श्वेताभ पाठक श्वेत प्रेम रस। प्रश्न- हरे कृष्ण ज्ञान, बुध्दि और विवेक मे क्या अंतर है? बहुत सारी आपकी पोस्टों में बुध्दि ना होने पर, ज्ञान नहीं देना चाहिए ऐसा भी पढ़ा था , यानी पात्रता कैसे निर्धारित कर सकते हैं? ज्ञान तो बढ़ा सकते हैं लेकिन बुध्दि कैसे बढ़ा सकते हैं? क्या बुध्दि की उच्चतम स्तर विवेक है?धन्यवाद
श्री श्वेताभ पाठक जी:- थोड़ा और समझ लीजिये ।
लौकिक ज्ञान को समझने के लिए यह लौकिक बुद्धि की आवश्यकता होती है ।
लेकिन अध्य्यात्मिक क्षेत्र का ज्ञान समझने के लिए प्रज्ञा की आवश्यकता होती है ।
यह #प्रज्ञा #चक्षु कैसे खुलेगी ??
सन्त महापुरुषों के चरणोदक के सेवन से , उनकी सेवा से , उनके संग से ।
व्रत से , उपवास से , ध्यान से , धारणा से , यम , नियम से , संयम से , तप से ।
जब प्रज्ञा चक्षु खुल जाएगी तब शास्त्रों की गूढ़ बातें समझ में आने लगेगी ।
जैसे जय भीम प्रजाति के लोग कितना भी पढ़ लें, 100 पीएचडी कर लें तब भी वह शास्त्र की बातें नहीं समझ सकते ।
क्योंकि प्रज्ञा चक्षु खुलती है , सात्विक भोजन से , सात्विक आचार विचार से , सात्विकता से ।
तो जब प्रज्ञा चक्षु द्वारा शास्त्र की बात समझ आने लगेगी और संत महापुरुष की बात सही सही समझ आने लगेगी , तब आप सही सही साधना करेंगे ।
अब साधना करने के पश्चात आपकी ऋतम्भरा शक्ति जागृत होगी ।
ऋतंभरा भी आध्यात्मिक बुद्धि है ।
आध्यात्मिक बुद्धि जब खुलेगी जिसे ऋतम्भरा बुद्धि बोलते हैं , तब ब्रह्मांड के सभी आध्यात्मिक रहस्य खुलने लगते हैं और उनको समझने की शक्ति आने लगती है । फिर यही ऋतम्भरा बुद्धि मनुष्य को संसार सागर के दुस्तर महासागर से पार लगाने में अति सहायक बन जाती है ।
बिना प्रज्ञा चक्षु के भले आप सभी वेदों शास्त्रों में पारंगत हो जाएंगे , लेकिन वेदों के शास्त्रों के एक भी मन्त्र और श्लोक के रहस्य से दूर ही रहेंगे ।
इसीलिए तो बड़े बड़े षटशास्त्री , शंकराचार्य आदि जन्म से वेदाध्ययन करते हैं फिर भी वह वेदों का असली तात्पर्य न समझकर अर्थवाद में लगकर मोहित हो जाते हैं । उन्हें कर्म का रहस्य तक भी मालूम नहीं चल पाता है ।
इसीलिए पहले गुरु अपने साधको को कठिन से कठिन व्रत नियम आदि पालन करवाते थे जिससे उनकी बुद्धि की प्रज्ञा चक्षु खुल जाएं ।
तभी वह कोई बात समझ सकते हैं अन्यथा नहीं , भले वह सब कंठस्थ कर लेंगे लेकिन उसके मूल भाव से अनभिज्ञ रहेंगे ।
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#ऋतंभरा
ऋत का अर्थ होता है परम सत्य ।
ऋत का अर्थ होता है वह वास्तविक सत्य जो कभी नहीं बदलता ।
जैसे *आग जलाती है* !
यह ऋत है ।
जैसे किसी से आपने पूछा कि प्रधानमंत्री कौन है ?
आपने कहा मोदी जी ।
लेकिन मोदी अन्य देश का तो नहीं है ।
और अन्य काल का नहीं हो सकता ।
प्रधानमंत्री तो बदल जाएंगे ।
जैसे किसी से आपने पूछा समय क्या है ??
उसने बताया कि 6 बजे हैं ।
लेकिन यह सदा 6 तो नहीं बजे रह सकते ।
दोनों सत्य हैं । झूठ नहीं है कुछ ।
लेकिन यह परिवर्तित है ।
बदल जायेगा ।
आग जलाती है । यह ऋत है ।
वहीं आग करोड़ों वर्ष पूर्व भी जलाती थी और करोड़ों वर्ष के बाद भी जलायेगी ।
कोई भी काल हो , किसी भी वस्तु के लिए हो , किसी भी देश के लिए हो , किसी भी परिस्थिति के लिए हो , आग के जलाने का गुण नहीं बदलेगा ।।
इसलिए जो वास्तविक सत्य है , मौलिक सत्य , उसे ऋत कहते हैं ।
और इस ऋत को ज्ञात करने वाली या जानने वाली बुद्धि को ऋतम्भरा कहते हैं ।
ऐसी वास्तविकता या सत्य जो कभी नहीं बदलती ।
बुद्धि जब ऋतम्भरा हो जाती है तो वह कभी भी ग़लत निर्णय नहीं करती ।
तो ऋतम्भरा वह बुद्धि है जो वास्तविक ज्ञान का रहस्य प्रतिपादित करती है ।
जब ऋतम्भरा प्रज्ञा खुलती है तो ब्रह्मांड के समस्त रहस्य स्वयं हाथ जोड़े आपके सामने खड़े रहते हैं ।
वेदों शास्त्रों महापयरुषों के वचन समझने में आसानी होती है ।
उनके पीछे के रहस्य , मर्म , तत्त्वतः क्या कहना चाहते हैं , वह सब स्वतः आने लगता है ।
और यह जागृत होती है साधना से ।
इसीलिए आप लोगों से कहता रहता हूँ-
साधना करु साधना करु साधना करु प्यारे ।
