Courtesy Desk : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते 8 मुस्लिम पुरुषों की ज़मानत अर्ज़ियां मंज़ूर कीं। इन पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने, गंगा नदी (वाराणसी में) में नाव पर मांसाहारी भोजन करने और बचा हुआ कचरा नदी में फेंकने का आरोप है।
उसी दिन (15 मई) जारी अलग-अलग आदेशों में जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने 5 आरोपियों को ज़मानत दी, जबकि जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा ने 3 आरोपियों को ज़मानत दी। इसके साथ ही इस मामले में कुल 14 आरोपियों में से 8 को अब ज़मानत मिल चुकी है।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में 14 आरोपियों में से 8 को अब ज़मानत मिल गई। अपने 16 पन्नों के आदेश में जस्टिस शुक्ला ने कहा कि हालांकि कथित कृत्य से हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं, लेकिन आरोपियों ने अपने हलफ़नामों में “सच्चा पछतावा” दिखाया है। हालांकि, सिंगल जज ने आरोपियों के ख़िलाफ़ ज़बरन वसूली के आरोपों को ‘संदिग्ध’ पाया।
बेंच ने कहा,
“यह मामला मुस्लिम समुदाय के सदस्यों से जुड़ा है, जो रोज़ा इफ्तार पार्टी कर रहे थे। इस इफ्तार पार्टी के दौरान, भोजन करते समय मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा मांसाहारी भोजन किए जाने की बात कही गई। फिर उन पर आरोप है कि उन्होंने बचा हुआ भोजन गंगा नदी में फेंक दिया। कोर्ट की निष्पक्ष राय में इस तथ्य को सही तौर पर हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला कहा जा सकता है।”
संक्षेप में कहें तो, सभी 14 मुस्लिम पुरुषों को 17 मार्च को वाराणसी पुलिस ने भारतीय जनता युवा मोर्चा के ज़िला अध्यक्ष रजत जायसवाल की शिकायत पर गिरफ़्तार किया था। यह विवाद तब शुरू हुआ जब इंस्टाग्राम पर एक वीडियो सामने आया, जिसे आरोपियों में से एक (मोहम्मद तहसीन) के हैंडल से अपलोड किया गया। इस वीडियो में यह समूह नाव पर रोज़ा इफ़्तार पार्टी के दौरान मांसाहारी भोजन करते हुए और कथित तौर पर उसका बचा हुआ हिस्सा नदी में फेंकते हुए दिखाई दे रहा था।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि पवित्र नदी में नाव पर बैठकर, इफ़्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाना और फिर उसका बचा हुआ हिस्सा पानी में फेंक देना—आरोपियों का यह कृत्य “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय” था। शिकायतकर्ता ने आगे दावा किया कि यह कृत्य जान-बूझकर “जिहादी मानसिकता” को बढ़ावा देने के लिए किया गया, जिससे सनातन धर्म के अनुयायियों की भावनाएँ गहरी आहत हुईं और जनता में व्यापक आक्रोश फैल गया।
इसके बाद उन पर BNS की धारा 196(1)(b) [दुश्मनी को बढ़ावा देना], 270 [सार्वजनिक उपद्रव], 279 [सार्वजनिक झरने या जलाशय के पानी को दूषित करना], 298 [पूजा स्थल को अपवित्र करना या नुकसान पहुँचाना], 299 [जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य, जिसका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना हो], 308 [जबरन वसूली] और 223(b) के तहत, साथ ही जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 24 [प्रदूषण फैलाने वाले पदार्थों के निपटान के लिए नदी या कुएँ के उपयोग पर रोक] के तहत मामला दर्ज किया गया।
वाराणसी सेशन कोर्ट द्वारा 1 अप्रैल को ज़मानत देने से इनकार किए जाने के बाद आरोपियों ने ज़मानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। इससे पहले, उनकी ज़मानत याचिकाएं CJM अदालत द्वारा भी खारिज की गईं। ज़मानत याचिकाओं का विरोध करते हुए एडिशनल एडवोकेट जनरल अनूप त्रिवेदी ने तर्क दिया कि आवेदकों ने न केवल गंगा नदी को अपवित्र किया, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने के एक दुस्साहसी प्रयास के तहत उस वीडियो को इंस्टाग्राम पर भी अपलोड किया।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह वीडियो सार्वजनिक सौहार्द को बिगाड़ने की एक बड़ी साज़िश का हिस्सा है। वर्तमान में यह पता लगाने के लिए जांच चल रही है कि इस इफ़्तार पार्टी के लिए किसने पैसे दिए और वीडियो को अपलोड करवाने में किसकी मुख्य भूमिका थी। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि गंगा न केवल एक पूजनीय हिंदू देवी हैं, बल्कि उत्तरी भारत की जीवनरेखा भी हैं। उन्होंने कहा कि आरोपियों के इस कृत्य से पूरे देश की भावनाएं आहत हुई हैं और इससे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर स्थिति भी पैदा हो गई। दूसरी ओर, आरोपी के वकील ने यह दलील दी कि आवेदकों को इस मामले में झूठा फंसाया गया और उनका हिंदू समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था।
आगे यह भी कहा गया कि आवेदक गरीब बुनकर हैं, जिनकी आजीविका का एकमात्र साधन बुनाई ही है। इसके अलावा, यह भी बताया गया कि आवेदकों ने उक्त नाविक से ज़बरन वसूली की थी – इस बात को जांच के दौरान काफी देर से सामने लाया गया। शुरुआत में ही जस्टिस शुक्ला ने गंगा नदी के गहरे महत्व के संबंध में राज्य की दलीलों से ‘पूरी तरह’ सहमति जताई; उन्होंने न केवल हिंदू समुदाय के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए इसके महत्व को स्वीकार किया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि एडिशनल एडवोकेट जनरल द्वारा व्यक्त की गई यह चिंता कि कुछ लोगों के कृत्यों से धार्मिक सद्भाव भंग हो सकता है और इसके परिणामस्वरूप कोई बड़ी घटना घटित हो सकती है – “बेबुनियाद नहीं थी”।
बेंच ने यह भी माना कि सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, जो दुनिया के हर कोने तक बिजली की गति से जानकारी फैलाते हैं, न केवल मनोरंजन और जानकारी साझा करने का ज़रिया बन गए, बल्कि गलत जानकारी फैलाने के बड़े केंद्र भी बन गए। अगर इनका गलत इस्तेमाल किया जाए तो ये जीवन के सामान्य प्रवाह को भी बाधित कर सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि जब किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति की ज़मानत अर्ज़ी पर विचार किया जा रहा हो तो उसे मामले के तथ्यों तक ही सीमित रहना चाहिए। साथ ही व्यापक सामाजिक मुद्दों को भी ध्यान में रखना चाहिए। इसलिए आवेदकों पर लगे आरोपों पर विचार करते हुए बेंच ने टिप्पणी की कि हालांकि कथित कृत्य को सही तौर पर हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कहा जा सकता है, लेकिन बेंच को फिलहाल इस बात पर विचार करना था कि क्या उन्हें जाँच और ट्रायल के दौरान ज़मानत पर रिहा किया जा सकता है। कोर्ट ने पाया कि आवेदक अपने कार्यों के लिए माफ़ी मांग रहे हैं। उनके परिवार भी समाज को हुई पीड़ा के लिए खेद व्यक्त करते हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“ज़मानत अर्ज़ी के समर्थन में कोर्ट में जो हलफ़नामे दायर किए गए हैं, साथ ही आवेदकों के वकील की दलीलें भी आवेदकों पर लगाए गए आरोपों के प्रति सच्ची पछतावे को दर्शाती हैं।”
कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि वीडियो में अपनी मौजूदगी से इनकार न करना और फिर पछतावा व्यक्त करना यह दर्शाता है कि आवेदक हलफ़नामे में कही गई बातों को सच में स्वीकार करते हैं, और वे इसे कानून की सज़ा से बचने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।
हालांकि, बेंच ने यह स्पष्ट किया कि वह इस बात को समझती है कि किसी आपराधिक मामले में अभियोजन का सामना करते समय जेल में बंद व्यक्ति की ओर से हलफ़नामा दायर करने वाला कोई अन्य व्यक्ति अपराध की विशिष्ट स्वीकारोक्ति नहीं कर सकता; और ज़मानत देने पर विचार करते समय, कथित अपराध की स्वीकारोक्ति “आवश्यक नहीं” है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने आरोपियों पर बाद में लगाए गए ज़बरन वसूली के आरोपों के संबंध में संदेह व्यक्त किया। संदर्भ के लिए, जांच के दौरान, नाविक (अनिल साहनी) ने आरोप लगाया कि उसे धमकाया गया और आरोपियों ने ज़बरदस्ती उसकी नाव पर कब्ज़ा कर लिया था।
बेंच को यह कहानी संदिग्ध लगी और उसने पाया कि मामला दर्ज होने से पहले उक्त नाविक ने ज़बरन वसूली के संबंध में कोई रिपोर्ट दर्ज कराने या कोई शिकायत करने के लिए आगे कदम नहीं बढ़ाया था।
बेंच ने टिप्पणी की,
“कोर्ट की प्रथम दृष्ट्या राय में नाविक अनिल साहनी द्वारा ज़बरन वसूली के आरोपों के साथ सामने आने में की गई देरी उसकी कहानी पर संदेह पैदा करती है।”
इसलिए मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों, आवेदकों के किसी भी आपराधिक इतिहास के न होने, हिरासत में बिताई गई अवधि और व्यक्त की गई माफी को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रथम दृष्टया, जमानत का मामला बनता है। खंडपीठ ने आगे कहा कि, जैसा कि राज्य द्वारा आशंका व्यक्त की गई, इफ्तार पार्टी के आयोजन, वीडियो अपलोड किए जाने और धार्मिक वैमनस्य फैलाने के लिए उसका उपयोग किए जाने—जो कि एक बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है—से संबंधित जांच, आवेदकों को और अधिक समय तक हिरासत में रखे बिना भी जारी रह सकती है। अतः, जमानत याचिकाएं स्वीकार कर ली गईं।
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