संदीप देव। कथा विवाद में कल मैंने पुराणों से यह बताया था वेदव्यास जी ने अपने शिष्य लोमहर्षण सूतजी को पुराण विद्या दी थी। लोमहर्षण सूतजी प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न हुए थे अतः शुद्र वर्ण में आते हैं।
नैमिषारण्य में शौनक जी उन्हें व्यास गद्दी प्रदान करते हुए उनसे पुराण कथा का वाचन करवा रहे थे। अचानक तीर्थयात्र से बलराम जी वहां पहुंचे। सूतजी उन्हें देखकर न आसन से उठे न नमस्कार आदि किया, इस पर बलराम जी ने यह सोचते हुए कि एक सूत को ब्राह्मणों का स्थान दिया गया है, परंतु फिर भी इसमें नम्रता नहीं है, आवेश में उन्हें मारा डाला।
ऋषियों के यह कहने पर कि सूतजी पुराणों का वाचन कर रहे थे और वह व्यासपीठ पर थे, इसलिए आपको ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा। बलराम जी ने प्रायश्चित किया और बचे पुराणों की कथा के लिए लोमहर्षण जी के पुत्र उग्रश्रवा सूतजी को बुला लाए और उन्हें अपने आशीर्वाद से बल, आयु आदि प्रदान किया। बाद में उग्रश्रवा जी ने बांकी बचे पुराणों की कथा कही।
कुपढ़ लोग यह कथा सुनते ही भड़क गये और इसे झूठा बताने लगे। तो कुपढ़ों श्रीमद्भागवत पुराण के 10 वें स्कंद( उत्तरार्द्ध ) के 78 वें अध्याय के श्लोक संख्या 22 से लेकर 36 तक को पढ़ डालो। गीता प्रेस, चौखंबा, श्रीधरी टीका- भागवत महापुराण का जो भी संस्करण तुम्हारे पास है, उन्हें पढ़ डालो।
वेदव्यास जी ने स्त्री, शूद्र और द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) जाति के अधम मनुष्यों के लिए ही महाभारत और पुराणों की रचना की और पुराण का ज्ञान सूत जाति में उत्पन्न अपने शिष्य लोमहर्षण जी को दिया ताकि वेद से वंचित लोगों को वेद का ज्ञान महाभारत और पुराणों के माध्यम से मिल सके।
अतः हे कुपढ़ो, कम से कम भागवत पुराण तो पढ़ ही लो। या यह भी नहीं पढ़ सकते तो ऊपर जितनी श्लोक संख्या लिखी है, उतना ही पढ़ लो ताकि तुम्हारी बुद्धि खुल जाए। पढ़ो, क्योंकि शास्त्रों का ज्ञान ही तुम्हें मुक्ति प्रदान करेगा। जयश्री कृष्ण 🙏
