लेखक: #संदीपदेव
विषय: तुष्टिकरण का ‘संघी स्वरूप’!
हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में गर्व से घोषणा की: “मुस्लिम समाज को OBC आरक्षण और उच्च शिक्षा में स्कॉलरशिप हमारी सरकार ने दी।” यह वक्तव्य उन सनातनी हिंदुओं के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए जो अभी भी भ्रम के शिकार हैं!
वर्ष 2015 से मैं लगातार ‘हिंदू विखंडीकरण’ के इन प्रयासों पर लिख रहा हूं। सरकारी दस्तावेज गवाह हैं कि संविधान की मूल भावना के विपरीत जाकर मुस्लिम आरक्षण की जमीन तैयार करने में उन शक्तियों की बड़ी भूमिका रही है, जिन्हें हिंदू समाज अपना रक्षक समझता है। सोशल मीडिया पर एक वर्ग आज भी ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ का शिकार है, जो गांधी-नेहरू के नाम की ओट लेकर वर्तमान सत्ता के जातिवादी और विभाजनकारी एजेंडे को ढंकने का प्रयास करता है।


* ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: पटेल की चेतावनी और जनता पार्टी का उदय!
विभाजन के बाद जब संविधान सभा में मुस्लिम आरक्षण की मांग उठी, तब सरदार पटेल ने दोटूक कहा था कि देश का बंटवारा होने के बाद अब ‘बड़े भाई’ (हिंदू) का गला और मत दबाइए। परिणामस्वरूप, केवल SC/ST के लिए ही आरक्षण सुनिश्चित हुआ।

परंतु, आपातकाल के बाद 1977 में बनी मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार (जिसमें जनसंघ 90 सांसद के साथ सबसे बड़ा घटक था) ने इस दिशा को बदल दिया।
मोरारजी देसाई पर अमेरिकी लेखक सेमोर हर्श (Seymour Hersh) ने अपनी पुस्तक ‘The Price of Power’ में CIA एजेंट होने का आरोप लगाया था। मोरारजी ने हर्श पर $100 मिलियन का मानहानि का मुकदमा किया, लेकिन वे इसे जीत नहीं पाए। शिकागो की अदालत ने साक्ष्य के अभाव में मोरारी के दावे को खारिज कर दिया था। मोरारजी स्वयं को निर्दोष साबित करने में विफल रहे और अमेरिकी अदालत ने हर्श के पक्ष में फैसला सुनाया। जिससे मोरारजी पर लगे आरोपों की छाया पूरी तरह नहीं हटी!
* विदेशी दखल: उस दौर में भारत शीतयुद्ध की बिसात बन चुका था। यदि नेहरू-इंदिरा पर सोवियत संघ (KGB) का प्रभाव था, तो जनसंघ-जनता पार्टी गठबंधन पर अमेरिकी हितों (CIA) की छाया देखी गई।
* मंडल आयोग और ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ का प्रवेश:-
1978 में अल्पसंख्यक आयोग और 1979 में मंडल कमीशन का गठन मोरारजी सरकार की ही देन थी। यह हिंदू समाज को जातियों में बांटने और मुस्लिम आरक्षण के लिए पिछड़ा वर्ग (OBC) की श्रेणी का उपयोग करने का पहला बड़ा संगठित प्रयास था।
* नेहरू-गांधी परिवार की आरक्षण नीति : नेहरू ने काका कालेलकर आयोग (1953) की रिपोर्ट को खारिज कर दिया था और राजीव गांधी ने भी मंडल आयोग को ‘देश तोड़ने वाला’ बताया था। विडंबना देखिए कि आज भाजपा इन्हीं नेताओं को आरक्षण विरोधी बताकर स्वयं को ‘आरक्षण का सबसे बड़ा चैंपियन’ सिद्ध करने की होड़ में है।
* वाजपेयी से मोदी तक: जातिवादी ढांचे का कानूनन सुदृढ़ीकरण!
जिस अमेरिकी नश्लवादी ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ को भारत में जाति के आधार पर मोरारजी सरकार ने शुरू किया, उसे बाद की भाजपा सरकारों ने संवैधानिक जामा पहनाया। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 81वें, 82वें और 85वें संविधान संशोधन के माध्यम से आरक्षण की 50% की सीमा (Cap) को लांघने के लिए ‘बैकलॉग’ की व्यवस्था की और पदोन्नति में वरिष्ठता की जगह आरक्षण को आधार बनाया गया।
नरेंद्र मोदी सरकार ने 2015 और 2018 में SC/ST Act को पहले से कहीं अधिक कठोर बनाया। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी पलट दिया गया।
102वां संशोधन (2018) कर पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया। और अब UGC कानून लाकर भारत के विश्वविद्यालयों में जातिवाद का जहर घोल दिया है।

* क्रिटिकल रेस थ्योरी (CRT) और भारत का भविष्य:-
अमेरिका की Critical Race Theory यह मानती है कि व्यवस्था की हर इकाई (न्याय, शिक्षा, प्रशासन) नस्लवादी है और इसे पूरी तरह उखाड़कर नए सिरे से ‘इक्विटी’ (साम्य) लानी चाहिए।
भारत में इसी थ्योरी को ‘जाति’ के आधार पर संघी सरकारों ने लागू किया और कानून बना-बना कर उसे मजबूत भी वही बनाते जा रहे हैं।
* UGC ‘इक्विटी’ रेगुलेशन 2026: विश्वविद्यालयों में सामान्य वर्ग के छात्रों को ‘संभावित अपराधी’ मानकर कैंपस में जातिवाद का जहर घोला जा रहा है।
* अंबेडकर का ‘गॉड’ बनना: वैचारिक रूप से अंबेडकर के नाम पर एक नया ‘पंथ’ खड़ा किया गया है और हिंदू समाज की एक जाति को दूसरी जाति के विरुद्ध कानून बनाकर युद्ध के लिए उकसाया जा रहा है!
* निष्कर्ष
संघ और भाजपा के नेता जिस तरह अमेरिकी संस्थाओं (जैसे ACYPL) से प्रशिक्षित होते हैं, जिस तरह से विदेशी फंडिंग (USAID) लेने का आरोप उन पर लगता है और जिस तरह उनके नाम विदेशी #EpsteinFiles में आते हैं, वह संकेत देता है कि यह केवल सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि एक गहरा ‘वैश्विक एजेंडा’ है!
ज्ञात हो कि मोदी सरकार ने विदेशी फंडिंग को संरक्षण भी कानून बनाकर दिया है। 2018 में एक ऐसा कानून लाया गया जिससे 1976 के बाद से राजनीतिक दलों को मिली विदेशी फंडिंग की जांच का रास्ता बंद हो गया। क्या यह जेपी आंदोलन और उस दौर की संदिग्ध US CIA की विदेशी फंडिंग को सुरक्षा देने का प्रयास था? इस दौर में इन पर USAID से फंड लेने का आरोप स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगा चुके हैं!
हिंदू समाज आज भी अपने ‘हितैषी’ की पहचान करने में असमर्थ है और अनजाने में अपनी ही चिता सजा रहा है।
