूर मनोवैज्ञानिक छल है। जब तक नागरिक ‘आशीर्वाद’ देने की भावुकता से बाहर निकलकर व्यवस्था से उसके कर्मों का ‘हिसाब’ नहीं मांगेंगे, तब तक समस्याओं के अंधकार को किसी भी दीये की लौ से मिटाया नहीं जा सकेगा।
17 सितंबर को प्रज्वलित होने वाला ‘आशीर्वाद का दीया’ केवल एक पीआर स्टंट नहीं है; यह ‘स्पिन डिक्टेटरशिप’ का वह मनोवैज्ञानिक अनुष्ठान है जहाँ सत्ता अपनी नाकामियों का हिसाब देने के बजाय, पीड़ित जनता से ही अपने अमरत्व का आशीर्वाद मांगती है।
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बहुत बढ़िया लेख और शोध
टेबल के माध्यम से ज्यादा समझ में आया।
ऐसा लगता है ये अजैविक पार्टी पूरे भारत को मेंटल जोम्बी बना के रहेगी।
अच्छा विश्लेषण है।
बहुत ही ज्ञानवर्धक और कालनेमियों के बहुत से भेद खोलने वाली रिपोर्ट।
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