धर्म-युद्ध प्रारम्भ हो चुका ,अब तभी युद्ध रुकने वाला है ;
समूल-नाश पापी का करके , हर-पाप मिटाने वाला है ।
हर-सीमा तक पाप बढ़ चुके , सारी-मर्यादा टूट चुकी है ;
नेता,अफसर,व्यापारी,बाबा को , चरित्रहीनता लूट चुकी है ।
नेता मंदिर – मूर्ति तोड़ता , पाप भरे गलियारे बनते ;
धर्म को धंधा बना दिया है, नेता नान-बायोलॉजिकल बनते ।
धर्महीन-अज्ञानी हिंदू , सब के सब ये महा-मूर्ख हैं ;
दसकों से कर रहे मूर्खता , नेतृत्व बनाता इन्हें मूर्ख हैं ।
न तो अपने-धर्म को जाना , न कोई मजहब पहचाना ;
रंगा-सियार अब्बासी-हिंदू , उसको अपना नेता माना ।
धर्म-युद्ध की आग भयानक , सारा भ्रष्टाचार जलेगा ;
अब्बासी-हिंदू स्रोत है जिसका, वो सारा व्यभिचार मिटेगा ।
जितने काले-कानून देश में , एक-एक कर मिट जायेंगे ;
राज्य के चारों-अंग भंग हैं , पूरी तरह बदल जायेंगे ।
जितनी भी पापी-सरकारें , जो लोकतंत्र को नष्ट कर रहीं ;
चुनाव-आयोग को जेब में रखकर,बेईमानी से राज कर रहीं ।
उनके अच्छे-दिन बीत गये हैं , अंधकार मिटने वाला है ;
धर्म का सूरज उदय हो रहा , अब सुराज आने वाला है ।
कोई अन्यायी नहीं बचेगा , कहीं नहीं छुपने पायेंगे ;
सारे बगुला – भगत देश के , करनी का फल पायेंगे ।
अब्बासी-हिंदू नेता का क्या, क्या झोला लेकर भाग पायेगा ?
ये तो बिलकुल नहीं बचेगा , सजा अधिकतम पायेगा ।
घड़ी आ गई है निर्णय की , सबका निर्णय हो जायेगा ;
सारे गंदे नेता – अफसर का , पूर्ण – सफाया हो जायेगा ।
उनके साथी बाबा – व्यापारी , सबका मुंह काला होगा ;
काला-धन सब छिनेगा इनका , काला-व्यापार बंद होगा ।
देश के ये सारे-अपराधी , सब अधर्म-पक्ष में आ जायेंगे ;
धर्म – पक्ष में सच्चे – हिंदू , ये सब एक साथ आयेंगें ।
धर्म-युद्ध दूजा-महाभारत , अबकी लम्बा चलने वाला है ;
अठारह-दिनों तक चला था पहला, ये वर्षों चलने वाला है ।
इस बार पाप की जड़े हैं गहरी, पुनः “कृष्ण” को आना होगा ;
“अवतार-कल्कि” प्राकट्य हो चुका,हर पापी को मरना होगा ।
धर्म की सेना के सेनापति , “भगवान – शंकराचार्य” हैं ;
धर्म – सनातन के ये रक्षक , सदा करें शुभ – कार्य हैं ।
धर्म-सनातन के जो भक्षक, उनकी है अब अंतिम-यात्रा ;
निश्चित-विजय धर्म की होगी, चल रही धर्म की विजय-यात्रा ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
