जगद्गुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी का संकल्प: धर्म, राष्ट्र और गौ-संरक्षण का संगम
भारतभूमि सदैव से धर्म, संस्कृति और परम्परा की पावन धारा से पोषित रही है। यहाँ राष्ट्र की आत्मा केवल सत्ता और सीमाओं में नहीं, बल्कि गौ, गंगा और गीता जैसे सनातन प्रतीकों में प्रतिष्ठित है। इसी भावभूमि पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने पुनः एक बार राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का संकल्प धारण किया है। “गौ मतदाता संकल्प यात्रा” इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जो वर्तमान में बिहार की पवित्र धरती पर आरम्भ हो रही है।
धर्म और राजनीति का वैदिक संगम
आज राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का साधन बन चुकी है, उसमें न तो राष्ट्र की आत्मा झलकती है और न ही समाज की आध्यात्मिक चेतना। ऐसे समय में यह यात्रा यह स्मरण कराती है कि बिना धर्मनिष्ठ राजनीति के राष्ट्र कभी सुदृढ़ नहीं हो सकता। गौ माता, जो भारतीय संस्कृति में ‘राष्ट्रमाता’ के रूप में पूज्य हैं, उनके संरक्षण के संकल्प के बिना राजनीति केवल खोखला तंत्र रह जाएगी। यह यात्रा जनता को यह संदेश देती है कि मताधिकार केवल व्यक्तिगत सुविधा हेतु नहीं, बल्कि धर्म और राष्ट्र की रक्षा हेतु प्रयोग किया जाना चाहिए।
बिहार की भूमि पर व्यापक यात्रा
१२ सितम्बर २०२५ को वाराणसी से पटना की ओर प्रारम्भ होकर यह यात्रा बिहार के प्रत्येक कोने में पहुँचने का कार्यक्रम रखती है। सितामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर, गया, औरंगाबाद, रोहतास, भोजपुर, सारण, सीवान, गोपालगंज, चम्पारण, दरभंगा, मुज़फ्फरपुर,खगड़िया, मुंगेर, नालन्दा इत्यादि लगभग सभी प्रमुख जिलों को यह यात्रा स्पर्श करेगी।
यह केवल भौगोलिक भ्रमण नहीं, अपितु प्रत्येक जिले में धर्मसभा, प्रवचन, संकल्प और सांस्कृतिक जागरण का आयोजन होगा। हर पड़ाव पर यह स्मरण कराया जाएगा कि गौ-रक्षा राष्ट्र-रक्षा का मूलाधार है।
महाराष्ट्र से बिहार तक एक अखिलभारतीय अभियान
इससे पूर्व भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने महाराष्ट्र सहित अन्य अनेक प्रदेशों में इसी प्रकार की यात्राएँ संपन्न कीं, जहाँ लाखों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर गौ-ध्वज के तले राष्ट्रधर्म की शपथ ली। महाराष्ट्र की धरती पर सम्पन्न हुई ऐसी यात्राओं ने जनचेतना को व्यापक दिशा दी और समाज को यह बोध कराया कि धर्मविहीन राजनीति राष्ट्रविनाश का मार्ग प्रशस्त करती है। अब वही चेतना बिहार की पावन भूमि पर प्रकट हो रही है।
राष्ट्रमाता के रूप में गौ माता
भारतीय जीवन में गौ केवल पशु नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के पोषण का प्रतीक हैं। वेदों में गौ को ‘अघ्न्या’ कहा गया है, अर्थात् जिसका वध कभी न किया जाए। कृषक का आधार, गृहस्थ का पोषण गौ माता ही रही हैं। आज जब आधुनिकता की आंधी ने संस्कृति को जड़ से काटने का प्रयास किया है, तब इस यात्रा का उद्घोष है कि “गौ माता ही राष्ट्रमाता हैं”।
मतदाता का धर्मनिष्ठ संकल्प
इस यात्रा का एक अभिनव पक्ष है “गौ मतदाता” की संकल्पना। इसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय केवल लाभ और प्रलोभन न देखे, बल्कि यह सोचे कि कौन-सा नेतृत्व गौ, गंगा और गीता की रक्षा करेगा। यही सच्चा धर्म है और यही राष्ट्रहित भी।
भविष्य का आह्वान
यह यात्रा बिहार से आरम्भ होकर सम्पूर्ण भारत को प्रभावित करेगी। यह केवल गौ-संरक्षण का अभियान नहीं, बल्कि धर्मराज्य की पुनर्स्थापना की भूमिका है।
“गौ मतदाता संकल्प यात्रा” केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, यह एक राष्ट्रीय पुनर्जागरण का शंखनाद है। यह यात्रा हमें स्मरण कराती है कि भारत की आत्मा धर्म में बसती है, और धर्म का आधार है “गौ माता”। यदि राष्ट्र को सुदृढ़, स्वावलम्बी और सांस्कृतिक दृष्टि से पुनर्जीवित करना है तो गौ माता को राष्ट्रमाता के रूप में स्थापित करना ही होगा।
बिहार की भूमि से उठी यह लौ शीघ्र ही सम्पूर्ण भारत को आलोकित करेगी और आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देगी कि राष्ट्र केवल संविधान और राजनीति से नहीं, बल्कि धर्म और संस्कृति से जीवित रहता है।
—हर्षवर्धन अरोड़ा / कुमार मयंक
