संघ के पाले हुए नाग 24 NAAC का खेल – गलगोटिया ने सरकार और संगठन दोनों के चेहरे से नकाब हटा दी… NAAC देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को शोध, पढ़ाई और ढांचे के आधार पर A, A+, A++ जैसी ग्रेड देता है…. यही ग्रेड आगे UGC की ग्रांट, रैंकिंग और प्रतिष्ठा तय करती है, इसलिए सरकारी से लेकर प्राइवेट विश्वविद्यालय तक इसके लिए लालायित रहते हैं। तकनीकी संस्थानों के लिए यही भूमिका AICTE निभाता है…. बिना उसकी मान्यता डिग्री की कीमत नहीं होती। दोनों एजेंसियाँ शिक्षा मंत्रालय के अधीन हैं।
लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है।
देश की कई प्राइवेट यूनिवर्सिटियाँ जैसे गलगोटिया, लवली प्रोफेशनल और जिंदल आदि अच्छी ग्रेडिंग के लिए “भाई साहब” लोगों से संपर्क साधती हैं। भाईसाहब मतलब
सुनील अम्बेकर- अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, के रघुनन्दन- विद्याभारती उच्च शिक्षा संसथान, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास- अतुल कोठारी, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ- महेंद्र कपूर व G लक्ष्मण, भारतीय , शंकरानद- भारतीय शिक्षण मंडल
इनके आसपास पूरा नेटवर्क काम करता है….
डील सीधी होती है….. A या A+ या A++ ग्रेड के बदले रकम तय। फिर भाई साहब का कोई सहयोगी NAAC या AICTE के जिम्मेदार लोगों तक संदेश पहुँचा देता है कि फलाँ संस्थान को फलाँ ग्रेड देना है
और ग्रेड मिल जाता है।
सिर्फ पैसा ही नहीं, हर साल बड़े-बड़े कार्यक्रम भी इन्हीं विश्वविद्यालयों में होते हैं। पूरा खर्च विश्वविद्यालय उठाता है। भाई साहब मुख्य अतिथि बनते हैं, तो साथ में कोई केंद्रीय मंत्री, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति भी पहुँच जाता है। संस्थान की प्रतिष्ठा बढ़ती है और बाकी डीलिंग सहयोगी संभाल लेते हैं।
यह कारोबार इतना बड़ा बताया जाता है कि अगर गंभीर जांच हो जाए तो न जाने कितने भाई साहब जेल की हवा खाएँ।
मामला केवल ग्रेडिंग तक सीमित नहीं है। कुलपति, निदेशक, चेयरमैन और मेम्बर सेक्रेटरी तक की नियुक्तियों में भी भाई साहब का प्रभाव चलता है। किसे बनना है और किसे नहीं…. यही तय करते हैं। इसलिए कई संस्थानों में पद महीनों या साल भर खाली पड़े रहते हैं या एक्सटेंशन से काम चलाया जाता है।
एक उदाहरण बिलासपुर के केंद्रीय विश्वविद्यालय गुरु घासीदास का बताया जाता है, जहाँ NAAC टीम के तीन दिन के दौरे में करीब 20 लाख खर्च दिखाया गया। कहा जाता है कि कुलपति की नजदीकी शिक्षा न्यास से जुड़े लोगों से है और वही निर्देश चलते हैं।
धीरे-धीरे हालत यह हो गई है कि विश्वविद्यालय पढ़ाई और शोध से ज्यादा इवेंट मैनेजमेंट के अड्डे बनते जा रहे हैं। UGC से मिलने वाला पैसा सेमिनार, कार्यशाला या शोध पर कम और भाई साहब के कार्यक्रमों व महिमामंडन पर ज्यादा खर्च होता है। शिक्षा के मंदिर छात्र राजनीति और आयोजनों के मंच बनते जा रहे हैं।
एक साल पहले NAAC ग्रेडिंग में लेन-देन के आरोप में JNU के प्रोफेसर राजीव सिजेरिया को CBI ने पकड़ा था। उसके बाद NAAC ने लगभग 700 लोगों को पैनल से बाहर किया। लेकिन कुछ समय बाद वे जेल से बाहर आ गए और फिर शिक्षा संगठनों में सक्रिय बताए जाते हैं।
कुल मिलाकर तस्वीर यह बनती है कि शिक्षा व्यवस्था में ग्रेडिंग, नियुक्तियाँ और कार्यक्रम…. सब कुछ एक ही नेटवर्क के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
सरकार और संगठन अलग नहीं…. भाई साहब ही सरकार हैं और सरकार ही भाई साहब।
