Courtesy Desk: इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज ने ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के खिलाफ अवमानना याचिका की सुनवाई से खुद को अलग किया। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने बुधवार को ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ दायर एक सिविल अवमानना याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।

जानकारी के अनुसार, जब मामला उनके पास सुनवाई के लिए आया तो उन्होंने ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश से नामांकन प्राप्त करने के बाद, इस मामले को एक नए मामले के तौर पर किसी दूसरी पीठ के समक्ष रखा जाए।
यह अवमानना याचिका हिस्ट्रीशीटर आशुतोष ब्रह्मचारी द्वारा दायर की गई है, जिसमें शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।
याचिका में हिस्ट्रीशीटर आशुतोष ने आरोप लगाया है कि “सार्वजनिक प्रदर्शनों और भड़काऊ मीडिया बयानों के ज़रिए, विरोधी पक्ष सक्रिय रूप से नाबालिग पीड़ितों और उनके परिवारों को डराने-धमकाने, डर का माहौल बनाने और उनके खिलाफ चल रही न्यायिक कार्यवाही को गैर-कानूनी तरीके से प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।”
याचिका के अनुसार,”विरोधी पक्ष सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना विभिन्न ज़िलों में यात्राएँ/जुलूस आयोजित कर रहे हैं और पीड़ित बच्चे के गृह ज़िले में जाकर सार्वजनिक सभाएँ कर रहे हैं, भाषण दे रहे हैं और भड़काऊ बयान दे रहे हैं; जिसके कारण नाबालिग पीड़ित बच्चों और उनके परिवारों के बीच डर और असुरक्षा का माहौल पैदा हो गया है। इससे न्यायिक प्रक्रिया के प्रभावित होने तथा पीड़ितों की सुरक्षा और निजता पर गंभीर असर पड़ने की संभावना है। वे मीडिया और सोशल मीडिया के ज़रिए प्रचार करके समाज में लगातार भ्रम फैला रहे हैं और अदालत की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।”
याचिका में यह भी कहा गया है कि ऊपर बताए गए कार्यक्रमों के दौरान, धार्मिक हस्तियाँ अलग-अलग न्यूज़ चैनलों, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और सार्वजनिक मंचों पर बार-बार भड़काऊ, गुमराह करने वाले और झूठे बयान देती हैं, और आरोप लगाती हैं कि उनके ख़िलाफ़ मामले “सरकार के इशारे पर” दर्ज किए जा रहे हैं। हिस्ट्रीशीटर आशुतोष का तर्क है कि इन बयानों का मकसद समाज में भ्रम पैदा करना, अदालत की निष्पक्षता पर शक पैदा करना और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना है; और यह कृत्य ‘अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971’ के तहत दंडनीय अवमानना के दायरे में आता है।
अवमानना याचिका में आगे यह दावा किया गया है कि उसकी नाक काटने के लिए सार्वजनिक रूप से 21 लाख रुपये के इनाम की घोषणा की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप 8 मार्च, 2026 को चलती ट्रेन के अंदर उन पर जानलेवा हमला हुआ, जिससे उन्हें चोटें भी आईं। इसके अलावा, आवेदक ने यह भी दावा किया है कि उन्हें एक पाकिस्तानी मोबाइल नंबर से WhatsApp कॉल के ज़रिए जान से मारने की धमकी मिली है, जिसमें उन्हें धमकी दी गई थी कि अगर उन्होंने मामले वापस नहीं लिए, तो उन्हें और उनके वकील को बम धमाके में मार दिया जाएगा। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये लगातार मिल रही धमकियाँ और हिंसा की घटनाएँ न्याय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप हैं।”
यह आशुतोष हिस्ट्रीशीटर का एक और ड्रामा लगता है। ज्ञात हो कि ट्रेन में नाक काटने की घटना की जांच में पुलिस को कोई साक्ष्य नहीं मिला था। यही नहीं, जिन किशोरों को उसने शंकराचार्य जी के विरुद्ध खड़ा किया था, अदालत में यह साबित हुआ कि वो कभी शंकराचार्य के गुरुकुल में पढ़े ही नहीं। यहां तक कि अदालत में मेडिकल रिपोर्ट भी सही साबित नहीं हुआ था। ज्ञात हो कि आशुतोष पर करीब दो दर्जन से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं।
साभार मूल लिंक:-https://www.livelaw.in/high-court/allahabad-high-court/pocso-case-allahabad-high-court-judge-recuses-contempt-swami-avimukteshwaranand-533253
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