संदीप देव। मेरे पिताजी बेहद जिंदादिल व्यक्ति थे। वह उत्सवप्रिय थे। छोटी बात को भी वह सभी के साथ उत्सव की तरह मनाते थे। ऐसी ही उनकी उत्सवधर्मिता का एक उदाहरण सिनेमा देखना था, जिसमें वह पूरे परिवार और पूरे गांव को शामिल कर लेते थे।
शायद उनसे ही गुण स्थानांतरित हुआ है कि हमारे पूरे परिवार को सिनेमा देखने का बड़ा चाव है। मां बताती है कि जब मैं उनके पेट में था तो डाक्टर से चेकअप कराने पिताजी उन्हें दरभंगा ले गये थे। वहां उन्होंने साथ में पहली फिल्म ‘संतोषी माता’ देखी थी।
जब मेरा जन्म हुआ और मैं करीब पांच साल का हुआ तो मुझे लेकर मेरे माता-पिता ने जो पहली फिल्म देखी थी वह अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘लावारिस’ थी। मुझे हल्की-फुल्की इसकी याद अभी भी मस्तिष्क में है।
मेरे पिताजी ने पांच साल छठ पर्व किया। संध्या अर्क के बाद वह पूरे गांव को गाड़ी में बैठाकर नाईट-शो फिल्म दिखाने ले जाते थे। वह इसलिए कि जब गांव लौटते थे तो सुबह के 2-3 बज रहे होते थे। फिर सोना नहीं होता था। वहां से लौटकर वह सीधे घाट पर अर्घ्य देने चले जाते थे। पिताजी के पास मेटाडोर गाड़ी थी, जिस पर पूरे गांव को लेकर वह सिनेमा दिखाने ले जाते थे। यहां पूरे गांव का तात्पर्य उन लोगों से है जो लोग सिनेमा के शौकीन थे और उत्सव की तरह सिनेमा देखने जाते थे।
मैं पटना में पढ़ता था। वहां से छुट्टियों में जब लौटता था तो जिद करता था सिनेमा देखने की! मेरी यह जिद मेरी मां पिताजी तक पहुंचाती थी। फिर पिताजी का मेटाडोर चल पड़ता था और शिव के बारात की तरह हर कोई उसमें शामिल हो जाता था। बूढ़ी परदादी और गांव की बहु से लेकर बच्चा, किशोर और पिताजी की मित्र मंडली तक, सभी साथ मिलकर सिनेमा का उत्सव मनाते थे। सभी के टिकट का खर्च मेरे पिताजी ही वहन करते थे।
एक बार पटना में मेरी परीक्षा थी। मैंने पिताजी से कहा कि सिनेमा दिखाइएगा तो ही परीक्षा दूंगा। वह हंसे और तुरंत तैयार हो गये। कहा, ‘पेपर अच्छे से देना तो अच्छी फिल्म दिखाऊंगा।’ पेपर अच्छा ही हुआ। फिर वो मुझे पटना के मोना टॉकीज में मैटनी शो दिखाने ले गये। मुझे अभी भी याद है सुनिल दत्त की ‘जानी दुश्मन’ फिल्म हमने देखी थी। मेरे साथ-साथ वह मेरे सभी दोस्तों को भी फिल्म दिखाने ले गये थे। फिर शाम में हम सभी को हॉस्टल छोड़ा था।
बहुत दिनों बाद मैं जब थोड़ा बड़ा हुआ तो मुझे उस घटना को याद करके अपनी मूर्खता और जिद पर गुस्सा भी आता था और स्वयं पर हंसी भी आती थी। मैं सोचता था कि हमें हॉस्टल में छोड़ते वक्त ही पिताजी को रात हो गई थी। वह रात में पटना से समस्तीपुर कैसे गये होंगे? परंतु यह सवाल मैं कभी उनसे नहीं पूछ सका। न जाने क्यों?
जब मैं पटना में पढ़ता था उस समय समस्तीपुर के बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति थे श्री हरिवंश नारायण सिंह। उन्होंने अपनी मां के नाम से ‘लक्ष्मी टॉकिज’ खोला था। हरिवंश बाबू भूमिहार समाज के सिरमौर थे। वह मेरे पिताजी से बहुत स्नेह करते थे। मेरे पिताजी ने अपने गांव के कई लोगों की नौकरी उनके सिनेमा हॉल में लगवाई थी। मेरे पिताजी, मेरे श्वसुर जी आदि सारे भूमिहारों की शाम उस सिनेमा हॉल पर ही गप्पें लड़ाते, ताश या लूडो खेलते और सिनेमा देखते हुए गुजरती थी!
पिताजी जब छुट्टी में मुझे पटना से लाते थे तो सिनेमा हॉल पर छोड़ देते थे। अपने लोगों व समाज के लिए हरिवंश बाबू ने वहां अलग से एक बाक्स बनवा रखा था, जिसमें सपरिवार बैठकर आप फिल्म देख सकते थे। उसमें बेहद लिमिट संख्या में सीटें थीं। पिताजी उसी बाक्स में मुझे बैठा देते थे। जब तक रात्रि में गांव जाने का समय नहीं होता था, एक ही फिल्म मैं लगातार कई-कई शो देखता था। मुझे याद है मनोज कुमार की फिल्म ‘क्रांति’ मैंने कई बार देखी थी। रात में घर ले जाते वक्त पिताजी पूछते थे कि ‘मन लगा?’ मैं हंसते हुए ‘हां’ में जवाब देता था!

इस सिनेमा हॉल से जुड़ी एक घटना ऐसी है कि मुझे जब भी याद आती है तो मैं आज भी खूब हंसता हूं! पटना में मैं जिस गुरुकुल में पढ़ता था, वहां रविवार को टेलीविजन पर फिल्म दिखाया जाता था। उस समय टेलीविजन नया-नया आया ही था। वहां एक फिल्म दिखाई गईं थी, जिसमें एक सीन था कि एक नये बने पुल निर्माण में बच्चे की बली दी जाती थी। पता नहीं कौन सी फिल्म थी, याद नहीं आ रही है!
पहली बार पटना से छुट्टी में जब पिताजी मुझे लेने आए तो समस्तीपुर पहुंच कर मुझे उस स्थान पर एक कुर्सी पर बैठा दिया, जहां भविष्य में लक्ष्मी टॉकीज का निर्माण होना था। तब वहां निर्माण कार्य ही चल रहा था। बैठे-बैठे रात होने लगी थी। मेरे पिताजी सहित वहां सभी की आदत थी कि सभी शाम तक साथ रहते थे और फिर रात घिर आने पर घर के लिए निकलते थे।
शाम होते ही मुझे डर लगने लगा। मुझे लगा कि इस निर्माण में मेरी बली दी जाएगी। पिताजी कहीं मुझे बली देने के लिए तो नहीं यहां लाए हैं? मुझे मां की याद आने लगी और मैं रोने लगा। घर पहुंच कर मैंने मां को यह बताया। वह खूब हंसी और पिताजी को डांट भी लगाई कि सुबह से बच्चे को लाकर घर लाने की जगह एक निर्माण स्थल पर बैठा रखा है, जिससे वह डर गया। आज भी उस घटना की याद आती है तो अपनी मूर्खता पर मैं खूब हंसता हूं!
अभी इसी अक्टूबर में पिताजी हमारे साथ बहादुरगढ़ में थे। दिल्ली जब भी मां-पिताजी आते तो तीन-चार महीने रुक कर सारा मेडिकल जांच आदि करवाते थे, फिर जाते थे। अभी उनको यहां से गये एक महीने भी नहीं बीते थे कि वह अचानक से हम सभी को छोड़कर इस दुनिया को चले गये!
जब पिताजी यहां थे तो अगस्त में मेरे छोटे भाई Amardeep Deo का 20 अगस्त को जन्मदिन था। उस समय दो अच्छी फिल्म एक साथ रिलीज हुई थी। रजनीकांत की ‘कुली’ और रितिक रोशन की ‘वार-2’. आपको आश्चर्य होगा कि बिल्कुल स्टूडेंट लाइफ की तरह हम पूरे परिवार ने एक ही दिन में पहले ‘कुली’ देखी और फिर ‘वार-२’.

‘कुली’ देखने के बाद होटल में खाना खाए और फिर वहीं विचार बना कि फिर चलते हैं ‘वार-२’ देखने। मां ने मना किया कि ‘मैं थक जाऊंगी। अगले दिन देखना।’ पिताजी ने कहा, ‘अरे बच्चों का मन है तो देख लेते हैं। तुम्हारे आराम से बैठने की व्यवस्था कर देंगे।’ नाईट-शो था। हॉल लगभग खाली ही था, तो मां-पिताजी को उस स्थान पर बैठाया गया, जहां बड़े आराम से पैर पसार कर दोनों बैठ सकते थे!
इस दुनिया से जाने से कुछ माह पहले भी पिताजी हम सभी के साथ नाईट शो और वह भी एक दिन में दो सिनेमा देख रहे थे! यह सब जब याद आता है तो मन बड़ा मायूस हो जाता है। पिताजी मेरे साथ वेब सीरीज देखने में कंम्पटीशन करते थे कि कौन पहले खत्म करता है! ऐसे जिंदादिल इंसान की मौत भी कैसे जिंदादिल तरीके से हुई कि वह मां को चिढाते हुए और उस पर खुलकर हंसते हुए इस दुनिया से विदा हो गये! खिलखिलाकर हंसते हुए उन्होंने यह धरती छोड़ा है। हर साल दिल्ली में उनकी सभी जांच करवाने वाले डाक्टर महाजन अमरदीप से कह रहे थे कि ‘मेडिकल साईंस के पास आपके पिताजी की मृत्यु का कोई जवाब नहीं है। काश! हम सभी की मृत्यु भी ऐसी ही हो!’
मेरी मां कहती है कि ‘तुम्हारे दादजी को भी फिल्म देखने का बड़ा शौक था। वहीं से वह गुण तुम्हारे पिताजी में आया और पिताजी से तुम लोगों के अंदर।’ क्या फिल्म देखना भी वंशानुगत होता है? सोच कर तो हंसी ही आती है। पिताजी के जाने के बाद कुछ दुख, कुछ हंसी और उनकी ढेर सारी यादें ही रह गई है़ं हम सभी के जीवन में!
