संदीप देव। नव-बौद्धवाद, असल में डॉ.बी.आर.आंबेडकर द्वारा चलाया गया ‘नवयान’ पंथ है। डॉ आंबेडकर ने The Buddha and His Dhamma (1957) पुस्तक लिखकर बौद्ध धर्म के नाम पर अपने पंथ की स्थापना की थी और इसे ‘नवयान’ नाम दिया था।
बौद्ध धर्म में पूर्व के हीनयान, महायान और वज्रयान की जैसे तीन साखाएं थीं, उसी तर्ज पर इसे ‘नवयान’ नाम दिया गया, जो आज ‘भीमयान’ के नाम से भी जाना जाता है। डॉ आंबेडकर 1920 के दशक से ही धर्मांतरण के पक्षधर थे और हर हाल में हिंदू धर्म छोड़ना चाहते थे। पहले इस्लाम, फिर सिख पंथ की उन्होंने वकालत की, परन्तु बाद में उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म में अपने अनुयायियों के साथ धर्मांतरण किया और 1957 में अपनी पुस्तक लिखकर इस बौद्ध धर्म की भी मनमानी व्याख्या करते हुए अपने नये पंथ ‘नवयान’ की स्थापना की, जो आज ‘भीमयान’ बन चुका है!
डॉ आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञा में से आरंभ की 8 प्रतीज्ञा हिंदू धर्म और उसके देवी-देवताओं के प्रति घृणा से भरे हैं और वह आज भी डॉ आंबेडकर की दीक्षा भूमि नागपुर में एक पिलर के रूप में लगे हैं (Pic1)। वहां हर आंबेडकरवादी जाकर माथा टेकता है और पिलर से हिंदुओं के प्रति घृणा के विचार को अपनाता है। आंबेडकरवादी वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई भी वहां माथा टेकने गये थे और देख लीजिए कि उन्होंने सनातन श्री हरि विष्णु पर किस तरह की अशोभनीय टिप्पणी की थी! आंबेडकरवाद की जातीय विचारधारा ही ‘भीमयान’ है, जो बौद्ध धर्म के आवरण में लिपटा है, परन्तु वह बौद्ध धर्म नहीं ‘आंबेडकर धर्म’ है!
The Buddha and His Dhamma जब डॉ आंबेडकर ने लिखी थी, उस समय बड़े-बड़े बौद्ध विद्वानों लेख लिखकर स्पष्ट किया था कि आंबेडकर ने पोलिटिकल एंबीशन में यह जो पुस्तक लिखी है, उसका बौद्ध धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह आंबेडकर के अपने विचार हैं, जो वह भगवान बुद्ध की आड़ लेकर स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
बाद में ‘भीमयानियों’ ने डॉ आंबेडकर को ‘बोधिसत्व’ की उपाधि से नवाज कर और उनकी मृत्यु को ‘महापरिनिर्वाण’ कह कर उन्हें बुद्ध के अवतार के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। इतने दशकों के बाद भी यह केवल एकेडमिक बहसों का हिस्सा था। महाराष्ट्र आदि में इसकी स्थापना के लिए जमीन पर छिटपुट प्रयास चलते रहते थे। परंतु इस प्रयास को 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही जबरदस्त बल मिला।
प्रधानमंत्री मोदी ने आते ही 2015 में SC/ST act अधिनियम में बदलाव कर इसे मजबूत बनाया, 2018 में SC/ST act पर सुप्रीम कोर्ट के बिना जांच गिरफ्तारी पर रोक के निर्णय को पलट दिया, आंबेडकर से जुड़े स्थानों को ‘पंच-तीर्थ’ नाम देकर आंबेडकर को भगवान का दर्जा दिया, विज्ञान भवन में खुलेआम समान्य जाति के विरुद्ध ‘हिसाब चुकता’ जैसा अशोभनीय भाषण दिया, आंबेडकर की जीवनी के नाम पर स्वयं प्रधानमंत्री ने उनकी झूठी कहानियां गढ़ी, आंबेडकर जयंती पर सरकारी छुट्टी (14 अप्रैल 2025 से) घोषित की गई, आंबेडकर के नाम पर देश की राजधानी दिल्ली में एक बड़ा कन्वेंशन सेंटर बनवाया गया, आंबेडकर की मूर्तियों के आगे मोदी पूजा-पाठ और दंडवत करते हुए फोटो खिंचवाने लगे और आंबेडकरवादी उदित राज, दिलीप मंडल, मेसराम जैसों को भाजपा और सरकार ने सिर पर बैठाया!

देखते-देखते देश में आंबेडकर की मूर्तियों की बाढ़ आ गई। अनेक यूट्यूब चैनल खुल गये, जो खुलेआम हिन्दू देवी-देवताओं को गाली देने लगे, देश में हिंदू मंदिरों, मूर्तियों और पर्वों पर भीमयानियों ने बौद्ध बनकर दावा करना शुरू कर दिया और हिंदू की अनुसूचित जातियों के मन में झूठ बो-बो कर हिंदू समाज के विरुद्ध घृणा का गहरा बीज बोया जाने लगा! बड़ी मात्रा में डॉ आंबेडकर और बौद्ध धर्म से जुड़े सच्चे-झूठे साहित्य रचे जाने लगे। इस सब ने देश और समाज के अंदर एक ऐसी जातीय वैमनस्यता की खाई पैदा कर दी, जो दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है और शायद यह अब कभी न भरे!
ध्यान देने की बात यह है कि संघ की पार्टी जनसंघ की पहली सरकार मोरारी देसाई के नेतृत्व में बनी तो मंडल कमीशन का निर्माण (1 जनवरी 1979) कर समाज में जातीय वैमनस्यता को खड़ा करने की नींब रखी गई। संघ की पार्टी भाजपा के सहयोग से दूसरी सरकार जब वी.पी.सिंह के नेतृत्व में बनी तो मंडल कमीशन (अगस्त 1990) और SC/ST act (30 जनवरी 1990) को लागू कर समाज में जातीय नफरत का प्रसार गांव-गांव तक कर दिया गया, सवर्णों के जलते बच्चे इस दौर ने खुली आंखों से देखा। अनेक जातिवादी पार्टियों का उभार और मजबूती भी जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और वी.पी.सिंह काल की देन हैं। इसी दौर में दशकों पूर्व गुजर गये डॉ आंबेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न (1990) देकर उनका ‘कल्ट’ गढ़ने की शुरुआत हुई।
संघ की पार्टी भाजपा की जब तीसरी सरकार अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में बनी तो उन्होंने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के अवसरों का विस्तार किया और जाट आदि मजबूत वर्ग को OBC में आरक्षण की शुरुआत कर न खत्म होने वाला एक नया मोर्चा ही समाज में खोल दिया!
और जब संघ की पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार 2014 में आई तो SC/ST act को मजबूत बनाने, ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने, SC/ST act और OBC की जातियां केंद्र तय करे जैसे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को न केवल पलटा,बल्कि
आंबेडकर को भगवान ही बना दिया गया!
सवाल उठता है कि यह सोची-समझी साजिश थी या फिर वोट बैंक के लालच में बिना सोचे-समझे हिन्दू समाज को जातीय विध्वंस में संघी सरकारें ढकेलती चली गई? यह गहरे शोध का विषय है!
उम्मीद है इतिहासकार इस पर शोध करेंगे कि मोरारजी देसाई से लेकर नरेंद्र मोदी तक संघ के सहयोग से या संघी पार्टियों को जब-जब सत्ता मिली, चुनाव से पहले नारा तो एकता का दिया गया, लेकिन चुनाव जीतने के बाद नीतियों के जरिए धरातल पर जातीय विद्वेष को फैला कर उसी हिंदू एकता को तोड़ दिया गया। आखिर क्यों?
दूसरा सवाल है कि मोरारी देसाई और नरेंद्र मोदी दोनों गुजरात से आते हैं और दोनों ने जातीय विद्वेष को बढ़ाने के लिए आयोग व नीतियां बनाई? क्या यह भी महज संयोग है? यह सारे सवाल हर भारतीय और हिन्दू के मन में उठना चाहिए और इस पर एक गंभीर शोध होना चाहिए।
डॉ आंबेडकर पर भी शोध की आवश्यकता है। मेरे मित्र Kamal Rawat ji ने डॉ आंबेडकर पर अंग्रेजी पर एक शोधपरक पुस्तक लिखने की शुरुआत की है, जिसे #Kapot प्रकाशन छापने जा रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या स्वतंत्र रूप से उपरोक्त सभी सवालों का जवाब पाने के लिए बिना डरे बड़े स्तर पर शोधकर्ता आगे आ पाएगें? जब तक बड़े पैमाने पर इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए शोध नहीं होता, समाज में जातीय घृणा का जो स्तर पनप चुका है, वह शायद ही अब कभी कम हो!
