इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। धर्मनगरी उज्जैन में सिंहस्थ महापर्व 2028 की तैयारियों और सड़क चौड़ीकरण की सरकारी योजना उस समय स्तब्ध रह गई, जब प्रशासन करीब 170 वर्ष पुराने ऐतिहासिक ‘खड़े हनुमान मंदिर’ की प्राणप्रतिष्ठित प्रतिमा को हटाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ।
सड़क चौड़ीकरण की जद में आए इस प्राचीन देवालय के बाहरी ढांचे को तो प्रशासनिक बुलडोज़रों ने ध्वस्त कर दिया, किंतु जब गर्भगृह में स्थापित हनुमान जी की भारी पाषाण प्रतिमा को विस्थापित करने का उपक्रम आरंभ हुआ, तो आधुनिक यांत्रिकी और प्रशासनिक हठ दोनों धराशायी हो गए। दो दिनों तक लगातार कई भारी क्रेनों, हाइड्रोलिक मशीनों और तकनीकी विशेषज्ञों की पूरी फौज जुटी रही, पट्टे बांधकर जोर आजमाइश की गई, लेकिन विग्रह टस से मस न हुआ। अंततः प्रशासन को विवश होकर काम रोकना पड़ा और अब प्रतिमा की प्राचीनता आंकने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वे कराने की बात कही जा रही है।
आधुनिक विज्ञान पर आस्था की विजय: तकनीक हुई बेबस
भौतिक विज्ञान, हाइड्रोलिक दबाव और भारी-भरकम क्रेनें उस शक्ति के आगे बौनी साबित हुईं जिसे सनातनी जनमानस केवल ईंट-पत्थर नहीं, साक्षात चैतन्य विग्रह मानता है। मशीनों की घड़घड़ाहट और प्रशासनिक अमले का अहंकार जब एक प्राचीन शिलाखंड के आगे परास्त हुआ, तो यह घटना आस्था और दैवीय चेतना के एक विराट साक्ष्य में तब्दील हो गई।
तुलसीदास जी ने लंका कांड में अंगद के उस पैर का वर्णन किया था जिसे रावण के बड़े-बड़े महारथी अपनी समूची ताकत लगाकर भी भूमि से एक इंच नहीं हिला सके थे। उज्जैन की इस सड़क पर ठीक वही दृश्य चरितार्थ हुआ। वैज्ञानिक तर्कों और विकास की अंधाधुंध व्याख्याओं के बीच यह घटना जन-आस्था की वह हुंकार बनकर उभरी, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि श्रद्धा के अधिष्ठान केवल सरकारी फाइलों के आदेश से विस्थापित नहीं किए जा सकते।
सत्ता की हनक, छद्म हिंदूवाद और मूल धर्म पर तीखा प्रहार
इस तथाकथित चमत्कार पर मुग्ध होकर ताली बजाने से पूर्व उस नग्न और कड़वे यथार्थ का चीरफाड़ करना आवश्यक है, जिस पर आज पूरा तथाकथित हिंदूवादी तंत्र और सत्ता के चरणचुंबक मौन साधे बैठे हैं।
सत्ता की सनक देखिए कि उसके लिए सड़क चौड़ी करना इतना अपरिहार्य हो गया कि उसने पवनपुत्र हनुमान की प्राणप्रतिष्ठित मूर्ति को उखाड़ने का दुस्साहस कर डाला। सवाल यह है कि यह चौड़ीकरण किसके लिए हो रहा है? क्या इंजीनियरिंग और आधुनिक शहरी नियोजन में ऐसा कोई विकल्प नहीं था कि सड़क को मूर्ति के दोनों तरफ से निकाल कर ‘राउंडअबाउट’ (गोल चक्कर) बना दिया जाता, जैसा कि कई ऐतिहासिक शहरों में हेरिटेज संरचनाओं के साथ किया जाता है? 170 वर्ष पुरानी धरोहर को बचाने के लिए सड़क का नक्शा क्यों नहीं बदला गया?
क्या यह सच नहीं है कि डकैत नेताओं और पाखंडी बाबाओं की करोड़ों की वातानुकूलित गाड़ियों का काफिला बिना किसी अवरोध के सीधे सिंहस्थ कुंभ के वातानुकूलित पंडालों तक पहुंच सके, इसलिए एक 170 साल पुराने मंदिर पर बुलडोजर चला दिया गया? क्या सनातन धर्म की परिभाषा यही है कि वीआईपी संस्कृति के आगे देवताओं के मंदिरों की बलि चढ़ा दी जाए?
उज्जैन की पुण्यभूमि पर सिंहस्थ कुंभ क्या पहली बार आयोजित हो रहा है? सदियों से बिना कंक्रीट के चौड़े हाईवे और बिना मंदिरों को तोड़े यह महापर्व सनातन की गरिमा के साथ संपन्न होता रहा है। फिर आज अचानक यह 170 वर्ष पुराने हनुमान जी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी ‘बाधा’ कैसे बन गए? उज्जैन 13 अखाड़ों और हजारों साधु-संतों की तपस्थली है। जब एक प्राचीन विग्रह पर क्रेनें लगाई जा रही थीं, तब इन अखाड़ों, मठाधीशों और धर्माचार्यों का मौन क्या सत्ता के साथ उनकी मिलीभगत या उदासीनता को उजागर नहीं करता?
शास्त्रों का उल्लंघन और समाज की आपराधिक चुप्पी
हिंदू धर्मग्रंथ, आगम शास्त्र और मंदिर वास्तु विधान इस बात की स्पष्ट घोषणा करते हैं कि किसी भी प्राणप्रतिष्ठित प्रतिमा और मंदिर का मनमाना स्थानांतरण अक्षम्य अधर्म है। मंदिर कोई सार्वजनिक शेड या अस्थायी निर्माण नहीं होता जिसे जब चाहा क्रेन से उठाकर दूसरी जगह रख दिया। यदि प्राणप्रतिष्ठा के उपरांत विग्रह चैतन्य हो चुका है, तो उसे सड़क से हटाने का अधिकार किसी लोकतांत्रिक सरकार या नगरपालिका को किस शास्त्र ने दिया?
इसके बावजूद सत्ता अपनी जिद पर अड़ी हुई है। मंदिर तोड़ा जा चुका है, विग्रह को हटाने के प्रयास बदस्तूर जारी हैं और अब बहानेबाजी के लिए एएसआई का सहारा लिया जा रहा है कि मूर्ति कितनी पुरानी है।
सबसे बड़ा त्रासद पहलू तो हिंदू समाज का आत्मघाती संवेदनशून्य व्यवहार है। हिंदू इस बात पर तो खुश हो रहा है कि ‘हनुमान बाबा मध्य प्रदेश सरकार से हटे नहीं’, लेकिन वही हिंदू सत्ता से यह बुनियादी सवाल पूछने का साहस क्यों नहीं जुटा पा रहा कि उन्हें हटाने का प्रयास किया ही क्यों गया? अपनी ही संस्कृति और धर्म के विरुद्ध यह ध्वंसकारी कदम उठाने की हिम्मत सरकार ने की कैसे? जब तक समाज ‘चमत्कार’ के मुगालते से बाहर निकलकर सत्ता के इस धर्मविरोधी आचरण पर तीखे सवाल नहीं पूछेगा, तब तक विकास के नाम पर सनातन आस्था के केंद्रों की बलि चढ़ाने का यह सिलसिला थमेगा नहीं।

सही सवाल, आखिर मूर्ति उखाड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या सिंहस्थ पहली बार हो रहा है ??? लेकिन सत्ता की हनक जो न करवाये कम है🤔
🙏🚩
जब तक मूर्ति मंदिर में विराजमान है, हिंदू एक लोटा जल चढ़ा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। कोई भी आकर उसे किसी भी नाम पर तोड़े उसे कोई फर्क नहीं पड़ता! मेरी समझ में नहीं आता कि विकास के रास्ते में आई(महाजिद) मस्जिद क्यों बीच सड़क कैसे तनी खड़ी रहती है, जिसमें सिवाय दीवारों के कुछ नहीं होता।
,