संदीप देव। जाति विमर्श की पिछली कड़ियों में हमने डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रमुख ऐतिहासिक कृतियों—’Who Were the Shudras?’ के 10 प्रश्नों, ‘The Untouchables’ के काल-निर्धारण (400 ईस्वी), मनुस्मृति के वास्तविक दंड-विधान और 1936 के ‘Annihilation of Caste’ (जाति उन्मूलन) के वैचारिक अंतर्विरोधों का तथ्यपरक विश्लेषण किया।
उन अध्ययनों से यह स्थापित हुआ कि सनातन परंपरा में जाति कभी राज्य-प्रायोजित या जन्मना शोषण का बंद पिंजरा नहीं थी। किंतु आधुनिक भारत का सबसे बड़ा यथार्थ यह है कि स्वतंत्रता के बाद जिस जाति-चेतना को समाप्त होना चाहिए था, वह स्वतंत्र भारत के चुनावी लोकतंत्र में क्षीण होने के बजाय, अधिक संस्थागत, आक्रामक और जन्मगत होती चली गई।

तथ्यों से अवगत करवाने के लिए आप को बहुत बहुत साधुवाद प्रभु श्री हरि आप को सुदीर्घ आयु प्रदान करें।