संपादकीय: संदीप देव ।
इतिहास की विडंबना देखिए। जो सोशल मीडिया कभी नरेंद्र मोदी को सत्ता के शिखर तक पहुँचने की सीढ़ी बना था, आज उसी सीढ़ी को कुल्हाड़ी से काटने की तैयारी हो चुकी है। जिस मंच ने एक क्षेत्रीय मुख्यमंत्री को ‘विश्वगुरु’ की छवि प्रदान की, आज वही मंच जब आईना दिखाने लगा है, तो सत्ता को आईना ही ‘राष्ट्रद्रोही’ नजर आने लगा है।
India Speak Daily जैसे स्वतंत्र मंचों और संदीप देव जैसे पत्रकारों पर FIR व नोटिसों की बौछार यह सिद्ध करती है कि दिल्ली के गलियारों में अब ‘तर्क’ और ‘तथ्य’ नहीं, पत्रकारों और जनता की आवाज दबाने के लिए ‘कानूनी हंटर’ चल रहा है!
1. 2014 का ‘वरदान’ अब 2026 का ‘अभिशाप’ क्यों?
याद कीजिए 2014 का वह दौर, जब मुख्यधारा की मीडिया नरेंद्र मोदी के नाम से बिदकती थी। तब सोशल मीडिया के छोटे-छोटे कंटेंट क्रिएटरों ने निस्वार्थ भाव से एक नैरेटिव गढ़ा था। सत्ता में आने के बाद इसी सरकार ने उन क्रिएटर्स को ‘अवार्ड’ बाँटकर अपनी चापलूसी की एक फौज तैयार करने की कोशिश की। लेकिन २०२४ के चुनाव परिणामों ने सत्ता के अहंकार को वह चोट दी है कि अब ‘डिजिटल मित्र’ भी ‘शत्रु’ नजर आने लगे हैं।
जैसे ही बहुमत का आंकड़ा फिसला, सरकार का धैर्य भी फिसल गया। अब डिजिटल दुनिया में ‘वाह-वाही’ नहीं, बल्कि UGC कानून, बढ़ती महंगाई, और अमेरिका के सामने ट्रेड डील के आत्मसमर्पण पर सवाल पूछे जा रहे हैं। और यही वह बिंदु है जहाँ सरकार ने ‘संवाद’ के बजाय ‘दमन’ का रास्ता चुना है।
2. IT एक्ट की धारा 69A: अभिव्यक्ति का नया वध-स्थल!
सरकार ने IT Rules 2026 में जो संशोधन किए हैं, वे किसी ‘डिजिटल आपातकाल’ से कम नहीं हैं। मात्र 3 घंटे के भीतर पोस्ट हटाने का आदेश और पूरे के पूरे अकाउंट को उड़ा देना—यह लोकतंत्र है या किसी तानाशाह की जागीर?
जब सरकार एप्सटीन फाइल्स या ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए गैस संकट पर घिरती है, तो वह उत्तर देने के बजाय पूछने वाले का गला दबा देती है। India Speaks Daily को भेजे गए नोटिस और दर्ज की गई FIR इसी हताशा का प्रमाण हैं। यह हमला केवल एक पोर्टल पर नहीं, बल्कि उस हर नागरिक पर है जो अपनी स्क्रीन पर सच लिखने का साहस करता है।
3. तुष्टिकरण और जातीय विभाजन का नया खेल!
विमर्श गहरा है। एक तरफ हिंदू समाज को जातियों में बांटने की साजिशें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ ‘सबका साथ’ के नाम पर तुष्टिकरण की वही पुरानी राह पकड़ी जा रही है जिससे लड़ने का वादा करके यह सरकार आई थी। जब इन विसंगतियों पर सोशल मीडिया का ‘आम आदमी’ मुखर होता है, तो उसे ‘भ्रामक सूचना’ (Misinformation) के नाम पर चुप करा दिया जाता है।
क्या सत्ता इतनी कमजोर हो गई है कि वह एक ‘व्यंग्य’ या ‘आलोचनात्मक पोस्ट’ से ढह जाएगी? या फिर डर इस बात का है कि जनता अब उस तिलिस्म को समझ चुकी है जो पिछले १० सालों से बुना गया था?
4. पतन की राह पर बढ़ता अहंकार!
राजनीति का शाश्वत नियम है—”जनता की आवाज़ दबाने वाली कोई भी सरकार अपने पतन की पटकथा खुद लिखती है।” आज जो अधिकारी और नेता ‘डिजिटल हंटर’ चला रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि डिजिटल दुनिया की याददाश्त बहुत लंबी होती है।
आप अकाउंट उड़ा सकते हैं, आप FIR दर्ज कर सकते हैं, आप जेल की सलाखें दिखा सकते हैं, लेकिन आप उस ‘विचार’ को नहीं मार सकते जो अब जनता के मानस में घर कर चुका है।
India Speak Daily न पहले झुका था, न अब झुकेगा। सच कहना अगर जुर्म है, तो यह जुर्म हम बार-बार करेंगे। लोकतंत्र किसी की जागीर नहीं, यह उन करोड़ों जनता का संगम है जिन्हें दबाने की कोशिश में बड़े-बड़े साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गए।
कलम पर पहरा बिठाने वालों,
याद रखना,
स्याही जब सूखती है,
फिर इतिहास के पन्नों पर अंगारे बनकर उभरती है!

जय सियाराम हर हर महादेव!