जेन-जी ! तुमको क्या करना ?
आत्महत्या करने से बेहतर , उसके कारण को मिटा जाओ ;
“भगत-सिंह” की तरह से लड़ना,देश के हित में मिट जाओ ।
“राजगुरु-सुखदेव-भगत सिंह” , हमको मार्ग दिखाते हैं ;
जेन-जी ! तुमको क्या करना ? यही मार्ग बतलाते हैं ।
भ्रष्टाचार का गंदा-नाला , भारत की नैया डूब रही है ;
पूरी तरह बंद हो नाला , सरकारें क्यों बढ़ा रही हैं ?
ऐसे कानून बने भारत में , भ्रष्टाचार को ही संरक्षण ;
चोर हैं चौकीदार यहां के , संतुष्टीकरण व आरक्षण ।
देशभक्त जब नहीं हों नेता , तब ऐसा ही होता है ;
पाखंडी जब धर्मगुरु हों , तब हिंदू मूरख होता है ।
धर्महीन – अज्ञानी हिंदू ! नेता के चक्कर में फंसता ;
महादुष्ट अब्बासी – हिंदू , हिंदू का नेता बनता रहता ।
पूरा-आबा बिगड़ चुका है , क्या जवान क्या बुड्ढा है ?
स्वार्थ ,लोभ ,भय ,भ्रष्टाचार का , खोद रहे गहरा-गड्ढा है ।
जबकि मरेंगे इसी में गिरकर, हिंदू ! की मौत का गड्ढा है ;
इनकी लाशों से भरेगा गड्ढा , क्या नहीं जानता बुड्ढा है ?
खरी-खरी सच बात यही है , और नहीं है बात दूसरी ;
“धर्म-सनातन” में हिंदू ! लौटो , तभी बनेगी बात अधूरी ।
कब्र में जिनके पांव हैं लटके , वे बुड्ढे भी राह में आयें ;
महामूर्खता अपनी छोड़ें , अब्बासी-हिंदू नेता धकियायें ।
बुड्ढो ! बुड्ढे-नेता को छोड़ो , पूरी तरह सठियाया है ;
सच्चे-नेता को लाना होगा , जिसे जेल भिजवाया है ।
“सोनम-वांगचुक” हैं सच्चे-नेता , इनको फौरन रिहा करो ;
वरना वो दिन दूर नहीं है , जब सब गड्ढे में डूब मरो ।
देशभक्त व चरित्रवान ही , अब ऐसा नेता है अनिवार्य ;
अच्छी-सरकार बनानी होगी , तब पूरे होंगे देश के कार्य ।
और नहीं है मार्ग दूसरा , इसी मार्ग पर चलना होगा ;
अच्छा-नेतृत्व बनाना होगा , या हिंदू को मिटना होगा ।
“भविष्य-मालिका” यही कह रही , बार-बार बतलाती है ;
फिर भी हिंदू नहीं चेतता, क्या खुदकुशी उसे ललचाती है ?
स्वार्थ में जो भी अंधा होता , गड्ढे में ही गिरता है ;
अब्बासी-हिंदू है मौत का गड्ढा, हिंदू ! क्यों नंही समझता है ?
हिंदू ! धर्म पर चलना सीखो , नेत्रदोष को ठीक करो ;
हिंदू ! “शंकराचार्य” की मानो , वरना फिर बेमौत मरो ।
“गौ – गंगा – गीता” की रक्षा , हर हालत में करना है ;
अच्छी-सरकार बनानी होगी , सर्वप्रथम यही करना है ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
